10 में से पाठ 9 · प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय इतिहास

विजयनगर, बहमनी राज्य तथा भक्ति और सूफ़ी आंदोलन

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विजयनगर की स्थापना

विजयनगर की स्थापना 1336 में संगम परिवार के भाइयों हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम ने की, परंपरा के अनुसार संत विद्यारण्य की प्रेरणा से। इसकी राजधानी विजयनगर (आधुनिक हम्पी) तुंगभद्रा के दक्षिणी तट पर थी। चार राजवंशों ने शासन किया: संगम (1336-1485), सालुव (1485-1505), तुलुव (1505-1570) और अराविडु (1570 से)। इतालवी यात्री निकोलो दी कोंटी देवराय प्रथम के समय आया, और फ़ारसी दूत अब्दुर्रज़्ज़ाक 1443 में देवराय द्वितीय के समय आया, जिसने अपनी सेना में मुस्लिम घुड़सवार और धनुर्धर भर्ती किए।

कृष्णदेव राय

तुलुव राजा कृष्णदेव राय (1509-1529) विजयनगर का सबसे महान शासक था। उसने बीजापुर के सुल्तान को हराकर 1520 में रायचूर लिया, ओडिशा के गजपति राजा प्रतापरुद्र को पराजित किया, और घोड़ों की आपूर्ति करने वाले पुर्तगालियों से अच्छे संबंध रखे। उसने तेलुगु में आमुक्तमाल्यद, जिसमें राज्य-शासन पर भी चर्चा है, और संस्कृत में जांबवती कल्याणम् लिखा, और उसे आंध्र भोज कहा गया। अष्टदिग्गज कहलाने वाले आठ कवि, जिनमें अल्लसानि पेद्दन और तेनालि रामकृष्ण शामिल थे, उसके दरबार की शोभा थे। पुर्तगाली डोमिंगो पेस ने उसकी राजधानी का वर्णन किया, और फ़र्नाओ नूनिज़ ने कुछ समय बाद साम्राज्य के बारे में लिखा। हम्पी का पत्थर के रथ वाला विट्ठल मंदिर और हज़ार राम मंदिर विजयनगर के सबसे प्रसिद्ध स्मारकों में हैं।

प्रशासन और तालीकोटा

नायंकर व्यवस्था के अंतर्गत नायक या अमरनायक कहलाने वाले सैन्य प्रमुखों को सेना रखने और नज़राना देने के बदले क्षेत्र (अमरम) मिलते थे; इनमें से कई बाद में स्वतंत्र हो गए, जैसे मदुरै और तंजावुर के नायक। गाँवों की सेवा बारह वंशानुगत कर्मचारियों का एक समूह करता था, जिसे आयगार कहते थे। कृष्णदेव राय और उसके भाई अच्युत देव राय के बाद सत्ता सदाशिव राय के संरक्षक आलिय राम राय के हाथ में चली गई। दक्कन की राजनीति में उसके हस्तक्षेप ने बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा और बीदर को एकजुट कर दिया, जिन्होंने 23 जनवरी 1565 को तालीकोटा (जिसे राक्षस-तंगड़ी या बन्नीहट्टी भी कहते हैं) में उसे कुचल दिया। राम राय मारा गया और राजधानी लूटी गई तथा उजाड़ दी गई; अराविडु वंश ने पेनुकोंडा और बाद में चंद्रगिरि से शासन जारी रखा।

बहमनी राज्य और उसके उत्तराधिकारी

1347 में अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (हसन गंगू) ने मुहम्मद बिन तुगलक के विरुद्ध विद्रोह कर गुलबर्गा को राजधानी बनाकर बहमनी राज्य की स्थापना की; बाद में राजधानी बीदर ले जाई गई। बहमनी शासक कृष्णा और तुंगभद्रा के बीच के उपजाऊ रायचूर दोआब के लिए विजयनगर से बार-बार लड़े। मुहम्मद शाह तृतीय के प्रधानमंत्री, फ़ारसी मूल के महमूद गवाँ ने प्रांतों का पुनर्गठन किया, गोवा जीता और बीदर में एक विशाल मदरसा बनवाया, पर 1481 में एक जाली आरोप पर उसे मृत्युदंड दे दिया गया, जिसके बाद राज्य बिखर गया। रूसी व्यापारी अफ़ानासी निकितिन 1469 से 1472 के बीच यहाँ आया। इसके पाँच उत्तराधिकारी राज्य थे: बीजापुर (आदिलशाही), अहमदनगर (निज़ामशाही), बरार (इमादशाही), गोलकुंडा (कुतुबशाही) और बीदर (बरीदशाही)। बीजापुर का गोल गुंबज मुहम्मद आदिल शाह का मकबरा है, और चारमीनार (1591) हैदराबाद के संस्थापक मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया। चाँद बीबी ने अकबर के विरुद्ध अहमदनगर की रक्षा की, और औरंगज़ेब ने 1686 में बीजापुर और 1687 में गोलकुंडा को मुगल साम्राज्य में मिला लिया।

दक्षिण में भक्ति

भक्ति, अर्थात् सभी जातियों और स्त्रियों के लिए खुली, अपने इष्टदेव के प्रति प्रेमपूर्ण निष्ठा, छठी से नौवीं शताब्दी के बीच तमिल प्रदेश में 63 नायनारों, अर्थात् अप्पर, संबंदर और सुंदरर जैसे शिव भक्तों, और 12 आलवारों, अर्थात् विष्णु भक्तों, के साथ आरंभ हुई; आलवारों में आंडाल एकमात्र स्त्री थीं। बाद में आचार्यों ने भक्ति को दार्शनिक आधार दिया: रामानुज ने विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट अद्वैतवाद), मध्व ने द्वैत (द्वैतवाद), निंबार्क ने द्वैताद्वैत और वल्लभ ने शुद्धाद्वैत की शिक्षा दी, जो आठवीं शताब्दी के शंकराचार्य के अद्वैत (अद्वैतवाद) से भिन्न थे। कर्नाटक में कलचुरि राजा बिज्जल के मंत्री बसवन्ना ने बारहवीं शताब्दी में वीरशैव (लिंगायत) आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसने अपने वचनों के माध्यम से जाति और कर्मकांड को अस्वीकार किया।

पश्चिम, उत्तर और पूर्व में भक्ति

महाराष्ट्र में वारकरी संत पंढरपुर के विठोबा की उपासना करते थे: ज्ञानेश्वर ने गीता पर मराठी टीका ज्ञानेश्वरी लिखी, और उनके बाद नामदेव, एकनाथ और तुकाराम हुए, जिनके गीत अभंग कहलाते हैं। उत्तर में रामानंद ने भक्ति को सभी जातियों के लिए खोल दिया। जुलाहे कबीर ने निराकार (निर्गुण) ईश्वर की भक्ति सिखाई, मूर्ति-पूजा और जाति पर प्रहार किया, और उनके दोहे बीजक में संकलित हैं; रैदास (रविदास), दादू दयाल और सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक (1469-1539) इसी निर्गुण धारा के हैं। सगुण संतों ने साकार ईश्वर की उपासना की: तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस लिखा, सूरदास ने सूरसागर, और राजपूत राजकुमारी मीराबाई ने कृष्ण के गीत गाए। बंगाल में चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन द्वारा कृष्ण भक्ति फैलाई, और असम में शंकरदेव ने नामघरों और सत्रों के साथ एकशरण धर्म की स्थापना की।

सूफ़ी

सूफ़ीवाद इस्लाम का रहस्यवादी पक्ष है, जो ईश्वर से प्रेम, पीर (गुरु) के प्रति निष्ठा और लोगों की सेवा पर बल देता है। सूफ़ी ख़ानक़ाहों में रहते थे, सिलसिलों (संप्रदायों) में संगठित थे, समा (भक्ति संगीत) का प्रयोग करते थे, और उनकी कब्रें (दरगाहें) तीर्थस्थल बन गईं। चिश्ती सिलसिला भारत में ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती लाए, जो अजमेर में बस गए; यह दिल्ली के कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, पाकपट्टन के बाबा फ़रीद, जिनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में है, दिल्ली के निज़ामुद्दीन औलिया, जिनके शिष्य अमीर ख़ुसरो थे, और नसीरुद्दीन चिराग़-ए-दिल्ली के माध्यम से आगे बढ़ा; फ़तेहपुर सीकरी के शेख़ सलीम चिश्ती ने अकबर को आशीर्वाद दिया। चिश्ती दरबार से दूर रहते थे, जबकि भारत में मुल्तान के बहाउद्दीन ज़करिया के नेतृत्व वाले सुहरावर्दी सिलसिले ने राजकीय संरक्षण स्वीकार किया। ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह द्वारा लाया गया नक्शबंदी सिलसिला कट्टरपंथी था; इसके शेख़ अहमद सरहिंदी ने अपने पत्रों में, जो अधिकतर जहाँगीर के शासनकाल में लिखे गए, अकबर के काल की उदार धार्मिक नीति की निंदा की। दारा शिकोह क़ादिरी सिलसिले का अनुयायी था।

मुख्य तथ्य

  • विजयनगर: 1336 में हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम द्वारा स्थापित; राजवंश संगम, सालुव, तुलुव, अराविडु; राजधानी तुंगभद्रा तट पर हम्पी।
  • विजयनगर आए विदेशी: निकोलो दी कोंटी (इतालवी, देवराय प्रथम), अब्दुर्रज़्ज़ाक (फ़ारसी, देवराय द्वितीय, 1443), डोमिंगो पेस और फ़र्नाओ नूनिज़ (पुर्तगाली)।
  • कृष्णदेव राय (1509-1529): आमुक्तमाल्यद (तेलुगु), जांबवती कल्याणम् (संस्कृत); उपाधि आंध्र भोज; अल्लसानि पेद्दन सहित अष्टदिग्गज; 1520 में रायचूर जीता।
  • तालीकोटा (राक्षस-तंगड़ी) का युद्ध, 23 जनवरी 1565: बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा और बीदर ने राम राय को हराया।
  • बहमनी राज्य: 1347 में हसन गंगू (अलाउद्दीन बहमन शाह) द्वारा गुलबर्गा में स्थापित, बाद में राजधानी बीदर; महमूद गवाँ को 1481 में मृत्युदंड; अफ़ानासी निकितिन यहाँ आया।
  • दक्कन सल्तनतें: बीजापुर (आदिलशाही, गोल गुंबज), अहमदनगर (निज़ामशाही, चाँद बीबी), गोलकुंडा (कुतुबशाही, चारमीनार 1591), बरार (इमादशाही), बीदर (बरीदशाही)।
  • दार्शनिक: शंकराचार्य-अद्वैत, रामानुज-विशिष्टाद्वैत, मध्व-द्वैत, निंबार्क-द्वैताद्वैत, वल्लभ-शुद्धाद्वैत; बसवन्ना ने लिंगायत आंदोलन चलाया।
  • तमिल भक्ति: 63 नायनार (शिव) और 12 आलवार (विष्णु); आंडाल एकमात्र स्त्री आलवार थीं।
  • निर्गुण संत: कबीर (बीजक), रैदास, दादू, गुरु नानक; सगुण संत: तुलसीदास (रामचरितमानस), सूरदास (सूरसागर), मीराबाई; बंगाल में चैतन्य, असम में शंकरदेव।
  • सूफ़ी सिलसिले: चिश्ती (मोइनुद्दीन, अजमेर; निज़ामुद्दीन औलिया, दिल्ली), सुहरावर्दी (बहाउद्दीन ज़करिया, मुल्तान), नक्शबंदी (बाक़ी बिल्लाह, अहमद सरहिंदी), क़ादिरी (दारा शिकोह)।

एक नज़र में दोहराव

विजयनगर 1336 (हरिहर, बुक्का), चार राजवंश; अब्दुर्रज़्ज़ाक 1443; कृष्णदेव राय 1509-1529, आमुक्तमाल्यद, अष्टदिग्गज; नायंकर और आयगार व्यवस्था; तालीकोटा 23 जनवरी 1565; बहमनी 1347 गुलबर्गा फिर बीदर; महमूद गवाँ; पाँच दक्कन सल्तनतें; गोल गुंबज, चारमीनार; 63 नायनार, 12 आलवार; रामानुज विशिष्टाद्वैत; बसवन्ना लिंगायत; ज्ञानेश्वर, तुकाराम; कबीर, नानक, तुलसीदास, मीराबाई, चैतन्य; चिश्ती अजमेर में, सुहरावर्दी मुल्तान में, नक्शबंदी कट्टरपंथी।

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