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प्राचीन बिहार: चिरांद से मगध, नालंदा और पाल वंश तक

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प्रारंभिक बस्तियाँ

बिहार की मानव-कथा लिखित अभिलेखों से बहुत पहले शुरू होती है। परीक्षाओं में सबसे अधिक पूछा जाने वाला स्थल सारण जिले का चिरांद है, जो गंगा के उत्तरी तट पर उस स्थान के निकट है जहाँ घाघरा उससे मिलती है। यहाँ की खुदाई में एक नवपाषाणकालीन गाँव मिला, जो हड्डी और हिरण के सींग से बने औज़ारों के लिए प्रसिद्ध है; इसके बाद काले-लाल मृद्भांड वाले ताम्रपाषाणकालीन (ताँबा-पत्थर युग के) स्तर मिले। रोहतास जिले का सेनुवार और बोधगया के महाबोधि मंदिर के निकट ताराडीह अन्य प्रारंभिक कृषक बस्तियाँ हैं।

वैदिक संदर्भ

प्रारंभिक वैदिक लोग बहुत पश्चिम में रहते थे और उनके ग्रंथ पूर्व को दूर का प्रदेश मानते हैं। ऋग्वेद में कीकटों का, जिन्हें बाद में मगध से जोड़ा गया, और उनके प्रमुख प्रमगंद का उल्लेख अप्रिय शब्दों में है, और अथर्ववेद अंग और मगध के लोगों को उन दूरस्थ जनों में गिनाता है जिनके पास ज्वर भेज देने की कामना की गई है। शतपथ ब्राह्मण बताता है कि विदेघ माथव अपने पुरोहित गोतम राहूगण के साथ पवित्र अग्नि को पूर्व की ओर सदानीरा (जिसे प्रायः गंडक माना जाता है) के पार ले गए और विदेह को बसाया। मिथिला राजधानी वाला विदेह राजा जनक के लिए प्रसिद्ध हुआ, जिनके दरबार में ऋषि याज्ञवल्क्य ने गार्गी सहित अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ किया, जैसा कि बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित है।

महाजनपद और वज्जि गणराज्य

6ठी शताब्दी ई.पू. के लिए बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय 16 महाजनपदों की सूची देता है, जिनमें से तीन वर्तमान बिहार में थे: भागलपुर के निकट चंपा राजधानी वाला अंग, गिरिव्रज या राजगृह राजधानी वाला मगध, और वैशाली राजधानी वाला वज्जि संघ। वज्जि एक गण-संघ था, यानी लिच्छवियों के नेतृत्व में 8 कुलों का संघ, जिसमें कुल-प्रमुखों की सभा निर्णय लेती थी; इसी कारण वैशाली को प्रायः विश्व के प्राचीनतम गणराज्यों में गिना जाता है। बुद्ध ने वज्जियों की कल्याण की सात शर्तों (सात अपरिहानीय धर्म) के लिए प्रशंसा की, जैसे बार-बार सभा में मिलना और वृद्धों व स्त्रियों का सम्मान करना। वैशाली गणिका आम्रपाली का भी नगर था, जिसने बुद्ध को आम्रवन दान किया, और यहीं बौद्ध भिक्षुणी संघ की स्थापना हुई।

मगध का उदय

मगध अपने भूगोल के कारण भारत का पहला महान साम्राज्य बना: उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी, व्यापार और रक्षा के लिए गंगा और सोन, दक्षिणी पहाड़ियों में लौह अयस्क, वनों से हाथी, और पहाड़ियों व नदियों से सुरक्षित राजधानियाँ। हर्यक वंश का राजा बिंबिसार कोसल, लिच्छवियों और मद्र के साथ वैवाहिक संबंधों से शक्तिशाली हुआ और उसने अंग को अपने राज्य में मिला लिया। उसके पुत्र अजातशत्रु ने अपने मंत्री वस्सकार के माध्यम से वज्जियों में फूट डालकर लंबे युद्ध के बाद उन्हें जीता और गंगा तट पर पाटलिग्राम में एक दुर्ग बनवाया। परंपरा उदायिन को पाटलिपुत्र (कुसुमपुर) बसाने और राजधानी वहाँ ले जाने का श्रेय देती है। शिशुनाग ने अवंति की शक्ति नष्ट की, और उसके पुत्र कालाशोक (काकवर्ण) के संरक्षण में वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति हुई। इसके बाद नंदों ने गैर-क्षत्रिय वंश के अधीन पहला साम्राज्य बनाया: महापद्म नंद ने एकराट और सर्वक्षत्रांतक की उपाधियाँ लीं, और कहा जाता है कि धननंद की सेना की ख्याति ने 326 ई.पू. में ब्यास नदी पर सिकंदर के सैनिकों का मनोबल तोड़ दिया।

पाटलिपुत्र में मौर्य और गुप्त

चाणक्य (कौटिल्य) के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई.पू. में धननंद को सत्ता से हटाया। सेल्यूकस निकेटर के राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी इंडिका में पालिबोथ्रा (पाटलिपुत्र) को लकड़ी की दीवार से घिरा नगर बताया, जिसमें 570 बुर्ज और 64 द्वार थे और जिसका प्रबंध 30 सदस्यों की समिति करती थी। अशोक (लगभग 268-232 ई.पू.) ने मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित की, बराबर की गुफाएँ आजीवकों को दान कीं, और लौरिया नंदनगढ़, लौरिया अरेराज, रामपुरवा तथा वैशाली (कोल्हुआ) में स्तंभ खड़े किए। बाद में इसी क्षेत्र में गुप्तों का उदय हुआ: चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया, और उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने गर्व से स्वयं को लिच्छवि-दौहित्र, अर्थात लिच्छवियों की पुत्री का पुत्र, कहा। चीनी यात्री फाह्यान ने चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में पाटलिपुत्र में अशोक के महल की प्रशंसा की, और आर्यभट ने 499 ई. में कुसुमपुर में आर्यभटीय की रचना की।

बुद्ध और महावीर की भूमि

सिद्धार्थ गौतम को उरुवेला, आज के बोधगया, में निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ। राजगीर में बिंबिसार ने उन्हें वेणुवन (बाँस का उपवन) दान किया, और वे प्रायः गृध्रकूट (गिद्धों की चोटी) पर उपदेश देते थे; उनके देहावसान के बाद राजगीर की सप्तपर्णी गुफा में महाकस्सप की अध्यक्षता और अजातशत्रु के संरक्षण में प्रथम बौद्ध संगीति हुई। 24वें तीर्थंकर महावीर का जन्म परंपरा के अनुसार वैशाली के निकट कुंडग्राम में ज्ञातृक कुल के सिद्धार्थ और लिच्छवि राजकुमारी त्रिशला के घर हुआ, और उन्होंने नालंदा जिले के पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया, जहाँ कमल-सरोवर के बीच जल मंदिर स्थित है। प्रथम जैन संगीति चंद्रगुप्त मौर्य के समय के आसपास स्थूलभद्र की अध्यक्षता में पाटलिपुत्र में हुई।

विश्वविद्यालय और पाल वंश

5वीं शताब्दी ई. में कुमारगुप्त प्रथम द्वारा स्थापित नालंदा एक आवासीय विश्वविद्यालय बना, जहाँ चीन, कोरिया, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया से विद्यार्थी आते थे; 7वीं शताब्दी में ह्वेनसांग ने यहाँ आचार्य शीलभद्र से शिक्षा पाई, और उसके कुछ ही समय बाद इत्सिंग आया। पाल वंश की स्थापना लगभग 750 ई. में गोपाल ने की, जब परंपरा के अनुसार जनता ने अराजकता (मात्स्यन्याय) समाप्त करने के लिए उसे चुना। धर्मपाल ने भागलपुर जिले के अंतीचक में विक्रमशिला की स्थापना की, और बिहारशरीफ स्थित ओदंतपुरी का श्रेय परंपरा से गोपाल को दिया जाता है। विक्रमशिला के आचार्य अतीश दीपंकर बौद्ध शिक्षा को तिब्बत ले गए। ये महाविहार 12वीं शताब्दी के अंत में तुर्क आक्रमणों में नष्ट हो गए।

मुख्य तथ्य

  • चिरांद (सारण जिला, घाघरा और गंगा के संगम के निकट): हड्डी और सींग के औज़ारों के लिए प्रसिद्ध नवपाषाणकालीन स्थल, जिसमें बाद के ताम्रपाषाणकालीन स्तर भी हैं।
  • बिहार के तीन महाजनपद: अंग (राजधानी चंपा, भागलपुर के निकट), मगध (गिरिव्रज या राजगृह) और वज्जि (वैशाली); अंगुत्तर निकाय में कुल 16 महाजनपद गिनाए गए हैं।
  • वज्जि: लिच्छवियों के नेतृत्व में 8 कुलों का संघ, राजधानी वैशाली; इसे प्रायः विश्व के प्राचीनतम गणराज्यों में गिना जाता है।
  • मगध के राजवंश क्रम से: हर्यक (बिंबिसार, अजातशत्रु, उदायिन), शिशुनाग (शिशुनाग, कालाशोक), नंद (महापद्म, धननंद), फिर मौर्य।
  • शतपथ ब्राह्मण: विदेघ माथव पवित्र अग्नि को सदानीरा (गंडक) के पार पूर्व ले गए और विदेह बसाया, जिसकी राजधानी मिथिला पर राजा जनक का शासन था।
  • मेगस्थनीज की इंडिका: पाटलिपुत्र (पालिबोथ्रा) की लकड़ी की दीवार में 570 बुर्ज और 64 द्वार थे और नगर का प्रबंध 30 सदस्यों की समिति करती थी।
  • गुप्त-लिच्छवि संबंध: चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया; समुद्रगुप्त ने स्वयं को लिच्छवि-दौहित्र कहा।
  • महावीर: जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में (परंपरा), माता त्रिशला लिच्छवि राजकुमारी, निर्वाण पावापुरी (जल मंदिर) में; प्रथम जैन संगीति पाटलिपुत्र में स्थूलभद्र की अध्यक्षता में।
  • पाल वंश की स्थापनाएँ: विक्रमशिला (अंतीचक, भागलपुर) धर्मपाल द्वारा; ओदंतपुरी (बिहारशरीफ) परंपरा से गोपाल द्वारा; विक्रमशिला के अतीश दीपंकर तिब्बत गए।

एक नज़र में दोहराव

चिरांद (सारण) में नवपाषाणकालीन हड्डी के औज़ार; ऋग्वेद में कीकट; विदेघ माथव ने सदानीरा पार की; मिथिला के जनक; महाजनपद अंग (चंपा), मगध (राजगृह), वज्जि (वैशाली, 8 कुल, लिच्छवि); हर्यक-शिशुनाग-नंद-मौर्य; पाटलिपुत्र उदायिन द्वारा; मेगस्थनीज 570 बुर्ज, 64 द्वार; अशोक के समय तृतीय संगीति; कुमारदेवी; महावीर का निर्वाण पावापुरी; नालंदा कुमारगुप्त प्रथम द्वारा; विक्रमशिला धर्मपाल द्वारा।

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