41 में से पाठ 32 · पर्यायवाची और विलोम शब्द
पर्यायवाची शब्द (1): प्रकृति से जुड़े शब्द
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पर्यायवाची शब्द क्या हैं
जिन शब्दों का अर्थ समान हो, उन्हें पर्यायवाची या समानार्थी शब्द कहते हैं, जैसे ‘जल’ के लिए नीर, वारि, अंबु और सलिल। फिर भी हर पर्याय हर वाक्य में नहीं बैठता: ‘पानी पीना’ स्वाभाविक है, पर ‘सलिल पीना’ कोई नहीं बोलता, क्योंकि पर्यायों में प्रयोग और भाव का सूक्ष्म अंतर रहता है। परीक्षा में पूछे जाने वाले अधिकतर पर्याय तत्सम (संस्कृत से ज्यों-के-त्यों आए) शब्द हैं, और उनमें बहुत-से दो हिस्सों से बने हैं: एक मूल शब्द और एक अंतिम अंश, जो उसका काम बताता है। ‘दिनकर’ दिन को बनाने वाला है, इसलिए सूर्य; ‘निशाकर’ रात को प्रकाशित करने वाला है, इसलिए चंद्रमा। इस पाठ में प्रकृति से जुड़े 17 शब्दों के पर्याय इसी ढंग से समूहों में दिए गए हैं, ताकि आप रटने के साथ-साथ पहचानना भी सीखें।
सूर्य, चंद्रमा, दिन और रात
सूर्य के पर्याय हैं: सूरज, रवि, दिनकर, दिवाकर, दिनेश, दिनमणि, भानु, भास्कर, प्रभाकर, आदित्य, सविता, अर्क, मार्तंड, मिहिर, तरणि, अंशुमाली, सहस्रांशु और विवस्वान। चंद्रमा के पर्याय हैं: चाँद, चंद्र, शशि, शशांक, सोम, इंदु, विधु, राकेश, रजनीश, निशाकर, निशापति, सुधाकर, सुधांशु, हिमांशु, शीतांशु, मयंक, मृगांक, तारापति और कलानिधि। पहचान का सूत्र यह है कि ‘दिन’ या ‘दिवा’ के साथ ‘कर’, ‘ईश’ या ‘मणि’ जुड़ा हो तो शब्द सूर्य है (दिनकर, दिवाकर, दिनेश, दिनमणि), और ‘निशा’, ‘रजनी’ या ‘राका’ (पूर्णिमा की रात) के साथ ‘कर’, ‘ईश’ या ‘पति’ जुड़ा हो तो चंद्रमा (निशाकर, रजनीश, निशापति, राकेश)। ‘अंशु’ का अर्थ किरण है: हजार किरणों वाला ‘सहस्रांशु’ और किरणों की माला वाला ‘अंशुमाली’ सूर्य हैं, पर ठंडी किरणों वाले ‘हिमांशु’ और ‘शीतांशु’ तथा अमृत-किरणों वाला ‘सुधांशु’ चंद्रमा हैं। ‘अंक’ यहाँ चिह्न है: खरगोश (शश) के चिह्न वाला ‘शशांक’ और हिरन (मृग) के चिह्न वाला ‘मृगांक’ चंद्रमा हैं। दिन के पर्याय हैं: दिवस, दिवा, वासर, वार और अहन्; अहन् से ही पूर्वाह्न, मध्याह्न और अपराह्न बने हैं, और ‘अहर्निश’ का अर्थ है दिन-रात। रात के पर्याय हैं: रात्रि, रैन, निशा, निशि, रजनी, यामिनी, विभावरी, शर्वरी, क्षपा, तमी, तमिस्रा और त्रियामा।
पृथ्वी, आकाश और पर्वत
पृथ्वी के पर्याय हैं: धरती, धरा, धरणी, धरित्री, भू, भूमि, मही, अवनि, वसुधा, वसुंधरा, उर्वी, इला, क्षिति, मेदिनी, अचला और विश्वंभरा; ‘वसुधा’ और ‘वसुंधरा’ का अर्थ है वसु (धन) को धारण करने वाली। आकाश के पर्याय हैं: आसमान, नभ, गगन, अंबर, व्योम, अंतरिक्ष, अनंत, शून्य और ख; ‘ख’ से ही खग (आकाश में चलने वाला, अर्थात पक्षी) और खगोल बने हैं। पर्वत के पर्याय हैं: पहाड़, गिरि, शैल, अचल, अद्रि, नग, भूधर, महीधर, धराधर और शिखरी। यहाँ सबसे बड़ा जाल ‘धर’ है: ‘धरा’ पृथ्वी है, पर ‘भूधर’, ‘महीधर’ और ‘धराधर’ का अर्थ है पृथ्वी को धारण करने वाला, अर्थात पर्वत। इसी तरह ‘अचल’ (न चलने वाला, पुल्लिंग) पर्वत है, जबकि ‘अचला’ (स्त्रीलिंग) पृथ्वी। रामचरितमानस में तुलसीदास की प्रसिद्ध पंक्ति ‘छिति जल पावक गगन समीरा’ में पाँचों तत्त्व इन्हीं पर्यायों से आए हैं: छिति (क्षिति, पृथ्वी), जल, पावक (अग्नि), गगन (आकाश) और समीर (वायु)।
जल, बादल, समुद्र और नदी
जल के पर्याय हैं: पानी, नीर, वारि, अंबु, तोय, सलिल, उदक, जीवन और पय। इन मूल शब्दों को याद कर लें, तो बादल, समुद्र और कमल के दर्जनों पर्याय अपने-आप खुल जाते हैं। जल-वाचक शब्द के साथ ‘द’ (देने वाला) या ‘धर’ (धारण करने वाला) लगे तो बादल बनता है: जलद, नीरद, वारिद, अंबुद, तोयद, पयोद, जलधर और धाराधर; बादल के अन्य पर्याय हैं: मेघ, घन, जीमूत, बलाहक और अभ्र। ‘धि’ या ‘निधि’ (भंडार) लगे तो समुद्र बनता है: जलधि, उदधि, वारिधि, पयोधि, अंबुधि और नीरनिधि; समुद्र के अन्य पर्याय हैं: सागर, सिंधु, रत्नाकर (रत्नों की खान), अर्णव, पारावार और नदीश (नदियों का स्वामी)। ‘ज’ (जन्मा) लगे तो कमल बनता है, जिसकी बात आगे है। नदी के पर्याय हैं: सरिता, तटिनी, तरंगिणी, आपगा, निम्नगा, सरि, प्रवाहिनी, स्रोतस्विनी और दरिया। ‘निम्नगा’ का अर्थ है नीचे की ओर जाने वाली, ‘तटिनी’ तटों वाली और ‘तरंगिणी’ तरंगों वाली; ‘आपगा’ में ‘आप’ जल का वाचक है और ‘गा’ जाने वाली का।
वायु और अग्नि
वायु के पर्याय हैं: हवा, पवन, समीर, समीरण, अनिल, मारुत, वात, बयार, प्रभंजन और गंधवह। अग्नि के पर्याय हैं: आग, अनल, पावक, वह्नि, कृशानु, हुताशन, दहन, वैश्वानर और धूमकेतु। इस जोड़ी का सबसे अधिक पूछा जाने वाला भ्रम ‘अनिल’ (हवा) और ‘अनल’ (आग) का है; दोनों में केवल ‘इ’ की मात्रा का अंतर है, इसलिए विकल्प को अक्षर-अक्षर पढ़िए। कुछ नाम अपना अर्थ स्वयं बताते हैं: ‘गंधवह’ गंध को ढोने वाली वायु है, और ‘हुताशन’ (हुत अर्थात आहुति, अशन अर्थात खाने वाला) यज्ञ की आहुति ग्रहण करने वाली अग्नि। ‘पावक’ का अर्थ है पवित्र करने वाली; ‘पावक’ और ‘पवन’ की ध्वनि मिलती है, अर्थ नहीं। ‘मारुत’ हवा है, पर ‘मारुति’ (मारुत का पुत्र) हनुमान हैं। ‘धूमकेतु’ अनेकार्थी है: अग्नि भी और पुच्छल तारा भी।
वन, वृक्ष, फूल और कमल
वन के पर्याय हैं: जंगल, कानन, विपिन, अरण्य, अटवी और कांतार; ‘अरण्य’ से ही ‘आरण्यक’ (वनों में पढ़े जाने वाले वैदिक ग्रंथ) बना है। वृक्ष के पर्याय हैं: पेड़, तरु, विटप, पादप, द्रुम, रूख और शाखी; ‘पादप’ का अर्थ है पाद (जड़) से पानी पीने वाला। फूल के पर्याय हैं: पुष्प, सुमन, कुसुम, प्रसून, पुहुप और गुल। कमल के पर्याय हैं: पंकज, जलज, नीरज, वारिज, अंबुज, सरोज, सरसिज, राजीव, अरविंद, पद्म, नलिन, शतदल, कंज, तामरस, उत्पल, इंदीवर और पुंडरीक। इनमें ‘ज’ वाले शब्द जन्म-स्थान बताते हैं: पंक (कीचड़) में, जल, नीर, वारि या अंबु में, अथवा सर (तालाब) में जन्मा; ‘शतदल’ सौ पंखुड़ियों वाला है। रंग का भेद भी पुस्तकों में मिलता है: इंदीवर और उत्पल प्रायः नीले कमल के लिए और पुंडरीक सफेद कमल के लिए आते हैं, पर परीक्षा में ये सब कमल के पर्याय ही माने जाते हैं।
इस पाठ के प्रमुख जाल
‘पर्यायवाची नहीं है’ वाले प्रश्नों में परीक्षक ऐसा शब्द रखते हैं जो उसी मूल से बना हो, पर दूसरी वस्तु बताता हो। जलज (कमल), जलद (बादल), जलधि (समुद्र) और जलचर (मछली आदि जल-जीव) चारों ‘जल’ से बने हैं, पर एक-दूसरे के पर्याय नहीं। धराधर (पर्वत) और धाराधर (बादल) में केवल ‘आ’ की एक मात्रा का अंतर है। नदीश समुद्र है, नदी नहीं; कुसुमाकर (फूलों की खान) वसंत ऋतु है, फूल नहीं; रजनीचर और निशाचर (रात में घूमने वाले) राक्षस हैं, रात नहीं, जबकि रजनीश चंद्रमा है। ‘यामिनी’ रात है, पर मिलती-जुलती ‘दामिनी’ बिजली है और ‘कामिनी’ स्त्री। ‘तरु’ वृक्ष है, ‘तरणि’ सूर्य और ‘तरंगिणी’ नदी; ‘अंबु’ जल है और ‘अंबर’ आकाश; ‘सरोज’ कमल है और ‘सरोवर’ तालाब। विकल्प के हर शब्द को तोड़कर देखिए कि उसका अंतिम अंश क्या कहता है, तो अधिकतर प्रश्न बिना रटे हल हो जाते हैं।
मुख्य तथ्य
- सूर्य: रवि, दिनकर, दिवाकर, दिनेश, भानु, भास्कर, प्रभाकर, आदित्य, सविता, अर्क, मार्तंड, मिहिर, तरणि, अंशुमाली, सहस्रांशु, विवस्वान।
- चंद्रमा: शशि, शशांक, सोम, इंदु, विधु, राकेश, रजनीश, निशाकर, सुधाकर, सुधांशु, हिमांशु, शीतांशु, मयंक, मृगांक, कलानिधि।
- सूत्र: दिन या दिवा + कर, ईश, मणि = सूर्य; निशा, रजनी या राका + कर, ईश, पति = चंद्रमा (पर निशाचर, रजनीचर राक्षस); सहस्रांशु (हजार किरणें) सूर्य, हिमांशु और शीतांशु (ठंडी किरणें) चंद्रमा।
- पृथ्वी: धरा, धरणी, धरित्री, भू, भूमि, मही, अवनि, वसुधा, वसुंधरा, उर्वी, इला, क्षिति, मेदिनी, अचला; पर्वत: गिरि, शैल, अचल, अद्रि, नग, भूधर, महीधर, धराधर, शिखरी।
- आकाश: नभ, गगन, अंबर, व्योम, अंतरिक्ष, अनंत, शून्य, ख; रात: रात्रि, निशा, रजनी, यामिनी, विभावरी, शर्वरी, क्षपा, तमिस्रा; दिन: दिवस, दिवा, वासर।
- जल + द या धर = बादल (जलद, नीरद, वारिद, अंबुद, तोयद, पयोद, जलधर); जल + धि या निधि = समुद्र (जलधि, उदधि, वारिधि, पयोधि, नीरनिधि); जल + ज = कमल (जलज, नीरज, वारिज, अंबुज)।
- नदी: सरिता, तटिनी, तरंगिणी, आपगा, निम्नगा, प्रवाहिनी, स्रोतस्विनी; पर नदीश (नदियों का स्वामी) समुद्र है, नदी नहीं।
- वायु: पवन, समीर, अनिल, मारुत, वात, बयार, प्रभंजन, गंधवह; अग्नि: अनल, पावक, वह्नि, कृशानु, हुताशन, वैश्वानर, धूमकेतु।
- वन: कानन, विपिन, अरण्य, अटवी, कांतार; वृक्ष: तरु, विटप, पादप, द्रुम, रूख, शाखी; फूल: पुष्प, सुमन, कुसुम, प्रसून, पुहुप।
- कमल: पंकज, जलज, नीरज, सरोज, सरसिज, राजीव, अरविंद, पद्म, नलिन, शतदल, कंज, उत्पल, इंदीवर; जाल: धराधर पर्वत, धाराधर बादल; कुसुमाकर वसंत।
एक नज़र में दोहराव
दिन या दिवा + कर, ईश सूर्य (दिनकर, दिवाकर, दिनेश), निशा, रजनी या राका + कर, ईश चंद्रमा (निशाकर, रजनीश, राकेश); अंशु = किरण: सहस्रांशु सूर्य, हिमांशु, शीतांशु, सुधांशु चंद्रमा; जल + ज कमल, जल + द या धर बादल, जल + धि समुद्र; भूधर, महीधर, धराधर पर्वत, धाराधर बादल; अचल पर्वत, अचला पृथ्वी; नदीश समुद्र; कुसुमाकर वसंत; रजनीचर राक्षस; अनिल हवा, अनल आग; अंबु जल, अंबर आकाश; यामिनी रात, दामिनी बिजली।