41 में से पाठ 39 · उपयुक्त शब्द-चयन

समानार्थी लगने वाले शब्दों में सूक्ष्म अंतर: दुख-शोक-खेद, प्रेम-स्नेह-श्रद्धा, सलाह-परामर्श

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

पर्यायवाची पूरी तरह समान नहीं होते

किसी भाषा में दो शब्द हर प्रसंग में एक-दूसरे की जगह शायद ही ले पाते हैं। दुख, शोक और खेद तीनों पीड़ा बताते हैं, पर ‘मुझे खेद है कि मैं समय पर नहीं पहुँच सका’ में ‘शोक’ रखना हास्यास्पद होगा। ऐसे शब्दों का अंतर पाँच कसौटियों पर परखा जाता है: भाव किसके प्रति है (बड़ों, छोटों या बराबर वालों के), कष्ट शरीर का है या मन का, भाव कितना गहरा या तीव्र है, बात औपचारिक है या सामान्य, और भाव उचित है या अनुचित। परीक्षा में ऐसे प्रश्न दो रूपों में आते हैं: रिक्त स्थान के चारों विकल्प प्रायः एक ही पर्याय-समूह से होते हैं, या दो शब्द देकर पूछा जाता है कि उनमें क्या अंतर है।

दुख, शोक, खेद, क्षोभ और विषाद

दुख (तत्सम रूप दुःख) सबसे सामान्य शब्द है, किसी भी प्रतिकूल स्थिति में मन की पीड़ा: ‘परीक्षा में कम अंक आने का दुख’। शोक किसी प्रियजन की मृत्यु या बड़ी हानि पर होने वाला गहरा दुख है: ‘शोक-सभा’, ‘शोक-संदेश’, ‘महापुरुष के निधन पर देश ने शोक मनाया’। खेद अपनी भूल या किसी अनचाही बात पर होने वाला हल्का दुख है, जो औपचारिक भाषा और पत्रों में आता है: ‘असुविधा के लिए खेद है’। क्षोभ वह दुख है जिसमें विफलता, अपमान या अन्याय के कारण क्रोध भी मिला हो: ‘अन्यायपूर्ण निर्णय से जनता में क्षोभ फैल गया’। विषाद अत्यधिक दुख से उपजी निराशा है, जिसमें व्यक्ति कुछ करने का निर्णय नहीं कर पाता; गीता के पहले अध्याय का नाम ‘अर्जुनविषादयोग’ इसी अर्थ में है। इसी से जुड़ा युग्म आधि-व्याधि है: आधि मानसिक कष्ट (चिंता) है और व्याधि शारीरिक रोग: ‘बुढ़ापे में आधि और व्याधि दोनों घेर लेती हैं’।

प्रेम, स्नेह, श्रद्धा, भक्ति और दया के रूप

प्रेम सबसे व्यापक शब्द है, किसी के प्रति भी लगाव (देश-प्रेम, प्रकृति-प्रेम)। स्नेह छोटों के प्रति होने वाला प्रेम है: ‘बड़े भाई का छोटी बहन पर स्नेह’। श्रद्धा बड़ों, गुरुजनों या महापुरुषों के प्रति आदर से मिला प्रेम है: ‘गुरु के प्रति श्रद्धा’। भक्ति ईश्वर या इष्टदेव के प्रति अनन्य प्रेम है: ‘मीरा की कृष्ण-भक्ति’। वात्सल्य माता-पिता का संतान के प्रति प्रेम है; सूरदास का बाल-वर्णन वात्सल्य रस का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। प्रणय पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम है, और अनुराग किसी व्यक्ति, वस्तु या विषय से गहरा लगाव: ‘संगीत के प्रति अनुराग’। कुछ पुस्तकें स्नेह को बराबर वालों (मित्रों) के लिए भी स्वीकार करती हैं, पर परीक्षा का मानक उत्तर ‘छोटों के प्रति स्नेह, बड़ों के प्रति श्रद्धा’ ही है। दया, करुणा, कृपा और सहानुभूति भी अलग हैं: दया दूसरे का दुख देखकर उसे दूर करने की इच्छा है; करुणा दूसरे के दुख से मन का द्रवित हो जाना है, जो दया से गहरा भाव है; कृपा बड़ों का छोटों पर अनुग्रह है (‘ईश्वर की कृपा’); और सहानुभूति दूसरे के दुख को अपना-सा अनुभव करना है।

सलाह, परामर्श, मंत्रणा और आज्ञा-आदेश

सलाह रोज़ की बातचीत का सामान्य शब्द है: ‘मित्र की सलाह’। परामर्श किसी विशेषज्ञ या अधिकारी से विधिवत ली गई राय है, इसलिए ‘चिकित्सक का परामर्श’, ‘कानूनी परामर्श’ और ‘परामर्शदाता’ जैसे औपचारिक प्रयोग बनते हैं। मंत्रणा किसी गंभीर विषय पर गुप्त विचार-विमर्श है: ‘युद्ध से पहले राजा ने मंत्रियों से मंत्रणा की’। सुझाव विचार के लिए रखी गई बात है, जिसे मानना या न मानना सुनने वाले पर निर्भर है: ‘सुझाव-पेटी’। इसी तरह आज्ञा बड़ों द्वारा छोटों को दी जाती है (‘पिता की आज्ञा’), आदेश अधिकारी या शासन का औपचारिक और बाध्यकारी निर्देश है (‘जिलाधिकारी का आदेश’), अनुमति किसी काम की स्वीकृति है जो प्रायः छोटा बड़े से माँगता है (‘अवकाश की अनुमति’), और निर्देश काम करने के ढंग का मार्गदर्शन है (‘परीक्षा-भवन के निर्देश’)। प्रार्थना बड़ों या ईश्वर से की जाती है, अनुरोध बराबर वालों से, आग्रह ज़ोर देकर किया गया अनुरोध है, और निवेदन विनम्रता से अपनी बात रखना है: ‘सविनय निवेदन है’।

अस्त्र-शस्त्र, गर्व-अहंकार और ईर्ष्या-द्वेष

अस्त्र वह हथियार है जो फेंककर या छोड़कर चलाया जाए (बाण, ब्रह्मास्त्र), और शस्त्र वह जो हाथ में पकड़कर चलाया जाए (तलवार, गदा); ‘अस्त्र-शस्त्र’ एक साथ बोलने पर सब हथियार आ जाते हैं। गर्व उचित बात पर होने वाला गौरव का भाव है: ‘हमें अपनी सेना पर गर्व है’। स्वाभिमान अपने सम्मान की रक्षा का उचित भाव है; अहंकार या घमंड स्वयं को दूसरों से बड़ा मानने का अनुचित भाव है; और दंभ झूठा दिखावा या पाखंड है। ‘अभिमान’ पर पुस्तकें बँटी हुई हैं: कुछ इसे घमंड का पर्याय मानती हैं, तो कुछ उचित गौरव के लिए भी स्वीकार करती हैं (‘मुझे अपने देश पर अभिमान है’); इसलिए जहाँ ‘गर्व’ विकल्प में हो, वहाँ उचित भाव के लिए ‘गर्व’ ही सबसे सुरक्षित उत्तर है। ईर्ष्या दूसरे की उन्नति देखकर होने वाली जलन है, द्वेष किसी के प्रति शत्रुता का स्थायी भाव, और स्पर्धा दूसरों से आगे निकलने की स्वस्थ होड़: ‘विद्यार्थियों में स्पर्धा अच्छी है, ईर्ष्या नहीं’।

शिष्टाचार और मूल्य के शब्द

बधाई किसी हो चुकी सफलता या शुभ अवसर पर दी जाती है (‘परीक्षा में सफल होने पर बधाई’), जबकि शुभकामना आने वाले काम की सफलता के लिए दी जाती है (‘परीक्षा के लिए शुभकामनाएँ’); अभिनंदन किसी का सम्मानपूर्वक स्वागत है (‘अभिनंदन-पत्र’)। धन्यवाद सामान्य शिष्टाचार का शब्द है, आभार किसी उपकार को औपचारिक रूप से स्वीकारना है (‘मैं आपका आभारी हूँ’), और कृतज्ञता उपकार को मन से मानने का भाव है, जिसका विलोम कृतघ्नता है। अमूल्य वह है जिसका मूल्य आँका ही न जा सके (‘अमूल्य समय’, ‘अमूल्य जीवन’), जबकि बहुमूल्य वह है जिसका मूल्य बहुत अधिक हो (‘बहुमूल्य हीरा’)। सेवा सामान्य शब्द है, पर शुश्रूषा विशेष रूप से रोगी की सेवा है। विद्वान वह है जिसके पास विद्या हो, बुद्धिमान वह जो समझदारी से काम ले; अनपढ़ व्यक्ति भी बुद्धिमान हो सकता है।

सही शब्द कब चुनें

प्रश्न हल करते समय पहले देखिए कि वाक्य में भाव किसके प्रति है और कौन किससे कह रहा है; फिर देखिए कि भाव कितना गहरा है और भाषा औपचारिक है या सामान्य। ‘पिता की मृत्यु पर पूरा परिवार ...... में डूब गया’ (खेद, शोक, क्षोभ, ईर्ष्या): मृत्यु पर गहरा दुख है, इसलिए शोक। ‘रेलगाड़ी के विलंब से हुई असुविधा के लिए हमें ...... है’ (शोक, खेद, विषाद, क्षोभ): औपचारिक सूचना और हल्का दुख है, इसलिए खेद। ‘शिष्य के मन में गुरु के प्रति अपार ...... थी’ (स्नेह, श्रद्धा, वात्सल्य, ईर्ष्या): भाव बड़ों के प्रति है, इसलिए श्रद्धा। ‘घायल पक्षी को देखकर बालक का मन ...... से भर गया’ (कृपा, करुणा, अनुमति, गर्व): दूसरे के दुख से मन का द्रवित होना करुणा है। परीक्षक कभी-कभी दो सही लगने वाले विकल्प रखते हैं; तब वह शब्द चुनिए जो प्रसंग को सबसे सटीक बताए, केवल ‘चल जाने वाला’ शब्द नहीं।

मुख्य तथ्य

  • दुख = सामान्य पीड़ा; शोक = प्रियजन की मृत्यु पर; खेद = भूल या असुविधा पर (‘असुविधा के लिए खेद है’); क्षोभ = अपमान या अन्याय पर दुख और क्रोध; विषाद = घोर निराशा।
  • आधि = मानसिक कष्ट; व्याधि = शारीरिक रोग; अस्त्र = फेंककर चलाया जाने वाला हथियार (बाण); शस्त्र = हाथ में पकड़कर चलाया जाने वाला (तलवार)।
  • स्नेह छोटों के प्रति, श्रद्धा बड़ों के प्रति, भक्ति ईश्वर के प्रति, वात्सल्य संतान के प्रति, प्रणय पति-पत्नी में, अनुराग किसी विषय या वस्तु से।
  • दया = दुख दूर करने की इच्छा; करुणा = दूसरे के दुख से द्रवित होना; कृपा = बड़ों का अनुग्रह; सहानुभूति = दूसरे का दुख अपना-सा अनुभव करना।
  • सलाह = सामान्य राय; परामर्श = विशेषज्ञ की विधिवत राय (चिकित्सक का परामर्श); मंत्रणा = गुप्त, गंभीर विचार-विमर्श; सुझाव = विचार के लिए रखी गई बात।
  • आज्ञा = बड़ों की, छोटों को; आदेश = अधिकारी का, बाध्यकारी; अनुमति = स्वीकृति; प्रार्थना बड़ों या ईश्वर से, अनुरोध बराबर वालों से, आग्रह ज़ोर देकर।
  • गर्व = उचित गौरव; स्वाभिमान = अपने सम्मान की रक्षा; अहंकार, घमंड = अनुचित; दंभ = पाखंड; ईर्ष्या = जलन; द्वेष = शत्रुता; स्पर्धा = स्वस्थ होड़।
  • बधाई = सफलता के बाद; शुभकामना = आने वाले काम के लिए: ‘परीक्षा के लिए ......’ → शुभकामनाएँ; ‘अच्छे परिणाम पर ......’ → बधाई।
  • अमूल्य = जिसका मूल्य आँका न जा सके (अमूल्य समय); बहुमूल्य = बहुत मूल्य वाला (बहुमूल्य हीरा); शुश्रूषा = रोगी की सेवा।
  • ‘पिता की मृत्यु पर परिवार ...... में डूब गया’ (खेद, शोक, क्षोभ) → शोक; ‘शिष्य के मन में गुरु के प्रति अपार ...... थी’ (स्नेह, श्रद्धा, वात्सल्य) → श्रद्धा; ‘युद्ध से पहले राजा ने मंत्रियों से गुप्त ...... की’ (सुझाव, मंत्रणा, आज्ञा) → मंत्रणा।

एक नज़र में दोहराव

पर्यायवाची पूर्ण समान नहीं; कसौटी: किसके प्रति, तन या मन, तीव्रता, औपचारिकता, उचित-अनुचित; दुख सामान्य, शोक मृत्यु पर, खेद भूल पर, क्षोभ अपमान पर, विषाद निराशा; आधि मन, व्याधि तन; स्नेह छोटों, श्रद्धा बड़ों, भक्ति ईश्वर, वात्सल्य संतान के प्रति; करुणा दया से गहरी, कृपा बड़ों की; सलाह सामान्य, परामर्श विशेषज्ञ का, मंत्रणा गुप्त; आज्ञा बड़ों की, आदेश अधिकारी का; अस्त्र फेंककर, शस्त्र हाथ में; गर्व उचित, अहंकार अनुचित; बधाई बाद में, शुभकामना पहले; अमूल्य-बहुमूल्य।

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