41 में से पाठ 38 · उपयुक्त शब्द-चयन

श्रुतिसम-भिन्नार्थक शब्द (2): ब-व, संयुक्ताक्षर, बिंदु-नुक्ता वाले युग्म और हल की विधि

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

ब और व का अंतर

हिंदी की कई बोलियों में ‘व’ को ‘ब’ बोला जाता है, पर मानक हिंदी में दोनों से अलग-अलग शब्द बनते हैं। बदन (शरीर) और वदन (मुख): ‘चंद्रवदन’ का अर्थ है चंद्रमा जैसे मुख वाला। बात (कथन) और वात (वायु): आयुर्वेद में वात, पित्त और कफ तीन दोष माने जाते हैं। बहन (भगिनी) और वहन (ढोना, उठाना): ‘यात्रा का व्यय संस्था वहन करेगी’। बास (गंध, प्रायः दुर्गंध) और वास (निवास): ‘राम को 14 वर्ष का वनवास मिला’। बाद (पश्चात) और वाद (बहस; सिद्धांत; मुकदमा): ‘वाद-विवाद प्रतियोगिता’, ‘गांधीवाद’। बार (दफ़ा) और वार (आक्रमण; सप्ताह का दिन): ‘शत्रु पर वार किया’, ‘सोमवार’। इन युग्मों में ‘व’ वाला शब्द प्रायः तत्सम है, जबकि ‘ब’ वाला शब्द तद्भव या विदेशी है: बात ‘वार्ता’ का और बहन ‘भगिनी’ का तद्भव है, जबकि बदन और बाद अरबी-फ़ारसी से आए हैं।

आधा अक्षर या संयुक्ताक्षर जुड़ने से

एक आधा वर्ण जुड़ते ही शब्द दूसरा हो जाता है। अन्न (अनाज) और अन्य (दूसरा)। लक्ष (लाख) और लक्ष्य (उद्देश्य, निशाना): ‘अर्जुन का लक्ष्य चिड़िया की आँख थी’। आसन (बैठने का स्थान; योग की मुद्रा) और आसन्न (निकट आया हुआ): ‘आसन्न संकट’। मद (नशा, घमंड) और मद्य (शराब): ‘धन का मद’, पर ‘मद्य-निषेध’। पथ (रास्ता) और पथ्य (रोगी के लिए हितकर भोजन): ‘वैद्य ने पथ्य में खिचड़ी बताई’। भीति (डर) और भित्ति (दीवार): ‘अजंता के भित्ति-चित्र’। वसन (वस्त्र) और व्यसन (बुरी लत): ‘जुआ एक व्यसन है’। विजन (सुनसान) और व्यजन (पंखा)। निधन (मृत्यु) और निर्धन (गरीब)। सर्ग (महाकाव्य का अध्याय) और स्वर्ग (देवलोक): ‘कामायनी में 15 सर्ग हैं’। दीप (दीपक) और द्वीप (टापू); द्विप (हाथी) भी इसी का साथी है। इतर (दूसरा, भिन्न) और इत्र (सुगंध): ‘पाठ्येतर गतिविधियाँ’। उपयुक्त (उचित) और उपर्युक्त (ऊपर कहा गया): ‘उपर्युक्त नियम सब पर लागू होंगे’। ग्रंथ (पुस्तक) और ग्रंथि (गाँठ; शरीर की ग्रंथि) में अंतर अंत की ‘इ’ की मात्रा का है।

एक व्यंजन बदलने से

कुछ युग्मों में केवल एक व्यंजन बदलता है। अंक (गोद; संख्या) और अंग (शरीर का भाग): ‘माँ ने शिशु को अंक में भर लिया’। मेघ (बादल) और मेध (यज्ञ): ‘अश्वमेध यज्ञ’। दाम (मूल्य) और धाम (घर; तीर्थ): ‘चार धाम की यात्रा’। उद्यत (तैयार) और उद्धत (उद्दंड, अक्खड़): ‘वह सहायता के लिए उद्यत है’, पर ‘उसका उद्धत व्यवहार’। नीर (जल) और नीड़ (घोंसला)। पाणि (हाथ) और पानी (जल): ‘पाणिग्रहण’ का अर्थ विवाह है। कृपण (कंजूस) और कृपाण (तलवार) भी याद रखिए, यद्यपि इनमें व्यंजन नहीं, अ-आ का अंतर है। अभिराम (सुंदर) और अविराम (लगातार): ‘अविराम वर्षा’। आभरण (गहना) और आमरण (मृत्यु तक): ‘आमरण अनशन’। प्रणाम (नमस्कार) और प्रमाण (सबूत) में, तथा परिणाम (नतीजा) और परिमाण (मात्रा) में, ‘ण’ और ‘म’ ने आपस में स्थान बदल लिया है।

जलज-जलद जैसे शब्द-परिवार

इन्हें अलग से याद रखिए, क्योंकि परीक्षक इनके अर्थ उलटकर देते हैं। शब्द के अंत में ‘ज’ का अर्थ है ‘जन्मा हुआ’ और ‘द’ का अर्थ है ‘देने वाला’। इसलिए जल से जन्मा जलज, नीरज, अंबुज और वारिज कमल है, और जल देने वाला जलद, नीरद, अंबुद और वारिद बादल है। इसी नियम से पंकज (कीचड़ में जन्मा) कमल है, अंडज अंडे से जन्मा प्राणी है और पयोद (जल देने वाला) बादल है। ‘जलज-बादल’ या ‘नीरद-कमल’ जैसा जोड़ा दिखे तो वही गलत विकल्प है।

अनुस्वार, चंद्रबिंदु और नुक्ता

केवल एक बिंदु से भी अर्थ बदल जाता है। हंस (एक पक्षी) और हँस (हँसना क्रिया): ‘मानसरोवर के हंस’, पर ‘वह हँस पड़ा’। मास (महीना) और मांस (गोश्त)। गोद (अंक) और गोंद (चिपकाने का पदार्थ)। पूछ (प्रश्न करना) और पूँछ (दुम)। कहा (कहना का भूतकाल) और कहाँ (किस स्थान पर)। अरबी-फ़ारसी से आए शब्दों में नुक्ता भी अर्थ बदलता है; केंद्रीय हिंदी निदेशालय के वर्तनी-नियम कहते हैं कि हिंदी में घुल-मिल चुके शब्दों में नुक्ता अनिवार्य नहीं, पर जहाँ उच्चारण या अर्थ का भेद दिखाना हो वहाँ लगाया जाए। राज (शासन) और राज़ (रहस्य); जरा (बुढ़ापा) और ज़रा (थोड़ा); सजा (सजाया हुआ) और सज़ा (दंड); फन (साँप का फन) और फ़न (कला, हुनर); खाना (भोजन) और ख़ाना (घर, खंड, जैसे डाकख़ाना)।

जहाँ पुस्तकें भिन्न हैं

कुछ युग्मों के अर्थ अलग-अलग व्याकरण-पुस्तकों में थोड़े भिन्न मिलते हैं। कोश और कोष: कई पुस्तकें कोश को शब्दकोश और कोष को खज़ाना बताती हैं, पर संस्कृत में दोनों रूप दोनों अर्थों में मिलते हैं; व्यवहार में ‘शब्दकोश’, ‘राजकोष’ और ‘कोषाध्यक्ष’ रूप प्रचलित हैं। तरणि को कुछ पुस्तकें केवल सूर्य बताती हैं और कुछ सूर्य तथा नाव दोनों, पर तरणी (नाव) और तरुणी (युवती) पर सब एकमत हैं। अलि का अर्थ भौंरा है, पर सखी के अर्थ में कोई पुस्तक ‘अली’ लिखती है और कोई ‘आली’। ऐसे युग्मों पर प्रश्न आए तो वह विकल्प चुनिए जिस पर सब पुस्तकें सहमत हैं।

हल करने की विधि

पहला चरण है पूरा वाक्य पढ़कर प्रसंग पहचानना: नदी, तट या जल की बात हो तो कूल, वंश या परिवार की बात हो तो कुल। दूसरा चरण है रिक्त स्थान के आसपास के व्याकरण-संकेत देखना: ‘भीम बहुत ...... थे’ में गुण बताने वाला विशेषण चाहिए, ‘प्राणों की ......’ में स्त्रीलिंग संज्ञा। तीसरा चरण है शब्द को तोड़कर अर्थ निकालना: आ + मरण = मरने तक, नीर + द = जल देने वाला, निर् + धन = धनहीन। चौथा चरण है परिचित यौगिक शब्द से जाँचना: अश्वमेध (मेध = यज्ञ), भित्ति-चित्र (भित्ति = दीवार), वनवास (वास = निवास), पाणिग्रहण (पाणि = हाथ), मद्य-निषेध (मद्य = शराब)। अंत में चुना हुआ शब्द वाक्य में रखकर पढ़िए। उदाहरण: ‘धूप में मज़दूर के माथे पर ...... की बूँदें थीं’ (श्वेत, स्वेद); प्रसंग पसीने का है, इसलिए स्वेद। ‘अनशनकारी ने ...... अनशन की घोषणा की’ (आभरण, आमरण); उत्तर आमरण। ‘नौकरी के लिए ...... व्यक्ति चुना जाएगा’ (उपयुक्त, उपर्युक्त); उत्तर उपयुक्त। ‘कौन-सा युग्म सही नहीं है’ वाले प्रश्न में हर युग्म के दोनों अर्थ अलग-अलग जाँचिए, क्योंकि गलत विकल्प में प्रायः केवल अर्थों का क्रम उलटा होता है।

मुख्य तथ्य

  • बदन = शरीर; वदन = मुख (चंद्रवदन); बात = कथन; वात = वायु; बहन = भगिनी; वहन = ढोना; बास = गंध; वास = निवास (वनवास)।
  • बाद = पश्चात; वाद = बहस, सिद्धांत (वाद-विवाद, गांधीवाद); बार = दफ़ा; वार = आक्रमण, दिन (सोमवार)।
  • अन्न = अनाज; अन्य = दूसरा; लक्ष = लाख; लक्ष्य = उद्देश्य; आसन = बैठने का स्थान; आसन्न = निकट आया हुआ।
  • भीति = डर; भित्ति = दीवार (भित्ति-चित्र); वसन = वस्त्र; व्यसन = बुरी लत; विजन = सुनसान; व्यजन = पंखा; निधन = मृत्यु; निर्धन = गरीब।
  • उपयुक्त = उचित; उपर्युक्त = ऊपर कहा गया: ‘...... गद्यांश का सबसे उचित शीर्षक चुनिए’ → उपर्युक्त (ऊपर दिया गया); ‘नौकरी के लिए ...... व्यक्ति चुना जाएगा’ → उपयुक्त।
  • शब्द के अंत में ज = जन्मा, द = देने वाला: जलज, नीरज, अंबुज, वारिज, पंकज = कमल; जलद, नीरद, अंबुद, वारिद, पयोद = बादल।
  • मेघ = बादल; मेध = यज्ञ (अश्वमेध); दाम = मूल्य; धाम = तीर्थ; उद्यत = तैयार; उद्धत = उद्दंड; कृपण = कंजूस; कृपाण = तलवार।
  • आभरण = गहना; आमरण = मृत्यु तक (आमरण अनशन); अभिराम = सुंदर; अविराम = लगातार; प्रणाम = नमस्कार; प्रमाण = सबूत।
  • हंस = पक्षी, हँस = हँसना; गोद = अंक, गोंद = चिपकाने का पदार्थ; पूछ = प्रश्न करना, पूँछ = दुम; राज = शासन, राज़ = रहस्य; जरा = बुढ़ापा, ज़रा = थोड़ा।
  • ‘धूप में मज़दूर के माथे पर ...... की बूँदें थीं’ (श्वेत / स्वेद) → स्वेद (पसीना); ‘धन का मद’ में मद = घमंड, ‘मद्य-निषेध’ में मद्य = शराब।

एक नज़र में दोहराव

ब-व: बदन-वदन, बात-वात, बहन-वहन, बास-वास, बाद-वाद, बार-वार; संयुक्ताक्षर: अन्न-अन्य, लक्ष-लक्ष्य, आसन-आसन्न, मद-मद्य, पथ-पथ्य, भीति-भित्ति, वसन-व्यसन, विजन-व्यजन, निधन-निर्धन, सर्ग-स्वर्ग, दीप-द्वीप, इतर-इत्र, उपयुक्त-उपर्युक्त; व्यंजन: अंक-अंग, मेघ-मेध, दाम-धाम, उद्यत-उद्धत, पाणि-पानी, आभरण-आमरण, अभिराम-अविराम; अ-आ: कृपण-कृपाण; -ज कमल, -द बादल; बिंदु-नुक्ता: हंस-हँस, मास-मांस, गोद-गोंद, राज-राज़, जरा-ज़रा; विधि: प्रसंग, व्याकरण-संकेत, शब्द-विग्रह, परिचित शब्द।

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