41 में से पाठ 30 · वाक्य शुद्धि और वर्तनी
शब्द-चयन और पुनरुक्ति की अशुद्धियाँ: सर्वनाम और विशेषण की भूलें सहित
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
शब्द-चयन की अशुद्धि क्या है
कई वाक्यों में लिंग, वचन, कारक और काल सब ठीक होते हैं, फिर भी कोई शब्द अनावश्यक, गलत या अर्थ से भटका हुआ होता है। ऐसी भूलें तीन प्रकार की हैं: एक ही अर्थ को दो बार कहना, जिसे पुनरुक्ति या अधिक-पद दोष कहते हैं; मिलते-जुलते अर्थ या रूप वाले दो शब्दों में से गलत को चुन लेना; और ऐसे शब्द-रूप बना लेना जो व्याकरण से बनते ही नहीं, जैसे ‘सौंदर्यता’। ये भूलें सबसे कठिन इसलिए हैं कि वाक्य सुनने में स्वाभाविक लगता है। इन्हें पकड़ने का उपाय है हर शब्द से पूछना कि क्या इसे हटा देने पर अर्थ घटता है, और क्या इसके स्थान पर कोई अधिक सटीक शब्द है।
पुनरुक्ति के प्रकार
पहला प्रकार है दो समानार्थी शब्द साथ रखना: ‘आपस में परस्पर’, ‘पुनः दोबारा’, ‘प्रतिदिन रोज़’, ‘हर प्रत्येक’, ‘स्वयं अपने आप’, ‘इत्यादि आदि’, ‘केवल राम ही आया’; हर जोड़े में एक शब्द पर्याप्त है: ‘वे परस्पर लड़ते हैं’, ‘केवल राम आया’ या ‘राम ही आया’। दूसरा प्रकार है उपसर्ग या प्रत्यय से पहले ही आ चुके अर्थ को फिर से कहना: ‘सकुशलपूर्वक’ में ‘स’ और ‘पूर्वक’ दोनों ‘साथ’ का अर्थ देते हैं, इसलिए ‘सकुशल’ या ‘कुशलपूर्वक’ लिखिए; इसी तरह ‘सादरपूर्वक’ के स्थान पर ‘सादर’ या ‘आदरपूर्वक’, ‘निर्दोषी’ के स्थान पर ‘निर्दोष’। तीसरा प्रकार है ‘कृपया’ और ‘कृपा करें’ को एक साथ रखना: ‘कृपया पत्र का उत्तर देने की कृपा करें’ के स्थान पर ‘कृपया पत्र का उत्तर दें’ या ‘पत्र का उत्तर देने की कृपा करें’। चौथा प्रकार है सीमा बताने वाले दो शब्द: ‘सारे भारत भर में’ के स्थान पर ‘सारे भारत में’ या ‘भारत भर में’। ‘वापस लौटना’ को अनेक पुस्तकें पुनरुक्ति मानती हैं (‘लौटना’ या ‘वापस आना’ पर्याप्त है), यद्यपि बोलचाल में यह प्रचलित है।
दोहरे प्रत्यय
जो भाववाचक संज्ञा पहले से किसी प्रत्यय से बनी है, उस पर ‘ता’ या ‘त्व’ फिर से नहीं लगता। ‘य’ प्रत्यय से बने माधुर्य, धैर्य, सौजन्य, ऐक्य, चातुर्य, औदार्य और सौंदर्य पहले से भाववाचक हैं। इसलिए ‘माधुर्यता’, ‘धैर्यता’, ‘सौजन्यता’, ‘ऐक्यता’, ‘चातुर्यता’, ‘औदार्यता’ अशुद्ध हैं; शुद्ध रूप हैं माधुर्य या मधुरता, धैर्य, सौजन्य, ऐक्य या एकता, चातुर्य या चतुरता, औदार्य या उदारता। विशेषण पर दो प्रत्यय लगाने की भूल भी होती है: ‘आवश्यकीय’ के स्थान पर ‘आवश्यक’, ‘पूज्यनीय’ के स्थान पर ‘पूजनीय’ या ‘पूज्य’। ‘महानता’ पर पुस्तकों में मतभेद है: संस्कृत के अनुसार ‘महत्ता’ शुद्ध है, पर ‘महानता’ हिंदी में इतना प्रचलित है कि अनेक कोश इसे स्वीकार करते हैं और केंद्रीय हिंदी निदेशालय भी इसे प्रचलित रूप के उदाहरण में देता है; विकल्पों में ‘महत्ता’ हो तो वही सुरक्षित उत्तर है। तुलना के प्रत्यय ‘तर’ और ‘तम’ के साथ ‘अधिक’ या ‘सबसे’ नहीं लगता: ‘अधिक सुंदरतर’ के स्थान पर ‘सुंदरतर’ या ‘अधिक सुंदर’; ‘सबसे श्रेष्ठतम’ और ‘सर्वश्रेष्ठतम’ के स्थान पर ‘सर्वश्रेष्ठ’ या ‘श्रेष्ठतम’।
मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्द
भाव बताने वाले शब्दों में संबंध की दिशा देखी जाती है। छोटों के प्रति स्नेह, बड़ों के प्रति श्रद्धा, संतान के प्रति वात्सल्य, ईश्वर के प्रति भक्ति, और बराबर वालों में प्रेम या मैत्री: ‘माँ की पुत्र के प्रति श्रद्धा’ अशुद्ध है, ‘माँ का पुत्र के प्रति वात्सल्य’ शुद्ध। दुखी पर दया की जाती है, और बड़े छोटों पर कृपा करते हैं। ईर्ष्या दूसरे की उन्नति देखकर होने वाली जलन है, द्वेष शत्रुता का भाव। शंका संदेह है, आशंका अनिष्ट का डर: ‘मुझे आशंका है कि तुम सफल होगे’ अशुद्ध है, ‘मुझे आशा है कि तुम सफल होगे’ शुद्ध। आविष्कार नई वस्तु बनाना है और खोज पहले से विद्यमान वस्तु का पता लगाना: ‘कोलंबस ने अमेरिका का आविष्कार किया’ अशुद्ध है, ‘अमेरिका की खोज की’ शुद्ध। अस्त्र फेंककर चलाया जाता है (बाण), शस्त्र हाथ में पकड़कर (तलवार): ‘तलवार एक अस्त्र है’ अशुद्ध है। बहुमूल्य वह है जिसका मूल्य बहुत अधिक है, अमूल्य वह जिसका मूल्य आँका ही न जा सके।
रूप में मिलते-जुलते शब्द (युग्म)
इन शब्दों में एक मात्रा या एक वर्ण का अंतर पूरा अर्थ बदल देता है। परिणाम (फल) और परिमाण (मात्रा): ‘इस दवा का परिणाम ठीक रखें’ अशुद्ध है, ‘परिमाण ठीक रखें’ शुद्ध। उपयुक्त (उचित) और उपर्युक्त (ऊपर कहा हुआ): ‘यह उपर्युक्त अवसर नहीं है’ अशुद्ध है, ‘उपयुक्त अवसर’ शुद्ध। प्रसाद (भोग, कृपा) और प्रासाद (महल): ‘राजा का प्रसाद बहुत विशाल था’ के स्थान पर ‘राजा का प्रासाद बहुत विशाल था’। आदि (इत्यादि, आरंभ) और आदी (अभ्यस्त): ‘वह चाय का आदि है’ के स्थान पर ‘चाय का आदी है’। अनिल (वायु) और अनल (आग); अभिराम (सुंदर) और अविराम (लगातार); कुल (वंश) और कूल (किनारा); अवधि (समय-सीमा) और अवधी (भाषा)। ऐसे शब्दों में शुद्ध वर्तनी जानना पर्याप्त नहीं, वाक्य का अर्थ देखकर सही शब्द चुनना पड़ता है।
सर्वनाम की भूलें
वाक्य का कर्ता जिस वस्तु या व्यक्ति का स्वामी है, उसके लिए निजवाचक ‘अपना’ आता है, ‘मेरा’, ‘तेरा’, ‘तुम्हारा’ नहीं: ‘मैं मेरे घर जा रहा हूँ’ अशुद्ध है, ‘मैं अपने घर जा रहा हूँ’ शुद्ध; ‘तुम तुम्हारा काम करो’ के स्थान पर ‘तुम अपना काम करो’। बहुवचन और आदरवाचक ‘वे’ है, ‘वह’ एकवचन: ‘लड़के मैदान में खेल रहे हैं, वह बहुत प्रसन्न हैं’ के स्थान पर ‘वे बहुत प्रसन्न हैं’। ‘ने’ के साथ ‘उन’ और ‘जिन’ के रूप ‘उन्होंने’ और ‘जिन्होंने’ हैं, ‘उनने’ और ‘जिनने’ नहीं। ‘कौन’ प्राणियों के लिए और ‘क्या’ वस्तुओं के लिए आता है: ‘तुम्हारे हाथ में कौन है?’ के स्थान पर ‘तुम्हारे हाथ में क्या है?’। सर्वनाम के रूप में ‘कोई’ अज्ञात व्यक्ति या प्राणी के लिए और ‘कुछ’ अज्ञात वस्तु के लिए आता है: ‘बाहर कोई खड़ा है’, पर ‘दूध में कोई पड़ा है’ के स्थान पर ‘दूध में कुछ पड़ा है’।
विशेषण की भूलें
संख्यावाचक विशेषण में ‘दो’ गिनती है और ‘दोनों’ पूरे जोड़े का बोध: ‘दो भाई आए’ और ‘दोनों भाई आए’ का अर्थ अलग है। परिमाणवाचक ‘बहुत-सा’ अपनी संज्ञा से लिंग-वचन में मेल खाता है: ‘उसके पास बहुत सा पुस्तकें हैं’ अशुद्ध है, ‘बहुत-सी पुस्तकें हैं’ शुद्ध। ‘अनेक’ और ‘कई’ पहले से बहुवचन हैं, इसलिए ‘अनेकों’ अशुद्ध है; और ‘गण’ स्वयं बहुवचन बनाता है, इसलिए ‘सब छात्रगण’ में ‘सब’ अनावश्यक है। ‘मेरा अपना निजी मकान’ में ‘अपना’ और ‘निजी’ एक ही बात कहते हैं, इसलिए एक हटाइए। दो की तुलना में ‘से’ के साथ मूल विशेषण या ‘तर’ आता है, और ‘तम’ सबमें सर्वोच्च के लिए: ‘यह पर्वत उस पर्वत से उच्चतम है’ अशुद्ध है, ‘उस पर्वत से ऊँचा है’ या ‘उच्चतर है’ शुद्ध; ‘एवरेस्ट संसार की उच्चतम चोटी है’ शुद्ध है।
परीक्षा के जाल
इस श्रेणी के प्रश्न प्रायः ऐसे वाक्य होते हैं जिनमें पुनरुक्ति छिपी रहती है, जैसे ‘कृपया... की कृपा करें’, ‘सकुशलपूर्वक’, ‘सारे भारत भर में’, ‘आपस में परस्पर’; विकल्पों में व्याकरण की कोई भूल नहीं दिखती, इसलिए अभ्यर्थी ‘कोई त्रुटि नहीं’ चुन लेते हैं। दूसरा जाल युग्म शब्दों का है, जहाँ दोनों वर्तनियाँ शुद्ध हैं पर अर्थ केवल एक का बैठता है (परिणाम-परिमाण, उपयुक्त-उपर्युक्त, आदि-आदी)। तीसरा जाल ‘अपना’ के स्थान पर ‘मेरा’ या ‘तुम्हारा’ है, जो बोलचाल में बहुत सुनाई देता है। चौथा, दोहरे प्रत्यय वाले रूप (सौंदर्यता, धैर्यता, आवश्यकीय), जो पढ़ने में विद्वत्तापूर्ण लगते हैं।
मुख्य तथ्य
- ‘सकुशलपूर्वक’ → ‘सकुशल’ या ‘कुशलपूर्वक’; ‘सादरपूर्वक’ → ‘सादर’ या ‘आदरपूर्वक’; ‘निर्दोषी’ → ‘निर्दोष’; ‘आवश्यकीय’ → ‘आवश्यक’।
- ‘कृपया पत्र का उत्तर देने की कृपा करें।’ → ‘कृपया पत्र का उत्तर दें।’ या ‘पत्र का उत्तर देने की कृपा करें।’
- ‘वे आपस में परस्पर लड़ते हैं।’ → ‘वे आपस में लड़ते हैं।’ या ‘वे परस्पर लड़ते हैं।’; ‘सारे भारत भर में’ → ‘सारे भारत में’।
- दोहरा प्रत्यय: माधुर्यता, धैर्यता, सौजन्यता, ऐक्यता, चातुर्यता अशुद्ध; माधुर्य या मधुरता, धैर्य, सौजन्य, ऐक्य या एकता, चातुर्य या चतुरता शुद्ध।
- ‘कोलंबस ने अमेरिका का आविष्कार किया।’ → ‘कोलंबस ने अमेरिका की खोज की।’ (आविष्कार नई वस्तु का, खोज पहले से विद्यमान की)
- ‘इस दवा का परिणाम ठीक रखें।’ → ‘इस दवा का परिमाण ठीक रखें।’ (परिणाम = फल, परिमाण = मात्रा); उपयुक्त = उचित, उपर्युक्त = ऊपर कहा हुआ।
- ‘मुझे आशंका है कि तुम सफल होगे।’ → ‘मुझे आशा है कि तुम सफल होगे।’ (आशंका केवल अनिष्ट की होती है)
- भाव-भेद: छोटों से स्नेह, बड़ों के प्रति श्रद्धा, संतान से वात्सल्य, ईश्वर के प्रति भक्ति; दुखी पर दया, बड़ों की छोटों पर कृपा; ईर्ष्या (उन्नति से जलन), द्वेष (शत्रुता)।
- ‘मैं मेरे घर जा रहा हूँ।’ → ‘मैं अपने घर जा रहा हूँ।’; ‘उनने कहा।’ → ‘उन्होंने कहा।’; ‘उसके पास बहुत सा पुस्तकें हैं।’ → ‘बहुत-सी पुस्तकें हैं।’
- युग्म: प्रसाद (भोग) / प्रासाद (महल), आदि (इत्यादि) / आदी (अभ्यस्त), अनिल (वायु) / अनल (आग), अभिराम (सुंदर) / अविराम (लगातार), कुल (वंश) / कूल (किनारा)।
एक नज़र में दोहराव
पुनरुक्ति हटाएँ: आपस में परस्पर, पुनः दोबारा, हर प्रत्येक, केवल... ही, सकुशलपूर्वक, सादरपूर्वक, कृपया... कृपा करें, सारे भारत भर में; दोहरे प्रत्यय अशुद्ध: माधुर्यता, धैर्यता, सौजन्यता, आवश्यकीय, पूज्यनीय, सबसे श्रेष्ठतम; ‘महानता’ पर मतभेद, ‘महत्ता’ सुरक्षित; स्नेह-श्रद्धा-वात्सल्य-भक्ति, दया-कृपा, शंका-आशंका, आविष्कार-खोज, अस्त्र-शस्त्र; परिणाम-परिमाण, उपयुक्त-उपर्युक्त, प्रसाद-प्रासाद, आदि-आदी; कर्ता की वस्तु के लिए ‘अपना’; उन्होंने; बहुत-सी पुस्तकें।