41 में से पाठ 29 · वाक्य शुद्धि और वर्तनी

क्रिया, काल और पद-क्रम की अशुद्धियाँ

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

क्रिया किससे मेल खाए, तीन प्रयोग

हिंदी व्याकरण में क्रिया के मेल को ‘प्रयोग’ कहते हैं, और यह कर्ता तथा कर्म के साथ लगे परसर्ग से तय होता है। कर्तरि प्रयोग में कर्ता के साथ कोई परसर्ग नहीं होता और क्रिया कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार चलती है: ‘लड़का पत्र लिखता है’, ‘लड़कियाँ पत्र लिखती हैं’, ‘सीता गीत गा रही थी’। कर्मणि प्रयोग में कर्ता के साथ ‘ने’ होता है और कर्म के साथ कोई परसर्ग नहीं; तब क्रिया कर्म के अनुसार चलती है: ‘राम ने रोटी खाई’, ‘सीता ने केले खाए’, ‘लड़कों ने पुस्तक पढ़ी’। भावे प्रयोग में कर्ता और कर्म दोनों के साथ परसर्ग होता है (प्रायः ‘ने’ और ‘को’), तब क्रिया न कर्ता से मेल खाती है न कर्म से, और सदा अन्य पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन में रहती है: ‘सीता ने राम को देखा’, ‘रानी ने दासियों को बुलाया’, ‘माँ ने बच्ची को सुलाया’। इसलिए ‘रानी ने दासियों को बुलाईं’ और ‘शिक्षक ने छात्राओं को पढ़ाईं’ अशुद्ध हैं।

‘को’ वाले कर्ता के साथ क्रिया

जब कर्ता के साथ ‘को’ हो और वाक्य में ‘चाहिए’ या ‘है’ के साथ क्रियार्थक संज्ञा हो, तो मानक हिंदी में क्रिया कर्म के लिंग-वचन से मेल खाती है: ‘मुझे पुस्तक पढ़नी है’, ‘मुझे पत्र लिखना है’, ‘आपको दवा लेनी चाहिए’, ‘हमें ये बातें याद रखनी चाहिए’। बोलचाल में ‘मुझे पुस्तक पढ़ना है’ भी सुनाई देता है, और कुछ पुस्तकें इसे स्वीकार करती हैं, पर परीक्षा में कर्म से मेल वाला रूप सुरक्षित उत्तर है। कर्म के साथ ‘को’ हो तो रूप ‘ना’ ही रहता है: ‘मुझे सीता को बुलाना है’। ‘चाहिए’ का रूप आधुनिक हिंदी में प्रायः नहीं बदलता: ‘मुझे दो पुस्तकें चाहिए’; कुछ पुरानी व्याकरण पुस्तकें बहुवचन कर्म के साथ ‘चाहिएँ’ लिखती हैं, पर आज का प्रचलित मानक रूप ‘चाहिए’ है।

एक से अधिक कर्ता

‘और’ से जुड़े कर्ताओं के साथ क्रिया बहुवचन होती है, और भिन्न लिंगों के प्राणी हों तो पुल्लिंग बहुवचन: ‘माता और पिता आए’। ‘या’, ‘अथवा’ से जुड़े कर्ताओं में क्रिया अंतिम कर्ता के अनुसार चलती है: ‘मोहन या उसकी बहन आएगी’। ‘के साथ’ से जुड़ा व्यक्ति कर्ता नहीं होता, इसलिए क्रिया मुख्य कर्ता से मिलती है: ‘राधा अपने भाइयों के साथ आए’ अशुद्ध है, ‘राधा अपने भाइयों के साथ आई’ शुद्ध। भिन्न पुरुषों के कर्ता हों तो क्रिया उत्तम पुरुष को, और उत्तम पुरुष न हो तो मध्यम पुरुष को प्राथमिकता देती है: ‘राम और मैं कल जाएगा’ अशुद्ध है, ‘राम और मैं कल जाएँगे’ शुद्ध; ‘तुम और वह कल आएगा’ के स्थान पर ‘तुम और वह कल आओगे’। शिष्टता के लिए व्याकरण की पुस्तकें कर्ताओं का क्रम मध्यम, अन्य, उत्तम पुरुष रखने को कहती हैं: ‘तुम, वह और मैं चलेंगे’।

काल की भूलें

वाक्य में आए समय-सूचक शब्द काल तय करते हैं। ‘प्रतिदिन’, ‘रोज़’, ‘हमेशा’ आदत बताते हैं, इसलिए सामान्य वर्तमान (बीती आदत के लिए ‘जाता था’) चाहिए: ‘मैं प्रतिदिन टहलने गया’ अशुद्ध है, ‘मैं प्रतिदिन टहलने जाता हूँ’ शुद्ध। ‘अभी-अभी’ के साथ आसन्न भूत आता है: ‘वह अभी-अभी आया था’ के स्थान पर ‘वह अभी-अभी आया है’। बीते समय के निश्चित शब्दों (‘पिछले वर्ष’, ‘दो वर्ष पहले’, बीता हुआ ‘कल’) के साथ आसन्न भूत नहीं आता: ‘वह कल आया है’ अशुद्ध है, ‘वह कल आया’ या ‘आया था’ शुद्ध। ‘से’ से बताई गई अवधि में जो काम अब भी चल रहा है, उसके लिए अपूर्ण वर्तमान: ‘मैं दो घंटे से तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ’ अशुद्ध है, ‘कर रहा हूँ’ शुद्ध। भूतकाल की दो घटनाओं में जो पहले पूरी हो चुकी, वह पूर्ण भूत में आती है: ‘जब मैं स्टेशन पहुँचा, तब तक गाड़ी छूट चुकी थी’ (‘छूट गई है’ नहीं)। शर्त वाले वाक्य के दोनों भाग एक ढंग के हों: ‘यदि वर्षा होती तो फ़सल अच्छी होती’, ‘यदि तुम आओगे तो मैं चलूँगा’; ‘यदि वर्षा होती तो फ़सल अच्छी होगी’ अशुद्ध है।

निषेध, आज्ञा और आदर

‘मत’ केवल आज्ञा और निषेध के आदेश में आता है: ‘वहाँ मत जाओ’, ‘झूठ मत बोलो’। भविष्यत् या भूतकाल की क्रिया के साथ ‘नहीं’ आता है: ‘तुम वहाँ मत जाओगे’ अशुद्ध है, ‘तुम वहाँ नहीं जाओगे’ शुद्ध; ‘मैं वहाँ मत गया’ के स्थान पर ‘मैं वहाँ नहीं गया’। ‘न’ आशंका, इच्छा और ‘न... न’ के जोड़े में आता है: ‘कहीं वह न आ जाए’, ‘न वह आया, न उसका भाई’। आज्ञार्थक क्रिया सर्वनाम के आदर-स्तर से मेल खाती है: ‘तू’ के साथ ‘बैठ’, ‘तुम’ के साथ ‘बैठो’, ‘आप’ के साथ ‘बैठिए’। इसलिए ‘आप यहाँ बैठो’ अशुद्ध है और ‘आप यहाँ बैठिए’ शुद्ध। ‘आप’ के साथ क्रिया सदा बहुवचन रहती है: ‘आप कब आए?’, ‘आप कहाँ जा रहे हैं?’ (‘जा रहे हो’ नहीं)।

पद-क्रम

हिंदी वाक्य का सामान्य क्रम है कर्ता, फिर कर्म, और अंत में क्रिया: ‘राम ने रावण को मारा’। दो कर्म हों तो पहले गौण कर्म (‘को’ वाला) और फिर मुख्य कर्म: ‘माँ ने बच्चे को दूध पिलाया’, ‘शिक्षक ने छात्रों को कहानी सुनाई’। विशेषण अपने विशेष्य के ठीक पहले आता है, और विधेय-विशेषण क्रिया से पहले: ‘यह आम मीठा है’। इसलिए ‘मुझे एक गरम कप चाय चाहिए’ अशुद्ध है, क्योंकि गरम चाय है, कप नहीं: ‘मुझे एक कप गरम चाय चाहिए’। हाँ-नहीं वाले प्रश्न में ‘क्या’ वाक्य के आरंभ में आता है (‘क्या तुम कल आओगे?’), और ‘नहीं’, ‘न’, ‘मत’ क्रिया से ठीक पहले आते हैं। ‘ही’, ‘भी’, ‘तक’, ‘केवल’ जिस शब्द पर बल देते हैं, उसी के पास आते हैं, और जगह बदलते ही अर्थ बदल जाता है: ‘मैं ही आज जाऊँगा’ (कोई और नहीं), ‘मैं आज ही जाऊँगा’ (कल नहीं), ‘मैं आज जाऊँगा ही’ (निश्चय)।

उपवाक्य और योजक जोड़े

संबंधवाचक उपवाक्य में ‘जो’ के साथ ‘वह’ एक ही बार आता है: ‘वह लड़का जो कल आया था, वह मेरा भाई है’ अशुद्ध है, ‘जो लड़का कल आया था, वह मेरा भाई है’ शुद्ध। योजकों के जोड़े निश्चित हैं: जो... वह, जैसा... वैसा, जितना... उतना, जब... तब, जहाँ... वहाँ, यदि... तो, यद्यपि... तथापि (या फिर भी), न केवल... बल्कि (या अपितु), चूँकि... इसलिए। ‘जितना पढ़ोगे, इतना सीखोगे’ अशुद्ध है, ‘जितना पढ़ोगे, उतना सीखोगे’ शुद्ध; ‘वह न केवल गायक है, परंतु लेखक भी है’ के स्थान पर ‘बल्कि लेखक भी है’। ‘क्योंकि’ कारण बताने वाले उपवाक्य को मुख्य वाक्य के बाद जोड़ता है (‘वह नहीं आया, क्योंकि बीमार था’), जबकि आरंभ में ‘चूँकि’ आता है (‘चूँकि वह बीमार था, इसलिए नहीं आया’); इसलिए अनेक पुस्तकें ‘क्योंकि... इसलिए’ को एक साथ प्रयोग करना अशुद्ध मानती हैं, और परीक्षा में ‘चूँकि... इसलिए’ ही सुरक्षित उत्तर है।

परीक्षा के जाल

इस श्रेणी के सामान्य जाल हैं: कर्ता के साथ ‘ने’ और कर्म के साथ ‘को’ वाले वाक्य में क्रिया को कर्म से मिला देना (‘रानी ने दासियों को बुलाईं’); ‘के साथ’ वाले व्यक्ति को कर्ता गिन लेना; ‘प्रतिदिन’, ‘अभी-अभी’, ‘दो घंटे से’ जैसे शब्दों को अनदेखा करना; शर्त वाले वाक्य में दो ढंग मिलाना; ‘मत’ को भविष्यत् के साथ और ‘आप’ के साथ ‘बैठो’ लगाना; विशेषण को गलत शब्द के पास रखना; और योजक जोड़े बदल देना (जितना... इतना, न केवल... परंतु)।

मुख्य तथ्य

  • ‘रानी ने दासियों को बुलाईं।’ → ‘रानी ने दासियों को बुलाया।’ (कर्ता के साथ ने, कर्म के साथ को: क्रिया पुल्लिंग एकवचन)
  • ‘लड़कों ने पुस्तक पढ़े।’ → ‘लड़कों ने पुस्तक पढ़ी।’; ‘सीता ने केले खाई।’ → ‘सीता ने केले खाए।’ (ने वाले वाक्य में क्रिया कर्म से)
  • ‘राधा अपने भाइयों के साथ आए।’ → ‘राधा अपने भाइयों के साथ आई।’; ‘राम और मैं कल जाएगा।’ → ‘राम और मैं कल जाएँगे।’
  • ‘मैं प्रतिदिन टहलने गया।’ → ‘मैं प्रतिदिन टहलने जाता हूँ।’; ‘वह कल आया है।’ → ‘वह कल आया था।’
  • ‘जब मैं स्टेशन पहुँचा, गाड़ी छूट गई है।’ → ‘जब मैं स्टेशन पहुँचा, तब तक गाड़ी छूट चुकी थी।’
  • ‘मैं दो घंटे से तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ।’ → ‘मैं दो घंटे से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।’; ‘यदि वर्षा होती तो फ़सल अच्छी होगी।’ → ‘... अच्छी होती।’
  • ‘तुम वहाँ मत जाओगे।’ → ‘तुम वहाँ नहीं जाओगे।’ या ‘तुम वहाँ मत जाओ।’; ‘आप यहाँ बैठो।’ → ‘आप यहाँ बैठिए।’
  • ‘मुझे एक गरम कप चाय चाहिए।’ → ‘मुझे एक कप गरम चाय चाहिए।’; ‘वह लड़का जो कल आया था, वह मेरा भाई है।’ → ‘जो लड़का कल आया था, वह मेरा भाई है।’
  • ‘जितना पढ़ोगे, इतना सीखोगे।’ → ‘जितना पढ़ोगे, उतना सीखोगे।’; ‘वह न केवल गायक है, परंतु लेखक भी है।’ → ‘... बल्कि लेखक भी है।’
  • ‘ही’ का स्थान: ‘मैं ही आज जाऊँगा’ (कोई और नहीं), ‘मैं आज ही जाऊँगा’ (कल नहीं), ‘मैं आज जाऊँगा ही’ (निश्चय)।

एक नज़र में दोहराव

कर्ता बिना परसर्ग: क्रिया कर्ता से (कर्तरि); कर्ता के साथ ने, कर्म बिना परसर्ग: क्रिया कर्म से (कर्मणि); ने और कर्म के साथ को: क्रिया पुल्लिंग एकवचन (भावे), रानी ने दासियों को बुलाया; मुझे पुस्तक पढ़नी है; या से जुड़े कर्ता में अंतिम कर्ता से; के साथ वाला कर्ता नहीं; राम और मैं जाएँगे; प्रतिदिन जाता हूँ, अभी-अभी आया है, दो घंटे से कर रहा हूँ; यदि होती तो होती; मत केवल आज्ञा में; आप बैठिए; एक कप गरम चाय; जितना-उतना, न केवल-बल्कि, चूँकि-इसलिए।

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