12 में से पाठ 6 · सामान्य विज्ञान (भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान)
विद्युत और चुंबकत्व: ओम के नियम से घरेलू वायरिंग तक
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
आवेश और धारा
विद्युत आवेश धनात्मक या ऋणात्मक होता है; सजातीय आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित और विजातीय आवेश आकर्षित करते हैं। इसका SI मात्रक कूलॉम है, और एक इलेक्ट्रॉन पर 1.6 x 10^-19 C आवेश होता है। पदार्थ चालक (चाँदी सर्वश्रेष्ठ, फिर ताँबा और ऐलुमिनियम), विद्युतरोधी (रबर, काँच, प्लास्टिक, सूखी लकड़ी) या अर्धचालक (सिलिकॉन, जर्मेनियम) होते हैं। आवेश के प्रवाह की दर विद्युत धारा है, I = Q/t, जिसे ऐम्पियर (1 A = 1 C/s) में, श्रेणीक्रम में जुड़े ऐमीटर से मापते हैं। परिपाटी के अनुसार धारा धन टर्मिनल से ऋण टर्मिनल की ओर बहती है, जो इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह की उलटी दिशा है।
विभवांतर और ओम का नियम
दो बिंदुओं के बीच एकांक आवेश को ले जाने में किया गया कार्य विभवांतर (potential difference) है, V = W/Q, जिसे वोल्ट (1 V = 1 J/C) में, पार्श्वक्रम में जुड़े वोल्टमीटर से मापते हैं; सेल या बैटरी इसे बनाए रखती है। जॉर्ज साइमन ओम ने 1827 में बताया कि स्थिर ताप पर किसी चालक से बहने वाली धारा उसके सिरों के बीच के विभवांतर के अनुक्रमानुपाती होती है: V = IR, जहाँ R ओम में प्रतिरोध है। ऐमीटर का प्रतिरोध बहुत कम और वोल्टमीटर का बहुत अधिक होता है, ताकि दोनों में से कोई परिपथ को प्रभावित न करे।
प्रतिरोध और प्रतिरोधकता
तार का प्रतिरोध R = ρL/A है: यह लंबाई के साथ बढ़ता है, अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के साथ घटता है, और पदार्थ तथा ताप पर निर्भर करता है। प्रतिरोधकता (resistivity; ρ, ओम मीटर में) पदार्थ का गुण है। तार को खींचकर दोगुना लंबा करने पर उसका क्षेत्रफल आधा और प्रतिरोध चार गुना हो जाता है। कम प्रतिरोधकता वाले ताँबे और ऐलुमिनियम से संचरण तार बनते हैं; नाइक्रोम, जो अधिक प्रतिरोधकता वाली मिश्रधातु है और लाल-तप्त होने पर भी ऑक्सीकृत नहीं होती, तापन तत्व बनाती है; टंगस्टन, अपने बहुत ऊँचे गलनांक के कारण, बल्ब के तंतु बनाता है। धातुओं का प्रतिरोध ताप के साथ बढ़ता है, जबकि अर्धचालकों का घटता है।
श्रेणीक्रम और पार्श्वक्रम परिपथ
श्रेणीक्रम (series) में प्रत्येक प्रतिरोधक से समान धारा बहती है और R = R1 + R2 + R3, जो सबसे बड़े प्रतिरोध से भी अधिक है; एक जगह टूटने पर पूरा परिपथ रुक जाता है। पार्श्वक्रम (parallel) में प्रत्येक शाखा पर विभवांतर समान रहता है और 1/R = 1/R1 + 1/R2 + 1/R3, जो सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम है: 4 ओम के दो प्रतिरोधक श्रेणीक्रम में 8 ओम और पार्श्वक्रम में 2 ओम देते हैं। घरों में वायरिंग पार्श्वक्रम में होती है ताकि हर उपकरण को पूरा वोल्टेज मिले और उसे अलग से चालू-बंद किया जा सके।
विद्युत शक्ति और ऊर्जा
विद्युत शक्ति P = VI = I^2R = V^2/R है, वाट में। ऊर्जा शक्ति और समय का गुणनफल है, और इसका व्यावसायिक मात्रक किलोवाट घंटा है: 1 kWh = 1 यूनिट = 3.6 x 10^6 J, अतः 100 W का बल्ब 10 घंटे जलने पर 1 यूनिट खपत करता है। धारा का तापीय प्रभाव जूल के नियम H = I^2Rt का पालन करता है और हीटर, इस्त्री, केतली, बल्ब तथा फ्यूज में काम आता है।
धारा का चुंबकीय प्रभाव और मोटर
1820 में हैंस क्रिश्चियन ओर्स्टेड ने देखा कि धारावाही तार कंपास की सुई को विक्षेपित करता है, यानी विद्युत से चुंबकत्व उत्पन्न होता है। दक्षिण-हस्त अंगुष्ठ नियम सीधे तार के चारों ओर चुंबकीय क्षेत्र की दिशा बताता है। धारावाही कुंडली (परिनालिका) छड़ चुंबक जैसा व्यवहार करती है, और नरम लोहे के क्रोड के साथ वह विद्युत चुंबक बन जाती है, जो बिजली की घंटी, रिले और लोहे का कबाड़ उठाने वाली क्रेनों में प्रयुक्त होता है। चुंबकीय क्षेत्र में रखे धारावाही चालक पर बल लगता है, जिसकी दिशा फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम बताता है (तर्जनी क्षेत्र, मध्यमा धारा, अंगूठा गति)। यही विद्युत मोटर का सिद्धांत है, जो विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में बदलती है; DC मोटर हर आधे चक्कर पर धारा की दिशा उलटने के लिए विभक्त वलय दिक्परिवर्तक का प्रयोग करती है। पंखे, मिक्सर, पंप और वॉशिंग मशीन मोटर से चलते हैं।
प्रेरण, जनित्र और ट्रांसफॉर्मर
1831 में माइकल फैराडे ने पाया कि कुंडली से गुजरता बदलता चुंबकीय क्षेत्र उसमें धारा प्रेरित करता है; यह विद्युतचुंबकीय प्रेरण (electromagnetic induction) है, और फ्लेमिंग का दक्षिण-हस्त नियम उस धारा की दिशा बताता है। जनित्र (डायनेमो) इसी से यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। ट्रांसफॉर्मर अन्योन्य प्रेरण पर और केवल AC पर काम करता है: उच्चायी (स्टेप-अप) ट्रांसफॉर्मर, जिसकी द्वितीयक कुंडली में अधिक फेरे होते हैं, बिजलीघरों पर वोल्टेज बढ़ाता है ताकि बिजली कम हानि के साथ दूर तक जा सके, और अपचायी (स्टेप-डाउन) ट्रांसफॉर्मर घरों के पास इसे घटाता है। प्रत्यावर्ती धारा (AC) समय-समय पर अपनी दिशा उलटती है; भारत में इसकी आवृत्ति 50 Hz है, अर्थात यह हर 1/100 सेकंड में दिशा बदलती है। सेल और बैटरियाँ दिष्ट धारा (DC) देती हैं, जो एक ही दिशा में बहती है। दिष्टकारी (रेक्टिफायर) AC को DC में और इन्वर्टर DC को AC में बदलता है।
घरेलू वायरिंग और सुरक्षा
घरों में लगभग 220 से 230 V का AC विद्युन्मय (लाइव) तार, उदासीन (न्यूट्रल) तार और भूसंपर्क (अर्थ) तार के माध्यम से आता है; NCERT इनके विद्युतरोधन का रंग क्रमशः लाल, काला और हरा बताती है, जबकि कई नए केबल और उपकरणों की तारें अंतरराष्ट्रीय कोड अपनाती हैं: भूरा (विद्युन्मय), नीला (उदासीन) और पीली धारियों वाला हरा (भूसंपर्क)। भूसंपर्क तार इस्त्री, रेफ्रिजरेटर और टोस्टर के धात्विक आवरण को धरती से जोड़ता है, ताकि रिसने वाली धारा उपयोगकर्ता के शरीर के बजाय धरती में चली जाए। फ्यूज, कम गलनांक का एक तार जो विद्युन्मय तार के साथ श्रेणीक्रम में लगता है, तब पिघल जाता है जब लघुपथन (short circuit, यानी लाइव और उदासीन तारों के छू जाने) या अतिभारण (overloading, यानी एक सॉकेट पर बहुत अधिक उपकरण) के कारण अत्यधिक धारा बहती है; लघु परिपथ विच्छेदक (MCB) यही काम करता है और उसे बस फिर से चालू किया जा सकता है। स्विच सदैव विद्युन्मय तार में लगाए जाते हैं, और एक ही तार पर बैठा पक्षी सुरक्षित रहता है क्योंकि उसके शरीर के आर-पार कोई विभवांतर नहीं होता।
मुख्य तथ्य
- इलेक्ट्रॉन पर आवेश = 1.6 x 10^-19 C; I = Q/t (ऐम्पियर); ऐमीटर श्रेणीक्रम में (कम प्रतिरोध), वोल्टमीटर पार्श्वक्रम में (अधिक प्रतिरोध)।
- ओम का नियम (1827): स्थिर ताप पर V = IR; R = ρL/A, इसलिए खींचकर दोगुना लंबा किए गए तार का प्रतिरोध चार गुना हो जाता है।
- तापन तत्व: नाइक्रोम (अधिक प्रतिरोधकता, ऑक्सीकृत नहीं होता); बल्ब का तंतु: टंगस्टन (बहुत ऊँचा गलनांक); संचरण लाइनें: ताँबा और ऐलुमिनियम।
- श्रेणीक्रम: समान धारा, R = R1 + R2; पार्श्वक्रम: समान वोल्टेज, 1/R = 1/R1 + 1/R2; घरों की वायरिंग पार्श्वक्रम में होती है।
- P = VI = I^2R = V^2/R; 1 यूनिट = 1 kWh = 3.6 x 10^6 J; 100 W का बल्ब 10 घंटे जलने पर 1 यूनिट खर्च करता है।
- ओर्स्टेड (1820): धारा से चुंबकत्व उत्पन्न होता है; फैराडे (1831): बदलते चुंबकीय क्षेत्र से धारा उत्पन्न होती है (विद्युतचुंबकीय प्रेरण)।
- फ्लेमिंग का वाम-हस्त नियम: मोटर (विद्युत से यांत्रिक ऊर्जा); दक्षिण-हस्त नियम: जनित्र (यांत्रिक से विद्युत ऊर्जा)।
- ट्रांसफॉर्मर: अन्योन्य प्रेरण, केवल AC पर काम करता है; बिजलीघर पर उच्चायी, घरों के पास अपचायी; दिष्टकारी AC से DC, इन्वर्टर DC से AC।
- भारतीय घरेलू आपूर्ति: AC, 50 Hz, लगभग 220-230 V; फ्यूज विद्युन्मय तार के साथ श्रेणीक्रम में; भूसंपर्क तार धात्विक आवरण से लगने वाले झटके से बचाता है; स्विच विद्युन्मय तार में लगते हैं।
एक नज़र में दोहराव
इलेक्ट्रॉन का आवेश 1.6 x 10^-19 C; ऐम्पियर = कूलॉम प्रति सेकंड; V = IR (ओम, 1827); R = ρL/A; नाइक्रोम हीटर में, टंगस्टन तंतु में; श्रेणीक्रम में प्रतिरोध जुड़ते हैं, पार्श्वक्रम में व्युत्क्रम जुड़ते हैं; घरों में पार्श्वक्रम; P = VI; 1 kWh = 3.6 x 10^6 J; ओर्स्टेड 1820, फैराडे 1831; वाम-हस्त नियम मोटर, दक्षिण-हस्त नियम जनित्र; ट्रांसफॉर्मर केवल AC पर; भारत में 50 Hz AC; फ्यूज विद्युन्मय तार में, कम गलनांक; भूसंपर्क तार झटके से बचाता है।