10 में से पाठ 7 · भारत का भूगोल: भौतिक, आर्थिक और मानव

भारत की मृदाएँ और प्राकृतिक वनस्पति: मृदा के प्रकार, वनों के प्रकार और संरक्षण

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मृदाओं का वर्गीकरण

मृदा भूमि की पतली ऊपरी परत है, जो अपक्षयित चट्टानों और ह्यूमस के मिश्रण से बनती है, और कुछ सेंटीमीटर मृदा बनने में भी बहुत लंबा समय, सदियाँ या उससे भी अधिक, लगता है। इसका प्रकार मूल चट्टान, जलवायु, उच्चावच, वनस्पति और समय पर निर्भर करता है। 1929 में स्थापित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) भारतीय मृदाओं को आठ प्रमुख प्रकारों में बाँटती है: जलोढ़, काली, लाल और पीली, लैटेराइट, शुष्क (मरुस्थलीय), लवणीय, पीटमय (दलदली) और वन मृदाएँ। परीक्षाओं में पूछा जाता है कि प्रत्येक मृदा कहाँ मिलती है, उसका रंग या गुण किस कारण है, और कौन-सी फसलें उसके लिए उपयुक्त हैं।

जलोढ़ और काली मृदा

नदियों द्वारा बिछाई गई जलोढ़ मृदा सबसे विस्तृत है, जो उत्तरी मैदानों, नदी घाटियों और पूर्वी तट के डेल्टाओं में देश के लगभग 40 प्रतिशत भाग पर फैली है। इसमें पोटाश प्रचुर, परंतु फॉस्फोरस कम होता है; पुराने जलोढ़ (बांगर) में कंकड़ की गुटिकाएँ होती हैं, जबकि नया जलोढ़ (खादर) अधिक महीन और उपजाऊ होता है। यह धान, गेहूँ, गन्ना, दालों और तिलहनों के लिए उपयुक्त है। दक्कन ट्रैप की बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय से बनी काली मृदा या रेगुर महाराष्ट्र के अधिकांश भाग तथा गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ भागों में फैली है। यह चिकनी है और लंबे समय तक नमी बनाए रखती है, और गर्मियों में इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं जिनसे हवा भीतर जाती है, इसलिए इसे स्वतः जुताई वाली मृदा कहते हैं। इसमें चूना, लोहा, मैग्नीशिया और पोटाश प्रचुर, परंतु फॉस्फोरस, नाइट्रोजन और जैविक पदार्थ कम होते हैं। यह कपास के लिए आदर्श है, इसलिए इसे काली कपास मृदा भी कहते हैं।

लाल, लैटेराइट और अन्य मृदाएँ

लाल और पीली मृदा दक्कन के कम वर्षा वाले पूर्वी और दक्षिणी भागों में, तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में पुरानी क्रिस्टलीय चट्टानों पर बनती है; चट्टानों में लोहे के फैलाव के कारण यह लाल और उस लोहे के जलयोजित होने पर पीली दिखती है, और इसमें मोटे अनाज, दालें और मूँगफली उगती हैं। लैटेराइट मृदा (लैटिन शब्द लेटर, अर्थात ईंट, से) उच्च तापमान और भारी वर्षा में बनती है, जो चूना और सिलिका को बहा ले जाती है और लोहे व एल्युमिनियम के ऑक्साइड छोड़ देती है; केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और ओडिशा व असम की पहाड़ियों में पाई जाने वाली यह मृदा ईंटें बनाने में प्रयुक्त होती है और खाद देने पर इसमें चाय, कॉफी और काजू उगते हैं। राजस्थान की शुष्क मृदा रेतीली और लवणीय है, जिसके नीचे कंकड़ की परत होती है, और सिंचाई मिलने पर यह अच्छी उपज देती है। लवणीय मृदा (ऊसर, रेह या कल्लर) में सोडियम और मैग्नीशियम अधिक होते हैं; यह पश्चिमी गुजरात, पूर्वी डेल्टाओं, सुंदरबन और पंजाब व हरियाणा के अति-सिंचित भागों में मिलती है, और इसका उपचार जिप्सम से किया जाता है। जैविक पदार्थ से भरपूर पीटमय मृदा उत्तरी बिहार और पश्चिम बंगाल, ओडिशा व तमिलनाडु के तटों के जलभराव वाले क्षेत्रों में बनती है। हिमालय के ढालों पर वन मृदाएँ ऊँचाई पर पतली और अम्लीय होती हैं।

मृदा अपरदन और संरक्षण

मृदा अपरदन बहते जल और पवन द्वारा ऊपरी मृदा का हटना है, जिसे वनोन्मूलन, अति-चराई, खनन और लापरवाह खेती तेज़ करते हैं। बहता जल परत, क्षुद्र सरिता (रिल) और अवनालिका (गली) अपरदन करता है, और गहरी अवनालिकाएँ भूमि को उत्खात भूमि (बैडलैंड) बना देती हैं, जैसे चंबल के बीहड़, जबकि पवन मरुस्थल की ढीली मृदा उड़ा ले जाती है। संरक्षण के उपायों में ढाल के आर-पार समोच्च जुताई, पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीदार खेती, फसलों के बीच घास की पट्टियों वाली पट्टीदार कृषि, पश्चिमी भारत में पवन रोकने के लिए वृक्षों की रक्षक मेखलाएँ (शेल्टर बेल्ट), वनारोपण, अवनालिकाओं पर रोक बाँध (चेक डैम) और नियंत्रित चराई शामिल हैं।

वर्षा के अनुसार वन

भारत में प्राकृतिक वन का प्रकार मुख्यतः वर्षा पर निर्भर करता है। उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, पश्चिमी घाट, पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और अंडमान-निकोबार द्वीपों में उगते हैं; ये घने, ऊँचे, कई परतों वाले और पूरे वर्ष हरे रहते हैं, जिनमें आबनूस, महोगनी, रोज़वुड, रबड़ और सिनकोना हैं। उष्णकटिबंधीय पर्णपाती या मानसूनी वन सबसे विस्तृत हैं और शुष्क ऋतु में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। आर्द्र पर्णपाती प्रकार (200 से 100 सेमी वर्षा) में सागौन, साल, शीशम, चंदन और बाँस हैं और ये पूर्वोत्तर, हिमालय की तलहटी तथा झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में मिलते हैं; शुष्क पर्णपाती प्रकार (100 से 70 सेमी) में सागौन, पीपल और नीम हैं। उष्णकटिबंधीय कँटीले वन और झाड़ियाँ 70 सेमी से कम वर्षा वाले राजस्थान, गुजरात और शुष्क दक्कन में उगती हैं, जिनमें अकेशिया, बबूल, खेजड़ी, नागफनी और यूफोर्बिया हैं।

पर्वतीय वन और मैंग्रोव

पर्वतों में ऊँचाई के साथ वनस्पति बदलती है: 1,000 से 2,000 मीटर के बीच ओक और चेस्टनट के आर्द्र शीतोष्ण वन; 1,500 से 3,000 मीटर के बीच चीड़, देवदार, सिल्वर फर और स्प्रूस के शंकुधारी वन; लगभग 3,600 मीटर से ऊपर सिल्वर फर, जूनिपर और भोजपत्र (बर्च) के अल्पाइन वन; फिर अल्पाइन घास के मैदान, जिन्हें उत्तराखंड में बुग्याल और कश्मीर में मर्ग कहते हैं, और हिमरेखा के पास मॉस और लाइकेन। मैंग्रोव या ज्वारीय वन गंगा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के डेल्टाओं में खारे पानी में उगते हैं। सुंदरी वृक्ष के नाम पर बना और रॉयल बंगाल टाइगर का निवास पश्चिम बंगाल का सुंदरबन विश्व के सबसे बड़े मैंग्रोव वन का भाग है; भितरकनिका (ओडिशा) और पिचावरम (तमिलनाडु) अन्य मैंग्रोव हैं। 1988 की राष्ट्रीय वन नीति का लक्ष्य भूमि के एक-तिहाई (33 प्रतिशत) भाग और पहाड़ों में दो-तिहाई भाग को वन या वृक्ष आवरण में रखना है।

मुख्य तथ्य

  • ICAR (1929) भारतीय मृदाओं को आठ प्रकारों में बाँटती है: जलोढ़, काली, लाल और पीली, लैटेराइट, शुष्क, लवणीय, पीटमय और वन मृदा।
  • जलोढ़ मृदा: सबसे विस्तृत (क्षेत्रफल का लगभग 40 प्रतिशत), पोटाश प्रचुर, फॉस्फोरस कम; बांगर पुराना जलोढ़, खादर नया; धान, गेहूँ, गन्ना।
  • काली मृदा (रेगुर): दक्कन ट्रैप की बेसाल्ट से; नमी धारण करती है, स्वतः जुताई वाली दरारें; चूना, लोहा, मैग्नीशिया, पोटाश प्रचुर; फॉस्फोरस और नाइट्रोजन कम; कपास के लिए सर्वोत्तम।
  • लाल मृदा का रंग क्रिस्टलीय चट्टानों में लोहे के कारण (जलयोजित होने पर पीली); लैटेराइट (लैटिन लेटर = ईंट) गर्म, नम क्षेत्रों में निक्षालन से बनती है और चाय, कॉफी व काजू के लिए उपयुक्त है।
  • लवणीय मृदा (ऊसर, रेह, कल्लर) का उपचार जिप्सम से होता है; पीटमय मृदा जलभराव वाले उत्तरी बिहार और पश्चिम बंगाल, ओडिशा व तमिलनाडु के तटों पर बनती है।
  • संरक्षण: समोच्च जुताई, सीढ़ीदार खेती, पट्टीदार कृषि, रक्षक मेखलाएँ, रोक बाँध, वनारोपण; चंबल के बीहड़ अवनालिका अपरदन से बनी उत्खात भूमि हैं।
  • वर्षा के अनुसार वन: 200 सेमी से अधिक पर सदाबहार (आबनूस, महोगनी, रोज़वुड), 200-100 सेमी पर आर्द्र पर्णपाती (सागौन, साल), 100-70 सेमी पर शुष्क पर्णपाती, 70 सेमी से कम पर कँटीले (बबूल, खेजड़ी)।
  • पर्वतीय क्षेत्र: 1,000-2,000 मीटर पर ओक और चेस्टनट; 1,500-3,000 मीटर पर चीड़, देवदार, सिल्वर फर; 3,600 मीटर से ऊपर अल्पाइन; उत्तराखंड में घास के मैदान बुग्याल कहलाते हैं।
  • मैंग्रोव: सुंदरबन (सुंदरी वृक्ष, रॉयल बंगाल टाइगर), भितरकनिका (ओडिशा), पिचावरम (तमिलनाडु); वन नीति 1988 का लक्ष्य 33 प्रतिशत वन आवरण।

एक नज़र में दोहराव

ICAR (1929): मृदा के 8 समूह; जलोढ़ सबसे विस्तृत (लगभग 40%), पोटाश प्रचुर; काली रेगुर दक्कन की बेसाल्ट से, स्वतः जुताई वाली, कपास; लाल रंग लोहे से; लैटेराइट निक्षालन से, चाय, कॉफी, काजू; लवणीय (ऊसर, रेह) का उपचार जिप्सम से; समोच्च जुताई, सीढ़ीदार खेती, रक्षक मेखलाएँ अपरदन रोकती हैं; सदाबहार वन 200 सेमी से अधिक पर, पर्णपाती सबसे विस्तृत (सागौन, साल), कँटीले 70 सेमी से कम पर; शंकुधारी 1,500-3,000 मीटर; सुंदरबन मैंग्रोव; वन नीति 1988 का लक्ष्य 33%।

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