10 में से पाठ 1 · मध्य प्रदेश सामान्य ज्ञान
प्राचीन मध्यप्रदेश: भीमबेटका, महाजनपद, मौर्य और गुप्त काल
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
प्रागैतिहासिक मध्यप्रदेश
राज्य में मानव इतिहास पाषाण युग से आरंभ होता है। रायसेन जिले में भोपाल से लगभग 45 किमी दक्षिण-पूर्व में विंध्य की पहाड़ियों में स्थित भीमबेटका के शैलाश्रयों की पहचान पुरातत्वविद् वी. एस. वाकणकर ने 1957 में की थी। बलुआ पत्थर के सैकड़ों शैलाश्रयों में लाल और सफेद खनिज रंगों से बने चित्र हैं, जिनमें शिकार, नृत्य तथा बाइसन, बाघ और हाथी जैसे पशु दिखाए गए हैं; सबसे पुरानी परतें मध्यपाषाण काल तक जाती हैं। इसका नाम लोक में 'भीम बैठका' अर्थात भीम के बैठने का स्थान माना जाता है, और 2003 में यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना। नर्मदा घाटी में हथनोरा (सीहोर जिला) में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अरुण सोनकिया ने 1982 में मानव खोपड़ी का एक जीवाश्म खोजा, जिसे 'नर्मदा मानव' कहा जाता है और भारत में मिला सबसे पुराना मानव जीवाश्म माना जाता है। नर्मदापुरम के पास आदमगढ़ में पाषाणकालीन औज़ार और चित्र मिले हैं, तथा ताम्रपाषाणिक कृषक गाँवों का उत्खनन महेश्वर के पास नवदाटोली और उज्जैन के पास कायथा में हुआ है।
अवंति और चेदि
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध ग्रंथों में वर्णित सोलह महाजनपदों में से दो वर्तमान मध्यप्रदेश में थे। पश्चिमी मालवा में स्थित अवंति की राजधानी शिप्रा तट पर उज्जयिनी (उज्जैन) थी, और माहिष्मती, जिसकी पहचान प्रायः नर्मदा तट के महेश्वर से की जाती है, इसका दक्षिणी केंद्र थी। इसका राजा चंड प्रद्योत बुद्ध का समकालीन और मगध का प्रतिद्वंद्वी था, और अंततः शिशुनाग वंश के समय अवंति को मगध में मिला लिया गया। चेदि बुंदेलखंड क्षेत्र में था और उसकी राजधानी शुक्तिमती थी; महाभारत में शिशुपाल चेदि का राजा है। उज्जैन गंगा के मैदान से पश्चिमी बंदरगाहों तक जाने वाले व्यापार मार्ग पर स्थित था, जिससे यह दो हज़ार से अधिक वर्षों तक समृद्ध रहा।
मौर्य काल और मालवा में अशोक
मौर्यों के अधीन उज्जैन पश्चिमी प्रांत अवंति का मुख्यालय था। अशोक अपने पिता बिंदुसार के शासनकाल में उज्जैन का उपराजा (वायसराय) रहा, और श्रीलंकाई इतिवृत्तों के अनुसार उसने विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री देवी से विवाह किया, जो महेंद्र और संघमित्रा की माता थीं। राज्य में अशोक के अभिलेखों में रूपनाथ (कटनी जिला), गुर्जरा (दतिया जिला), जो उन गिने-चुने अभिलेखों में है जिनमें राजा का नाम 'अशोक' मिलता है, और सारु-मारु (सीहोर जिला) के लघु शिलालेख, तथा साँची का स्तंभलेख शामिल हैं, जिसमें भिक्षुओं को संघ में फूट डालने के विरुद्ध चेतावनी दी गई है। अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में साँची में ईंटों का पहला स्तूप बनवाया।
शुंग, साँची और विदिशा
लगभग 185 ईसा पूर्व में पुष्यमित्र शुंग द्वारा अंतिम मौर्य राजा बृहद्रथ को हटाने के बाद बेतवा तट पर स्थित विदिशा (प्राचीन बेसनगर) शुंगों का प्रमुख केंद्र बना; उसका पुत्र अग्निमित्र यहीं से शासन करता था और वही कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् का नायक है। शुंग काल में साँची के स्तूप का विस्तार कर उस पर पत्थर का आवरण चढ़ाया गया, और सतना जिले के भरहुत स्तूप की वेदिकाओं पर जातक कथाएँ उकेरी गईं; अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1873 में इन्हें खोजा और अब ये कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में हैं। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में तक्षशिला के हिंद-यवन राजा एंटियालकिडस द्वारा राजा भागभद्र के पास भेजे गए यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने बेसनगर में गरुड़ स्तंभ स्थापित किया, जिस पर वह स्वयं को वासुदेव का भक्त 'भागवत' बताता है; स्थानीय लोग इसे खंभ बाबा कहते हैं।
सातवाहन और शक
दक्कन के सातवाहनों ने पहली शताब्दी ईसा पूर्व में पूर्वी मालवा तक अपनी शक्ति फैलाई। साँची के महास्तूप के चार नक्काशीदार तोरण (प्रवेश द्वार) इसी चरण के हैं: दक्षिणी तोरण के एक अभिलेख में राजा शातकर्णी के शिल्पियों के प्रमुख आनंद के दान का उल्लेख है, और दूसरे अभिलेख के अनुसार इसका एक भाग विदिशा के हाथीदाँत शिल्पियों ने उकेरा। उज्जैन सहित पश्चिमी मालवा पश्चिमी क्षत्रप कहे जाने वाले शक शासकों के हाथ में चला गया; उनमें सबसे महान रुद्रदामन प्रथम उज्जैन से शासन करता था और 150 ई. के अपने जूनागढ़ अभिलेख से जाना जाता है।
गुप्त काल
चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने चौथी शताब्दी ईस्वी के अंत के आसपास शक शासन समाप्त किया और उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाया। विदिशा के पास उदयगिरि की गुफाएँ, लगभग बीस शैलकृत देवालय, उसी के शासनकाल की हैं: एक में 401 ई. का अभिलेख है और दूसरी में विशाल वराह फलक है, जिसमें विष्णु वराह रूप में पृथ्वी देवी को उठाते दिखाए गए हैं। सागर जिले में बीना नदी के तट पर एरण (प्राचीन ऐरिकिण) में समुद्रगुप्त का एक अभिलेख है, और भानुगुप्त के समय के 510 ई. के एक स्तंभलेख में लिखा है कि उसके सेनापति गोपराज की पत्नी अपने पति की चिता पर सती हो गई; यह सती प्रथा का सबसे पुराना अभिलेखीय साक्ष्य है। प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिर तिगवा (कटनी जिला), साँची (मंदिर 17), नचना (पन्ना) और भूमरा (सतना) में बचे हैं, और धार जिले की बाघ गुफाओं के चित्रों की तुलना प्रायः अजंता से की जाती है।
कालिदास और उज्जैन
परंपरा कालिदास को राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में गिनती है, जिनकी पहचान प्रायः चंद्रगुप्त द्वितीय से की जाती है। उनके मेघदूत में मेघ रूपी दूत उज्जयिनी और महाकाल मंदिर के ऊपर से गुज़रता है, और मालविकाग्निमित्रम् की कथा विदिशा में घटती है; उनकी अन्य रचनाएँ अभिज्ञानशाकुंतलम्, विक्रमोर्वशीयम्, रघुवंश, कुमारसंभव और ऋतुसंहार हैं। 57 ईसा पूर्व से आरंभ होने वाला विक्रम संवत परंपरा से उज्जैन के विक्रमादित्य से जुड़ा है। उज्जैन प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र की शून्य (प्रधान) देशांतर रेखा पर था; बृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका के रचयिता वराहमिहिर ने यहीं कार्य किया, और ब्रह्मगुप्त का नाम यहाँ की वेधशाला से जुड़ा है। उज्जैन में प्रतिवर्ष कालिदास समारोह आयोजित होता है।
मुख्य तथ्य
- भीमबेटका (रायसेन जिला): पाषाणकालीन चित्रित शैलाश्रय, जिनकी पहचान वी. एस. वाकणकर ने 1957 में की; 2003 से यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल।
- नर्मदा मानव: अरुण सोनकिया को 1982 में सीहोर जिले के हथनोरा में मिला मानव खोपड़ी का जीवाश्म, जिसे भारत में मिला सबसे पुराना मानव जीवाश्म माना जाता है।
- मध्यप्रदेश के महाजनपद: अवंति (राजधानी उज्जयिनी, दक्षिणी केंद्र माहिष्मती) और चेदि (राजधानी शुक्तिमती, बुंदेलखंड); अवंति का राजा चंड प्रद्योत बुद्ध का समकालीन था।
- अशोक उज्जैन का उपराजा रहा और विदिशा की देवी से विवाह किया; उसके अभिलेख रूपनाथ (कटनी), गुर्जरा (दतिया, इसमें 'अशोक' नाम है), सारु-मारु (सीहोर) और साँची स्तंभ पर हैं।
- साँची महास्तूप के तीन चरण: अशोक का ईंटों का स्तूप (मौर्य), पत्थर का आवरण और विस्तार (शुंग), चार नक्काशीदार तोरण (सातवाहन)।
- हेलियोडोरस स्तंभ (खंभ बाबा), विदिशा के पास बेसनगर: दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्ध में एंटियालकिडस के राजदूत ने स्थापित किया, जिसने स्वयं को वासुदेव का भक्त 'भागवत' कहा।
- भरहुत स्तूप (सतना): जातक कथाओं वाली शुंगकालीन वेदिकाएँ, 1873 में कनिंघम ने खोजीं, अब कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में।
- विदिशा के पास उदयगिरि गुफाएँ: चंद्रगुप्त द्वितीय के समय के गुप्तकालीन शैलकृत देवालय, जिनमें वराह फलक और 401 ई. का अभिलेख है।
- एरण (सागर जिला), बीना नदी के तट पर: 510 ई. का स्तंभलेख (भानुगुप्त का समय) सती प्रथा का सबसे पुराना अभिलेखीय प्रमाण है।
- उज्जैन: प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्र की शून्य (प्रधान) देशांतर रेखा, वराहमिहिर की कर्मभूमि, कालिदास के मेघदूत का प्रसंग; विक्रम संवत 57 ईसा पूर्व से आरंभ।
एक नज़र में दोहराव
भीमबेटका (रायसेन) शैलाश्रय, वाकणकर 1957, यूनेस्को 2003; हथनोरा (सीहोर) में नर्मदा मानव खोपड़ी 1982; महाजनपद अवंति (उज्जयिनी, माहिष्मती) और चेदि (शुक्तिमती); अशोक उज्जैन का उपराजा, अभिलेख रूपनाथ, गुर्जरा, सारु-मारु, साँची; विदिशा में शुंग, भरहुत वेदिकाएँ, हेलियोडोरस स्तंभ (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का उत्तरार्ध); साँची के सातवाहन तोरण; चंद्रगुप्त द्वितीय ने उज्जैन जीता, उदयगिरि वराह फलक (401 ई.); एरण सती अभिलेख 510 ई.; कालिदास, वराहमिहिर और उज्जैन।