10 में से पाठ 2 · मध्य प्रदेश सामान्य ज्ञान

मध्यकालीन मध्यप्रदेश: परमार, चंदेल, मालवा के सुल्तान, गोंड और मराठा

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क्षेत्रीय राज्य

गुप्तों के बाद मध्य भारत अनेक क्षेत्रीय राजवंशों में बँट गया; नौवीं शताब्दी में ग्वालियर गुर्जर-प्रतिहारों के अधिकार में था, और किले का तेली का मंदिर प्रतिहार युग का माना जाता है। दसवीं शताब्दी से मालवा के परमार, बुंदेलखंड के चंदेल और जबलपुर क्षेत्र के कलचुरि प्रभावी रहे, जब तक तुर्क आक्रमणों ने उन्हें कमज़ोर नहीं कर दिया।

परमार और राजा भोज

परमारों ने मालवा पर पहले उज्जैन से और बाद में धार (धारा नगरी) से शासन किया। कवि-राजा वाक्पति मुंज चालुक्य राजा तैलप द्वितीय के हाथों मारा गया। उसका भतीजा राजा भोज (लगभग 1010-1055) मध्यकालीन मध्यप्रदेश का सबसे प्रसिद्ध शासक है। स्थापत्य पर समरांगण सूत्रधार और काव्यशास्त्र पर सरस्वती कंठाभरण जैसी रचनाओं का श्रेय पाने वाले इस विद्वान राजा ने धार में संस्कृत विद्यालय भोजशाला की स्थापना की, रायसेन जिले के भोजपुर में भोजेश्वर शिव मंदिर का निर्माण आरंभ किया, जो कभी पूरा नहीं हुआ पर जिसमें भारत के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है, और भोपाल के विशाल तालाब के निर्माण का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है; भोपाल नाम प्रायः 'भोजपाल' से निकला माना जाता है। बाद के परमार राजा उदयादित्य ने विदिशा जिले के उदयपुर में उदयेश्वर (नीलकंठेश्वर) मंदिर बनवाया, और 1305 में अलाउद्दीन खिलजी की सेना द्वारा मालवा जीतने के साथ परमार शासन समाप्त हुआ।

चंदेल और खजुराहो

नौवीं शताब्दी में नन्नुक द्वारा स्थापित चंदेलों ने जेजाकभुक्ति (बुंदेलखंड) पर शासन किया; खजुराहो उनका मंदिर-नगर था और कालिंजर तथा महोबा के किले, जो दोनों अब उत्तर प्रदेश में हैं, उनके गढ़ थे। लगभग 950 से 1050 के बीच उन्होंने छतरपुर जिले में बलुआ पत्थर से नागर शैली में खजुराहो के मंदिर बनवाए: यशोवर्मन ने लक्ष्मण मंदिर और धंग ने विश्वनाथ मंदिर बनवाया, और सबसे बड़े कंदरिया महादेव मंदिर का श्रेय विद्याधर को दिया जाता है, जिसने महमूद गजनवी का प्रतिरोध किया। परंपरा 85 मंदिरों की बात करती है, जिनमें से लगभग दो दर्जन बचे हैं। परमर्दिदेव (परमाल) 1182 में पृथ्वीराज चौहान से हारा; उसके सेनापति आल्हा और ऊदल बुंदेली गाथाओं के नायक हैं।

कलचुरि और तोमर

कलचुरि (हैहय) वंश ने जबलपुर के पास आधुनिक तेवर, अर्थात त्रिपुरी, से चेदि देश पर शासन किया; गांगेयदेव ने विक्रमादित्य की उपाधि ली और उसका पुत्र लक्ष्मीकर्ण, जिसने भोज के अंतिम वर्षों में मालवा पर आक्रमण किया, इस वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था। भेड़ाघाट का चौंसठ योगिनी मंदिर कलचुरि कृति है। ग्वालियर में कच्छपघात राजा महिपाल ने 1093 में सहस्रबाहु (सास-बहू) मंदिर बनवाया। चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तोमरों ने ग्वालियर को स्वतंत्र कर लिया। डूंगर सिंह ने किले की चट्टानों में विशाल जैन प्रतिमाएँ उकेरवाईं, और मानसिंह तोमर (1486-1516) ने मान मंदिर महल तथा अपनी गूजर रानी मृगनयनी के लिए गूजरी महल बनवाया। वे ध्रुपद संगीत के महान संरक्षक थे, और 'मान कुतूहल' ग्रंथ उनसे जुड़ा है।

मालवा सल्तनत और मांडू

मालवा के तुगलक सूबेदार दिलावर खाँ गोरी ने 1401 में धार को राजधानी बनाकर स्वतंत्रता घोषित की। उसके पुत्र होशंगशाह (1406-1435) ने राजधानी मांडू स्थानांतरित की, जिसे शादियाबाद, यानी आनंद का नगर, भी कहा जाता है; वहाँ उसका मकबरा भारत की पहली संगमरमर की इमारत माना जाता है, और कहा जाता है कि इसने ताजमहल के निर्माताओं को प्रेरित किया। महमूद खिलजी ने मालवा में खिलजी वंश की स्थापना की और गयासुद्दीन खिलजी ने जहाज महल बनवाया। गुजरात के बहादुरशाह ने 1531 में मालवा को अपने राज्य में मिला लिया। बाद में शेरशाह के सूबेदार शुजात खाँ के पुत्र बाज बहादुर ने मांडू से शासन किया; गायिका रानी रूपमती के प्रति उसका प्रेम रूपमती मंडप में याद किया जाता है। अकबर के सेनापति अधम खाँ ने 1561 में सारंगपुर में बाज बहादुर को हराया, और रूपमती ने बंदी बनने के बजाय विष खा लिया।

गोंड, बुंदेला और मुगल

गढ़ा-कटंगा का गोंड राज्य संग्रामशाह के समय शक्तिशाली हुआ, जिन्हें 52 गढ़ों का श्रेय दिया जाता है। उनके पुत्र दलपतशाह ने चंदेल राजकुमारी दुर्गावती से विवाह किया; पति की मृत्यु के बाद दुर्गावती ने पुत्र वीर नारायण के लिए शासन संभाला, बाज बहादुर को पीछे धकेला, और 24 जून 1564 को जबलपुर के पास अकबर के सेनापति आसफ खाँ से लड़ते हुए प्राण दिए। उत्तर में बुंदेलों ने 1531 में रुद्रप्रताप सिंह के नेतृत्व में बेतवा तट पर ओरछा बसाया। शहज़ादे सलीम (जहाँगीर) के लिए 1602 में अबुल फजल की हत्या करवाने वाले वीरसिंह देव ने ओरछा में जहाँगीर महल और दतिया में महल बनवाया, और रामचंद्रिका तथा रसिकप्रिया के रचयिता हिंदी कवि केशवदास ओरछा दरबार से जुड़े थे। अकबर की अंतिम विजय 1601 में बुरहानपुर के पास असीरगढ़ का किला थी, जिसे दक्कन की कुंजी कहा जाता है, और मुमताज महल की मृत्यु 1631 में बुरहानपुर में हुई। औरंगज़ेब के समय छत्रसाल ने पन्ना को राजधानी बनाकर बुंदेला राज्य खड़ा किया और मुहम्मद खाँ बंगश के आक्रमण पर पेशवा बाजीराव प्रथम से सहायता माँगी, जिन्हें उन्होंने अपने राज्य का एक तिहाई भाग दिया।

मराठा

1737 में भोपाल के पास निज़ाम पर बाजीराव प्रथम की विजय और 1738 की दुराहा सराय (दोराहा) की संधि से मालवा मराठों को मिला। तीन मराठा घरानों ने इस क्षेत्र के बड़े भाग पर शासन किया: इंदौर में होलकर, ग्वालियर में सिंधिया तथा धार और देवास में पवार, जबकि नागपुर के भोंसलों के पास महाकोशल के कुछ भाग थे। मल्हारराव होलकर ने होलकर राज्य की स्थापना की; उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई होलकर ने 1767 से 1795 तक नर्मदा तट पर महेश्वर से शासन किया, 1780 में काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया, पूरे भारत में मंदिरों और घाटों के लिए दान दिया तथा माहेश्वरी बुनाई को प्रोत्साहन दिया। राणोजी सिंधिया ने उज्जैन को पहली राजधानी बनाकर सिंधिया घराने की नींव रखी, महादजी सिंधिया पानीपत के बाद उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्ति बने, और दौलतराव सिंधिया ने राजधानी ग्वालियर (लश्कर) स्थानांतरित की।

मुख्य तथ्य

  • राजा भोज (परमार, लगभग 1010-1055): राजधानी धार, भोजशाला, भोजपुर (रायसेन) का भोजेश्वर मंदिर, भोपाल का विशाल तालाब; समरांगण सूत्रधार के रचयिता।
  • खजुराहो (छतरपुर): लगभग 950-1050 के नागर शैली के चंदेल मंदिर; लक्ष्मण मंदिर यशोवर्मन ने बनवाया, कंदरिया महादेव का श्रेय विद्याधर को।
  • त्रिपुरी (जबलपुर के पास तेवर) के कलचुरि: गांगेयदेव और लक्ष्मीकर्ण; भेड़ाघाट का चौंसठ योगिनी मंदिर।
  • ग्वालियर: सास-बहू मंदिर 1093 में कच्छपघात राजा महिपाल ने बनवाया; मानसिंह तोमर (1486-1516) ने मान मंदिर और रानी मृगनयनी के लिए गूजरी महल बनवाया।
  • मालवा सल्तनत: दिलावर खाँ गोरी 1401 में धार में स्वतंत्र; होशंगशाह ने राजधानी मांडू (शादियाबाद) की; बाज बहादुर 1561 में सारंगपुर में अधम खाँ से हारा।
  • गढ़ा-कटंगा की रानी दुर्गावती 24 जून 1564 को जबलपुर के पास अकबर के सेनापति आसफ खाँ से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं।
  • बेतवा तट पर ओरछा, 1531 में रुद्रप्रताप सिंह द्वारा स्थापित; वीरसिंह देव ने जहाँगीर महल बनवाया; कवि केशवदास ने ओरछा दरबार में रामचंद्रिका लिखी।
  • बुरहानपुर के पास असीरगढ़: अकबर की अंतिम विजय (1601), दक्कन की कुंजी; मुमताज महल की मृत्यु 1631 में बुरहानपुर में हुई।
  • पन्ना के छत्रसाल ने बंगश के विरुद्ध बाजीराव प्रथम की सहायता ली; दुराहा सराय की संधि (1738) से मालवा मराठों को मिला।
  • मराठा घराने: होलकर (इंदौर; अहिल्याबाई ने महेश्वर से 1767-1795 तक शासन किया), सिंधिया (उज्जैन, फिर ग्वालियर), पवार (धार और देवास)।

एक नज़र में दोहराव

ग्वालियर में प्रतिहार (तेली का मंदिर); धार के परमार, राजा भोज (लगभग 1010-1055), भोजपुर मंदिर, भोजशाला; चंदेलों ने खजुराहो बनवाया (लगभग 950-1050), कंदरिया महादेव; त्रिपुरी के कलचुरि, भेड़ाघाट में चौंसठ योगिनी; सास-बहू मंदिर 1093; मानसिंह तोमर का मान मंदिर और गूजरी महल; मालवा सल्तनत 1401, मांडू, बाज बहादुर और रूपमती, सारंगपुर 1561; दुर्गावती का बलिदान 24 जून 1564; ओरछा की स्थापना 1531; असीरगढ़ 1601; दुराहा सराय की संधि 1738; होलकर, सिंधिया, पवार।

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