10 में से पाठ 3 · राजस्थान सामान्य ज्ञान

आधुनिक राजस्थान: 1857, किसान और जनजातीय आंदोलन तथा प्रजामंडल

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मराठा आक्रमणों से ब्रिटिश संरक्षण तक

1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के झगड़ों से राजपूत राज्य कमज़ोर हो गए और सिंधिया तथा होल्कर जैसे मराठा सरदारों और पिंडारी दलों के शिकार बने। पिंडारी नेता अमीर खाँ को 1817 में अंग्रेज़ों के समर्थन से टोंक का नवाब बनाया गया, इसीलिए टोंक राजपूताना की एकमात्र मुस्लिम रियासत थी। इन आक्रमणों से थककर शासकों ने गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स के अधीन ईस्ट इंडिया कंपनी का सहारा लिया, जिसके प्रतिनिधि चार्ल्स मेटकॉफ ने संधियों की बातचीत की।

1817-18 की संधियाँ

अधीनस्थ संधियों के एक ही दौर में लगभग हर राजपूत राज्य ने ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार किया, स्वतंत्र विदेश नीति का अधिकार छोड़ दिया और खिराज (कर) देना स्वीकार किया। करौली ने सबसे पहले (नवंबर 1817 में) संधि की, जिसके कुछ ही महीनों में कोटा, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, जयपुर और शेष राज्यों ने भी संधियाँ कीं; सिरोही ने सबसे अंत में, 1823 में संधि की। 1818 में दौलतराव सिंधिया ने अजमेर अंग्रेज़ों को सौंप दिया, और अजमेर-मेरवाड़ा रियासतों के बीच सीधे ब्रिटिश शासन वाला क्षेत्र बन गया। राजपूताना एजेंसी का संचालन गवर्नर-जनरल के एजेंट (AGG) द्वारा होता था, जिसका मुख्यालय अजमेर में और ग्रीष्मकालीन मुख्यालय माउंट आबू में था। राजकुमारों की शिक्षा के लिए 1875 में अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना हुई।

1857 का विद्रोह

राजपूताना में छह ब्रिटिश सैनिक छावनियाँ थीं: नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा और खेरवाड़ा। इस क्षेत्र में विद्रोह 28 मई 1857 को अजमेर के पास नसीराबाद से शुरू हुआ, और 3 जून को नीमच में विद्रोह हुआ। मारवाड़ में आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह चांपावत ने असंतुष्ट सामंतों और एरिनपुरा से आए जोधपुर लीजन के विद्रोही सैनिकों को एकजुट किया; उनकी सेना ने जोधपुर राज्य की सेना को हराया और सितंबर 1857 में जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉक मेसन को मार डाला। कोटा में 15 अक्टूबर 1857 को लाला जयदयाल और मेहराब खाँ के नेतृत्व में राज्य की सेना ने विद्रोह किया, पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन को मार डाला और लगभग छह महीने तक नगर पर अधिकार रखा, जब तक मार्च 1858 में ब्रिटिश सेना ने उसे वापस नहीं ले लिया। 1858 में तात्या टोपे की सेनाएँ राजस्थान से होकर गुज़रीं। अधिकांश शासक अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार रहे, इसलिए यहाँ विद्रोह का नेतृत्व राजाओं ने नहीं, बल्कि सैनिकों और स्थानीय ठाकुरों ने किया।

किसान आंदोलन

जागीरों (ठिकानों) में किसान भू-राजस्व के अतिरिक्त अनेक लाग-बाग (उपकर) चुकाते थे और बेगार (बिना मज़दूरी का श्रम) करते थे। 1897 में शुरू हुए मेवाड़ के बिजोलिया आंदोलन को प्रायः भारत का सबसे लंबा अहिंसक किसान आंदोलन कहा जाता है: इसके प्रमुख नेता साधु सीताराम दास, फिर 1916 से विजय सिंह पथिक, जिन्होंने ऊपरमाल पंच बोर्ड बनाया, और बाद में माणिक्यलाल वर्मा रहे, और यह 1941 में तभी समाप्त हुआ जब मेवाड़ सरकार ने अधिकांश माँगें मान लीं। पास के बेगूं (चित्तौड़गढ़) में रामनारायण चौधरी ने 1921 से आंदोलन चलाया, और ठाकुर के साथ हुए 1923 के समझौते को राज्य ने 'बोल्शेविक फैसला' कहकर ठुकरा दिया। बूंदी में पंडित नयनूराम शर्मा ने किसानों का नेतृत्व किया, और 2 अप्रैल 1923 को डाबी में पुलिस की गोलीबारी में झंडा गीत गाते हुए नानक भील शहीद हुए। अलवर राज्य के नीमूचाणा में 14 मई 1925 को किसानों की सभा पर हुई गोलीबारी में अनेक लोग मारे गए, और गांधीजी ने इसकी तुलना जलियाँवाला बाग से की।

दक्षिण के जनजातीय आंदोलन

1858 में डूंगरपुर के बांसिया गाँव में एक बंजारा परिवार में जन्मे गोविंद गुरु ने 1883 में सम्प सभा की स्थापना की और भीलों में भगत आंदोलन फैलाया, जिसमें उन्होंने शराब और मांस छोड़ने तथा बेगार का विरोध करने का आह्वान किया। 17 नवंबर 1913 को राजस्थान-गुजरात सीमा पर बांसवाड़ा की मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्र उनके हज़ारों अनुयायियों पर अंग्रेज़ अधिकारियों के नेतृत्व वाली सेना ने गोलियाँ चलाईं; स्थानीय विवरणों के अनुसार लगभग 1,500 लोग मारे गए, और मानगढ़ को आदिवासियों का जलियाँवाला कहा जाता है। 1921 में उदयपुर के झाड़ोल क्षेत्र के कोलियारी गाँव के मोतीलाल तेजावत ने चित्तौड़गढ़ के मातृकुंडिया से बेगार और भारी करों के विरुद्ध भीलों और गरासियों का एकी (एकता) आंदोलन शुरू किया, जिसके माँग-पत्र को 'मेवाड़ पुकार' कहा गया। 7 मार्च 1922 को नीमड़ा में उनके अनुयायियों की एक बड़ी सभा पर सेना ने गोलियाँ चलाईं।

राजनीतिक जागृति और प्रजामंडल

आरंभिक राष्ट्रवादियों में केसरी सिंह बारहठ थे, जिनके डिंगल सोरठों 'चेतावणी रा चूंगट्या' (1903) ने मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह को कर्ज़न के दिल्ली दरबार में जाने से रोक दिया; इनके अलावा जयपुर के अर्जुनलाल सेठी और खरवा के राव गोपाल सिंह भी प्रमुख थे। 1930 के दशक से प्रत्येक राज्य में प्रजामंडलों (जन-संगठनों) ने नागरिक अधिकारों और शासकों के अधीन उत्तरदायी शासन की माँग की: जयपुर (1931, बाद में जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री के नेतृत्व में), बीकानेर (1936), मेवाड़ (24 अप्रैल 1938, माणिक्यलाल वर्मा) और मारवाड़ लोक परिषद (1938, जयनारायण व्यास) प्रमुख थे। 1938 के कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन ने रियासतों की जनता से अपने आंदोलन स्वयं संगठित करने को कहा, और अनेक प्रजामंडल उसी वर्ष बने।

एक राज्य की ओर

स्वतंत्रता के समय राजपूताना में 19 रियासतें, 3 ठिकाने (लावा, कुशलगढ़ और नीमराणा) और ब्रिटिश शासित अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत था। सरदार पटेल के अधीन रियासती मंत्रालय ने, जिसके सचिव वी.पी. मेनन थे, तय किया कि केवल वही रियासतें अलग इकाई रह सकती हैं जिनकी वार्षिक आय कम से कम एक करोड़ रुपये और जनसंख्या कम से कम दस लाख हो; केवल जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और उदयपुर इस कसौटी पर खरे उतरे। शेष को विलय करना पड़ा, और यह प्रक्रिया 18 मार्च 1948 से 1 नवंबर 1956 तक सात चरणों में चली, यानी कुल 8 वर्ष, 7 माह और 14 दिन।

मुख्य तथ्य

  • 1817-18 की संधियाँ: सबसे पहले करौली (नवंबर 1817), सबसे अंत में सिरोही (1823); 1818 में सिंधिया ने अजमेर अंग्रेज़ों को सौंपा।
  • टोंक: राजपूताना की एकमात्र मुस्लिम रियासत; पिंडारी नेता अमीर खाँ 1817 में इसका नवाब बना।
  • 1857: सबसे पहले नसीराबाद (28 मई), फिर नीमच (3 जून), आउवा (कुशाल सिंह चांपावत, मॉक मेसन की हत्या), कोटा (15 अक्टूबर, मेजर बर्टन की हत्या)।
  • 1857 में राजपूताना की छह छावनियाँ: नसीराबाद, नीमच, देवली, ब्यावर, एरिनपुरा और खेरवाड़ा।
  • बिजोलिया (1897-1941): साधु सीताराम दास, विजय सिंह पथिक (ऊपरमाल पंच बोर्ड), फिर माणिक्यलाल वर्मा।
  • बेगूं 1921 से (रामनारायण चौधरी, 1923 का 'बोल्शेविक फैसला'); बूंदी: 2 अप्रैल 1923 को डाबी में नानक भील शहीद।
  • गोविंद गुरु: सम्प सभा 1883, भगत आंदोलन; मानगढ़ हत्याकांड 17 नवंबर 1913 (बांसवाड़ा)।
  • मोतीलाल तेजावत: 1921 में मातृकुंडिया से एकी आंदोलन, माँग-पत्र 'मेवाड़ पुकार'; नीमड़ा गोलीकांड 7 मार्च 1922।
  • प्रजामंडल: जयपुर 1931, बीकानेर 1936, मेवाड़ 1938 (माणिक्यलाल वर्मा), मारवाड़ लोक परिषद 1938 (जयनारायण व्यास)।
  • स्वतंत्रता के समय: 19 रियासतें, 3 ठिकाने (लावा, कुशलगढ़, नीमराणा) और अजमेर-मेरवाड़ा।

एक नज़र में दोहराव

1817-18 की संधियाँ (पहले करौली, अंत में सिरोही 1823); अजमेर 1818 में सौंपा गया, AGG का मुख्यालय अजमेर; 1857 का आरंभ नसीराबाद 28 मई, आउवा (कुशाल सिंह), कोटा (मेजर बर्टन की हत्या); बिजोलिया 1897-1941 (सीताराम दास, पथिक, माणिक्यलाल वर्मा); बेगूं 1921; डाबी 1923 (नानक भील); नीमूचाणा 1925; गोविंद गुरु, सम्प सभा 1883, मानगढ़ 17 नवंबर 1913; एकी आंदोलन 1921 (तेजावत); प्रजामंडल 1931 से; 19 रियासतें, 3 ठिकाने।

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