10 में से पाठ 2 · राजस्थान सामान्य ज्ञान
राजपूत राजवंश और मध्यकालीन राजस्थान: मेवाड़, मारवाड़, आमेर और चौहान
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कुल और क्षेत्र
8वीं शताब्दी से राजस्थान विभिन्न राजपूत कुलों में बँटा रहा: मेवाड़ में गुहिल (बाद में सिसोदिया), मारवाड़ और बीकानेर में राठौड़, ढूँढाड़ में कछवाहा, शाकंभरी, अजमेर, रणथंभौर और जालोर में चौहान, जैसलमेर में भाटी, तथा हाड़ौती (बूंदी और कोटा) में चौहानों की शाखा हाड़ा। चंदबरदाई का पृथ्वीराज रासो अग्निकुल की कथा देता है कि प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान कुल आबू पर्वत पर यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुए; कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें विदेशी (सीथियन) मूल का माना, और गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने प्राचीन क्षत्रियों का वंशज।
चौहान
चौहानों का आरंभ वासुदेव के नेतृत्व में शाकंभरी (सांभर) से हुआ। अजयराज ने 12वीं शताब्दी के आरंभ में अजयमेरु (अजमेर) बसाया, अर्णोराज ने आनासागर झील बनवाई, और 'हरकेलि नाटक' के रचयिता विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) ने एक संस्कृत पाठशाला बनवाई, जिसे बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने 'अढ़ाई दिन का झोंपड़ा' नामक मस्जिद में बदल दिया। पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 में तराइन (हरियाणा में) में मुहम्मद गोरी को हराया, पर 1192 में वहीं उससे हार गया, जिससे उत्तर भारत तुर्कों के लिए खुल गया। रणथंभौर में हम्मीर देव ने 1301 तक अलाउद्दीन खिलजी का प्रतिरोध किया, और दुर्ग के पतन को राजस्थान का पहला साका माना जाता है। जालोर कान्हड़देव के समय 1311 में अलाउद्दीन के हाथों गिरा, जिसका वर्णन पद्मनाभ के 'कान्हड़दे प्रबंध' में है।
बप्पा रावल से कुंभा तक मेवाड़
बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी में चित्तौड़ पर अधिकार किया, और परंपरा उदयपुर के पास एकलिंगजी मंदिर का श्रेय उन्हें देती है; महाराणा एकलिंगजी को ही मेवाड़ का वास्तविक शासक मानते थे और स्वयं को उनका दीवान कहते थे। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने रावल रत्नसिंह से चित्तौड़ छीन लिया; रानी पद्मिनी का जौहर और गोरा-बादल की वीरता लोककथा बन गई, जिसे मलिक मुहम्मद जायसी ने 'पद्मावत' (1540) में फिर से कहा, और अलाउद्दीन ने अपने पुत्र के नाम पर दुर्ग का नाम खिज्राबाद रखा। हम्मीर ने 14वीं शताब्दी में चित्तौड़ वापस लिया और सिसोदिया वंश की शुरुआत की। राणा कुंभा (1433-1468) ने 1437 में सारंगपुर में मालवा के महमूद खिलजी को हराया और इसकी स्मृति में चित्तौड़ में विजय स्तंभ बनवाया; परंपरा के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 उसने बनवाए, जिनमें शिल्पी मंडन द्वारा रचित कुंभलगढ़ भी है। उसने 'संगीतराज' की रचना की और अभिनव भरताचार्य तथा हिंदू सुरत्राण जैसी उपाधियाँ धारण कीं।
राणा सांगा और महाराणा प्रताप
राणा सांगा (1509-1528) ने 1517 में खातोली में इब्राहिम लोदी को हराया और बाबर के विरुद्ध राजपूत संघ का नेतृत्व किया; बयाना में वह जीता, पर मार्च 1527 में भरतपुर के पास खानवा में बाबर के तोपखाने के सामने हार गया, जिसके बाद बाबर ने 'गाजी' की उपाधि ली। चित्तौड़ की घेराबंदी गुजरात के बहादुरशाह (1535) और अकबर (1567-68, जब जयमल और पत्ता दुर्ग की रक्षा करते हुए मारे गए) ने की; दुर्ग के पतन के बाद उदयसिंह द्वितीय ने 1559 में अपने बसाए उदयपुर को राजधानी बनाया। 1540 में जन्मे और 1572 में गोगुंदा में राज्याभिषिक्त महाराणा प्रताप ने 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में आमेर के मानसिंह और आसफ खाँ के नेतृत्व वाली अकबर की सेना का सामना किया। हकीम खाँ सूर, भील सरदार राणा पूंजा और झाला मान, जिन्होंने शत्रु का ध्यान खींचने के लिए राजचिह्न धारण किए, प्रताप की ओर से लड़े, और उनका घोड़ा चेतक उन्हें सुरक्षित निकालते हुए मारा गया। जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी को मेवाड़ की थर्मोपल्ली और दिवेर (1582) में प्रताप की विजय को मेवाड़ का मैराथन कहा। भामाशाह की आर्थिक सहायता से प्रताप ने मेवाड़ का अधिकांश भाग वापस जीता और 19 जनवरी 1597 को चावंड में उनका देहांत हुआ। उनके पुत्र अमरसिंह प्रथम ने 1615 में जहाँगीर से संधि की।
मारवाड़ और बीकानेर
राव सीहा ने 13वीं शताब्दी में मारवाड़ में राठौड़ शासन की नींव रखी; राव चूंडा ने मंडोर पर अधिकार किया, और राव जोधा ने 1459 में जोधपुर नगर और मेहरानगढ़ दुर्ग की स्थापना की। उनके पुत्र राव बीका ने 1488 में बीकानेर बसाया। राव मालदेव के विरुद्ध 1544 में गिरी-सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी बड़ी कठिनाई से जीता और उसने कहा कि वह मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत लगभग खो बैठा था। मोटा राजा उदयसिंह की पुत्री जगत गोसाईं, जिसका विवाह जहाँगीर से हुआ, शाहजहाँ की माता थी। 1678 में जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब ने मारवाड़ को हड़पना चाहा, तब दुर्गादास राठौड़ ने शिशु अजीत सिंह की रक्षा की।
आमेर, जैसलमेर और हाड़ौती
दूल्हेराय के नेतृत्व में कछवाहों ने 12वीं शताब्दी में ढूँढाड़ में दौसा को राजधानी बनाकर शासन स्थापित किया और बाद में आमेर चले गए। राजा भारमल अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले पहले राजपूत शासक थे, जिन्होंने 1562 में अपनी पुत्री हरखा बाई का विवाह अकबर से किया; आमेर के मानसिंह प्रथम अकबर के प्रमुख सेनापति और काबुल, बिहार तथा बंगाल के सूबेदार बने। मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने 1665 में शिवाजी के साथ पुरंदर की संधि की। भाटियों ने जैसलमेर से शासन किया, जिसे रावल जैसल ने 1156 में बसाया था। राव देवा के नेतृत्व में हाड़ाओं ने मीणाओं से बूंदी छीनी, और 1631 में शाहजहाँ द्वारा माधोसिंह को कोटा दिए जाने पर कोटा एक अलग राज्य बना।
जौहर, साका और मुगल-राजपूत समझौता
दुर्ग के पतन की आशंका होने पर स्त्रियों द्वारा अग्नि में आत्मबलिदान जौहर कहलाता था; केसरिया वस्त्र पहनकर पुरुषों का अंतिम युद्ध के लिए निकल पड़ना साका कहलाता था। चित्तौड़ ने तीन साके देखे (1303, 1535 और 1568), गागरोन ने दो (1423 में मालवा के होशंगशाह के विरुद्ध और 1444 में महमूद खिलजी के विरुद्ध), और जैसलमेर के ढाई साके प्रसिद्ध हैं। अकबर ने वैवाहिक संबंधों, ऊँचे मनसबों और अपने मूल राज्यों को वतन जागीर के रूप में बनाए रखने के अधिकार के द्वारा राजपूत शासकों को अपना साझेदार बनाया; 1570 के नागौर दरबार में बीकानेर और जैसलमेर के शासकों ने उसकी अधीनता स्वीकार की। 1679 में औरंगज़ेब द्वारा जज़िया फिर से लगाने और मारवाड़ पर कब्ज़े के प्रयास ने यह समझौता तोड़ दिया।
मुख्य तथ्य
- तराइन: 1191 में पृथ्वीराज तृतीय ने मुहम्मद गोरी को हराया; 1192 में गोरी जीता। तराइन हरियाणा में है, राजस्थान में नहीं।
- रणथंभौर 1301 (अलाउद्दीन के विरुद्ध हम्मीर देव) राजस्थान का पहला साका माना जाता है; जालोर 1311 में गिरा (कान्हड़देव)।
- चित्तौड़ के तीन साके: 1303 (अलाउद्दीन, पद्मिनी), 1535 (बहादुरशाह, कर्णावती), 1568 (अकबर, जयमल और पत्ता)।
- राणा कुंभा (1433-1468): सारंगपुर विजय 1437, विजय स्तंभ, कुंभलगढ़ (शिल्पी मंडन), उपाधियाँ अभिनव भरताचार्य और हिंदू सुरत्राण।
- खानवा, मार्च 1527: बाबर ने राणा सांगा को हराया; सांगा ने इससे पहले खातोली (1517) में इब्राहिम लोदी को हराया था।
- हल्दीघाटी, 18 जून 1576: अकबर की ओर से मानसिंह और आसफ खाँ; प्रताप की ओर से हकीम खाँ सूर, राणा पूंजा और झाला मान; टॉड के अनुसार 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली'।
- दिवेर 1582: प्रताप की विजय, टॉड के अनुसार 'मेवाड़ का मैराथन'; प्रताप का देहांत 19 जनवरी 1597 को चावंड में; मेवाड़-मुगल संधि 1615।
- गिरी-सुमेल 1544: शेरशाह ने मालदेव को हराया और कहा कि वह 'मुट्ठी भर बाजरे के लिए' हिंदुस्तान लगभग खो बैठा था।
- आमेर के भारमल: अकबर की अधीनता मानने वाले पहले राजपूत शासक (1562); मिर्ज़ा राजा जयसिंह: शिवाजी के साथ पुरंदर की संधि (1665)।
- कोटा 1631 में बूंदी से अलग हुआ; अकबर का नागौर दरबार 1570; औरंगज़ेब ने 1679 में जज़िया फिर से लगाया।
एक नज़र में दोहराव
पृथ्वीराज रासो में अग्निकुल की कथा; अजयराज ने अजमेर बसाया; तराइन 1191 में जीत, 1192 में हार; रणथंभौर 1301 पहला साका; चित्तौड़ के साके 1303, 1535, 1568; हम्मीर से सिसोदिया वंश; कुंभा: सारंगपुर 1437, विजय स्तंभ, कुंभलगढ़; खानवा 1527; हल्दीघाटी 18 जून 1576, दिवेर 1582; संधि 1615; जोधपुर 1459, बीकानेर 1488; गिरी-सुमेल 1544; भारमल-अकबर 1562; कोटा अलग 1631।