10 में से पाठ 7 · बिहार सामान्य ज्ञान

बिहार की जलवायु, मिट्टियाँ, वन और वन्यजीव

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जलवायु का प्रकार

बिहार की जलवायु आर्द्र उपोष्ण मानसूनी है, जिसमें गर्मियाँ गर्म, मानसून नम और जाड़े ठंडे व शुष्क होते हैं। पूरी तरह कर्क रेखा के उत्तर में और समुद्र से दूर स्थित होने के कारण इसमें महाद्वीपीय विशेषता है: दक्षिण-पश्चिम में गया के आसपास गर्मियों का तापमान प्रायः 40 °C से ऊपर चला जाता है, मई में लू नामक गर्म शुष्क हवाएँ चलती हैं, और उत्तर में जाड़े की रातें ठंडी व कोहरे भरी होती हैं, कभी-कभी शीतलहर भी चलती है।

ऋतुएँ और वर्षा

अप्रैल और मई में नॉर्वेस्टर (काल बैसाखी) कहलाने वाले मानसून-पूर्व तूफ़ान मुख्यतः पूर्वी भाग में कुछ राहत देते हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा लगभग मध्य जून में पहुँचती है और सितंबर तक वर्ष की अधिकांश वर्षा दे देती है। सबसे अधिक वर्षा उत्तर-पूर्व में हिमालय की तलहटी के निकट किशनगंज के आसपास होती है और पश्चिम तथा दक्षिण-पश्चिम की ओर घटती जाती है। सितंबर के अंत में होने वाली हथिया (हस्त नक्षत्र) की वर्षा धान की फसल के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जबकि पश्चिमी विक्षोभों से होने वाली जाड़े की हल्की वर्षा गेहूँ के लिए लाभकारी है। वर्षा इतनी असमान है कि एक ही वर्ष में कुछ जिलों को बाढ़ और कुछ को सूखे का सामना करना पड़ सकता है।

मिट्टियाँ

लगभग पूरा राज्य जलोढ़ मिट्टी से ढका है। सुदूर उत्तर-पश्चिम में पहाड़ियों की तलहटी में गिरिपद दलदली मिट्टी और उसके बाद नेपाल सीमा के साथ तराई मिट्टी मिलती है। उत्तर बिहार के मैदान के उत्तर-पश्चिमी और मध्य भागों में, यानी गंडक और बूढ़ी गंडक के अपवाह क्षेत्र में, नई जलोढ़ मिट्टी चूनेदार (चूने से भरपूर) है और मक्का, गन्ना व तंबाकू के लिए उपयुक्त है। गंगा के दक्षिण में जलोढ़ पुरानी है: निचले टाल क्षेत्रों में भारी चिकनी मिट्टी है, जो मानसून में जलमग्न रहती है, नमी रोके रखती है और रबी की दलहनों के लिए उपयुक्त है, तथा दक्षिण बिहार के मैदान के अन्य भागों में भारी, चिपचिपी चिकनी मिट्टी मिलती है जिसे स्थानीय रूप से करैल-केवाल कहते हैं। दक्षिणी पहाड़ियों और कैमूर पठार पर लाल और पीली मिट्टियाँ हैं, जो पतली और कम उपजाऊ हैं।

वन क्षेत्र

राज्यों में बिहार का वन आवरण सबसे कम में से है, इसके क्षेत्रफल के दसवें भाग से भी कम, जबकि राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य एक-तिहाई है; पुराने वनों का अधिकांश भाग 2000 में झारखंड में चला गया। वन दो पट्टियों में बचे हैं। उत्तर-पश्चिम में पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकि वन उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती हैं, जिनका मुख्य वृक्ष साल है। दक्षिण में कैमूर, रोहतास, गया, नवादा, जमुई, मुंगेर और बाँका की पहाड़ियों पर उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन हैं, जिनमें साल, खैर, केंदू, महुआ, पलाश और बाँस जैसे वृक्ष मिलते हैं।

वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य

पश्चिमी चंपारण के सुदूर उत्तर-पश्चिम में गंडक और नेपाल सीमा के बीच स्थित वाल्मीकि एक राष्ट्रीय उद्यान भी है और बाघ अभयारण्य (टाइगर रिज़र्व) भी; यह 1989-90 में प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत आया। यह नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान और उत्तर प्रदेश के सोहगीबरवा अभयारण्य से सटा है, इसलिए बाघ एक साझा भू-भाग में विचरते हैं। इसका नाम महर्षि वाल्मीकि की याद दिलाता है, जिनका आश्रम इसी क्षेत्र में माना जाता है। बाघों के अलावा यहाँ तेंदुआ, स्लॉथ भालू, गौर, सांभर, चीतल और पाढ़ा (हॉग डियर) मिलते हैं, और कभी-कभी चितवन से एक सींग वाले गैंडे भी आ जाते हैं।

विक्रमशिला गांगेय डॉल्फ़िन अभयारण्य

1991 में घोषित यह अभयारण्य भागलपुर जिले में सुल्तानगंज और कहलगाँव के बीच गंगा के भाग की रक्षा करता है और गंगा की नदी डॉल्फ़िन (प्लैटनिस्टा गैंजेटिका), जिसे स्थानीय रूप से सोंस कहते हैं, के लिए विशेष रूप से बना भारत का पहला संरक्षित क्षेत्र माना जाता है। यह डॉल्फ़िन लगभग दृष्टिहीन होती है और प्रतिध्वनि (इकोलोकेशन) से रास्ता पहचानती है; इसे स्वच्छ, गहरा और बहता जल चाहिए, इसलिए इसकी उपस्थिति नदी के स्वास्थ्य का सूचक है। 2009 में इसे भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया।

अन्य अभयारण्य और पक्षी

कैमूर वन्यजीव अभयारण्य बिहार का सबसे बड़ा अभयारण्य है। मुंगेर का भीमबांध अपने गर्म जल-स्रोतों के लिए प्रसिद्ध है, गौतम बुद्ध अभयारण्य गया जिले में, राजगीर (पंत) अभयारण्य नालंदा जिले में और उदयपुर अभयारण्य पश्चिमी चंपारण में है। पक्षी आवासों में जमुई के नागी डैम और नकटी डैम पक्षी अभयारण्य, बेगूसराय का कावर झील पक्षी अभयारण्य, दरभंगा का कुशेश्वर स्थान पक्षी अभयारण्य और वैशाली की बरैला झील पर सालिम अली जुब्बा सहनी पक्षी अभयारण्य शामिल हैं। जाड़े में इन आर्द्रभूमियों में मध्य एशिया और साइबेरिया से प्रवासी बत्तखें और जलचर पक्षी आते हैं, और भागलपुर जिले में नवगछिया के निकट के बाढ़-मैदान गरुड़ (ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क) के प्रजनन स्थल हैं।

मुख्य तथ्य

  • जलवायु: आर्द्र उपोष्ण मानसूनी; मई में लू; अप्रैल-मई में नॉर्वेस्टर (काल बैसाखी); दक्षिण-पश्चिम मानसून लगभग मध्य जून में पहुँचता है।
  • सबसे अधिक वर्षा उत्तर-पूर्व (किशनगंज) में होती है और पश्चिम व दक्षिण-पश्चिम की ओर घटती है; मानसून के अंत की हथिया वर्षा धान के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • मिट्टियाँ: उत्तर-पश्चिम में गिरिपद दलदली और तराई मिट्टी, गंडक-बूढ़ी गंडक के मैदान में चूनेदार नई जलोढ़, दक्षिण में पुरानी जलोढ़ के साथ टाल की चिकनी मिट्टी और करैल-केवाल, दक्षिणी पहाड़ियों में लाल और पीली मिट्टी।
  • वन आवरण: क्षेत्रफल के दसवें भाग से कम, जबकि राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य एक-तिहाई है।
  • वाल्मीकि (पश्चिमी चंपारण): राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य दोनों, 1989-90 से प्रोजेक्ट टाइगर में, नेपाल के चितवन से सटा।
  • विक्रमशिला गांगेय डॉल्फ़िन अभयारण्य (1991): भागलपुर जिले में सुल्तानगंज और कहलगाँव के बीच गंगा।
  • गांगेय डॉल्फ़िन (सोंस, प्लैटनिस्टा गैंजेटिका): लगभग दृष्टिहीन, प्रतिध्वनि से रास्ता पहचानती है; 2009 में भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित।
  • कैमूर बिहार का सबसे बड़ा वन्यजीव अभयारण्य है; भीमबांध (मुंगेर) गर्म जल-स्रोतों के लिए प्रसिद्ध है; नागी डैम और नकटी डैम जमुई के पक्षी अभयारण्य हैं।
  • आर्द्रभूमि पक्षी अभयारण्य: कावर झील (बेगूसराय), कुशेश्वर स्थान (दरभंगा), बरैला झील पर सालिम अली जुब्बा सहनी (वैशाली)।

एक नज़र में दोहराव

आर्द्र उपोष्ण मानसूनी जलवायु; मई में लू; अप्रैल-मई में काल बैसाखी; मध्य जून से मानसून; सर्वाधिक वर्षा किशनगंज में; धान के लिए हथिया वर्षा; गंडक-बूढ़ी गंडक मैदान में चूनेदार जलोढ़, गंगा के दक्षिण में टाल की चिकनी मिट्टी और करैल-केवाल, दक्षिणी पहाड़ियों में लाल-पीली मिट्टी; वन दसवें भाग से कम (लक्ष्य एक-तिहाई, नीति 1988); वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान और बाघ अभयारण्य (प्रोजेक्ट टाइगर 1989-90), चितवन से सटा; विक्रमशिला डॉल्फ़िन अभयारण्य 1991 (सुल्तानगंज-कहलगाँव); डॉल्फ़िन राष्ट्रीय जलीय जीव 2009; कैमूर सबसे बड़ा अभयारण्य।

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