10 में से पाठ 6 · बिहार सामान्य ज्ञान

बिहार की नदियाँ, बाढ़ और नदी परियोजनाएँ

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गंगा, बिहार की रीढ़

बिहार का लगभग पूरा जल गंगा में जाता है। यह नदी बक्सर जिले के चौसा में राज्य में प्रवेश करती है, जहाँ उत्तर प्रदेश की सीमा पर कर्मनाशा इससे मिलती है; फिर बक्सर, पटना, मोकामा, मुंगेर और भागलपुर से होते हुए पूर्व की ओर बहती है और पश्चिम बंगाल की ओर जाते हुए झारखंड के साहिबगंज में निकल जाती है। इसकी उत्तरी सहायक नदियाँ हिमालय से आती हैं, हिम और मानसूनी वर्षा से पोषित होती हैं, भारी मात्रा में गाद लाती हैं और प्रायः मार्ग बदलती हैं; दक्षिणी सहायक नदियाँ विंध्य और छोटानागपुर के उच्च भागों से आती हैं, वर्षा पर निर्भर हैं और गर्मी में सिकुड़ जाती हैं। पटना से गुजरने वाला भाग राष्ट्रीय जलमार्ग 1 (हल्दिया से प्रयागराज, पूर्व नाम इलाहाबाद) का अंश है, जिसे 1986 में घोषित किया गया।

उत्तरी सहायक नदियाँ

पश्चिम से पूर्व की ओर, घाघरा (सरयू) चिरांद के निकट छपरा के पास गंगा से मिलती है। नेपाल में नारायणी या शालिग्रामी और प्राचीन ग्रंथों में सदानीरा कहलाने वाली गंडक वाल्मीकिनगर में बिहार में प्रवेश करती है और पटना के सामने सोनपुर-हाजीपुर में गंगा से मिलती है। बूढ़ी गंडक पश्चिमी चंपारण में सोमेश्वर पहाड़ियों के निकट से निकलती है, गंडक के पूर्व में मुज़फ़्फ़रपुर और समस्तीपुर से होकर बहती है और खगड़िया के निकट गंगा से मिलती है। बागमती काठमांडू घाटी से आकर सीतामढ़ी, मुज़फ़्फ़रपुर और दरभंगा से होकर बहती है; कमला-बलान मधुबनी और दरभंगा का जल बहाती है; कोसी सुपौल के भीमनगर के निकट प्रवेश करके कटिहार के कुरसेला के निकट गंगा से मिलती है; और महानंदा सुदूर उत्तर-पूर्व (किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार) का जल लेकर बिहार की सीमा के बाहर गंगा से मिलती है।

कोसी, बिहार का शोक

कोसी या सप्तकोसी नेपाल में सात हिमालयी धाराओं से बनती है, जिनमें सुनकोसी, अरुण और तमुर प्रमुख हैं। सबसे अधिक गाद ढोने वाली नदियों में से एक होने के कारण यह लगभग दो शताब्दियों में 100 किमी से अधिक पश्चिम की ओर खिसक चुकी है, खेतों को बालू के नीचे दबाती और पुरानी धाराएँ पीछे छोड़ती गई है। भारत और नेपाल के बीच 1954 के कोसी समझौते के तहत भीमनगर के नेपाली भाग में हनुमाननगर के निकट बराज बनाया गया, साथ ही दोनों किनारों पर तटबंध और पूर्वी व पश्चिमी कोसी नहरें बनीं। 18 अगस्त 2008 को नेपाल के कुसहा में पूर्वी तटबंध टूट गया और नदी एक पुरानी धारा में मुड़ गई, जिससे सुपौल, मधेपुरा, अररिया, सहरसा और पूर्णिया में बाढ़ आ गई।

गंडक और सोन परियोजनाएँ

नेपाल के साथ 1959 के गंडक समझौते से वाल्मीकिनगर में बराज बना, जिसकी नहरें बिहार में चंपारण, सारण और तिरहुत, उत्तर प्रदेश के कुछ भागों और नेपाल के एक भाग की सिंचाई करती हैं। बिहार में दक्षिण से गंगा में मिलने वाली सहायक नदियों में सोन सबसे बड़ी है: यह मध्य प्रदेश में अमरकंटक के निकट से निकलती है और पटना के पश्चिम में मनेर के निकट गंगा से मिलती है। इसका जल भारत की सबसे पुरानी आधुनिक नहर प्रणालियों में से एक को पोषित करता है: डेहरी-ऑन-सोन का एनीकट (मेड़नुमा बाँध) 1870 के दशक में बना, और बाद में ऊपर की ओर बने इंद्रपुरी बराज ने उसका स्थान लिया। सोन नहरों ने पुराने शाहाबाद क्षेत्र, विशेषकर रोहतास और कैमूर, को बिहार का धान का कटोरा बना दिया।

दक्षिण की अन्य नदियाँ

पुनपुन छोटानागपुर पठार से निकलकर पटना के पूर्व में फतुहा में गंगा से मिलती है; इसके तट पर भी पिंडदान होता है। फल्गु बोधगया के निकट निरंजना (लीलाजन) और मोहना के मिलने से बनती है; गया और वहाँ का विष्णुपद मंदिर इसी के तट पर हैं, और वर्ष के अधिकांश समय इसका जल रेतीली तली के नीचे बहता है, इसलिए इसे अंतःसलिला कहा जाता है। परंपरा में अपवित्र मानी जाने वाली कर्मनाशा उत्तर प्रदेश के साथ सीमा का एक भाग बनाती है। किउल जमुई और लखीसराय का जल बहाती है, और अजय जमुई के निकट से निकलकर पश्चिम बंगाल में जाती है।

बाढ़ और तटबंध

उत्तर बिहार भारत के सबसे अधिक बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में है, क्योंकि यहाँ नेपाल में भारी मानसूनी वर्षा, हिमालय की तीव्र ढलान, भारी गाद और समतल मैदान एक साथ मिलते हैं। 1954 की बाढ़ के बाद सरकार ने मुख्यतः तटबंधों पर भरोसा किया, और तब से इनकी लंबाई कई गुना बढ़ी है, फिर भी बाढ़ से होने वाली क्षति कम नहीं हुई: तटबंध गाद को रोककर नदी की तली ऊँची कर देते हैं, अपने पीछे जलजमाव पैदा करते हैं, और टूटने पर भयंकर विनाश करते हैं। लंबे समय से चर्चित समाधान नेपाल के बराहक्षेत्र में कोसी पर ऊँचा बाँध है, जो जल-भंडारण और बिजली उत्पादन भी करेगा; इसलिए बिहार की बाढ़ आंशिक रूप से भारत-नेपाल का प्रश्न है।

पुल और आर्द्रभूमियाँ

बिहार में गंगा पर मोकामा का राजेंद्र सेतु (1959) है, जो नदी पर राज्य का पहला रेल-सह-सड़क पुल है; पटना और हाजीपुर के बीच महात्मा गांधी सेतु (1982) है, जिसकी लंबाई 5.5 किमी से अधिक है और जिसे लंबे समय तक भारत के सबसे लंबे नदी पुलों में गिना जाता रहा; तथा भागलपुर में विक्रमशिला सेतु है। मैदानों में अनेक आर्द्रभूमियाँ हैं: बेगूसराय की कावर झील (काबर ताल), जो बिहार का पहला रामसर स्थल (2020) है और जिसे प्रायः एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील कहा जाता है; दरभंगा की कुशेश्वर स्थान आर्द्रभूमि; और वैशाली की बरैला झील; तीनों पक्षी अभयारण्य भी हैं।

मुख्य तथ्य

  • गंगा बक्सर जिले के चौसा में बिहार में प्रवेश करती है, जहाँ कर्मनाशा इससे मिलती है, और पटना, मुंगेर व भागलपुर से होकर पश्चिम से पूर्व बहती है।
  • पश्चिम से पूर्व उत्तरी सहायक नदियाँ: घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला-बलान, कोसी, महानंदा।
  • दक्षिणी नदियाँ: कर्मनाशा, सोन, पुनपुन, फल्गु, किउल और अजय; ये वर्षा पर निर्भर हैं और गर्मी में सिकुड़ जाती हैं।
  • संगम: घाघरा छपरा के निकट, गंडक सोनपुर-हाजीपुर में, सोन मनेर के निकट, पुनपुन फतुहा में, बूढ़ी गंडक खगड़िया के निकट, कोसी कुरसेला के निकट।
  • कोसी: नेपाल की सप्तकोसी (सुनकोसी, अरुण, तमुर); बिहार का शोक; कोसी समझौता 1954; हनुमाननगर के निकट बराज; 18 अगस्त 2008 को कुसहा में तटबंध टूटा।
  • गंडक समझौता 1959; वाल्मीकिनगर बराज से बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल में सिंचाई होती है।
  • सोन: अमरकंटक के निकट उद्गम; डेहरी-ऑन-सोन का एनीकट (1870 का दशक), बाद में इंद्रपुरी बराज; सोन नहरों से रोहतास-कैमूर बिहार का धान का कटोरा बना।
  • फल्गु: बोधगया के निकट निरंजना (लीलाजन) और मोहना के मिलने से बनती है; गया का विष्णुपद मंदिर इसके तट पर है; इसे अंतःसलिला कहते हैं।
  • गंगा के पुल: राजेंद्र सेतु, मोकामा (1959); महात्मा गांधी सेतु, पटना-हाजीपुर (1982); विक्रमशिला सेतु, भागलपुर।
  • कावर झील (काबर ताल), बेगूसराय: बिहार का पहला रामसर स्थल (2020), जिसे प्रायः एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील कहा जाता है।

एक नज़र में दोहराव

गंगा का प्रवेश चौसा में (कर्मनाशा), राष्ट्रीय जलमार्ग 1 (1986); उत्तर से: घाघरा, गंडक (वाल्मीकिनगर से सोनपुर), बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, कोसी (कुरसेला), महानंदा; दक्षिण से: सोन (अमरकंटक, मनेर के निकट संगम), पुनपुन (फतुहा), फल्गु (निरंजना + मोहना), कर्मनाशा, किउल; कोसी = बिहार का शोक, समझौता 1954, कुसहा में तटबंध टूटा 2008; गंडक समझौता 1959; डेहरी एनीकट 1870 का दशक, इंद्रपुरी बराज; राजेंद्र सेतु 1959, गांधी सेतु 1982; कावर झील रामसर स्थल 2020।

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