10 में से पाठ 9 · पर्यावरण और पारिस्थितिकी

भारत में पर्यावरण कानून और आंदोलन: संविधान, अधिनियम, NGT और चिपको

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संविधान

मूल संविधान में पर्यावरण पर कोई सीधा प्रावधान नहीं था। 1976 के 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 48क जोड़ा, जो राज्य के नीति निदेशक तत्व के रूप में कहता है कि राज्य पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन का तथा देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा का प्रयास करेगा, और अनुच्छेद 51क(छ) जोड़ा, जो हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन करे और प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे। इसी संशोधन ने 'वन' और 'वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण' को राज्य सूची से समवर्ती सूची में डाला। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार में शामिल माना है। अनुच्छेद 253, जो संसद को अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है, वायु अधिनियम 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 का आधार बना।

वन्यजीव, जल और वन कानून

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 सूचीबद्ध प्रजातियों के शिकार पर रोक लगाता है और अभयारण्यों तथा राष्ट्रीय उद्यानों का प्रावधान करता है। जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1974 भारत का पहला प्रमुख प्रदूषण कानून था; जल राज्य सूची का विषय है, इसलिए यह राज्यों के अनुरोध पर अनुच्छेद 252 के अंतर्गत पारित हुआ। इसने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाए। वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के अनुसार किसी राज्य द्वारा वन को अनारक्षित करने या वन भूमि को खनन जैसे गैर-वन उद्देश्यों में लगाने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति आवश्यक है; 2023 में संशोधन करके इसका नाम वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम कर दिया गया। राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य भूमि के एक-तिहाई (33 प्रतिशत) भाग पर, और पहाड़ों में दो-तिहाई भाग पर, वन या वृक्ष आवरण है।

वायु कानून और छत्र कानून

वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1981 ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को वायु गुणवत्ता पर अधिकार दिए, और 1987 के संशोधन ने ध्वनि को वायु प्रदूषक की परिभाषा में शामिल किया। भोपाल गैस त्रासदी के बाद पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 एक छत्र कानून के रूप में पारित हुआ। यह केंद्र सरकार को उत्सर्जन और बहिःस्राव के मानक तय करने, खतरनाक पदार्थों का नियमन करने और प्रदूषणकारी उद्योगों को बंद करने की शक्ति देता है; 1994 की पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना (2006 में प्रतिस्थापित), 1991 की तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना और ठोस, प्लास्टिक तथा ई-अपशिष्ट के नियम इसी के अंतर्गत जारी होते हैं। लोक दायित्व बीमा अधिनियम 1991 खतरनाक पदार्थों का काम करने वाले उद्योगों के लिए दुर्घटनाओं का बीमा अनिवार्य करता है।

जैव विविधता, वन अधिकार और NGT

CBD के अंतर्गत भारत की प्रतिबद्धताओं को लागू करने के लिए पारित जैविक विविधता अधिनियम 2002 ने त्रिस्तरीय ढाँचा बनाया: चेन्नई में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड, और स्थानीय निकायों में जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ, जो लोक जैव विविधता रजिस्टर तैयार करती हैं। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 वन भूमि और वनोपज पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता देता है; व्यक्तिगत दावा 4 हेक्टेयर तक हो सकता है, अंतिम तिथि 13 दिसंबर 2005 है, अन्य परंपरागत वन निवासियों को तीन पीढ़ियों (75 वर्ष) का निवास दिखाना होता है, और ग्राम सभा की केंद्रीय भूमिका है। NGT अधिनियम 2010 के अंतर्गत बना राष्ट्रीय हरित अधिकरण पर्यावरण कानूनों से जुड़े दीवानी मामलों की सुनवाई करता है, इसकी प्रधान पीठ नई दिल्ली में और क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई में हैं, और इसका लक्ष्य मामलों का निपटारा 6 महीने में करना है। भारत को प्रायः ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के बाद ऐसा विशेष अधिकरण बनाने वाला तीसरा देश बताया जाता है।

न्यायालयों के सिद्धांत और CPCB

भारतीय न्यायालयों ने जनहित याचिकाओं के माध्यम से पर्यावरण कानून को विकसित किया है। प्रदूषक भुगतान करे का सिद्धांत (इंडियन काउंसिल फ़ॉर एनवायरो-लीगल एक्शन मामला, 1996), एहतियाती सिद्धांत (वेल्लोर सिटिज़न्स वेलफ़ेयर फ़ोरम मामला, 1996) और लोक न्यास सिद्धांत (एम.सी. मेहता बनाम कमलनाथ, दिसंबर 1996 का निर्णय, जिसे प्रायः 1997 का बताया जाता है) अब भारतीय कानून का हिस्सा हैं। पर्यावरण मंत्रालय के अधीन सांविधिक निकाय CPCB केंद्र को सलाह देता है, मानक तय करता है, राज्य बोर्डों में समन्वय करता है और वायु तथा जल गुणवत्ता की राष्ट्रीय निगरानी चलाता है।

वन आंदोलन

1730 में जोधपुर के पास खेजड़ली में अमृता देवी बिश्नोई और 363 बिश्नोइयों ने मारवाड़ के महाराजा के लिए खेजड़ी के पेड़ों की कटाई रोकने में अपने प्राण दे दिए। चिपको आंदोलन 1973 में वर्तमान उत्तराखंड के चमोली ज़िले में शुरू हुआ, जब ग्रामीणों ने व्यावसायिक कटाई रोकने के लिए पेड़ों को गले लगाया; दशोली ग्राम स्वराज्य संघ के चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा और रैणी गाँव की गौरा देवी इसके प्रमुख चेहरे थे। इसके परिणामस्वरूप 1980 में उत्तर प्रदेश के हिमालयी वनों में हरे पेड़ों की कटाई पर 15 वर्ष का प्रतिबंध लगा। चिपको की दक्षिणी प्रतिध्वनि, अप्पिको आंदोलन, 1983 में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ ज़िले के सलकानी में पांडुरंग हेगड़े के नेतृत्व में शुरू हुआ।

बाँध और नदी आंदोलन

केरल के पालक्काड ज़िले में साइलेंट वैली आंदोलन ने कुंतिपुझा नदी पर बनने वाले उस जलविद्युत बाँध का विरोध किया जो शेर-पूँछ मकाक के आवास, एक दुर्लभ उष्णकटिबंधीय सदाबहार वर्षा वन, को डुबो देता। केरल शास्त्र साहित्य परिषद और कवयित्री सुगतकुमारी ने अभियान का नेतृत्व किया; परियोजना छोड़ दी गई और 1984 में साइलेंट वैली को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया। 1980 के दशक के मध्य से मेधा पाटकर के नेतृत्व में और बाबा आमटे के समर्थन से चले नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर और नर्मदा के अन्य बाँधों से होने वाले विस्थापन के विरुद्ध संघर्ष किया; विश्व बैंक ने 1993 में अपना वित्त पोषण वापस ले लिया।

मुख्य तथ्य

  • पर्यावरण पर अनुच्छेद 48क (राज्य के नीति निदेशक तत्व) और 51क(छ) (मौलिक कर्तव्य) 42वें संशोधन, 1976 से जोड़े गए; वन और वन्यजीव समवर्ती सूची में गए।
  • अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार शामिल है; अनुच्छेद 253 वायु अधिनियम 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 का आधार बना।
  • जल अधिनियम 1974 अनुच्छेद 252 के अंतर्गत पारित हुआ और इसने CPCB बनाया; वायु अधिनियम 1981 के 1987 के संशोधन से ध्वनि वायु प्रदूषक बनी।
  • वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 में वन भूमि के उपयोग-परिवर्तन के लिए केंद्र की अनुमति ज़रूरी; 2023 में नाम वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम हुआ; राष्ट्रीय वन नीति 1988 का लक्ष्य 33 प्रतिशत आवरण।
  • जैविक विविधता अधिनियम 2002: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (चेन्नई), राज्य जैव विविधता बोर्ड, लोक जैव विविधता रजिस्टर बनाने वाली जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ।
  • वन अधिकार अधिनियम 2006: व्यक्तिगत दावा 4 हेक्टेयर तक; अंतिम तिथि 13 दिसंबर 2005; अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिए 75 वर्ष का निवास; निर्णय में ग्राम सभा की भूमिका केंद्रीय।
  • NGT अधिनियम 2010: प्रधान पीठ नई दिल्ली; क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता, चेन्नई; मामलों का निपटारा 6 महीने में करने का लक्ष्य।
  • न्यायालयों के सिद्धांत: प्रदूषक भुगतान करे और एहतियाती सिद्धांत (दोनों 1996 के मामले), लोक न्यास सिद्धांत (एम.सी. मेहता बनाम कमलनाथ, निर्णय दिसंबर 1996, प्रायः 1997 उद्धृत)।
  • आंदोलन: खेजड़ली 1730 (अमृता देवी, 363 बिश्नोई); चिपको 1973 (चमोली; भट्ट, बहुगुणा, गौरा देवी); अप्पिको 1983 (पांडुरंग हेगड़े); साइलेंट वैली राष्ट्रीय उद्यान 1984; नर्मदा बचाओ (मेधा पाटकर)।

एक नज़र में दोहराव

अनुच्छेद 48क और 51क(छ) 42वें संशोधन 1976 से; अनुच्छेद 21 में स्वस्थ पर्यावरण; वन्यजीव अधिनियम 1972; जल अधिनियम 1974 (अनुच्छेद 252, CPCB); वन (संरक्षण) अधिनियम 1980; वायु अधिनियम 1981 (ध्वनि 1987); पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 भोपाल के बाद; लोक दायित्व बीमा अधिनियम 1991; जैविक विविधता अधिनियम 2002 (प्राधिकरण चेन्नई); वन अधिकार अधिनियम 2006 (4 हेक्टेयर, 13 दिसंबर 2005); NGT 2010 (नई दिल्ली, 6 महीने); खेजड़ली 1730; चिपको 1973; अप्पिको 1983; साइलेंट वैली 1984; नर्मदा बचाओ मेधा पाटकर।

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