10 में से पाठ 8 · पर्यावरण और पारिस्थितिकी
अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण अभिसमय: स्टॉकहोम 1972 से पेरिस समझौते तक
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स्टॉकहोम 1972 और UNEP
5 से 16 जून 1972 तक स्वीडन के स्टॉकहोम में हुआ मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन पहला विश्व सम्मेलन था जिसने पर्यावरण को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया। इसमें 26 सिद्धांतों वाली स्टॉकहोम घोषणा और एक कार्य योजना अपनाई गई, और उसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) बना, जिसका मुख्यालय केन्या के नैरोबी में है। सम्मेलन का पहला दिन, 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस बना। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वहाँ भाषण देकर गरीबी को पर्यावरण से जोड़ा, और भारत के वायु अधिनियम 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 स्टॉकहोम के निर्णयों को लागू करने के लिए पारित हुए।
ब्रुंटलैंड रिपोर्ट
नॉर्वे की पूर्व प्रधानमंत्री ग्रो हार्लेम ब्रुंटलैंड की अध्यक्षता वाले पर्यावरण और विकास पर विश्व आयोग ने 1987 में 'हमारा साझा भविष्य' (Our Common Future) प्रकाशित किया। इसने सतत विकास की सबसे प्रसिद्ध परिभाषा दी: ऐसा विकास जो भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की आवश्यकताएँ पूरी करे।
रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन 1992
पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCED), जिसे पृथ्वी शिखर सम्मेलन कहा जाता है, जून 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो में हुआ। इससे 27 सिद्धांतों वाली रियो घोषणा निकली, जिसमें एहतियाती सिद्धांत, प्रदूषक भुगतान करे का सिद्धांत और साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व शामिल हैं; 21वीं सदी में सतत विकास के लिए एक गैर-बाध्यकारी कार्य योजना, एजेंडा 21; और गैर-बाध्यकारी वन सिद्धांत। वहाँ दो बाध्यकारी अभिसमय हस्ताक्षर के लिए खोले गए: जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क अभिसमय (UNFCCC) और जैव विविधता अभिसमय (CBD)। 1994 में अपनाया गया मरुस्थलीकरण रोकथाम के लिए संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCCD) तीन रियो अभिसमयों को पूरा करता है। रियो+10 सम्मेलन 2002 में जोहान्सबर्ग में और रियो+20 सम्मेलन 2012 में फिर रियो में हुआ।
जलवायु संधियाँ
UNFCCC 1994 में लागू हुआ, इसका सचिवालय जर्मनी के बॉन में है, और इसके पक्षकारों का सम्मेलन (COP) हर वर्ष होता है, जिसमें पहला 1995 में बर्लिन में हुआ। यह देशों को अनुलग्नक I (औद्योगिक देश और संक्रमणशील अर्थव्यवस्थाएँ) और भारत जैसे गैर-अनुलग्नक I देशों में बाँटता है। दिसंबर 1997 में जापान के क्योटो में COP3 में अपनाए गए और 2005 से लागू क्योटो प्रोटोकॉल ने केवल अनुलग्नक I देशों के लिए बाध्यकारी लक्ष्य तय किए: पहली प्रतिबद्धता अवधि, 2008 से 2012, में 1990 के स्तर से औसतन 5.2 प्रतिशत की कटौती; 2012 के दोहा संशोधन ने 2020 तक की दूसरी अवधि जोड़ी। दिसंबर 2015 में COP21 में अपनाया गया और 4 नवंबर 2016 से लागू पेरिस समझौता सभी पक्षकारों को तपन को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से काफ़ी नीचे रखने और 1.5 डिग्री तक सीमित करने के प्रयास के लिए प्रतिबद्ध करता है। हर देश अपना राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) स्वयं तय करता है, जिसे हर पाँच वर्ष में नवीनीकृत किया जाता है। भारत ने इसका अनुसमर्थन 2 अक्टूबर 2016, गांधी जयंती, को किया।
ओज़ोन संधियाँ
ओज़ोन परत के संरक्षण के लिए वियना अभिसमय (1985) ढाँचा था, और ओज़ोन परत का क्षरण करने वाले पदार्थों पर मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, जिस पर 16 सितंबर 1987 को हस्ताक्षर हुए और जो 1989 से लागू है, ने CFC, हैलोन और अन्य ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों को समाप्त करने की बाध्यकारी समय-सारणी तय की। इसका बहुपक्षीय कोष विकासशील देशों को विकल्प अपनाने में सहायता देता है, और वियना अभिसमय के साथ यह हर देश द्वारा अनुसमर्थित पहली संयुक्त राष्ट्र संधि बना। अक्टूबर 2016 में रवांडा में तय हुए किगाली संशोधन ने हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) को, जो ओज़ोन को हानि नहीं पहुँचाते पर शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं, चरणबद्ध कटौती के दायरे में लाया; भारत के समूह को 2028 में HFC का उपयोग स्थिर करना है और 2047 तक उसमें 85 प्रतिशत कटौती करनी है।
रसायन और अपशिष्ट
बेसल अभिसमय (1989) खतरनाक अपशिष्टों की सीमा-पार आवाजाही और उनके निपटान को नियंत्रित करता है; यह तब बना जब धनी देशों द्वारा गरीब देशों में ज़हरीला कचरा फेंकने के मामले सामने आए। रॉटरडैम अभिसमय (1998) पूर्व सूचित सहमति (PIC) प्रक्रिया स्थापित करता है, जिसके अनुसार कुछ खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के निर्यात से पहले आयातक देश को सूचित करना और उसकी सहमति लेना आवश्यक है। स्टॉकहोम अभिसमय (2001) का लक्ष्य स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) को समाप्त या सीमित करना है, जिसकी शुरुआत DDT, एल्ड्रिन, डाइएल्ड्रिन, PCB, डाइऑक्सिन और फ्यूरान जैसे 'डर्टी डज़न' से हुई; मलेरिया नियंत्रण के लिए DDT की अब भी अनुमति है। तीनों का संयुक्त सचिवालय जिनेवा में है, और मिनामाता अभिसमय (2013) पारे को नियंत्रित करता है।
जैव विविधता संधियाँ
29 दिसंबर 1993 से लागू CBD, जिसका सचिवालय कनाडा के मॉन्ट्रियल में है, के तीन उद्देश्य हैं: जैव विविधता का संरक्षण, उसके घटकों का सतत उपयोग, और आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों का उचित और न्यायसंगत बँटवारा। जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल (2000 में अपनाया गया, 2003 में लागू) जीवित संशोधित जीवों, यानी आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों, की सीमा-पार आवाजाही को नियंत्रित करता है। पहुँच और लाभ साझाकरण पर नागोया प्रोटोकॉल (2010 में जापान में अपनाया गया, 2014 में लागू) यह सुनिश्चित करता है कि आनुवंशिक संसाधन और पारंपरिक ज्ञान देने वाले देशों और समुदायों को उनके उपयोग के लाभों में हिस्सा मिले। अन्य वन्यजीव संधियाँ हैं रामसर (1971), CITES (1973) और प्रवासी प्रजातियों पर बॉन अभिसमय (1979)।
IPCC
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की स्थापना 1988 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और UNEP ने की, और इसका सचिवालय जिनेवा में है। यह स्वयं शोध नहीं करता; यह प्रकाशित विज्ञान का आकलन करके आकलन रिपोर्टें जारी करता है, जिनमें पहली 1990 में आई। इसने 2007 का नोबेल शांति पुरस्कार अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर के साथ साझा किया।
मुख्य तथ्य
- स्टॉकहोम सम्मेलन, 5-16 जून 1972: संयुक्त राष्ट्र का पहला पर्यावरण सम्मेलन; UNEP (नैरोबी) बना; 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस बना।
- ब्रुंटलैंड रिपोर्ट, 'हमारा साझा भविष्य' (1987): सतत विकास को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किए बिना वर्तमान की आवश्यकताएँ पूरी करने के रूप में परिभाषित किया।
- रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन 1992 के परिणाम: रियो घोषणा (27 सिद्धांत), एजेंडा 21, वन सिद्धांत, UNFCCC और CBD; UNCCD 1994 में आया।
- क्योटो प्रोटोकॉल: 1997 में COP3 में अपनाया; 2005 में लागू; अनुलग्नक I देशों को 2008-2012 में 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत कटौती करनी थी।
- पेरिस समझौता: COP21, 2015; 4 नवंबर 2016 से लागू; 2 डिग्री सेल्सियस से काफ़ी नीचे, लक्ष्य 1.5; हर पाँच वर्ष में NDC; भारत ने 2 अक्टूबर 2016 को अनुसमर्थन किया।
- ओज़ोन: वियना अभिसमय 1985 (ढाँचा), मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल 16 सितंबर 1987 (CFC), किगाली संशोधन 2016 (HFC में चरणबद्ध कटौती; भारत का समूह 2028 में स्थिर करेगा)।
- रसायन अभिसमय: बेसल 1989 (खतरनाक अपशिष्ट), रॉटरडैम 1998 (पूर्व सूचित सहमति), स्टॉकहोम 2001 (POPs, डर्टी डज़न), मिनामाता 2013 (पारा)।
- CBD के अंतर्गत: कार्टाजेना प्रोटोकॉल (जैव सुरक्षा, GMO; 2000 में अपनाया) और नागोया प्रोटोकॉल (पहुँच और लाभ साझाकरण; 2010 में अपनाया)।
- सचिवालय: UNEP नैरोबी, UNFCCC बॉन, CBD मॉन्ट्रियल, IPCC तथा बेसल-रॉटरडैम-स्टॉकहोम अभिसमय जिनेवा।
- IPCC: 1988 में WMO और UNEP ने बनाया; पहली आकलन रिपोर्ट 1990; 2007 का नोबेल शांति पुरस्कार अल गोर के साथ साझा किया।
एक नज़र में दोहराव
स्टॉकहोम 1972 (UNEP, 5 जून); ब्रुंटलैंड 1987; रियो 1992: रियो घोषणा, एजेंडा 21, UNFCCC, CBD; UNCCD 1994; UNFCCC 1994 में लागू, बॉन; क्योटो 1997 (COP3), 2005 में लागू, 5.2 प्रतिशत कटौती; पेरिस 2015 (COP21), 2016 में लागू, 2 डिग्री से काफ़ी नीचे; वियना 1985; मॉन्ट्रियल 1987; किगाली 2016 (HFC); बेसल 1989, रॉटरडैम 1998, स्टॉकहोम 2001; कार्टाजेना 2000; नागोया 2010; IPCC 1988 (WMO, UNEP)।