41 में से पाठ 20 · अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
इच्छा, ज्ञान और भाव से जुड़े शब्द तथा प्रत्ययों के पैटर्न (-ज्ञ, -दर्शी, -भोगी, -हीन)
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इच्छा वाले शब्दों का नियम
संस्कृत में किसी काम की इच्छा बताने के लिए धातु में ‘सन्’ प्रत्यय लगता है। इसकी पहचान आसान है: प्रायः धातु का पहला अक्षर दोहराया जाता है (कभी थोड़े बदले रूप में, जैसे भुज् से बुभुक्षा, कृ से चिकीर्षा) और अंत में प्रायः ‘-सा’ या ‘-षा’ आता है। ‘-आ’ वाला रूप इच्छा (संज्ञा) बताता है और ‘-उ’ वाला रूप इच्छा रखने वाला व्यक्ति (विशेषण)। ज्ञा (जानना) से जिज्ञासा (जानने की इच्छा) और जिज्ञासु; पा (पीना) से पिपासा (पीने की इच्छा, प्यास) और पिपासु; भुज् (खाना) से बुभुक्षा (खाने की इच्छा, भूख) और बुभुक्षित (भूखा); जीव् (जीना) से जिजीविषा (जीने की इच्छा) और जिजीविषु; मुच् (मुक्त होना) से मुमुक्षा (मोक्ष की इच्छा) और मुमुक्षु; युध् (लड़ना) से युयुत्सा (युद्ध की इच्छा) और युयुत्सु; जि (जीतना) से जिगीषा (जीतने की इच्छा) और जिगीषु; कृ (करना) से चिकीर्षा (करने की इच्छा); दृश् (देखना) से दिदृक्षा (देखने की इच्छा); मृ (मरना) से मुमूर्षा (मरने की इच्छा)। लभ् (पाना) से बना ‘लिप्सा’ (पाने की लालसा, जैसे धन-लिप्सा) भी इसी सन् प्रत्यय का रूप है, पर इसमें दोहराव होता ही नहीं: संस्कृत व्याकरण के एक विशेष नियम से लभ् का रूप ‘लिप्स’ बनता है और दोहराया हुआ अक्षर हट जाता है। इसी तरह आप् (पाना) से ‘ईप्सा’ और ‘ईप्सित’ (चाहा हुआ) बनते हैं।
सन् से बने, पर इच्छा नहीं
कुछ शब्द इसी सन् प्रत्यय से बने हैं, पर संस्कृत व्याकरण (पाणिनि) के अनुसार इनमें सन् इच्छा का अर्थ नहीं देता, धातु का एक विशेष अर्थ देता है; परीक्षा में यहीं भूल होती है। गुप् से बने ‘जुगुप्सा’ का अर्थ घृणा है (वीभत्स रस का स्थायी भाव), कित् से बने ‘चिकित्सा’ का अर्थ रोग दूर करना या इलाज, तिज् से बने ‘तितिक्षा’ का अर्थ सहनशीलता और मान् से बने ‘मीमांसा’ का अर्थ गहन विचार या विवेचना है। ये सन् के रूप तो हैं, पर इच्छा-वाचक नहीं। ‘शुश्रूषा’ (श्रु + सन्) का शाब्दिक अर्थ ‘सुनने की इच्छा’ है; संस्कृत में भी इसका दूसरा अर्थ सेवा या आज्ञापालन है, और हिंदी में यही सेवा-टहल वाला अर्थ चलता है (रोगी की शुश्रूषा)। कुछ पुस्तकें ‘सुनने की इच्छा = शुश्रूषा’ पूछती हैं, इसलिए दोनों अर्थ याद रखिए; वर्तनी ‘शुश्रूषा’ है, ‘सुश्रूषा’ या ‘शुश्रुषा’ नहीं। ‘मुमूर्षु’ को भी पुस्तकें दो तरह लिखती हैं: ‘मरने की इच्छा रखने वाला’ और ‘जो मरने के निकट हो’। इच्छा से जुड़े दूसरे शब्द: इच्छा रखने वाला ‘इच्छुक’, चाहा हुआ ‘इच्छित’, ‘ईप्सित’ या ‘अभीष्ट’, जो चाहा न गया हो ‘अवांछित’, बिना फल की इच्छा के काम करने वाला ‘निष्काम’, फल की इच्छा से काम करने वाला ‘सकाम’, मनमानी करने वाला ‘स्वेच्छाचारी’ और लालच से भरा ‘लोलुप’।
ज्ञान से जुड़े शब्द
‘-ज्ञ’ का अर्थ है जानने वाला। सर्वज्ञ, अल्पज्ञ, मर्मज्ञ और कृतज्ञ के अलावा विशेषज्ञ (किसी विषय का विशेष ज्ञान रखने वाला), बहुज्ञ (बहुत जानने वाला), विज्ञ (जानकार), नीतिज्ञ (नीति जानने वाला), धर्मज्ञ (धर्म जानने वाला), रसज्ञ (रस का पारखी) और तत्त्वज्ञ (तत्त्व जानने वाला) इसी ढंग के हैं। उलटे अर्थ में ‘अज्ञ’ (जो कुछ न जानता हो) और ‘अनभिज्ञ’ (जो किसी विशेष बात से अनजान हो) आते हैं। ‘-विद्’ और ‘-वेत्ता’ भी जानने वाले के लिए आते हैं: भाषाविद् (भाषा का विद्वान), वेदविद्, तत्त्ववेत्ता। जिसने बहुत सुना-पढ़ा हो वह ‘बहुश्रुत’, किसी विषय में पूरी तरह निपुण ‘पारंगत’ और जिसने कोई घटना अपनी आँखों से देखी हो वह ‘प्रत्यक्षदर्शी’ कहलाता है। ज्ञा धातु से बने ज्ञाता, ज्ञात और ज्ञेय का अंतर अगले पाठ में विस्तार से दिया गया है।
भाव और प्रेम के रूप
प्रेम के अलग-अलग रूपों के लिए अलग शब्द हैं: संतान के प्रति माता-पिता का प्रेम ‘वात्सल्य’, छोटों के प्रति प्रेम ‘स्नेह’, बड़ों के प्रति आदर-भरा प्रेम ‘श्रद्धा’, ईश्वर के प्रति प्रेम ‘भक्ति’ और पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम ‘प्रणय’। पुस्तकों में इनकी परिभाषा के शब्द थोड़े अलग मिलते हैं, पर मूल अंतर यही है। किए हुए गलत काम पर बाद में होने वाला दुख ‘पश्चात्ताप’ है और पाप के शोधन के लिए किया गया कर्म ‘प्रायश्चित्त’; दोनों की वर्तनी में ‘त्त’ है। दूसरे के दुख को अपना समझकर दुखी होना ‘सहानुभूति’, आश्चर्य का भाव ‘विस्मय’, आनंद या भय से रोंगटे खड़े होना ‘रोमांच’, प्रिय से बिछुड़ने का दुख ‘विरह’, किसी अनिष्ट का डर ‘आशंका’ और किसी बात को पाने या जानने की तीव्र इच्छा और बेचैनी ‘उत्कंठा’ है। जिसे किसी बात में रुचि या लगाव न हो वह ‘उदासीन’ और शोक से व्याकुल ‘शोकाकुल’ कहलाता है।
प्रत्ययों के पैटर्न
‘-दर्शी’ का अर्थ है देखने या समझने वाला: दूरदर्शी और उसका उलटा अदूरदर्शी, त्रिकालदर्शी (भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को जानने वाला), समदर्शी (सबको समान दृष्टि से देखने वाला), पारदर्शी (जिसके आर-पार दिखे)। इसे ‘-दर्शक’ से अलग रखिए: दर्शक (देखने वाला), मार्गदर्शक (मार्ग दिखाने वाला)। ‘-भोगी’ भोगने वाला बताता है: भुक्तभोगी (जिसने स्वयं भोगा हो), सुखभोगी (सुख भोगने वाला)। ‘-गामी’ चलने या जाने वाला: अनुगामी (पीछे चलने वाला), अग्रगामी (आगे चलने वाला), द्रुतगामी (तेज़ चलने वाला), ऊर्ध्वगामी (ऊपर जाने वाला), अधोगामी (नीचे जाने वाला), दूरगामी (दूर तक असर डालने वाला)। ‘-भक्षी’ और ‘-आहारी’ खाने वाला: सर्वभक्षी या सर्वाहारी (सब कुछ खाने वाला), कीटभक्षी (कीड़े खाने वाला), फलाहारी, अल्पाहारी (कम खाने वाला)। ‘-जीवी’ जीने वाला: परजीवी (दूसरे पर आश्रित रहकर जीने वाला), अल्पजीवी (थोड़े समय तक जीने वाला)। ‘-ज’ जन्मा हुआ: जलज और पंकज (कमल), अंडज (अंडे से जन्मा), पिंडज या जरायुज (गर्भ से जन्मा; जरायु = गर्भ की झिल्ली), स्वेदज (पसीने या नमी से उत्पन्न), उद्भिज्ज (धरती फोड़कर उगने वाला, पेड़-पौधे; यह उद्भिद् + ज से बना तत्सम रूप है, हिंदी में ‘उद्भिज’ भी लिखा जाता है)।
‘-हीन’ और ‘सर्व-’ वाले शब्द
‘-हीन’ रहित का भाव देता है और प्रायः ‘निर्/निस्’ वाले शब्द का पर्याय बनता है: अर्थहीन = निरर्थक, आधारहीन = निराधार, बलहीन = निर्बल, धनहीन = निर्धन, गुणहीन = निर्गुण। दिशाहीन (जिसकी कोई दिशा न हो), विवेकहीन (जिसमें भले-बुरे की पहचान न हो) और श्रीहीन (शोभा से रहित) भी ऐसे ही बनते हैं। ‘निर्गुण’ का एक विशेष अर्थ भी है: ईश्वर का वह रूप जो गुणों और आकार से परे हो, जैसे कबीर की निर्गुण भक्ति। ‘सर्व-’ से शुरू होने वाले शब्द एक साथ याद कीजिए: सर्वशक्तिमान (जिसमें सब प्रकार की शक्ति हो), सर्वव्यापी (जो सब जगह व्याप्त हो), सर्वसुलभ (जो सबको सरलता से मिले), सर्वसम्मत (जिसमें सबकी सहमति हो), सर्वांगीण (सब अंगों या पक्षों से जुड़ा), सर्वमान्य (जिसे सब मानें)। ‘बहु-’ से बहुमुखी (जो अनेक क्षेत्रों में कुशल हो) और बहुरूपिया (अनेक रूप धरने वाला) बनते हैं।
सावधानी
इच्छा वाले शब्दों में ‘-आ’ और ‘-उ’ का भेद प्रश्न का उत्तर बदल देता है: ‘जानने की इच्छा’ का उत्तर जिज्ञासा है, ‘जानने की इच्छा रखने वाला’ का जिज्ञासु। ‘-दर्शी’ और ‘-दर्शक’, ‘पश्चात्ताप’ और ‘प्रायश्चित्त’, ‘अज्ञ’ और ‘अनभिज्ञ’ के जोड़े भी उलझाते हैं। ‘सर्वज्ञ’ (सब कुछ जानने वाला) और ‘सर्वव्यापी’ (सब जगह उपस्थित) अलग गुण हैं, यद्यपि दोनों ईश्वर के लिए आते हैं।
मुख्य तथ्य
- जानने की इच्छा → जिज्ञासा; जानने की इच्छा रखने वाला → जिज्ञासु (‘-आ’ इच्छा, ‘-उ’ इच्छा रखने वाला)।
- युद्ध की इच्छा → युयुत्सा, युद्ध का इच्छुक → युयुत्सु; जीतने की इच्छा → जिगीषा; करने की इच्छा → चिकीर्षा; देखने की इच्छा → दिदृक्षा।
- पाने की लालसा → लिप्सा; मरने की इच्छा → मुमूर्षा; मोक्ष की इच्छा रखने वाला → मुमुक्षु; भूखा → बुभुक्षित।
- सन् से बने पर इच्छा-वाचक नहीं: जुगुप्सा (गुप्) = घृणा, चिकित्सा (कित्) = इलाज, तितिक्षा (तिज्) = सहनशीलता, मीमांसा (मान्) = गहन विचार; शुश्रूषा = सेवा (शाब्दिक अर्थ सुनने की इच्छा)।
- किसी विषय का विशेष ज्ञान रखने वाला → विशेषज्ञ; नीति जानने वाला → नीतिज्ञ; जो किसी बात से अनजान हो → अनभिज्ञ; जिसने बहुत सुना-पढ़ा हो → बहुश्रुत।
- संतान के प्रति प्रेम → वात्सल्य; छोटों के प्रति → स्नेह; बड़ों के प्रति → श्रद्धा; ईश्वर के प्रति → भक्ति; पति-पत्नी का प्रेम → प्रणय।
- किए पर बाद में होने वाला पछतावा → पश्चात्ताप; पाप-शोधन के लिए किया गया कर्म → प्रायश्चित्त (दोनों में ‘त्त’)।
- भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाला → त्रिकालदर्शी; सबको समान देखने वाला → समदर्शी; पीछे चलने वाला → अनुगामी; ऊपर जाने वाला → ऊर्ध्वगामी।
- सब कुछ खाने वाला → सर्वभक्षी/सर्वाहारी; कीड़े खाने वाला → कीटभक्षी; दूसरे पर आश्रित रहकर जीने वाला → परजीवी; अंडे से जन्मा → अंडज।
- अर्थहीन = निरर्थक, आधारहीन = निराधार, बलहीन = निर्बल; जो सब जगह व्याप्त हो → सर्वव्यापी; जिसमें सबकी सहमति हो → सर्वसम्मत।
एक नज़र में दोहराव
इच्छा = सन् प्रत्यय (प्रायः धातु का पहला अक्षर दोहरा, -सा/-षा; लिप्सा में दोहराव नहीं): जिज्ञासा, पिपासा, बुभुक्षा, जिजीविषा, मुमुक्षा, युयुत्सा, जिगीषा, चिकीर्षा, दिदृक्षा, मुमूर्षा, लिप्सा; -आ इच्छा, -उ इच्छुक; जुगुप्सा, चिकित्सा, तितिक्षा, मीमांसा भी सन् से बने पर इच्छा-वाचक नहीं; शुश्रूषा = सेवा; -ज्ञ (विशेषज्ञ, नीतिज्ञ), अज्ञ, अनभिज्ञ, बहुश्रुत; वात्सल्य, स्नेह, श्रद्धा, भक्ति, प्रणय; पश्चात्ताप, प्रायश्चित्त; -दर्शी, -भोगी, -गामी, -भक्षी, -जीवी, -ज; -हीन = निर्- (निरर्थक, निराधार); सर्वव्यापी, सर्वसम्मत।