41 में से पाठ 21 · अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
मिलते-जुलते शब्दों में अंतर और प्रश्न हल करने की विधि (अज्ञ, अज्ञात, अज्ञेय)
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
एक धातु के तीन रूप
बहुत-से भ्रम इसलिए होते हैं कि एक ही धातु से कर्ता, कर्म और संभावना के अलग-अलग शब्द बनते हैं। ज्ञा (जानना) से ‘ज्ञाता’ या ‘-ज्ञ’ = जानने वाला (कर्ता), ‘ज्ञात’ = जाना हुआ, ‘ज्ञेय’ = जो जाना जा सके या जानने योग्य हो। निषेध लगाने पर ‘अज्ञ’ = जो कुछ न जानता हो (व्यक्ति, अज्ञानी), ‘अज्ञात’ = जिसके बारे में अब तक पता न चला हो (अज्ञात व्यक्ति, अज्ञात कारण), और ‘अज्ञेय’ = जो जाना ही न जा सके, जिसे जानना मनुष्य की सीमा से परे हो (कुछ दार्शनिक परम सत्य को अज्ञेय मानते हैं)। ‘अनभिज्ञ’ अलग है: यह उस व्यक्ति के लिए आता है जो किसी विशेष बात से अनजान हो (वह नए नियम से अनभिज्ञ था)। यही साँचा दूसरी धातुओं पर भी चलता है: दृश् से द्रष्टा (देखने वाला), दृष्ट (देखा हुआ), दृश्य (जो देखा जा सके), अदृष्ट (जो देखा न गया हो; भाग्य के अर्थ में भी), अदृश्य (जो दिखाई न दे); श्रु से श्रोता, श्रुत, श्रव्य, अश्रुत; जि से विजेता (जीतने वाला), विजित (जो जीता गया हो), अजेय (जिसे जीता न जा सके), अजित (जो अब तक जीता न गया हो)।
बारीक अंतर वाले युग्म
‘दुर्लभ’ जो कठिनाई से मिले, ‘अलभ्य’ जो मिल ही न सके। ‘साध्य’ जो सिद्ध या ठीक किया जा सके, ‘दुःसाध्य’ जो कठिनाई से सिद्ध हो, ‘असाध्य’ जो सिद्ध या ठीक न हो सके (असाध्य रोग)। ‘अक्षम’ असमर्थ व्यक्ति है, ‘अक्षम्य’ वह अपराध जो क्षमा न किया जा सके। ‘अमूल्य’ का अर्थ है जिसका मूल्य आँका न जा सके, ‘मूल्यहीन’ नहीं; बहुत अधिक मूल्य वाला ‘बहुमूल्य’ है। ‘अदृश्य’ जो आँखों से न दिखे, ‘अगोचर’ जो किसी भी इंद्रिय से न जाना जा सके। ‘इहलौकिक’ इस लोक से जुड़ा, ‘पारलौकिक’ परलोक से जुड़ा, ‘अलौकिक’ जो इस लोक में साधारणतः न मिले, अद्भुत। ‘निष्पक्ष’ वह जो निर्णय करते समय किसी का पक्ष न ले, ‘तटस्थ’ वह जो विवाद में किसी भी ओर न हो; कई पुस्तकें ‘जो किसी का पक्ष न ले’ के लिए दोनों शब्द देती हैं, पर पक्षपात न करने के भाव में निष्पक्ष और किसी ओर न होने के भाव में तटस्थ अधिक सटीक है। ‘अनुपम’ (जिसकी उपमा न हो), ‘अद्वितीय’ (जिसके समान दूसरा न हो) और ‘अतुलनीय’ (जिसकी तुलना न हो सके) लगभग पर्याय हैं; वाक्यांश में ‘उपमा’, ‘दूसरा’ या ‘तुलना’ में से जो शब्द हो, उसी से उत्तर मिलाइए।
विकल्प परखने की विधि
पहले वाक्यांश का मुख्य शब्द पहचानिए और उसके मूल शब्द तक जाइए (‘जिसे टाला न जा सके’ में टालना = परिहार)। फिर देखिए कि अर्थ किस प्रकार का है: करने वाला हो तो ‘-क’, ‘-कार’, ‘-ई’, ‘-ता’ या ‘-ज्ञ’; जो किया गया हो तो ‘-इत’ या ‘-त’; जो किया जा सके या करने योग्य हो तो ‘-य’, ‘-नीय’ या ‘-तव्य’; स्थान हो तो ‘-आलय’ या ‘-शाला’; इच्छा हो तो सन् वाला रूप। इसके बाद निषेध और मात्रा के छोटे शब्द पढ़िए: ‘न’ के लिए अ/अन्, ‘बिना’ या ‘रहित’ के लिए निर्/निस् या ‘-हीन’, ‘कठिनाई से’ के लिए दुर्/दुस्, ‘सरलता से’ के लिए सु। फिर काल देखिए: ‘जो हुआ हो’, ‘जो होने वाला हो’ और ‘जो हो सके’ तीन अलग उत्तर हैं। अंत में चुना हुआ शब्द वाक्यांश में वापस रखकर पूरा अर्थ मिलाइए और उसकी वर्तनी जाँचिए, क्योंकि कई प्रश्नों में सही शब्द का एक अशुद्ध रूप भी विकल्प में होता है। इस तरह ‘जिसे टाला न जा सके’ में परिहार से परिहार्य (जो टाला जा सके) और निषेध से अपरिहार्य मिलता है।
हल किए गए प्रश्न
पहला प्रश्न ‘जिसे जीता न जा सके’; विकल्प अजित, अजेय, अपराजित, विजित। यहाँ ‘जा सके’ संभावना है, इसलिए ‘-य’ वाला ‘अजेय’ सही है; अजित और अपराजित ‘अब तक न जीता गया या न हारा’ बताते हैं और विजित तो जीता हुआ है। इन दोनों में भी वाक्यांश का शब्द देखिए: ‘जीता न गया हो’ हो तो अजित, ‘हारा न हो’ या ‘पराजित न हुआ हो’ हो तो अपराजित। दूसरा प्रश्न ‘जो पहले कभी न सुना गया हो’; विकल्प अश्रव्य, अश्रुत, अश्रुतपूर्व, अनसुना। ‘पहले कभी’ के कारण ‘अश्रुतपूर्व’ सही है, जबकि ‘अश्रव्य’ वह है जो सुना न जा सके। तीसरा प्रश्न ‘किसी विशेष बात को न जानने वाला’; विकल्प अज्ञेय, अज्ञात, अनभिज्ञ, अज्ञ। अज्ञेय और अज्ञात जानी जाने वाली वस्तु के लिए हैं, जानने वाले के लिए नहीं, और ‘अज्ञ’ सामान्य रूप से कुछ न जानने वाला है, इसलिए ‘अनभिज्ञ’ सही है। चौथा प्रश्न ‘जो ऊपर कहा गया हो’; उपरि + उक्त = ‘उपर्युक्त’ (यण् संधि) शुद्ध है, ‘उपरोक्त’ चलन में बहुत है पर अधिकतर व्याकरण-पुस्तकें उसे अशुद्ध मानती हैं, इसलिए दोनों हों तो ‘उपर्युक्त’ चुनिए।
मिश्रित अभ्यास
इन वाक्यांशों को पहले स्वयं हल कीजिए, फिर उत्तर मिलाइए। जो धरती से संबंधित हो → पार्थिव; जो आकाश को छूता हो → गगनचुंबी; जो कानून के विरुद्ध हो → अवैध; जो सबके लिए हो → सार्वजनिक; जो छिपकर अदृश्य हो गया हो → अंतर्धान; जिसका वर्णन वाणी से न हो सके → अनिर्वचनीय; जो बीत गया हो → अतीत; जिसकी गिनती न हो सके → अगणित या असंख्य; जो किसी के मत को मानकर उसके पीछे चले → अनुयायी; जो अपनी जगह से हिल न सके → स्थावर, और उलटा चलने-फिरने वाला → जंगम; जो इंद्रियों की पहुँच से परे हो → अतींद्रिय या इंद्रियातीत (‘अगोचर’ इसका निकट पर्याय है); जो सबसे आगे रहकर नेतृत्व करे → अग्रणी; जो अपने मार्ग से भटक गया हो → पथभ्रष्ट; जो क्षमा के योग्य हो → क्षम्य।
जाल और वर्तनी
विकल्पों में सबसे अधिक ये अशुद्ध रूप रखे जाते हैं: उपरोक्त (शुद्ध उपर्युक्त), अपरान्ह (अपराह्न), अभ्यारण्य (अभयारण्य), शमशान (श्मशान), अंतर्ध्यान (अंतर्धान), पश्चाताप (पश्चात्ताप), प्रायश्चित (प्रायश्चित्त), मुहुर्त (मुहूर्त)। ‘अनुदित’ एक अलग शब्द है, जिसका अर्थ है जो उदित न हुआ हो (अन् + उदित); ‘अनुवाद किया हुआ’ के लिए ‘अनूदित’ लिखा जाता है। अर्थ के जाल भी पहचानिए: वाक्यांश में ‘न’, ‘कभी’, ‘पहले’, ‘स्वयं’ जैसे छोटे शब्द पूरा उत्तर बदल देते हैं (भूतपूर्व-अभूतपूर्व, ज्ञात-अज्ञात-अज्ञेय, शरणार्थी-शरणागत)। विलोम शब्द प्रायः विकल्प में होता है, इसलिए उत्तर चुनने से पहले वाक्यांश दोबारा पढ़िए। जहाँ पुस्तकें दो उत्तर मानती हैं (मितभाषी-अल्पभाषी, अनूदित-अनुवादित, हीरक जयंती 60 या 75 वर्ष), वहाँ विकल्पों में जो एक ही ठीक बैठे, उसे चुनिए; दोनों हों तो अधिक मान्य रूप (मितभाषी, अनूदित, 60 वर्ष) चुनिए।
मुख्य तथ्य
- जो कुछ न जानता हो → अज्ञ; जिसके बारे में पता न हो → अज्ञात; जो जाना ही न जा सके → अज्ञेय; जो किसी विशेष बात से अनजान हो → अनभिज्ञ।
- जिसे जीता न जा सके → अजेय; जो अब तक जीता न गया हो → अजित; जो कभी हारा न हो → अपराजित; जो जीता गया हो → विजित।
- जो कठिनाई से मिले → दुर्लभ; जो मिल ही न सके → अलभ्य; जो ठीक न हो सके → असाध्य; जो कठिनाई से सिद्ध हो → दुःसाध्य।
- असमर्थ → अक्षम; जो क्षमा न किया जा सके → अक्षम्य; जिसका मूल्य आँका न जा सके → अमूल्य (मूल्यहीन नहीं)।
- जो आँखों से न दिखे → अदृश्य; जो इंद्रियों से न जाना जा सके → अगोचर; इस लोक का → इहलौकिक; परलोक का → पारलौकिक; अद्भुत, असाधारण → अलौकिक।
- जो पहले कभी न सुना गया हो → अश्रुतपूर्व; जो सुना न जा सके → अश्रव्य; जो ऊपर कहा गया हो → उपर्युक्त (उपरि + उक्त, यण् संधि)।
- जो धरती से संबंधित हो → पार्थिव; जो आकाश को छूता हो → गगनचुंबी; जो छिपकर अदृश्य हो गया हो → अंतर्धान; जिसका वर्णन वाणी से न हो सके → अनिर्वचनीय।
- जो अपनी जगह से हिल न सके → स्थावर; चलने-फिरने वाला → जंगम; जो इंद्रियों की पहुँच से परे हो → अतींद्रिय; जो अपने मार्ग से भटक गया हो → पथभ्रष्ट।
- अशुद्ध → शुद्ध: उपरोक्त → उपर्युक्त, अभ्यारण्य → अभयारण्य, शमशान → श्मशान, अंतर्ध्यान → अंतर्धान, पश्चाताप → पश्चात्ताप, प्रायश्चित → प्रायश्चित्त।
- विधि: मुख्य शब्द → अर्थ का प्रकार (कर्ता, किया गया, किया जा सके, स्थान, इच्छा) → निषेध (अ/अन्, निर्, दुर्) → काल → शब्द को वाक्यांश में रखकर जाँच → वर्तनी।
एक नज़र में दोहराव
-ज्ञ/ज्ञाता करने वाला, ज्ञात जाना हुआ, ज्ञेय जो जाना जा सके; अज्ञ, अज्ञात, अज्ञेय, अनभिज्ञ अलग; अजेय-अजित-अपराजित-विजित; दुर्लभ-अलभ्य; साध्य-दुःसाध्य-असाध्य; अक्षम-अक्षम्य; अमूल्य मूल्यहीन नहीं; अदृश्य-अगोचर; इहलौकिक-पारलौकिक-अलौकिक; निष्पक्ष-तटस्थ; विधि: मुख्य शब्द, अर्थ का प्रकार, निषेध, काल, वापस रखकर जाँच, वर्तनी; उपर्युक्त, अपराह्न, अभयारण्य, श्मशान, अंतर्धान, पश्चात्ताप, प्रायश्चित्त, अनूदित शुद्ध।