41 में से पाठ 19 · अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
काम, स्थान और समय से जुड़े शब्द (पुस्तकालय, अपरिहार्य, अभूतपूर्व)
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
स्थान बताने वाले अंत
‘जहाँ ... हो’ वाले वाक्यांशों के उत्तर प्रायः ‘-आलय’, ‘-शाला’, ‘-आगार’ या ‘-भूमि’ से बनते हैं। ‘आलय’ का अर्थ है घर या भवन: पुस्तकालय (जहाँ पुस्तकें रखी हों), चिकित्सालय (जहाँ चिकित्सा हो), औषधालय (जहाँ दवाएँ मिलें), संग्रहालय (जहाँ दर्शनीय वस्तुओं का संग्रह हो), न्यायालय, देवालय, अनाथालय। इनमें दीर्घ संधि है: पुस्तक + आलय = पुस्तकालय, हिम + आलय = हिमालय (बर्फ़ का घर)। ‘-शाला’ से पाठशाला, प्रयोगशाला (जहाँ प्रयोग किए जाएँ), धर्मशाला (यात्रियों के ठहरने का धर्मार्थ स्थान), गोशाला (जहाँ गायें रहें), अश्वशाला (जहाँ घोड़े बाँधे जाएँ) और पाकशाला (जहाँ भोजन पकाया जाए) बनते हैं; ‘-आगार’ से शस्त्रागार (जहाँ शस्त्र रखे जाएँ) और कारागार (जेल)। कुछ शब्द याद ही करने पड़ते हैं: श्मशान (जहाँ शव जलाए जाएँ), टकसाल (जहाँ सिक्के ढलते हैं), आश्रम (जहाँ ऋषि-मुनि रहते हों), छात्रावास (जहाँ विद्यार्थी रहते हों), रणभूमि (जहाँ युद्ध हो)। पशु-पक्षियों के घर भी पूछे जाते हैं: पक्षी का घोंसला ‘नीड़’, साँप का घर ‘बाँबी’, शेर जैसे जंगली पशु की ‘माँद’।
भूगोल से जुड़े स्थान
चारों ओर जल से घिरा भूभाग ‘द्वीप’, तीन ओर जल से घिरा ‘प्रायद्वीप’, दो नदियों के बीच की भूमि ‘दोआब’, जहाँ नदियाँ मिलें वह ‘संगम’, जहाँ से नदी निकले वह ‘उद्गम’ और जहाँ नदी समुद्र में मिले वह ‘मुहाना’ है। पर्वत के पास नीचे की भूमि ‘उपत्यका’ (घाटी) और पर्वत के ऊपर की समतल भूमि ‘अधित्यका’ कहलाती है; ‘उप’ पास या नीचे का और ‘अधि’ ऊपर का भाव देता है। दो बड़े जलभागों को जोड़ने वाला पतला जलमार्ग ‘जलडमरूमध्य’ और दो बड़े भूभागों को जोड़ने वाली पतली भूमि ‘स्थलडमरूमध्य’ है। जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखें वह ‘क्षितिज’, जहाँ कुछ न उगे वह ‘ऊसर’ या ‘बंजर’, उपजाऊ भूमि ‘उर्वर’, जहाँ कोई न रहता हो वह ‘निर्जन’ और जहाँ वन्य जीव बिना भय के रह सकें वह ‘अभयारण्य’ (अभय + अरण्य) है। जहाँ पहुँचना कठिन हो वह ‘दुर्गम’, जहाँ जाया ही न जा सके वह ‘अगम्य’ और जहाँ सरलता से पहुँचा जा सके वह ‘सुगम’ है।
निवास और यात्रा
गाँव में रहने वाला ‘ग्रामीण’ और नगर में रहने वाला ‘नागरिक’ है (नागरिक देश के निवासी के अर्थ में भी आता है)। जो अपना स्थान या देश छोड़कर दूसरी जगह जा बसा हो वह ‘प्रवासी’ और जो दूसरे देश से आकर यहाँ बसा हो वह ‘आप्रवासी’ है। जो एक जगह टिककर न रहे वह ‘यायावर’ या ‘घुमंतू’, रास्ते पर चलने वाला ‘पथिक’ और तीर्थ जाने वाला ‘तीर्थयात्री’ है। जो कहीं से आया हो वह ‘आगंतुक’ और जिसके आने की तिथि निश्चित न हो वह ‘अतिथि’ है। जो अपना देश छोड़कर दूसरे देश में शरण चाहता हो वह ‘शरणार्थी’ और जो शरण में आ चुका हो वह ‘शरणागत’।
जो किया गया हो, जो किया जा सके, जो करना चाहिए
ये तीन अर्थ तीन अलग प्रत्यय माँगते हैं। ‘जो किया गया हो’ के लिए ‘-इत’ या ‘-त’: आमंत्रित (जिसे बुलाया गया हो), उपेक्षित (जिसकी उपेक्षा की गई हो), निर्वासित (जिसे देश या स्थान से निकाल दिया गया हो), बहिष्कृत (जिसे समाज से बाहर कर दिया गया हो), पुरस्कृत, अप्रकाशित (जो छपा न हो) और अनूदित (जिसका अनुवाद किया गया हो)। ‘जो किया जा सके’ या ‘करने योग्य’ के लिए ‘-य’ और ‘-नीय’: पेय और अपेय, खाद्य और अखाद्य, गेय (जो गाया जा सके), श्रव्य (जो सुना जा सके), ग्राह्य (जो ग्रहण करने योग्य हो), त्याज्य (जो त्यागने योग्य हो), अपठनीय (जो पढ़ा न जा सके), अनुकरणीय (जो अनुकरण करने योग्य हो), अपरिहार्य (जिसे टाला न जा सके), अविभाज्य (जिसे बाँटा न जा सके)। ‘जो करना या जानना चाहिए’ के लिए ‘-तव्य’: कर्तव्य (जो करना चाहिए), वक्तव्य (जो कहा जाए), ज्ञातव्य (जो जानने योग्य हो), द्रष्टव्य (जो देखने योग्य हो) और गंतव्य (जहाँ जाना हो)। अचानक होने वाला ‘आकस्मिक’, जिसकी आशा न की गई हो वह ‘अप्रत्याशित’ और जिसका होना निश्चित हो वह ‘अवश्यंभावी’ है।
काम करने वाले
खेती करने वाला ‘कृषक’, श्रम करने वाला ‘श्रमिक’, शिल्प का काम करने वाला ‘शिल्पी’, रथ चलाने वाला ‘सारथी’, अनुवाद करने वाला ‘अनुवादक’, दो भाषाएँ जानकर दो लोगों की बात एक-दूसरे को समझाने वाला ‘दुभाषिया’, छिपकर भेद लेने वाला ‘गुप्तचर’, समाचार भेजने वाला ‘संवाददाता’, दो पक्षों में समझौता कराने वाला ‘मध्यस्थ’, किसी की ओर से काम करने वाला ‘प्रतिनिधि’ और किसी के बाद उसकी संपत्ति या पद पाने वाला ‘उत्तराधिकारी’ है। बिना वेतन के काम करने वाला ‘अवैतनिक’, अपनी इच्छा से सेवा करने वाला ‘स्वयंसेवक’, सेवा से निवृत्त ‘सेवानिवृत्त’ और पद से हटाया गया ‘पदच्युत’ कहलाता है। जो काम में लगा रहे वह ‘कर्मठ’ और जो कोई काम न करे वह ‘अकर्मण्य’ है।
समय और अवधि
‘-इक’ प्रत्यय से अवधि वाले शब्द बनते हैं और प्रत्यय लगने पर पहला स्वर प्रायः बढ़ जाता है: दिन से दैनिक, तीन मास से त्रैमासिक (तीन महीने में एक बार), छह मास से षाण्मासिक या अर्धवार्षिक, वर्ष से वार्षिक, तीन वर्ष से त्रैवार्षिक। दस वर्ष का समय ‘दशक’, सौ वर्ष का ‘शताब्दी’ और हज़ार वर्ष का ‘सहस्राब्दी’ है। 25 वर्ष पूरे होने का उत्सव ‘रजत जयंती’ और 50 का ‘स्वर्ण जयंती’ है; ‘हीरक जयंती’ को अधिकतर परीक्षा-पुस्तकें 60 वर्ष पूरे होने का उत्सव मानती हैं (कुछ 75 वर्ष भी लिखती हैं), इसलिए परीक्षा में 60 ही सुरक्षित उत्तर है। सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले का समय ‘ब्राह्म मुहूर्त’ (शुद्ध तत्सम रूप ‘ब्राह्म’ है, पर ‘ब्रह्म मुहूर्त’ भी चलता है) और संध्या का वह समय जब गायें चरकर लौटती हैं ‘गोधूलि’ है। जो पहले कभी न हुआ हो वह ‘अभूतपूर्व’; इसी साँचे पर अदृष्टपूर्व (जो पहले कभी न देखा गया हो) और अश्रुतपूर्व (जो पहले कभी न सुना गया हो) बनते हैं। पहले हुए पुरखे ‘पूर्वज’ और बाद की पीढ़ियाँ ‘वंशज’; एक ही समय में रहने वाले ‘समकालीन’; उस समय का ‘तत्कालीन’ और तुरंत का ‘तात्कालिक’; पुराना ‘प्राचीन’ और नया ‘अर्वाचीन’; असमय होने वाला (जैसे असामयिक मृत्यु) ‘असामयिक’; क्षण भर में नष्ट होने वाला ‘क्षणभंगुर’; सदा रहने वाला ‘शाश्वत’; जिसकी मृत्यु हो चुकी हो वह ‘दिवंगत’ और जो मृत्यु के निकट हो वह ‘मरणासन्न’ है।
वर्तनी और भ्रम
‘श्मशान’ (शमशान नहीं), ‘अभयारण्य’ (अभ्यारण्य नहीं) और ‘मुहूर्त’ (मुहुर्त नहीं) की वर्तनी पर विकल्प बनाए जाते हैं। ‘अनूदित’ शुद्ध तत्सम रूप है; ‘अनुवादित’ भी चलन में है और कुछ पुस्तकें उसे स्वीकार करती हैं, पर दोनों विकल्प हों तो ‘अनूदित’ चुनिए। ‘अप्रवासी’ शब्द समाचारों में खूब चलता है, पर इसमें ‘अ’ निषेध का अर्थ देता है (अ + प्रवासी = जो प्रवासी न हो), इसलिए कई व्याकरण-पुस्तकें इसे अशुद्ध मानती हैं; दूसरे देश से आकर बसे व्यक्ति के लिए ‘आप्रवासी’ और विदेश जा बसे व्यक्ति के लिए ‘प्रवासी’ चुनिए। विदेश में रहने वाले भारतीयों के लिए सरकारी प्रयोग में ‘प्रवासी भारतीय’ और ‘अनिवासी भारतीय’ (NRI) दोनों मिलते हैं। ‘गंतव्य’ स्थान है, ‘कर्तव्य’ करने योग्य काम; ‘अगम्य’ वह जहाँ जाया ही न जा सके, ‘दुर्गम’ वह जहाँ कठिनाई से पहुँचा जाए।
मुख्य तथ्य
- जहाँ पुस्तकें रखी हों → पुस्तकालय; जहाँ दवाएँ मिलें → औषधालय; जहाँ दर्शनीय वस्तुओं का संग्रह हो → संग्रहालय (पुस्तक + आलय: दीर्घ संधि)।
- जहाँ प्रयोग किए जाएँ → प्रयोगशाला; जहाँ घोड़े बाँधे जाएँ → अश्वशाला; जहाँ शस्त्र रखे जाएँ → शस्त्रागार; जहाँ शव जलाए जाएँ → श्मशान; जहाँ सिक्के ढलें → टकसाल।
- पर्वत के पास नीचे की भूमि → उपत्यका; पर्वत के ऊपर की समतल भूमि → अधित्यका; दो नदियों के बीच की भूमि → दोआब; जहाँ नदी समुद्र में मिले → मुहाना।
- तीन ओर जल से घिरा भूभाग → प्रायद्वीप; दो जलभागों को जोड़ने वाला पतला जलमार्ग → जलडमरूमध्य; जहाँ वन्य जीव निर्भय रहें → अभयारण्य।
- जो दूसरे देश से आकर बसा हो → आप्रवासी; जो अपना स्थान छोड़कर दूसरी जगह बसा हो → प्रवासी; जो शरण चाहता हो → शरणार्थी; जो शरण में आ चुका हो → शरणागत।
- जिसे टाला न जा सके → अपरिहार्य; जिसका होना निश्चित हो → अवश्यंभावी; जिसकी आशा न की गई हो → अप्रत्याशित; जिसका अनुवाद किया गया हो → अनूदित।
- जो करना चाहिए → कर्तव्य; जो कहा जाए → वक्तव्य; जो जानने योग्य हो → ज्ञातव्य; जहाँ जाना हो → गंतव्य (‘-तव्य’ प्रत्यय)।
- तीन महीने में एक बार → त्रैमासिक; छह महीने में एक बार → षाण्मासिक या अर्धवार्षिक; तीन वर्ष में एक बार → त्रैवार्षिक; हज़ार वर्ष → सहस्राब्दी।
- जो पहले कभी न हुआ हो → अभूतपूर्व; जो पहले कभी न देखा गया हो → अदृष्टपूर्व; जो पहले कभी न सुना गया हो → अश्रुतपूर्व।
- बिना वेतन काम करने वाला → अवैतनिक; जो कोई काम न करे → अकर्मण्य; दो पक्षों में समझौता कराने वाला → मध्यस्थ; पद से हटाया गया → पदच्युत।
एक नज़र में दोहराव
स्थान: -आलय (पुस्तकालय, औषधालय, संग्रहालय, हिमालय), -शाला (प्रयोगशाला, अश्वशाला, पाकशाला), -आगार (शस्त्रागार, कारागार), श्मशान, टकसाल; उपत्यका-अधित्यका, दोआब, मुहाना, प्रायद्वीप, जलडमरूमध्य, अभयारण्य; प्रवासी-आप्रवासी, शरणार्थी-शरणागत, अतिथि; -इत (अनूदित, निर्वासित), -य/-नीय (अपरिहार्य, अविभाज्य), -तव्य (कर्तव्य, गंतव्य); त्रैमासिक, षाण्मासिक, त्रैवार्षिक, सहस्राब्दी; रजत 25, स्वर्ण 50, हीरक 60 (अधिकतर पुस्तकें; कुछ 75); अभूतपूर्व, अदृष्टपूर्व, अश्रुतपूर्व; तत्कालीन-तात्कालिक।