41 में से पाठ 18 · अनेक शब्दों के लिए एक शब्द

व्यक्ति, स्वभाव और गुण बताने वाले शब्द (आस्तिक, मितभाषी, अजातशत्रु)

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

ये शब्द कैसे बनते हैं

किसी व्यक्ति के विश्वास, स्वभाव, बोलचाल या गुण को एक शब्द में कहने वाले शब्द प्रायः विशेषण होते हैं और तीन तरीकों से बनते हैं। पहला, प्रत्यय से: ‘-ई’ (सदाचारी, स्वार्थी), ‘-इक’ (आस्तिक), ‘-वान/-मान’ (गुणवान, बुद्धिमान; प्रायः अ या आ पर समाप्त होने वाले शब्द के बाद ‘-वान’ और इ, ई या उ पर समाप्त होने वाले शब्द के बाद ‘-मान’, जैसे धनवान, विद्यावान, बुद्धिमान, श्रीमान; लक्ष्मीवान जैसे अपवाद भी हैं), ‘-शील’ (क्षमाशील, विचारशील), ‘-आलु’ (दयालु, श्रद्धालु), ‘-इष्णु’ (सहिष्णु) और ‘-वी’ (तपस्वी, यशस्वी, तेजस्वी, मेधावी, मायावी)। दूसरा, उपसर्ग या उपसर्ग की तरह लगने वाले शब्दों से: ‘सत्’ और ‘दुर्’ अच्छे-बुरे का भेद बताते हैं (सदाचारी, दुराचारी) और ‘निर्/निस्’ रहित होने का (निर्भीक, निर्लज्ज, निःस्वार्थ)। तीसरा, बहुव्रीहि समास से: इसमें दोनों पद मिलकर किसी तीसरे व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं, जैसे अजातशत्रु = नहीं जन्मा है शत्रु जिसका। प्रश्न में ‘जो’, ‘जिसका’, ‘जिसकी’, ‘जिसने’ से शुरू होने वाले वाक्यांश अधिकतर इन्हीं शब्दों के लिए होते हैं।

आस्था और दृष्टिकोण

जो ईश्वर में विश्वास रखे वह ‘आस्तिक’ और जो विश्वास न रखे वह ‘नास्तिक’ कहलाता है। ये संस्कृत ‘अस्ति’ (है) और ‘नास्ति’ (नहीं है) में ‘-इक’ प्रत्यय लगकर बने हैं; प्रत्यय लगने पर पहला स्वर ‘अ’ बढ़कर ‘आ’ हो जाता है, इसलिए ‘अस्तिक’ नहीं, ‘आस्तिक’ लिखा जाता है। भारतीय दर्शन में वेद को प्रमाण मानने वाले दर्शनों को भी आस्तिक कहा गया है, पर परीक्षा में अर्थ ‘ईश्वर में विश्वास रखने वाला’ ही लिया जाता है। इसी तरह जो हर बात में अच्छा परिणाम देखे वह ‘आशावादी’, जो हर बात में निराशा देखे वह ‘निराशावादी’, जो सब कुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दे वह ‘भाग्यवादी’, जो वास्तविकता को मानकर चले वह ‘यथार्थवादी’ और जो ऊँचे आदर्शों पर चले वह ‘आदर्शवादी’ है। जो बिना परखे किसी बात पर विश्वास कर ले वह ‘अंधविश्वासी’ है। जो अपने कर्तव्य में लगा रहे उसे ‘कर्तव्यपरायण’ या ‘कर्तव्यनिष्ठ’ कहते हैं।

बोलने का ढंग

‘-भाषी’ और ‘-वादी’ वाले शब्द बहुत पूछे जाते हैं। जो कम और नपा-तुला बोले वह ‘मितभाषी’ (मित = नपा-तुला) है; ‘अल्पभाषी’ (अल्प = थोड़ा) भी इसी अर्थ में आता है। जो मीठा बोले वह ‘मृदुभाषी’ या ‘मिष्टभाषी’, जो कड़वा बोले वह ‘कटुभाषी’, जो सच बोले वह ‘सत्यवादी’ और जो झूठ बोले वह ‘मिथ्यावादी’ है। जो बहुत बोले उसे ‘वाचाल’ कहते हैं। जो बिना लाग-लपेट के साफ़ बात कहे वह ‘स्पष्टवक्ता’, जो बातचीत में चतुर हो वह ‘वाक्पटु’ और जो अपनी प्रशंसा आप करे वह ‘आत्मश्लाघी’ कहलाता है। ‘बहुभाषी’ पर पुस्तकें एकमत नहीं हैं: कुछ इसे ‘बहुत बोलने वाला’ लिखती हैं, जबकि आज इसका अधिकतर प्रयोग ‘कई भाषाएँ बोलने वाला’ के अर्थ में होता है; इसलिए ‘बहुत बोलने वाला’ के प्रश्न में विकल्पों में ‘वाचाल’ हो तो उसे ही चुनिए।

स्वभाव और आचरण

अच्छे आचरण वाला ‘सदाचारी’ और बुरे आचरण वाला ‘दुराचारी’ है। केवल अपना लाभ देखने वाला ‘स्वार्थी’ है और जिसमें स्वार्थ न हो वह ‘निःस्वार्थ’। जिस पर भरोसा किया जा सके वह ‘विश्वासपात्र’ और जो भरोसा तोड़े वह ‘विश्वासघाती’ है। ‘-आलु’ प्रत्यय स्वभाव या प्रवृत्ति बताता है: दयालु (दया करने वाला), कृपालु (कृपा करने वाला), श्रद्धालु (श्रद्धा रखने वाला), ईर्ष्यालु (दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाला)। ‘-इष्णु’ से सहिष्णु (सहन करने वाला) और उसका उलटा असहिष्णु बनता है; ‘-शील’ से क्षमाशील, सहनशील, प्रगतिशील। जिसे डर न लगे वह ‘निर्भीक’, डरपोक ‘भीरु’ या ‘कायर’, जिसे लज्जा न आए वह ‘निर्लज्ज’ और जिसमें दया न हो वह ‘निर्दय’ है। दूसरों के दोष ढूँढ़ने वाले को ‘छिद्रान्वेषी’ (छिद्र = दोष, अन्वेषी = खोजने वाला) कहते हैं। धन होते हुए भी खर्च न करने वाला ‘कृपण’ (कंजूस) है, और जिसके पास कुछ भी न हो वह ‘अकिंचन’।

बुद्धि और मन, बहुव्रीहि समास से

ये शब्द परीक्षा में बार-बार आते हैं और इनका विग्रह ‘जिसका, जिसकी, जिसने’ से होता है। कुशाग्रबुद्धि = कुश के अग्रभाग (नोक) जैसी तीक्ष्ण है बुद्धि जिसकी; प्रत्युत्पन्नमति = जिसकी बुद्धि मौके पर तुरंत काम करे (हाज़िरजवाब); स्थितप्रज्ञ = जिसकी बुद्धि सुख-दुख में स्थिर रहे; जितेंद्रिय = जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो; वीतराग = जिसका राग (आसक्ति) समाप्त हो गया हो; अन्यमनस्क = जिसका मन कहीं और लगा हो; आजानुबाहु = जिसकी भुजाएँ घुटनों (जानु) तक लंबी हों; दीर्घायु = लंबी है आयु जिसकी, और उलटा अल्पायु। ‘मेधावी’ (तीव्र बुद्धि वाला) और ‘प्रतिभाशाली’ (जिसमें प्रतिभा हो) प्रत्यय से बने विशेषण हैं, समास नहीं।

आयु, कुल और संबंध

बहुत समय तक जीने वाला ‘चिरंजीवी’ है। जो बालिग हो वह ‘वयस्क’, जो बालिग न हो वह ‘अवयस्क’ और समान आयु वाले ‘समवयस्क’ कहलाते हैं। अच्छे कुल में जन्मा ‘कुलीन’ है। संबंधों में पिता के पिता ‘पितामह’, माता के पिता ‘मातामह’, पिता के दादा ‘प्रपितामह’, सौतेली माँ ‘विमाता’ और गोद लिया हुआ पुत्र ‘दत्तक’ कहलाता है। विद्वान स्त्री को ‘विदुषी’ कहते हैं; ‘विद्वानी’ अशुद्ध रूप है।

उलटे जोड़े और सावधानी

इस वर्ग के लगभग हर शब्द का विलोम भी होता है और प्रश्न में वही विकल्प बनकर आता है: आस्तिक-नास्तिक, सदाचारी-दुराचारी, स्वार्थी-निःस्वार्थ, सहिष्णु-असहिष्णु, आशावादी-निराशावादी, वयस्क-अवयस्क, विश्वासपात्र-विश्वासघाती। इसलिए पहले देखिए कि वाक्यांश में ‘न’ या ‘नहीं’ है या नहीं। ‘मितभाषी’ और ‘मितव्ययी’ में ‘मित’ का अर्थ ‘नपा-तुला’ है, ‘कंजूस’ नहीं; कंजूस के लिए ‘कृपण’ है। ‘अजातशत्रु’ का अर्थ है जिसका कोई शत्रु पैदा ही न हुआ हो; इसे ‘जिसने सब शत्रुओं को जीत लिया हो’ समझना आम भूल है। बहुव्रीहि शब्दों का पूरा विग्रह याद रखिए, केवल एक पद देखकर उत्तर न चुनिए।

मुख्य तथ्य

  • जो ईश्वर में विश्वास रखे → आस्तिक; जो विश्वास न रखे → नास्तिक (अस्ति/नास्ति + इक; आस्तिक में पहला स्वर अ से आ)।
  • कम और नपा-तुला बोलने वाला → मितभाषी (अल्पभाषी भी); बहुत बोलने वाला → वाचाल; मीठा बोलने वाला → मृदुभाषी; कड़वा बोलने वाला → कटुभाषी।
  • साफ़-साफ़ कहने वाला → स्पष्टवक्ता; बातचीत में चतुर → वाक्पटु; अपनी प्रशंसा आप करने वाला → आत्मश्लाघी।
  • जिसका कोई शत्रु न जन्मा हो → अजातशत्रु (बहुव्रीहि); इसका अर्थ ‘सब शत्रुओं को जीतने वाला’ नहीं है।
  • कुश की नोक जैसी तीक्ष्ण बुद्धि वाला → कुशाग्रबुद्धि; जिसकी बुद्धि मौके पर तुरंत काम करे → प्रत्युत्पन्नमति; जिसकी बुद्धि स्थिर हो → स्थितप्रज्ञ।
  • जिसने इंद्रियों को जीत लिया हो → जितेंद्रिय; जिसकी आसक्ति मिट गई हो → वीतराग; जिसका मन कहीं और लगा हो → अन्यमनस्क।
  • दूसरों के दोष ढूँढ़ने वाला → छिद्रान्वेषी; दूसरों की उन्नति से जलने वाला → ईर्ष्यालु; सहन करने वाला → सहिष्णु।
  • धन होते हुए भी खर्च न करने वाला → कृपण; सोच-समझकर खर्च करने वाला → मितव्ययी; जिसके पास कुछ न हो → अकिंचन।
  • जिसकी भुजाएँ घुटनों तक हों → आजानुबाहु; समान आयु वाले → समवयस्क; सौतेली माँ → विमाता; गोद लिया पुत्र → दत्तक; विद्वान स्त्री → विदुषी।

एक नज़र में दोहराव

व्यक्ति-वाचक शब्द प्रत्यय (-ई, -इक, -वान/-मान, -शील, -आलु, -इष्णु, -वी), उपसर्ग या उपसर्ग-जैसे शब्द (सत्, दुर्, निर्) और बहुव्रीहि से बनते हैं; आस्तिक-नास्तिक (अस्ति + इक); मितभाषी/अल्पभाषी, वाचाल, मृदुभाषी, कटुभाषी, स्पष्टवक्ता, वाक्पटु, आत्मश्लाघी; कुशाग्रबुद्धि, प्रत्युत्पन्नमति, स्थितप्रज्ञ, जितेंद्रिय, वीतराग, अन्यमनस्क, आजानुबाहु, अजातशत्रु (शत्रु जन्मा ही न हो); छिद्रान्वेषी, ईर्ष्यालु, सहिष्णु, निर्भीक, भीरु; कृपण कंजूस है, मितव्ययी नहीं; पितामह, मातामह, विमाता, दत्तक, विदुषी।

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