41 में से पाठ 28 · वाक्य शुद्धि और वर्तनी
लिंग, वचन और कारक की अशुद्धियाँ
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
वाक्य में मेल का नियम
हिंदी वाक्य के शब्द आपस में बँधे रहते हैं। विशेषण अपने विशेष्य से, संबंध कारक के ‘का, की, के’ अपने बाद आने वाली संज्ञा से, और क्रिया अपने कर्ता या कर्म से लिंग, वचन और पुरुष में मेल खाती है। इसलिए किसी एक संज्ञा का लिंग या वचन गलत समझ लेने पर भूल पूरे वाक्य में फैल जाती है: ‘मेरा पुस्तक खो गया’ में ‘मेरा’ और ‘गया’ दोनों अशुद्ध हैं, शुद्ध है ‘मेरी पुस्तक खो गई’। हिंदी में दो ही लिंग हैं, पुल्लिंग और स्त्रीलिंग; संस्कृत का नपुंसक लिंग हिंदी में नहीं है। ध्यान रहे कि तत्सम शब्द भी हिंदी में सदा संस्कृत वाला लिंग नहीं रखते: संस्कृत में ‘पुस्तक’ नपुंसक और ‘आत्मा’ पुल्लिंग है, पर हिंदी में दोनों स्त्रीलिंग हैं (‘मेरी पुस्तक’, ‘उसकी आत्मा’)। इसलिए लिंग का निर्णय हिंदी के प्रयोग से होता है, शब्द के मूल से नहीं।
जिन संज्ञाओं का लिंग धोखा देता है
स्त्रीलिंग शब्द जिन्हें प्रायः पुल्लिंग मान लिया जाता है: आग, आत्मा, आयु, वायु, ऋतु, वस्तु, मृत्यु, देह, संतान, सरकार, पुलिस, जनता, भीड़, सड़क, पुस्तक, बर्फ़, सलाह, सुबह, शाम, भूख, प्यास। पुल्लिंग शब्द जिन्हें प्रायः स्त्रीलिंग मान लिया जाता है: पानी, घी, दही, मोती, आँसू, हस्ताक्षर, प्राण, सवेरा, व्यक्ति, अतिथि, कवि, शत्रु, पक्षी, हाथी। एक ही समय के दो शब्दों का लिंग अलग है: ‘सुबह हो गई’ पर ‘सवेरा हो गया’। ‘दही खट्टा है’ शुद्ध है, ‘दही खट्टी है’ अशुद्ध; ‘पुलिस आ गई’, ‘सरकार ने घोषणा की’, ‘उसकी आयु बीस वर्ष की है’, ‘ठंडी वायु चल रही है’, ‘मुझे भूख लगी है’ शुद्ध हैं (संस्कृत और कुछ पुराने प्रयोगों में ‘वायु’ पुल्लिंग है, पर परीक्षा में इसे स्त्रीलिंग मानिए)। कुछ समूह याद रखिए: भाषाओं, नदियों और तिथियों के नाम प्रायः स्त्रीलिंग होते हैं (हिंदी, गंगा, एकादशी), पर ‘ब्रह्मपुत्र’ पुल्लिंग है; पर्वतों, देशों, दिनों और ग्रहों के नाम प्रायः पुल्लिंग होते हैं (हिमालय, भारत, सोमवार, मंगल), पर ‘पृथ्वी’ स्त्रीलिंग है। कुछ प्राणी-नाम नित्य स्त्रीलिंग हैं (कोयल, मैना, चील, मक्खी) और कुछ नित्य पुल्लिंग (कौआ, उल्लू, भेड़िया, खटमल); इनका दूसरा लिंग ‘नर’ या ‘मादा’ जोड़कर बताया जाता है: नर कोयल, मादा भेड़िया।
लिंग की भूलें वाक्य में
‘का, की, के’ अपने से पहले वाली संज्ञा से नहीं, बाद वाली से मेल खाते हैं: ‘राम का बहन’ अशुद्ध है, ‘राम की बहन’ शुद्ध; ‘सीता के भाई आया’ अशुद्ध है, ‘सीता का भाई आया’ शुद्ध। ‘उसकी आत्मा काँप उठा’ अशुद्ध है, ‘काँप उठी’ शुद्ध; ‘पुलिस चोर को पकड़ ले गया’ के स्थान पर ‘पकड़ ले गई’। विशेषणों में प्रायः आकारांत विशेषण ही लिंग और वचन के साथ बदलते हैं (अच्छा लड़का, अच्छी लड़की, अच्छे लड़के), यद्यपि ‘बढ़िया’ जैसे कुछ आकारांत भी नहीं बदलते; सुंदर, लाल, चतुर, ईमानदार जैसे विशेषण नहीं बदलते (सुंदर लड़का, सुंदर लड़की)। स्त्रीलिंग बहुवचन में भी विशेषण ‘ई’ पर ही रहता है: ‘अच्छी लड़कियाँ’, ‘बड़ी इमारतें’। जब भिन्न लिंगों के प्राणिवाचक कर्ता ‘और’ से जुड़े हों, तो क्रिया पुल्लिंग बहुवचन होती है: ‘माता और पिता आए’, ‘भाई और बहन खेल रहे हैं’।
वचन की भूलें
कुछ शब्द आदर या प्रयोग के कारण प्रायः बहुवचन में ही चलते हैं: प्राण, दर्शन, हस्ताक्षर, होश, आँसू, लोग, दाम (‘बाल’ भी प्रायः बहुवचन में आता है, पर ‘एक बाल’ शुद्ध है)। इसलिए ‘मुझे आपका दर्शन हुआ’ अशुद्ध है, ‘मुझे आपके दर्शन हुए’ शुद्ध; ‘शेर को देखकर उसके होश उड़ गया’ के स्थान पर ‘होश उड़ गए’; ‘यहाँ अपना हस्ताक्षर कीजिए’ के स्थान पर ‘अपने हस्ताक्षर कीजिए’। पर ‘दर्शन’ का अर्थ जब शास्त्र हो, तब वह एकवचन है: ‘भारतीय दर्शन बहुत प्राचीन है’। कुछ शब्द एकवचन में ही चलते हैं: समूहवाचक जनता और भीड़; द्रव्यवाचक पानी, दूध, घी, सोना, चाँदी; तथा सामान और आकाश। ‘जनता मेले में आए’ अशुद्ध है, ‘जनता मेले में आई’ शुद्ध। संख्या के बाद संज्ञा बहुवचन होती है: ‘दस रुपया’ नहीं, ‘दस रुपये’; ‘चार पुस्तक’ नहीं, ‘चार पुस्तकें’। इसके विपरीत ‘प्रत्येक’, ‘हर’ और ‘हर एक’ के साथ संज्ञा और क्रिया एकवचन रहती हैं: ‘प्रत्येक छात्रों को’ नहीं, ‘प्रत्येक छात्र को’; ‘प्रत्येक व्यक्ति अपना काम करते हैं’ नहीं, ‘करता है’। ‘गण’, ‘वृंद’, ‘जन’ और ‘वर्ग’ स्वयं बहुवचन बनाते हैं (छात्रगण, गुरुजन), इसलिए ‘सब छात्रगण आए’ में ‘सब’ अनावश्यक है।
‘ने’ कहाँ लगता है और कहाँ नहीं
‘ने’ केवल सकर्मक क्रिया के उन भूतकालिक रूपों में आता है जो भूतकालिक कृदंत से बनते हैं: सामान्य भूत (उसने खाया), आसन्न भूत (उसने खाया है), पूर्ण भूत (उसने खाया था), संदिग्ध भूत (उसने खाया होगा) और हेतुहेतुमद् भूत (यदि उसने खाया होता)। अपूर्ण भूत (वह खा रहा था, वह खाता था), वर्तमान और भविष्यत् में ‘ने’ नहीं आता: ‘मैंने कल पत्र लिखूँगा’ अशुद्ध है, ‘मैं कल पत्र लिखूँगा’ शुद्ध। अकर्मक क्रिया के साथ ‘ने’ नहीं आता: ‘उसने हँसा’, ‘मैंने सोया’ के स्थान पर ‘वह हँसा’, ‘मैं सोया’; छींकना, खाँसना और थूकना इसके अपवाद हैं (उसने छींका)। कुछ सकर्मक क्रियाओं के साथ भी ‘ने’ नहीं आता: लाना (‘वह पुस्तक लाया’) और भूलना (‘मैं उसका नाम भूल गया’)। ‘बोलना’ बिना कर्म के ‘ने’ नहीं लेता (‘वह बोला’), पर कर्म होने पर लेता है (‘उसने सच बोला’)। संयुक्त क्रिया में प्रायः अंतिम क्रिया निर्णय करती है: वह सकर्मक हो तो ‘ने’ (‘उसने खाना खा लिया’, ‘उसने पत्र लिख दिया’, ‘उसने आत्महत्या कर ली’), और अकर्मक हो या ‘चुकना’, ‘सकना’ हो तो ‘ने’ नहीं (‘वह खाना खा गया’, ‘वह खाना खा चुका’, ‘मैं यह काम कर सका’)।
अन्य परसर्गों की भूलें
सर्वनाम के साथ ‘मेरे को’, ‘तेरे को’, ‘हमारे को’, ‘मेरे से’, ‘मेरे में’ अशुद्ध हैं; शुद्ध रूप हैं मुझे या मुझको, तुझे, हमें, मुझसे, मुझमें। ‘चाहिए’, ‘पड़ना’ और कर्तव्य बताने वाले ‘है’ के साथ कर्ता ‘को’ लेता है: ‘मैं जाना चाहिए’ नहीं, ‘मुझे जाना चाहिए’; ‘वह जाना पड़ा’ नहीं, ‘उसे जाना पड़ा’। कुछ क्रियाएँ अपना परसर्ग साथ लाती हैं। ‘से’ लेने वाली: कहना, पूछना (‘उसने मुझसे पूछा’), डरना (‘वह कुत्ते से डरता है’, ‘कुत्ते को डरता’ नहीं), प्रार्थना करना (‘ईश्वर से प्रार्थना’) और मिलना जब उसका अर्थ भेंट करना हो (‘मैं कल उससे मिला’; ‘मुझे रास्ते में पर्स मिला’ में अर्थ पाना है)। ‘पर’ लेने वाले भाव: विश्वास, दया, उपकार, क्रोध, गर्व, निर्भर (‘मुझ पर विश्वास करो’, ‘उस पर दया करो’, ‘मुझे अपने देश पर गर्व है’); ‘उसने मुझसे दया की’ अशुद्ध है। सतह पर होने के लिए ‘पर’, भीतर होने के लिए ‘में’: ‘बंदर पेड़ में चढ़ गया’ अशुद्ध है, ‘पेड़ पर चढ़ गया’ शुद्ध।
परीक्षा के जाल
पहला जाल ‘ने’ वाले वाक्य में क्रिया को कर्ता से मिलाना है; ‘सीता ने केले खाई’ में ‘सीता’ देखकर स्त्रीलिंग क्रिया लगाना भूल है, क्योंकि यहाँ क्रिया कर्म ‘केले’ से चलती है: ‘सीता ने केले खाए’। दूसरा, धोखा देने वाली संज्ञाएँ: दही, मोती, आँसू, सवेरा पुल्लिंग; आयु, आत्मा, पुलिस, भूख स्त्रीलिंग। तीसरा, नित्य बहुवचन शब्दों (दर्शन, हस्ताक्षर, प्राण, होश) को एकवचन मान लेना और समूहवाचक शब्दों (जनता, भीड़) को बहुवचन। चौथा, ‘प्रत्येक’ के बाद बहुवचन संज्ञा। पाँचवाँ, ‘सकना’ और ‘चुकना’ वाले वाक्यों में ‘ने’ लगा देना। छठा, क्रिया के साथ जाने वाला परसर्ग बदल देना: ‘मुझे कहा’, ‘कुत्ते को डरना’, ‘मुझसे दया’।
मुख्य तथ्य
- ‘दही खट्टी है।’ → ‘दही खट्टा है।’; ‘सुबह हो गया।’ → ‘सुबह हो गई।’ (पर ‘सवेरा हो गया’ शुद्ध है)।
- ‘पुलिस चोर को पकड़ ले गया।’ → ‘पुलिस चोर को पकड़ ले गई।’; ‘उसकी आयु बीस वर्ष का है।’ → ‘उसकी आयु बीस वर्ष की है।’
- ‘उसकी आत्मा काँप उठा।’ → ‘उसकी आत्मा काँप उठी।’; ‘आज ठंडा वायु चल रहा है।’ → ‘आज ठंडी वायु चल रही है।’
- ‘मुझे आपका दर्शन हुआ।’ → ‘मुझे आपके दर्शन हुए।’; पर ‘भारतीय दर्शन बहुत प्राचीन है’ में दर्शन (शास्त्र) एकवचन है।
- ‘प्रत्येक छात्रों को पुस्तक मिली।’ → ‘प्रत्येक छात्र को पुस्तक मिली।’; ‘जनता मेले में आए।’ → ‘जनता मेले में आई।’
- ‘मुझे दस रुपया चाहिए।’ → ‘मुझे दस रुपये चाहिए।’; ‘सब छात्रगण आए।’ → ‘सब छात्र आए।’ या ‘छात्रगण आए।’
- ‘मैंने कल पत्र लिखूँगा।’ → ‘मैं कल पत्र लिखूँगा।’; ‘उसने हँसा।’ → ‘वह हँसा।’; ‘मैंने यह काम कर सका।’ → ‘मैं यह काम कर सका।’
- ‘वह खाना खा लिया।’ → ‘उसने खाना खा लिया।’ (अंतिम क्रिया ‘लेना’ सकर्मक); ‘उसने खाना खा चुका।’ → ‘वह खाना खा चुका।’
- ‘मेरे को नींद आ रही है।’ → ‘मुझे नींद आ रही है।’; ‘मेरे से भूल हो गई।’ → ‘मुझसे भूल हो गई।’; ‘मैं जाना चाहिए।’ → ‘मुझे जाना चाहिए।’
- ‘वह कुत्ते को डरता है।’ → ‘वह कुत्ते से डरता है।’; ‘उसने मुझसे दया की।’ → ‘उसने मुझ पर दया की।’; ‘बंदर पेड़ में चढ़ गया।’ → ‘बंदर पेड़ पर चढ़ गया।’
एक नज़र में दोहराव
का/की/के बाद वाली संज्ञा से मेल खाते हैं; आग, आत्मा, आयु, वायु, पुलिस, सरकार, जनता, सुबह, भूख स्त्रीलिंग; दही, मोती, आँसू, सवेरा, व्यक्ति पुल्लिंग; प्राण, दर्शन, हस्ताक्षर, होश बहुवचन; जनता, भीड़, सामान एकवचन; प्रत्येक के साथ एकवचन; संख्या के बाद बहुवचन (दस रुपये); ‘ने’ केवल सकर्मक के भूतकालिक कृदंत वाले रूपों में, लाना, भूलना, सकना, चुकना के साथ नहीं; मुझे जाना चाहिए; मुझसे कहा, कुत्ते से डरना, मुझ पर दया, पेड़ पर चढ़ना।