41 में से पाठ 27 · वाक्य शुद्धि और वर्तनी
वर्तनी की अशुद्धियाँ (2): र के रूप, श-ष-स, ण-न, ब-व, क्ष-छ, हलंत और संयुक्ताक्षर
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
र के रूप
देवनागरी में र कई तरह से लिखा जाता है, और वर्तनी के बहुत-से प्रश्न इन्हीं पर बनते हैं। जब र स्वर-रहित होकर अपने बाद वाले व्यंजन से पहले बोला जाता है, तो वह रेफ बनकर उस व्यंजन के ऊपर लगता है: कर्म, धर्म, सूर्य, कार्य, पूर्ण, निर्माण। रेफ जिस वर्ण के ऊपर लगता है, उच्चारण में र ठीक उसी से पहले आता है; ‘आ-शीर्-वाद’ बोलने पर ‘आशीर्वाद’ लिखा जाएगा, ‘आर्शीवाद’ नहीं। इसी तर्क से अंतर्धान (अंतर्ध्यान नहीं), पुनर्जन्म, निर्दोष, आर्द्र, पूर्णिमा और सौहार्द (सौहार्द्र नहीं) लिखे जाते हैं। जब र किसी व्यंजन के बाद बोला जाता है, तो वह उस व्यंजन के नीचे तिरछी रेखा बनकर लगता है, जिसे पदेन र कहते हैं: प्रकाश, क्रम, ग्राम, श्रम, द्रव, व्रत; ट और ड के नीचे यह छोटे कोण के आकार में लगता है: राष्ट्र, ट्रक, ड्रामा। ऋ की मात्रा (ृ) र नहीं बल्कि एक स्वर है: कृपा, गृह, हृदय, पृथ्वी, दृष्टि, मृत्यु।
ऋ और र का भ्रम
क् + र + इ से ‘क्रिया’ बनता है और क + ऋ से ‘कृपा’; इन्हें आपस में बदलने पर ‘कृया’ या ‘क्रपा’ जैसे अशुद्ध रूप बनते हैं। अर्थ बदलने वाली जोड़ियाँ: ‘गृह’ (घर; गृहस्थ, गृहिणी) और ‘ग्रह’ (नवग्रह, ग्रहण); ‘हृदय’ में ह + ऋ पर ‘ह्रास’ (कमी) में ह् + र; इसी तरह प्रकृति और प्रक्रिया, दृश्य और द्रव्य, वृक्ष और व्रत। ‘शृंगार’ और ‘शृंखला’ में श + ऋ है, इसलिए ‘श्रृंगार’ अशुद्ध है, जबकि श्रम, श्रद्धा और आश्रम में श् + र है। सबसे अधिक पूछा जाने वाला जाल ‘स्र’ और ‘स्त्र’ का है: ‘स्रोत’ और ‘सहस्र’ में केवल स् + र है, इसलिए ‘स्त्रोत’ और ‘सहस्त्र’ अशुद्ध हैं; जबकि स्त्री, अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र और शास्त्र में सचमुच स् + त् + र है। ऋषि, ऋण और ऋतु आरंभ में ऋ स्वर से लिखे जाते हैं, और ‘सृष्टि’ को ‘श्रृष्टि’ लिखना दोहरी भूल है।
श, ष और स
बोलचाल में ष प्रायः श की तरह बोला जाता है, इसलिए भूलें होती हैं; ष लगभग केवल तत्सम शब्दों में आता है। संस्कृत के संधि-नियमों से तीन काम की बातें निकलती हैं। तत्सम शब्दों में ट और ठ से ठीक पहले ष आता है: कष्ट, स्पष्ट, दृष्टि, षष्ठी, निष्ठा, प्रतिष्ठा, श्रेष्ठ; ध्यान रहे कि ‘षष्ठी’ में ष्ठ है, ‘षष्टी’ अशुद्ध है। च और छ से पहले श आता है: पश्चिम, पश्चात्, निश्चय, निश्छल। त और थ से पहले स आता है: अस्त, स्थान, स्वस्थ, पुस्तक। इ या उ पर समाप्त होने वाले उपसर्ग के बाद स प्रायः ष हो जाता है (निषेध, अभिषेक, विषम, अनुष्ठान), पर ‘अनुसार’, ‘विस्मरण’ जैसे अपवाद भी हैं, इसलिए इसे पक्का नियम न मानें। जिन शब्दों में भूल आम है: विशेष (विषेश नहीं), प्रशंसा (प्रसंशा नहीं), शासन, शीर्षक, विश्लेषण, आकर्षण, अभिलाषा, शुश्रूषा, श्मशान (शमशान नहीं), षड्यंत्र।
ण और न
हिंदी का कोई शब्द ण से आरंभ नहीं होता। संस्कृत का णत्व नियम है कि ऋ, र या ष के बाद आने वाला न, ण बन जाता है, और यह परिवर्तन तब भी होता है जब दोनों के बीच कोई स्वर, क-वर्ग, प-वर्ग, य, व, ह या अनुस्वार हो: ऋण, कृष्ण, विष्णु, भूषण, कारण, ग्रहण, रामायण, प्रमाण, परिणाम, अर्पण, निर्माण, आदरणीय, स्मरणीय। क्ष में भी ष छिपा है, इसलिए लक्षण, शिक्षण, निरीक्षण में ण आता है। पर यदि बीच में च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग, श, स या ल आ जाए, तो न बना रहता है: अर्चना, रचना, गर्जन, अर्जुन, दर्शन, प्रार्थना, रत्न, प्रयत्न। इसी कारण ‘आदरणीय’ और ‘स्मरणीय’ में ण है, पर ‘दर्शनीय’ में न, क्योंकि वहाँ र और न के बीच श है। यह नियम तत्सम शब्दों पर लगता है; तद्भव और ठेठ हिंदी शब्दों में न ही रहता है: करना, मरना, रानी, पुराना। तत्सम ‘कर्ण’ से तद्भव ‘कान’ और ‘स्वर्ण’ से ‘सोना’ बनना इसी का उदाहरण है।
ब और व
बोलचाल में ब और व का भेद प्रायः मिट जाता है, पर लिखने में यह अर्थ बदल देता है: ‘वात’ (वायु) और ‘बात’ (कथन), ‘वाद’ (विवाद, सिद्धांत) और ‘बाद’ (पश्चात्), ‘वार’ (आक्रमण, सप्ताह का दिन) और ‘बार’ (दफ़ा), ‘वहन’ (ढोना) और ‘बहन’ (भगिनी), ‘वन’ (जंगल) और ‘बन’ (बनना से)। इसलिए ‘वह दो वार आया’ अशुद्ध है, ‘दो बार आया’ शुद्ध; ‘उसने भार का बहन किया’ अशुद्ध है, ‘भार का वहन किया’ शुद्ध। व वाले शब्द जिन्हें प्रायः ब से लिखा जाता है: वाल्मीकि (बाल्मीकि नहीं), वीणा, विश्व, विवश, व्यंग्य (ब्यंग्य या व्यंग नहीं), वृद्ध, व्यवहार, वसुधा। ब वाले शब्द जिन्हें प्रायः व से लिखा जाता है: बिंदु (विंदु नहीं), बृहस्पति (वृहस्पति नहीं), बुद्धि, बंधु, ब्राह्मण।
क्ष, छ, ज्ञ और ग्य
‘क्ष’ संयुक्ताक्षर है, जिसमें क् और ष मिले हैं; बोलचाल में यह ‘छ’ जैसा सुनाई देता है, पर लिखा क्ष ही जाता है: क्षमा, क्षेत्र, क्षत्रिय, क्षीण, क्षुधा, कक्षा, शिक्षा, रक्षा, वृक्ष, अध्यक्ष, साक्षी, लक्षण, दक्षिण। ‘छमा’, ‘छेत्र’, ‘छत्रिय’ अशुद्ध हैं। उलटी भूल भी होती है: छात्र, छाया, छत्र (छाता), इच्छा, स्वच्छ और तुच्छ में छ ही है, क्ष नहीं। ‘ज्ञ’ में ज् और ञ मिले हैं, यद्यपि हिंदी में इसका उच्चारण प्रायः ‘ग्य’ जैसा होता है: ज्ञान, यज्ञ, आज्ञा, संज्ञा, प्रतिज्ञा, विज्ञान, कृतज्ञ, सर्वज्ञ। इनके विपरीत योग्य, भाग्य, आरोग्य, वैराग्य और अयोग्य में सचमुच ग् + य है, इसलिए इन्हें ज्ञ से नहीं लिखा जाता। ‘कृतघ्न’ को ‘कृतघ्नी’ लिखना भी अशुद्ध है।
हलंत, संधि और ह वाले संयुक्ताक्षर
स्वर-रहित व्यंजन का चिह्न हलंत (्) तत्सम शब्दों में लिखा जाता है: जगत्, पश्चात्, अर्थात्, साक्षात्, विद्युत्; पर निदेशालय के अनुसार जिन शब्दों में हिंदी में हल् चिह्न लुप्त हो चुका है, जैसे महान और विद्वान, उनमें इसे फिर लगाने की आवश्यकता नहीं। हलंत वाले शब्द संधि में रूप बदलते हैं, और यहीं अशुद्धियाँ बनती हैं: सत् + उपदेश = सदुपदेश (सदोपदेश नहीं), तत् + उपरांत = तदुपरांत (तदोपरांत नहीं), उत् + ज्वल = उज्ज्वल, उत् + लंघन = उल्लंघन (उलंघन नहीं); इसी प्रकार पुनः + उक्ति = पुनरुक्ति, दुः + अवस्था = दुरवस्था (दुरावस्था नहीं)। ह से बने संयुक्ताक्षरों में अक्षरों का क्रम उलट देना आम भूल है: चिह्न (चिन्ह नहीं), ब्रह्मा, ब्राह्मण (ब्राम्हण नहीं), आह्वान (आव्हान नहीं), जिह्वा (जिव्हा नहीं), आह्लाद, मध्याह्न और अपराह्न (मध्यान्ह नहीं)। दोहरे और संयुक्त वर्ण वाले शब्द: महत्त्व (महत् + त्व), तत्त्व (तत् + त्व), द्वंद्व, अध्ययन (अध्यन नहीं), स्वास्थ्य, ज्योत्स्ना, साम्राज्य (सम्राज्य नहीं)।
सामान्यतः अशुद्ध लिखे जाने वाले शब्द और हल करने का क्रम
ऊपर के शब्दों के अतिरिक्त ये भी बार-बार पूछे जाते हैं: पुरस्कार (पुरुस्कार नहीं), आगामी (अगामी नहीं), अंत्याक्षरी (अंताक्षरी नहीं), निरपराध (निरपराधी नहीं), धूम्रपान (धुम्रपान नहीं), प्रशंसा (प्रसंशा नहीं)। वर्तनी के प्रश्न में चारों विकल्प साथ रखकर पहले रेफ और पदेन र की जगह देखिए, फिर स्र और स्त्र, फिर ह वाले संयुक्ताक्षर, और अंत में श-ष-स तथा ण-न; प्रायः पहले दो-तीन चरणों में ही उत्तर मिल जाता है। ‘महत्व’ रूप भी बहुत प्रचलित है; विकल्पों में ‘महत्त्व’ हो तो वही मानक है, पर केवल ‘महत्व’ हो तो उसे अशुद्ध मानने से पहले बाकी विकल्प देख लीजिए।
मुख्य तथ्य
- रेफ का स्थान उच्चारण से: आशीर्वाद (आर्शीवाद नहीं), अंतर्धान (अंतर्ध्यान नहीं), सौहार्द (सौहार्द्र नहीं), पूर्णिमा, आर्द्र, निर्माण।
- ऋ और र: गृह (घर) / ग्रह (नवग्रह), हृदय / ह्रास, कृपा / क्रिया, शृंगार और शृंखला शुद्ध; श्रृंगार, कृया, श्रृष्टि अशुद्ध।
- स्र और स्त्र: स्रोत, सहस्र शुद्ध, स्त्रोत, सहस्त्र अशुद्ध; पर स्त्री, अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र, शास्त्र में स् + त् + र है।
- श-ष-स: ट/ठ से पहले ष (कष्ट, षष्ठी, श्रेष्ठ), च/छ से पहले श (पश्चिम, निश्चय, निश्छल), त/थ से पहले स (अस्त, स्थान); विशेष, प्रशंसा, श्मशान शुद्ध।
- णत्व: ऋ, र, ष के बाद न का ण (ऋण, कारण, प्रमाण, रामायण, आदरणीय, लक्षण); बीच में च/ट/त-वर्ग, श, स, ल हो तो न (अर्चना, दर्शन, दर्शनीय, प्रार्थना, रत्न)।
- ब/व के अर्थ-भेद: वात / बात, वाद / बाद, वार / बार, वहन / बहन, वन / बन; वाल्मीकि, व्यंग्य, बिंदु, बृहस्पति शुद्ध।
- क्ष और ज्ञ: क्षमा, क्षेत्र, क्षत्रिय, शिक्षा (छमा, छेत्र नहीं); छात्र, इच्छा, स्वच्छ में छ; ज्ञान, यज्ञ, आज्ञा में ज्ञ, पर योग्य, भाग्य, आरोग्य में ग्य।
- ह वाले संयुक्ताक्षर: चिह्न, ब्रह्मा, ब्राह्मण, आह्वान, जिह्वा, आह्लाद, मध्याह्न, अपराह्न शुद्ध; चिन्ह, ब्रम्हा, आव्हान, जिव्हा, मध्यान्ह अशुद्ध।
- संधि से बनी वर्तनी: सदुपदेश, तदुपरांत, उज्ज्वल, उल्लंघन, पुनरुक्ति, दुरवस्था शुद्ध; सदोपदेश, तदोपरांत, उज्वल, उलंघन, पुनरोक्ति, दुरावस्था अशुद्ध।
- अन्य: पुरस्कार, आगामी, अंत्याक्षरी, निरपराध, कृतघ्न, धूम्रपान, षष्ठी, साम्राज्य, अध्ययन, स्वास्थ्य, महत्त्व, द्वंद्व शुद्ध रूप हैं।
एक नज़र में दोहराव
रेफ उच्चारण-क्रम से: आशीर्वाद, अंतर्धान, सौहार्द; पदेन र: प्रकाश, राष्ट्र; ऋ स्वर: कृपा, गृह, हृदय, शृंगार; गृह/ग्रह, हृदय/ह्रास; स्रोत, सहस्र (स्त्रोत नहीं); ट/ठ से पहले ष, च/छ से पहले श, त/थ से पहले स; ऋ, र, ष के बाद ण (कारण, प्रमाण, आदरणीय), बीच में च/ट/त-वर्ग, श, स, ल हो तो न (दर्शन, प्रार्थना); वात/बात, वाद/बाद, वहन/बहन; क्षमा, क्षेत्र; ज्ञान पर योग्य; चिह्न, ब्राह्मण, आह्वान, मध्याह्न; सदुपदेश, उज्ज्वल, पुनरुक्ति; पुरस्कार, आगामी, महत्त्व।