41 में से पाठ 16 · मुहावरे और लोकोक्तियाँ

प्रसिद्ध लोकोक्तियाँ (भाग 1): अर्थ और वाक्य-प्रयोग सहित

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

दिखावे और घमंड की लोकोक्तियाँ

लोकोक्ति किसी छोटी कहानी या जीवन-स्थिति का सार होती है, इसलिए पहले उसका चित्र मन में बनाइए, फिर अर्थ जोड़िए; नीचे हर लोकोक्ति के साथ अर्थ और ऐसा वाक्य है जिसमें वह ज्यों-की-त्यों आती है। अधजल गगरी छलकत जाय (कम ज्ञान या धन वाला अधिक दिखावा करता है); आधा भरा घड़ा चलते समय छलकता है, पूरा भरा नहीं: चार किताबें पढ़कर वह सबको उपदेश देता फिरता है, अधजल गगरी छलकत जाय। थोथा चना बाजे घना (गुणहीन व्यक्ति अधिक शोर करता है): जिसने कभी बल्ला नहीं पकड़ा, वही क्रिकेट पर सबसे ज़्यादा बोलता है; थोथा चना बाजे घना। ऊँची दुकान फीका पकवान (बाहर सजावट या बड़ा नाम, भीतर गुण कम): शहर के सबसे महँगे होटल का खाना बेस्वाद निकला, ऊँची दुकान फीका पकवान। नाम बड़े और दर्शन छोटे (प्रसिद्धि बहुत, वास्तविकता कम): जिस विद्वान की इतनी चर्चा थी, वह एक प्रश्न का उत्तर न दे सका; नाम बड़े और दर्शन छोटे। आँख का अंधा नाम नयनसुख (नाम के विपरीत गुण): नाम तो वीर सिंह है, पर चूहे से डरता है; आँख का अंधा नाम नयनसुख। हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और (कहना कुछ, करना कुछ): नेता जी मंच पर सादगी का उपदेश देते हैं और घर में ठाट-बाट से रहते हैं; हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और।

लाभ और लालच की लोकोक्तियाँ

आम के आम गुठलियों के दाम (दोहरा लाभ; एक ही वस्तु से दो लाभ): पुरानी किताबें बेचकर पैसे भी मिले और अलमारी भी खाली हो गई, आम के आम गुठलियों के दाम। एक पंथ दो काज (एक प्रयत्न से दो काम): दिल्ली जाकर परीक्षा भी दे आया और मौसी से भी मिल आया, एक पंथ दो काज। नौ नकद न तेरह उधार (भविष्य के बड़े लाभ से तुरंत का थोड़ा लाभ अच्छा): दुकानदार ने उधार के बड़े सौदे के बदले नकद में कम दाम पर माल बेच दिया, क्योंकि नौ नकद न तेरह उधार। आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे (अधिक के लालच में हाथ का भी चला जाता है): पक्की नौकरी छोड़कर झटपट अमीर बनने की योजना में पैसा लगाया और दोनों खो बैठा; आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे। बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा (बिना प्रयत्न संयोग से मनचाही वस्तु मिल जाना): मैं टिकट के लिए परेशान था कि मित्र की यात्रा रद्द हुई और उसने अपना टिकट मुझे दे दिया, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा। अंधा क्या चाहे दो आँखें (जो चाहिए वही मिल जाना): भूखे यात्री को किसी ने भोजन पर बुलाया तो वह मन में बोला, अंधा क्या चाहे दो आँखें।

दोष और बहाने की लोकोक्तियाँ

उलटा चोर कोतवाल को डाँटे (दोषी उलटे निर्दोष पर दोष लगाए): गलत दिशा से गाड़ी चलाकर टक्कर मारने वाला ही हमें दोषी बताने लगा; उलटा चोर कोतवाल को डाँटे। चोर की दाढ़ी में तिनका (दोषी स्वयं शंकित रहता है): चोरी की बात छिड़ते ही नौकर बिना पूछे सफ़ाई देने लगा, चोर की दाढ़ी में तिनका। नाच न जाने आँगन टेढ़ा (अपनी अयोग्यता का दोष साधन या परिस्थिति पर डालना): सुंदर लिख नहीं पाता तो कलम को दोष देता है; नाच न जाने आँगन टेढ़ा। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे (लज्जित या असफल होकर क्रोध दूसरों पर उतारना): मैच हारकर कप्तान अंपायर पर बरस पड़ा, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। अंगूर खट्टे हैं (न मिल पाने पर वस्तु को ही बुरा बताना): चयन न होने पर बोला कि वह नौकरी तो वैसे भी अच्छी नहीं थी; अंगूर खट्टे हैं। चोर-चोर मौसेरे भाई (एक जैसे बुरे लोग आपस में मिल जाते हैं): ठेकेदार और भ्रष्ट बाबू ने मिलकर सड़क का पैसा खा लिया, चोर-चोर मौसेरे भाई।

शक्ति, संगति और विश्वासघात की लोकोक्तियाँ

जिसकी लाठी उसकी भैंस (शक्तिशाली की ही चलती है): गाँव के दबंग ने गरीब का खेत हथिया लिया और कोई कुछ न कर सका; जिसकी लाठी उसकी भैंस। जल में रहकर मगर से बैर (जिसके आश्रय में रहें उससे शत्रुता ठीक नहीं): इसी दफ़्तर में काम करके अपने अधिकारी से झगड़ना जल में रहकर मगर से बैर करना है। घर का भेदी लंका ढाए (भीतर का भेद जानने वाला सबसे बड़ी हानि करता है); इसे प्रायः रामकथा के विभीषण से जोड़ा जाता है, जो रावण का भाई होकर राम से जा मिला था: कंपनी का गुप्त सूत्र उसी के कर्मचारी ने बेचा; घर का भेदी लंका ढाए। अंधों में काना राजा (अज्ञानियों में थोड़ा जानने वाला भी श्रेष्ठ माना जाता है): गाँव में वही अकेला पढ़ा-लिखा है, इसलिए सबकी चिट्ठियाँ वही पढ़ता है; अंधों में काना राजा। एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है (एक बुरा व्यक्ति पूरे समूह को बदनाम कर देता है): एक रिश्वतखोर कर्मचारी के कारण पूरा विभाग बदनाम हो गया; सच है, एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता (अकेला व्यक्ति बड़ा काम नहीं कर सकता): गाँव की सड़क तभी बनी जब सब मिलकर जुटे, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।

समय, कर्म और परिश्रम की लोकोक्तियाँ

अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत (समय निकल जाने पर पछताना व्यर्थ): साल भर खेलते रहे, अब परीक्षा से एक दिन पहले रोने से क्या होगा; अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। का बरखा जब कृषि सुखाने (समय बीत जाने पर मिली सहायता व्यर्थ है), जो तुलसीदास के रामचरितमानस की एक पंक्ति से आई है: रोगी के मरने के बाद दवा पहुँची, का बरखा जब कृषि सुखाने। खोदा पहाड़ निकली चुहिया (बहुत परिश्रम, बहुत थोड़ा फल): महीने भर की खुदाई के बाद वहाँ से केवल कुछ टूटे बर्तन निकले, खोदा पहाड़ निकली चुहिया। जैसी करनी वैसी भरनी (जैसा कर्म, वैसा फल): जीवन भर सबको सताने वाला बुढ़ापे में अकेला रह गया; जैसी करनी वैसी भरनी। बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय (बुरे कर्म करके अच्छे फल की आशा व्यर्थ): बच्चों को संस्कार नहीं दिए और अब उनसे सेवा की आशा करते हो? बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय। मन चंगा तो कठौती में गंगा (मन पवित्र हो तो घर ही तीर्थ है), जो संत रैदास से जुड़ी है: सच्चे मन से काम करने वाले को तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं, मन चंगा तो कठौती में गंगा।

लोकोक्ति का रूप न बदलें

लोकोक्तियों में ‘छलकत’, ‘होत’, ‘बाजे’, ‘ढाए’, ‘होय’ जैसे पुराने रूप हैं; इन्हें ‘छलकती’, ‘होता’, ‘बजता’ में न बदलें। कहीं-कहीं रूप-भेद मिलते हैं: ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ के साथ ‘छलकत जाए’, ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा’ के साथ ‘नाच न आवे आँगन टेढ़ा’, और ‘बोया पेड़ बबूल का’ के अंत में ‘आम कहाँ से होय’ के साथ ‘आम कहाँ से खाय’। परीक्षा में इनमें से कोई भी रूप दिया हो, अर्थ एक ही है; रूप के अंतर को गलती न समझें।

मुख्य तथ्य

  • अधजल गगरी छलकत जाय और थोथा चना बाजे घना: दोनों में कम ज्ञान या गुण वाला अधिक दिखावा और शोर करता है।
  • ऊँची दुकान फीका पकवान = बाहर सजावट, भीतर गुण कम; नाम बड़े और दर्शन छोटे = प्रसिद्धि बहुत, वास्तविकता कम; आँख का अंधा नाम नयनसुख = नाम के उलटे गुण।
  • हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और = कथनी और करनी में अंतर, कपटपूर्ण व्यवहार।
  • आम के आम गुठलियों के दाम = दोहरा लाभ; एक पंथ दो काज = एक प्रयत्न से दो काम; नौ नकद न तेरह उधार = तुरंत का थोड़ा लाभ, बाद के बड़े लाभ से अच्छा।
  • आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे = अधिक के लालच में हाथ का भी खो देना; बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा = संयोग से अनायास लाभ।
  • उलटा चोर कोतवाल को डाँटे = दोषी ही निर्दोष पर दोष लगाए; चोर की दाढ़ी में तिनका = दोषी स्वयं शंकित रहे; चोर-चोर मौसेरे भाई = बुरे लोग आपस में मिल जाते हैं।
  • नाच न जाने आँगन टेढ़ा = अपनी कमी का दोष साधन पर; खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे = लज्जा का क्रोध दूसरों पर; अंगूर खट्टे हैं = न मिलने पर वस्तु को बुरा बताना।
  • जिसकी लाठी उसकी भैंस = शक्तिशाली की चलती है; जल में रहकर मगर से बैर = आश्रयदाता से शत्रुता अनुचित; घर का भेदी लंका ढाए = भीतर का भेदी सबसे घातक (विभीषण)।
  • अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत और का बरखा जब कृषि सुखाने: दोनों में समय निकल जाने के बाद पछताना या सहायता व्यर्थ है।
  • जैसी करनी वैसी भरनी = जैसा कर्म वैसा फल; बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होय = बुरे कर्म से अच्छा फल नहीं; खोदा पहाड़ निकली चुहिया = परिश्रम बहुत, फल थोड़ा।

एक नज़र में दोहराव

अधजल गगरी छलकत जाय, थोथा चना बाजे घना = दिखावा; ऊँची दुकान फीका पकवान, नाम बड़े दर्शन छोटे = बाहर चमक भीतर खोखला; हाथी के दाँत = कथनी-करनी में अंतर; आम के आम गुठलियों के दाम = दोहरा लाभ; एक पंथ दो काज = एक प्रयत्न दो काम; नौ नकद न तेरह उधार; उलटा चोर कोतवाल को डाँटे; चोर की दाढ़ी में तिनका; नाच न जाने आँगन टेढ़ा; खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे; अंगूर खट्टे हैं; जिसकी लाठी उसकी भैंस; घर का भेदी लंका ढाए; अंधों में काना राजा; का बरखा जब कृषि सुखाने (मानस); मन चंगा तो कठौती में गंगा (रैदास)।

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