41 में से पाठ 17 · मुहावरे और लोकोक्तियाँ

प्रसिद्ध लोकोक्तियाँ (भाग 2) और अर्थ वाले प्रश्न हल करने की विधि

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

संकट और विपत्ति की लोकोक्तियाँ

आसमान से गिरा खजूर में अटका (एक संकट से निकलकर दूसरे में फँस जाना): बाढ़ से बचकर शहर पहुँचे तो वहाँ दंगा हो गया; आसमान से गिरा खजूर में अटका। कंगाली में आटा गीला (संकट में और संकट आ पड़ना): नौकरी पहले ही छूट गई थी, ऊपर से घर में चोरी हो गई; कंगाली में आटा गीला। सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े (काम आरंभ करते ही विघ्न आना): दुकान खोलने के पहले ही दिन बाज़ार बंद हो गया, यानी सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े। डूबते को तिनके का सहारा (संकट में छोटी सहायता भी बड़ी लगती है): बेरोज़गारी के दिनों में ट्यूशन से मिले थोड़े पैसे डूबते को तिनके का सहारा बने। ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर (कठिन काम हाथ में लेने पर कष्टों से नहीं डरना चाहिए): सेना में भर्ती हुए हो तो कठिन प्रशिक्षण से कैसा डर; ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर। दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है (एक बार धोखा खाया व्यक्ति आगे बहुत सावधान रहता है): एक बार ठगे जाने के बाद वह हर कागज़ कई बार पढ़कर हस्ताक्षर करता है; दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है।

घर, समाज और स्वभाव की लोकोक्तियाँ

घर की मुर्गी दाल बराबर (घर की सुलभ वस्तु या व्यक्ति का आदर नहीं होता): घर में ही गणित के अध्यापक पिता हैं, फिर भी बेटा बाहर ट्यूशन पढ़ने जाता है; घर की मुर्गी दाल बराबर। घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध (गुणी का आदर अपने स्थान पर नहीं, बाहर होता है): जिस गायक को अपने कस्बे में कोई नहीं पूछता था, उसे विदेश में सम्मान मिला; घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध। दूर के ढोल सुहावने (दूर से हर चीज़ अच्छी लगती है, पास जाकर कमियाँ दिखती हैं): शहर की नौकरी गाँव से बड़ी आकर्षक लगती थी, वहाँ जाकर समझ आया कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं। चिराग तले अँधेरा (जहाँ अच्छाई की आशा हो, वहीं बुराई होना): थानेदार का बेटा ही चोरी करता पकड़ा गया, चिराग तले अँधेरा। आप भला तो जग भला (स्वयं अच्छे हों तो संसार भी अच्छा लगता है): तुम सबसे प्रेम से मिलोगे तो सब तुमसे प्रेम से मिलेंगे; आप भला तो जग भला। होनहार बिरवान के होत चीकने पात (होनहार के लक्षण बचपन में ही दिख जाते हैं): छोटी आयु में ही वह शतरंज में बड़ों को हरा देता था; होनहार बिरवान के होत चीकने पात।

संयम, धैर्य और प्रयास की लोकोक्तियाँ

तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर (आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिए; सौर यानी ओढ़ने की रज़ाई या चादर): कम वेतन में महँगी गाड़ी खरीदकर वह कर्ज़ में डूब गया; तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर। बूँद-बूँद से घड़ा भरता है (थोड़ा-थोड़ा जोड़ने से बहुत हो जाता है): रोज़ थोड़े पैसे बचाकर उसने साल के अंत में अच्छी रकम जोड़ ली; बूँद-बूँद से घड़ा भरता है। सहज पके सो मीठा होय (धैर्य से किया गया काम अच्छा होता है): जल्दबाज़ी मत करो, धीरे-धीरे तैयारी करो; सहज पके सो मीठा होय। जहाँ चाह वहाँ राह (दृढ़ इच्छा हो तो उपाय मिल ही जाता है): पैर में चोट के बाद भी उसने दौड़ पूरी की; सच है, जहाँ चाह वहाँ राह। हाथ कंगन को आरसी क्या (प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं): मेरे परिश्रम पर संदेह है तो मेरी उत्तर-पुस्तिका देख लो; हाथ कंगन को आरसी क्या।

मिलते-जुलते अर्थ वाली लोकोक्तियों में अंतर

परीक्षा में एक जैसे भाव वाली दो लोकोक्तियाँ अक्सर विकल्पों में साथ रखी जाती हैं, इसलिए बारीक अंतर पकड़िए। संकट: ‘आसमान से गिरा खजूर में अटका’ में एक संकट से छूटकर दूसरे में फँसना है, ‘कंगाली में आटा गीला’ में पहले संकट के ऊपर दूसरा संकट आ पड़ना, और ‘सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े’ में काम की शुरुआत में ही बाधा। दिखावा: ‘अधजल गगरी’ और ‘थोथा चना’ व्यक्ति के अधूरे ज्ञान और शोर के लिए हैं, जबकि ‘ऊँची दुकान फीका पकवान’ प्रायः किसी स्थान, वस्तु या संस्था की बाहरी चमक और भीतरी खोखलेपन के लिए आती है। लाभ: ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ में एक ही वस्तु से दोहरा लाभ है और ‘एक पंथ दो काज’ में एक ही प्रयत्न या यात्रा से दो काम बनते हैं; कई पुस्तकें दोनों का अर्थ ‘दोहरा लाभ’ ही लिखती हैं, इसलिए दोनों विकल्प हों तो प्रश्न के शब्द (‘लाभ’ या ‘काम’) देखकर चुनिए। अनादर: ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ में सुलभ होने से आदर घटता है, ‘घर का जोगी जोगड़ा’ में गुणी का अपने ही स्थान पर अनादर है।

उलटे और भ्रम वाले जोड़े

‘जैसी करनी वैसी भरनी’ (जो करे वही भोगे) के विपरीत ‘करे कोई भरे कोई’ (दोष एक का, दंड दूसरे को) है। ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ अकेलेपन की दुर्बलता बताती है, जबकि ‘एक और एक ग्यारह होते हैं’ मेल की शक्ति। ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती’ का अर्थ है कि झगड़े में दोनों पक्ष दोषी होते हैं: दोनों पड़ोसी एक-दूसरे को दोष दे रहे थे, पर ताली एक हाथ से नहीं बजती। ‘एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं’ (दो समान बलशाली एक स्थान पर साथ नहीं रह सकते) को ‘एक अनार सौ बीमार’ (वस्तु एक, चाहने वाले अनेक) से न मिलाएँ।

अर्थ चुनने के प्रश्नों के जाल

पहला जाल शब्दशः अर्थ है: ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ के विकल्पों में ‘आम और गुठली दोनों बेचना’ जैसा विकल्प रखा जाता है, जबकि सही अर्थ ‘दोहरा लाभ’ है। दूसरा जाल शब्दों का अनुवाद मात्र है: ‘अंधों में काना राजा’ के लिए ‘अंधों का राजा काना होता है’ अर्थ नहीं है; सही अर्थ ‘अज्ञानियों में थोड़ा जानने वाला भी श्रेष्ठ माना जाता है’ है। तीसरा जाल भाव की दिशा है: ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ निराशा है (परिश्रम अधिक, फल कम), लाभ नहीं; ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा’ अनायास लाभ है, परिश्रम का फल नहीं। चौथा जाल किसी एक शब्द का पीछा करना है: ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’ का भोजन से कोई संबंध नहीं, और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का पशुपालन से नहीं।

प्रश्न हल करने की विधि

पहले लोकोक्ति के पीछे की स्थिति या कहानी सोचिए, जैसे बबूल बोने वाले को आम नहीं मिलता। फिर उसका भाव तय कीजिए: प्रशंसा है या व्यंग्य, लाभ है या हानि, उपदेश है या चेतावनी। अब शब्दशः अनुवाद वाले और उलटे भाव वाले विकल्प काट दीजिए। रिक्त स्थान वाले प्रश्न में वाक्य की स्थिति से कुंजी लीजिए: ‘अकेले जाकर पूरी व्यवस्था से लड़ोगे? ......’ में अकेलेपन की बात है, इसलिए ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ सही है। अंत में बचे दो मिलते-जुलते विकल्पों में ऊपर बताए बारीक अंतर से निर्णय कीजिए।

मुख्य तथ्य

  • आसमान से गिरा खजूर में अटका = एक संकट से छूटकर दूसरे में फँसना; कंगाली में आटा गीला = संकट पर और संकट; सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े = आरंभ में ही विघ्न।
  • डूबते को तिनके का सहारा = संकट में छोटी सहायता भी बड़ी; दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है = एक बार धोखा खाने वाला अधिक सावधान रहता है।
  • घर की मुर्गी दाल बराबर = सुलभ का आदर नहीं; घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध = गुणी का अपने स्थान पर अनादर; चिराग तले अँधेरा = जहाँ अच्छाई की आशा, वहीं बुराई।
  • होनहार बिरवान के होत चीकने पात = होनहार के लक्षण बचपन में ही दिख जाते हैं; दूर के ढोल सुहावने = दूर की वस्तु अच्छी लगती है; आप भला तो जग भला।
  • तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर = आय के अनुसार व्यय करें; बूँद-बूँद से घड़ा भरता है = थोड़ा-थोड़ा जोड़ने से बहुत होता है; सहज पके सो मीठा होय = धैर्य का फल मीठा।
  • ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ (जो करे वही भोगे) का उलटा: ‘करे कोई भरे कोई’ (दोष एक का, दंड दूसरे को); ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती’ = झगड़े में दोनों पक्ष दोषी।
  • ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ का अर्थ? (क) आम और गुठली दोनों बेचना (ख) दोहरा लाभ (ग) महँगा सौदा (घ) व्यर्थ परिश्रम → (ख); (क) शब्दशः अर्थ वाला जाल है।
  • ‘अंधों में काना राजा’ = अज्ञानियों में थोड़ा जानने वाला भी श्रेष्ठ; ‘अंधों का राजा काना होता है’ केवल शब्दों का अनुवाद है, अर्थ नहीं।
  • ‘अकेले जाकर पूरी व्यवस्था से लड़ोगे? ___’ → अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता; ‘एक और एक ग्यारह होते हैं’ इसका उलटा भाव (मेल की शक्ति) है।
  • खोदा पहाड़ निकली चुहिया = परिश्रम बहुत, फल थोड़ा (निराशा); बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा = बिना प्रयत्न अचानक लाभ; हाथ कंगन को आरसी क्या = प्रत्यक्ष को प्रमाण नहीं चाहिए।

एक नज़र में दोहराव

आसमान से गिरा खजूर में अटका = एक संकट से दूसरे में; कंगाली में आटा गीला = संकट पर संकट; सिर मुँड़ाते ही ओले पड़े = आरंभ में विघ्न; डूबते को तिनके का सहारा; दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है; घर की मुर्गी दाल बराबर बनाम घर का जोगी जोगड़ा; चिराग तले अँधेरा; तेते पाँव पसारिए जेती लाँबी सौर = आय के अनुसार व्यय; जैसी करनी वैसी भरनी बनाम करे कोई भरे कोई; जाल: शब्दशः अर्थ, शब्दों का अनुवाद, उलटा भाव, एक शब्द का पीछा; विधि: स्थिति सोचें, भाव तय करें, जाल काटें, बारीक अंतर से चुनें।

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