41 में से पाठ 37 · उपयुक्त शब्द-चयन
श्रुतिसम-भिन्नार्थक शब्द (1): मात्रा, स्वर और श-स के अंतर वाले युग्म
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श्रुतिसम-भिन्नार्थक शब्द क्या हैं
‘श्रुति’ का अर्थ है सुनना और ‘सम’ का अर्थ है समान। इसलिए श्रुतिसम-भिन्नार्थक शब्द वे हैं जो सुनने में लगभग एक जैसे लगते हैं, पर जिनके अर्थ भिन्न होते हैं। कुछ पुस्तकें इन्हें समोच्चरित-भिन्नार्थक शब्द या केवल युग्म शब्द कहती हैं; नाम अलग है, विषय एक ही है। इन शब्दों में प्रायः एक छोटा-सा अंतर होता है: कहीं ह्रस्व और दीर्घ मात्रा का (दिन-दीन), कहीं एक स्वर का (अनल-अनिल), कहीं ‘श’ और ‘स’ का (अंश-अंस), तो कहीं संयुक्त व्यंजन का (अन्न-अन्य)। बोलचाल में यह अंतर अक्सर सुनाई नहीं देता, इसलिए लिखते समय भूल होती है, और परीक्षक इसी भूल को पकड़ते हैं। इनमें से अधिकतर शब्द संस्कृत से आए तत्सम शब्द हैं, इसलिए इनका अर्थ प्रायः शब्द की बनावट से भी समझा जा सकता है। इस पाठ में मात्रा, स्वर और श-स के अंतर वाले युग्म हैं; ब-व, संयुक्ताक्षर, बिंदु और नुक्ता वाले युग्म अगले पाठ में हैं।
इ और ई की मात्रा का अंतर
सबसे अधिक युग्म इसी अंतर के हैं। दिन (दिवस) और दीन (गरीब, दुखी): ‘आज का दिन शुभ है’, पर ‘दीन-दुखियों की सेवा करो’। आदि (आरंभ; इत्यादि) और आदी (अभ्यस्त): ‘आदि काल से’, पर ‘वह देर से उठने का आदी है’। बलि (बलिदान, भेंट) और बली (बलवान): ‘देश के लिए प्राणों की बलि’, पर ‘भीम बड़े बली थे’। कृति (रचना) और कृती (कुशल, निपुण): ‘गोदान प्रेमचंद की प्रसिद्ध कृति है’। अवधि (समय-सीमा) और अवधी (अवध क्षेत्र की भाषा): ‘आवेदन की अवधि बढ़ा दी गई’, पर ‘तुलसीदास ने रामचरितमानस अवधी में लिखा’। सुधि (याद, खबर) और सुधी (बुद्धिमान, विद्वान): ‘परदेस गए बेटे की कोई सुधि नहीं मिली’, पर ‘सुधी पाठक’। चिर (बहुत समय तक रहने वाला) और चीर (वस्त्र): ‘चिरकाल से’, पर ‘द्रौपदी का चीर-हरण’। हरि (भगवान विष्णु) और हरी (हरे रंग की): ‘हरी घास’। गिरि (पर्वत) और गिरी (गिर पड़ी; बीज का गूदा): ‘गिरिराज हिमालय’, पर ‘नारियल की गिरी’। कलि (कलियुग; कलह) और कली (फूल की कली)। पिक (कोयल) और पीक (पान का थूक)। नियत (निश्चित) और नीयत (इरादा): ‘नियत समय पर पहुँचो’, पर ‘उसकी नीयत साफ़ नहीं है’।
उ और ऊ की मात्रा का अंतर
कुल (वंश; सब मिलाकर) और कूल (किनारा): ‘वह अपने कुल का दीपक है’, ‘कुल पचास रुपये’, पर ‘नदी के कूल पर मेला लगा’। सुत (पुत्र) और सूत (धागा; सारथी): ‘दशरथ-सुत राम’, ‘चरखे पर सूत काता जाता है’; कर्ण को सूत-पुत्र इसलिए कहा गया कि उसका पालन सारथी अधिरथ ने किया था। सुर (देवता; स्वर) और सूर (सूर्य; सूरदास): ‘सुर और असुर’, ‘मधुर सुर में गाना’। पुरा (प्राचीन) और पूरा (संपूर्ण): ‘पुरातत्त्व विभाग’, पर ‘काम पूरा हो गया’। कुजन (बुरे लोग) और कूजन (पक्षियों का मधुर कलरव): ‘भोर में पक्षियों का कूजन’। शुचि (पवित्र) और सूची (तालिका; सुई): ‘शुचि मन’, ‘मतदाता सूची’; इस युग्म में मात्रा के साथ श-स का अंतर भी है।
अ और आ का अंतर
इन युग्मों में एक शब्द में ‘अ’ है और दूसरे में दीर्घ ‘आ’। अचार (मसाला डालकर रखा खाद्य पदार्थ) और आचार (आचरण, व्यवहार): ‘आम का अचार’, पर ‘आचार-संहिता’। अगम (जहाँ पहुँचना कठिन हो) और आगम (आगमन; शास्त्र): ‘अगम पर्वत’, पर ‘वसंत का आगम’। अपर (दूसरा, अतिरिक्त) और अपार (जिसका पार न हो): ‘अपर जिलाधिकारी’, पर ‘अपार जनसमूह’। छत्र (छाता, राजछत्र) और छात्र (विद्यार्थी)। तप (तपस्या) और ताप (गर्मी; ज्वर)। प्रकार (भेद, तरह) और प्राकार (परकोटा, चारदीवारी): ‘किले का ऊँचा प्राकार’। प्रसाद (देवता का भोग; कृपा) और प्रासाद (महल)। प्रहर (पहर, दिन-रात का आठवाँ भाग, यानी 3 घंटे) और प्रहार (चोट, आक्रमण)। प्रकृत (स्वाभाविक, असली) और प्राकृत (एक प्राचीन भारतीय भाषा)। समान (बराबर) और सामान (वस्तुएँ): ‘कानून की दृष्टि में सब समान हैं’, पर ‘यात्रा का सामान’। हल (समाधान; खेत जोतने का औज़ार) और हाल (दशा): ‘प्रश्न का हल’, पर ‘रोगी का हाल’।
एक स्वर के बदलने से
कुछ युग्मों में ह्रस्व-दीर्घ का नहीं, स्वर का ही अंतर होता है। अनल (आग) और अनिल (हवा): ‘वन में अनल की लपटें उठ रही थीं’, पर ‘शीतल अनिल बह रहा है’। भवन (घर, इमारत) और भुवन (संसार, लोक): ‘विद्यालय का नया भवन’, पर ‘त्रिभुवन’ अर्थात् तीनों लोक। ओर (तरफ़) और और (तथा): ‘नदी की ओर चलो’, पर ‘राम और श्याम’। अपेक्षा (आशा; तुलना में) और उपेक्षा (अनदेखी): ‘माता-पिता को बच्चों से बहुत अपेक्षाएँ होती हैं’, पर ‘बुज़ुर्गों की उपेक्षा न करें’। तीन शब्दों का एक समूह भी याद रखिए: तरणि (सूर्य), तरणी (नाव) और तरुणी (युवती)।
श और स का अंतर
उत्तर भारत की बोलचाल में ‘श’ और ‘स’ का भेद प्रायः मिट जाता है, पर लिखित हिंदी में यह अर्थ बदल देता है। अंश (हिस्सा) और अंस (कंधा): ‘लाभ में सबका अंश बराबर है’, पर ‘योद्धा ने धनुष अंस पर टाँग लिया’। शर (बाण) और सर (तालाब; सिर): ‘अर्जुन के शर’, पर ‘सर में कमल खिले हैं’। शंकर (शिव) और संकर (मिश्रित): ‘संकर बीज’, ‘संकर नस्ल की गाय’। शूर (वीर) और सूर (सूर्य; सूरदास): ‘शूरवीर’। शीत (ठंडा) और सित (सफ़ेद): ‘शीत ऋतु’, पर ‘सित कमल’। शप्त (शापित) और सप्त (सात): ‘सप्तर्षि’, पर ‘गौतम ऋषि के शाप से शप्त अहल्या’। शम (शांति, मन का संयम) और सम (बराबर): ‘सम संख्या’। श्वेत (सफ़ेद) और स्वेद (पसीना): ‘श्वेत वस्त्र’, पर ‘माथे पर स्वेद-कण’।
परीक्षा में ये युग्म कैसे पूछे जाते हैं
पहला प्रकार रिक्त स्थान है: ‘नदी के ...... पर मेला लगा’ (कुल, कूल, कुली, कूप)। ‘नदी के’ बता रहा है कि किनारा चाहिए, इसलिए उत्तर कूल है। दूसरा प्रकार युग्म का सही अर्थ-जोड़ा पूछता है: ‘अनल-अनिल’ का सही अर्थ ‘आग-हवा’ है; विकल्पों में ‘हवा-आग’ भी दिया जाता है, इसलिए क्रम देखकर उत्तर दें। तीसरा प्रकार असंगत युग्म पूछता है: ‘कौन-सा युग्म सही नहीं है: दिन-दिवस, दीन-गरीब, आदी-आरंभ, बली-बलवान’; उत्तर ‘आदी-आरंभ’ है, क्योंकि आरंभ का अर्थ ‘आदि’ देता है, आदी नहीं। चौथे प्रकार में व्याकरण भी संकेत देता है: ‘भीम बहुत ...... थे’ (बलि, बली) में भीम का गुण बताने वाला विशेषण चाहिए, इसलिए बली; जबकि ‘प्राणों की ......’ में संज्ञा चाहिए, इसलिए बलि। याद रखने का सबसे अच्छा उपाय हर युग्म को किसी परिचित शब्द से जोड़ना है: दीनबंधु (दीन), आदिवासी (आदि), गिरिराज (गिरि), सप्तर्षि (सप्त), पुरातत्त्व (पुरा), आचार-संहिता (आचार), सूत-पुत्र (सूत), त्रिभुवन (भुवन)।
मुख्य तथ्य
- दिन = दिवस; दीन = गरीब, दुखी: ‘आज का दिन शुभ है’, ‘दीन-दुखियों की सेवा करो’।
- आदि = आरंभ, इत्यादि; आदी = अभ्यस्त: ‘वह सुबह चाय पीने का ...... है’ → आदी।
- कुल = वंश, सब; कूल = किनारा: ‘नदी के ...... पर मंदिर है’ → कूल; ‘वह अपने ...... का नाम रोशन करेगा’ → कुल।
- सुत = पुत्र; सूत = धागा, सारथी (कर्ण सूत-पुत्र कहलाया); सुर = देवता, स्वर; सूर = सूर्य, सूरदास।
- बलि = बलिदान, भेंट; बली = बलवान; कृति = रचना; कृती = कुशल; अवधि = समय-सीमा; अवधी = अवध की भाषा।
- नियत = निश्चित; नीयत = इरादा: ‘परीक्षा ...... समय पर होगी’ → नियत; ‘उसकी ...... में खोट है’ → नीयत।
- अचार = खाद्य पदार्थ; आचार = आचरण (आचार-संहिता); अपर = दूसरा; अपार = असीम; प्रहर = पहर (3 घंटे); प्रहार = चोट।
- प्रसाद = भोग, कृपा; प्रासाद = महल; प्रकार = भेद; प्राकार = परकोटा; समान = बराबर; सामान = वस्तुएँ।
- अनल = आग; अनिल = हवा; भवन = घर; भुवन = संसार (त्रिभुवन); ओर = तरफ़; और = तथा; तरणि = सूर्य, तरणी = नाव, तरुणी = युवती।
- अंश = हिस्सा; अंस = कंधा; शर = बाण; सर = तालाब; शंकर = शिव; संकर = मिश्रित; शीत = ठंडा; सित = सफ़ेद; श्वेत = सफ़ेद; स्वेद = पसीना।
एक नज़र में दोहराव
श्रुतिसम-भिन्नार्थक = सुनने में समान, अर्थ में भिन्न; इ-ई: दिन-दीन, आदि-आदी, बलि-बली, कृति-कृती, अवधि-अवधी, सुधि-सुधी, चिर-चीर, गिरि-गिरी, नियत-नीयत; उ-ऊ: कुल-कूल, सुत-सूत, सुर-सूर, पुरा-पूरा, कुजन-कूजन; अ-आ: अचार-आचार, अगम-आगम, अपर-अपार, प्रकार-प्राकार, प्रसाद-प्रासाद, प्रहर-प्रहार, समान-सामान; स्वर: अनल-अनिल, भवन-भुवन, ओर-और, तरणी-तरुणी; श-स: अंश-अंस, शर-सर, शंकर-संकर, शीत-सित, शप्त-सप्त, श्वेत-स्वेद; प्रसंग और व्याकरण से चुनें।