41 में से पाठ 36 · पर्यायवाची और विलोम शब्द
विलोम शब्द (2): तत्सम विलोम, प्रश्नों के जाल और अभ्यास
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
तत्सम विलोमों को समूहों में याद करें
सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्रों में विलोम के कठिन प्रश्न प्रायः तत्सम शब्दों पर आते हैं, क्योंकि इनके विकल्प मिलते-जुलते बनाए जा सकते हैं और अनुमान से उत्तर नहीं लगता। इन्हें याद करने का सबसे अच्छा तरीका अर्थ के आधार पर समूह बनाना है: उन्नति और पतन, आना-जाना, समय और दिशा, स्वभाव और व्यवहार, तथा शास्त्र और साहित्य के युग्म। हर जोड़े को दोनों ओर से याद कीजिए, क्योंकि प्रश्न ‘प्राचीन’ का विलोम भी पूछ सकता है और ‘अर्वाचीन’ का भी। जहाँ किसी जोड़े में उपसर्ग का नियम दिखे (उत् और अप, आ और निर्, अनु और वि), उसे पहचानिए; जहाँ नियम न हो (स्थावर-जंगम, ऋजु-वक्र, अथ-इति), उसका अर्थ समझकर याद कीजिए, क्योंकि अर्थ जानने से ही विकल्पों में छिपा पर्याय पकड़ में आता है।
उन्नति, पतन और आना-जाना
उत्कर्ष-अपकर्ष, उन्नति-अवनति, उत्थान-पतन, आरोह-अवरोह, आरोहण-अवरोहण, ह्रास-वृद्धि, उत्कृष्ट-निकृष्ट, उत्तम-अधम, सबल-निर्बल, संपन्न-विपन्न। आने-जाने और लेन-देन के युग्म: आदान-प्रदान, आयात-निर्यात, आगमन-प्रस्थान, आविर्भाव-तिरोभाव, आकर्षण-विकर्षण, क्रय-विक्रय, प्रवृत्ति-निवृत्ति, संयोग-वियोग, संक्षेप-विस्तार, संक्षिप्त-विस्तृत, संकीर्ण-विस्तीर्ण, संश्लेषण-विश्लेषण। ‘आविर्भाव’ का अर्थ है प्रकट होना और ‘तिरोभाव’ का छिप जाना या लुप्त होना; ‘आदान’ लेना है और ‘प्रदान’ देना; ‘आयात’ बाहर से देश में माल लाना है और ‘निर्यात’ देश से बाहर भेजना; ‘प्रवृत्ति’ किसी काम में लगना है और ‘निवृत्ति’ उससे हट जाना। ‘ह्रास’ (घटना) और ‘वृद्धि’ (बढ़ना) की जोड़ी में ‘ह्रास’ की वर्तनी पर भी ध्यान दीजिए: इसमें ‘ह’ के बाद ‘र’ है।
समय, दिशा और लोक
प्राचीन-अर्वाचीन, पुरातन-नूतन या अधुनातन, आदि-अंत, अथ-इति, पूर्वाह्न-अपराह्न, दिवा-रात्रि, क्षणिक-शाश्वत, नश्वर-अनश्वर, मर्त्य-अमर, प्राची-प्रतीची, पाश्चात्य-पौर्वात्य, उत्तरायण-दक्षिणायन, अवनि-अंबर, आकाश-पाताल, लौकिक-अलौकिक, अंतरंग-बहिरंग, स्थावर-जंगम, चर-अचर, ऋजु-वक्र। ‘प्राची’ पूर्व दिशा है और ‘प्रतीची’ पश्चिम दिशा। ‘अथ’ आरंभ का सूचक है और ‘इति’ समाप्ति का, इसीलिए ‘अथ से इति तक’ का अर्थ है आरंभ से अंत तक। ‘अवनि’ (पृथ्वी) का विलोम ‘अंबर’ (आकाश) है। ‘स्थावर’ वह है जो अपनी जगह से न हिले, जैसे वृक्ष और पर्वत, और ‘जंगम’ वह जो चल-फिर सके; ‘ऋजु’ का अर्थ सीधा है और ‘वक्र’ का टेढ़ा। ‘मर्त्य’ (मरणशील) का विलोम ‘अमर’ या ‘अमर्त्य’ है, और ‘मर्त्य’ से ही पृथ्वी को ‘मर्त्यलोक’ कहते हैं।
स्वभाव और व्यवहार
आस्तिक-नास्तिक, आस्था-अनास्था, कृतज्ञ-कृतघ्न, अनुराग-विराग, अनुरक्त-विरक्त, राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, निंदा-स्तुति, आशीर्वाद-अभिशाप, धृष्ट-विनीत, मूक-वाचाल, उद्यमी-आलसी, कृपण-दानी, सदाचारी-दुराचारी, सात्त्विक-तामसिक, शोषक-शोषित, दाता-याचक, अभिज्ञ-अनभिज्ञ, इष्ट-अनिष्ट, सौभाग्य-दुर्भाग्य। ‘धृष्ट’ (ढीठ) का विलोम ‘विनीत’ (नम्र) है; ‘कृपण’ (कंजूस) का ‘दानी’ या ‘उदार’; ‘मूक’ (गूँगा, चुप रहने वाला) का ‘वाचाल’ (बहुत बोलने वाला); ‘शोषक’ (शोषण करने वाला) का ‘शोषित’ (जिसका शोषण हो)। ‘राग’ के विलोम पुस्तकों में ‘द्वेष’ और ‘विराग’ दोनों मिलते हैं, जबकि ‘अनुराग’ का विलोम ‘विराग’ है।
शास्त्र, साहित्य और प्रकृति के युग्म
व्यष्टि-समष्टि, उपमेय-उपमान, गौण-मुख्य, ग्राह्य-त्याज्य, वादी-प्रतिवादी, अनिवार्य-ऐच्छिक, कृत्रिम-प्राकृतिक, आदर्श-यथार्थ, अपेक्षा-उपेक्षा, पुरस्कार-दंड, सृष्टि-प्रलय, अतिवृष्टि-अनावृष्टि, आर्द्र-शुष्क, उर्वर-ऊसर, सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, स्वकीया-परकीया, गरिमा-लघिमा, मानव-दानव, सुर-असुर, जड़-चेतन। ‘व्यष्टि’ (एक व्यक्ति) का विलोम ‘समष्टि’ (पूरा समूह) है। ‘उपमेय’ वह है जिसकी तुलना की जाए और ‘उपमान’ वह जिससे तुलना की जाए: ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ में मुख उपमेय है और चंद्रमा उपमान। ‘ग्राह्य’ (ग्रहण करने योग्य) का विलोम ‘त्याज्य’ (त्यागने योग्य) है, ‘अतिवृष्टि’ (बहुत अधिक वर्षा) का ‘अनावृष्टि’ (वर्षा न होना), और ‘उर्वर’ (उपजाऊ) का ‘ऊसर’ (बंजर)। ‘स्वकीया’ (अपनी) और ‘परकीया’ (पराई) साहित्य में नायिका के भेद हैं। ‘गरिमा’ (भारीपन) का विलोम ‘लघिमा’ (हलकापन) है; दोनों अष्ट सिद्धियों के नाम भी हैं।
विलोम के प्रश्नों के जाल
पहला जाल पर्याय का है: ‘उत्कर्ष’ के विकल्पों में ‘उन्नति’ और ‘प्रगति’ जैसे शब्द रखे जाते हैं, जो उसके पर्याय हैं, विलोम नहीं; उत्तर ‘अपकर्ष’ है। दूसरा जाल शब्द-भेद और रूप का है: ‘उन्नति’ (संज्ञा) का विलोम ‘अवनति’ है, ‘अवनत’ (विशेषण) नहीं; ‘आस्तिक’ का विलोम ‘नास्तिक’ है, पर ‘आस्था’ का ‘अनास्था’, और ‘अनास्तिक’ जैसा रूप प्रचलित नहीं। तीसरा जाल नकारात्मक दिखने वाले शब्दों का है: ‘अभिज्ञ’ का अर्थ जानकार है और उसका विलोम ‘अनभिज्ञ’ (अनजान) है; बहुत-से अभ्यर्थी ‘अभिज्ञ’ को ही अनजान समझ बैठते हैं। इसी तरह अमूल्य, अनुपम, अतुलनीय और अद्वितीय में ‘अ’ या ‘अन्’ होते हुए भी अर्थ प्रशंसा का है, और ‘निर्मल’ व ‘निर्भय’ में ‘निर्’ होते हुए भी अर्थ अच्छा है (निर्मल का विलोम मलिन)। चौथा जाल उपसर्ग का भ्रम है: ‘वि’, ‘प्र’ और ‘अनु’ हमेशा उलटा अर्थ नहीं देते; विज्ञान, विनम्र, प्रख्यात और अनुशासन अपने मूल शब्दों के विलोम नहीं हैं। पाँचवाँ जाल मिलते-जुलते रूपों का है: ‘अनुज’ का विलोम ‘अग्रज’ है, ‘मनुज’ (मनुष्य) नहीं; ‘आदान’ का ‘प्रदान’ है, ‘निदान’ (रोग की पहचान) नहीं।
जहाँ एक से अधिक विलोम मान्य हैं
कई शब्दों के दो या तीन विलोम पुस्तकों में मिलते हैं: प्राचीन-अर्वाचीन या नवीन, हर्ष-विषाद या शोक, जीवन-मरण या मृत्यु, निंदा-स्तुति या प्रशंसा, पुरस्कार-दंड या तिरस्कार, कृपण-दानी या उदार, लौकिक-अलौकिक या पारलौकिक, नश्वर-अनश्वर या शाश्वत। कुछ जोड़ों पर पुस्तकें सचमुच अलग राय रखती हैं: ‘यथार्थ’ का विलोम कोई पुस्तक ‘आदर्श’ देती है तो कोई ‘कल्पित’, और नर-नारी जैसे लिंग-युग्मों को कुछ पुस्तकें विलोम मानती हैं, कुछ नहीं। प्रश्न में प्रायः इनमें से एक ही विकल्प होता है, इसलिए जो विकल्प अर्थ में पूरा उलटा हो और उसी शब्द-भेद व स्रोत का हो, वही चुनिए; यदि दो मान्य विलोम साथ दिखें, तो उसी मूल या उपसर्ग-युग्म से बना शब्द अधिक सटीक है, जैसे ‘उन्नति’ के लिए ‘पतन’ से अधिक सटीक ‘अवनति’।
अभ्यास
हर प्रश्न में पहले पर्याय हटाइए, फिर उपसर्ग या पद का जोड़ा खोजिए। पहला, ‘आविर्भाव’ का विलोम (प्रादुर्भाव, तिरोभाव, उद्भव, प्रभाव): उत्तर तिरोभाव, क्योंकि प्रादुर्भाव और उद्भव प्रकट होने के ही अर्थ के निकट हैं। दूसरा, ‘व्यष्टि’ (समष्टि, विशिष्ट, सृष्टि, दृष्टि): उत्तर समष्टि; बाकी केवल तुक मिलाने वाले शब्द हैं। तीसरा, ‘ऋजु’ (सरल, वक्र, कोमल, तीव्र): उत्तर वक्र, क्योंकि सरल तो ऋजु का पर्याय है। चौथा, ‘अनुराग’ (प्रेम, विराग, अनुरक्ति, राग): उत्तर विराग। पाँचवाँ, ‘स्थावर’ (अचल, जंगम, स्थिर, जड़): उत्तर जंगम। छठा, ‘कृतज्ञ’ (कृतार्थ, कृपालु, कृतघ्न, कृपण): उत्तर कृतघ्न; कृतार्थ (सफल) और कृपण (कंजूस) केवल मिलते-जुलते रूप हैं। सातवाँ, ‘आदान’ (निदान, प्रदान, अवदान, संधान): उत्तर प्रदान। आठवाँ, ‘उन्नति’ (उत्थान, अवनत, अवनति, प्रगति): उत्तर अवनति, क्योंकि अवनत विशेषण है और उत्थान व प्रगति पर्याय हैं। नौवाँ, ‘अभिज्ञ’ (विज्ञ, अनभिज्ञ, प्रज्ञ, सुविज्ञ): उत्तर अनभिज्ञ।
मुख्य तथ्य
- उन्नति और पतन: उत्कर्ष-अपकर्ष, उन्नति-अवनति, उत्थान-पतन, आरोह-अवरोह, ह्रास-वृद्धि, उत्कृष्ट-निकृष्ट, उत्तम-अधम, संपन्न-विपन्न।
- आना-जाना: आदान-प्रदान, आयात-निर्यात, आगमन-प्रस्थान, आविर्भाव-तिरोभाव, आकर्षण-विकर्षण, क्रय-विक्रय, प्रवृत्ति-निवृत्ति, संश्लेषण-विश्लेषण।
- समय और दिशा: प्राचीन-अर्वाचीन, पुरातन-नूतन, अथ-इति, प्राची-प्रतीची, पाश्चात्य-पौर्वात्य, उत्तरायण-दक्षिणायन, क्षणिक-शाश्वत, अवनि-अंबर।
- स्वभाव: आस्तिक-नास्तिक, कृतज्ञ-कृतघ्न, अनुराग-विराग, राग-द्वेष, धृष्ट-विनीत, मूक-वाचाल, कृपण-दानी, सात्त्विक-तामसिक, अभिज्ञ-अनभिज्ञ।
- शास्त्रीय युग्म: व्यष्टि-समष्टि, उपमेय-उपमान, स्थावर-जंगम, ऋजु-वक्र, गौण-मुख्य, ग्राह्य-त्याज्य, वादी-प्रतिवादी, स्वकीया-परकीया, गरिमा-लघिमा।
- पर्याय वाला जाल: ‘उत्कर्ष’ का विलोम अपकर्ष है; विकल्पों में रखे उन्नति और प्रगति उसके पर्याय हैं।
- शब्द-भेद मिलाइए: उन्नति-अवनति, उन्नत-अवनत; आस्तिक-नास्तिक, पर आस्था-अनास्था।
- नकारात्मक दिखने वाले शब्द: अभिज्ञ = जानकार, अनभिज्ञ = अनजान; अमूल्य, अनुपम, अतुलनीय प्रशंसा के शब्द हैं; विज्ञान, विनम्र, अनुशासन उलटे अर्थ वाले नहीं।
- एक से अधिक मान्य विलोम: प्राचीन-अर्वाचीन या नवीन, हर्ष-विषाद या शोक, पुरस्कार-दंड या तिरस्कार; यथार्थ-आदर्श या कल्पित (पुस्तकों में अंतर)।
एक नज़र में दोहराव
उत्कर्ष-अपकर्ष, उन्नति-अवनति, आरोह-अवरोह, ह्रास-वृद्धि; आदान-प्रदान, आयात-निर्यात, आविर्भाव-तिरोभाव, संश्लेषण-विश्लेषण; प्राचीन-अर्वाचीन, अथ-इति, प्राची-प्रतीची, अवनि-अंबर, स्थावर-जंगम, ऋजु-वक्र; आस्तिक-नास्तिक, आस्था-अनास्था, कृतज्ञ-कृतघ्न, धृष्ट-विनीत, मूक-वाचाल, अभिज्ञ-अनभिज्ञ; व्यष्टि-समष्टि, उपमेय-उपमान, ग्राह्य-त्याज्य, अतिवृष्टि-अनावृष्टि; जाल: विकल्प में पर्याय, शब्द-भेद का मेल, अभिज्ञ जानकार है, विज्ञान और अनुशासन उलटे नहीं, अनुज का विलोम अग्रज।