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वर्ण-विचार: स्वर, व्यंजन, उच्चारण स्थान, अनुस्वार-अनुनासिक और संयुक्त व्यंजन

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

वर्ण और वर्णमाला

भाषा की वह सबसे छोटी ध्वनि, जिसके और टुकड़े न हो सकें, वर्ण कहलाती है; ‘कमल’ में क्, अ, म्, अ, ल्, अ छह ध्वनियाँ हैं। वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। वर्ण के दो भेद हैं: स्वर और व्यंजन। कुल संख्या पर पुस्तकें एकमत नहीं हैं: 11 स्वर और 33 मूल व्यंजन मिलाकर 44; अयोगवाह अं, अः जोड़कर 46; उत्क्षिप्त ड़, ढ़ जोड़कर 48; और संयुक्त व्यंजन क्ष, त्र, ज्ञ, श्र भी गिनें तो 52। इसलिए प्रश्न में गिनती का आधार ध्यान से पढ़िए।

स्वर और उनके भेद

जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी दूसरे वर्ण की सहायता के होता है, वे स्वर हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। उच्चारण-काल (मात्रा) के आधार पर ह्रस्व स्वर एक मात्रा के हैं (अ, इ, उ, ऋ), दीर्घ स्वर दो मात्रा के (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ), और प्लुत स्वर तीन मात्रा तक खींचा जाता है (ओ३म्, पुकारते समय ‘हे रा३म’); हिंदी लेखन में प्लुत प्रायः नहीं आता। बनावट के आधार पर अ, इ, उ, ऋ मूल स्वर हैं; आ, ई, ऊ एक जैसे स्वरों के मेल से बने हैं, और ए (अ + इ), ऐ (अ + ए), ओ (अ + उ), औ (अ + ओ) भिन्न स्वरों के मेल से बने संयुक्त स्वर हैं। ओठों की आकृति से उ, ऊ, ओ, औ वृत्ताकार हैं; जीभ के भाग से इ, ई, ए, ऐ अग्र, अ मध्य और आ, उ, ऊ, ओ, औ पश्च स्वर माने जाते हैं। ‘अ’ की कोई मात्रा नहीं होती, क्योंकि वह हर व्यंजन में मिला रहता है (क = क् + अ)। ‘ऋ’ लिखने में स्वर है, पर हिंदी में इसका उच्चारण ‘रि’ जैसा होता है और यह केवल तत्सम शब्दों में आता है: ऋषि, कृपा, गृह। अंग्रेज़ी शब्दों के लिए आगत स्वर ‘ऑ’ लिखा जाता है: डॉक्टर, कॉलेज।

व्यंजन और उनके भेद

जिन वर्णों का उच्चारण स्वर की सहायता से होता है, वे व्यंजन हैं। 33 मूल व्यंजनों में 25 स्पर्श व्यंजन हैं, जिनमें जीभ या ओठ मुख के किसी भाग को छूते हैं (प-वर्ग में दोनों ओठ मिलते हैं): क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग और प-वर्ग, हर वर्ग में पाँच वर्ण। अंतःस्थ व्यंजन चार हैं: य, र, ल, व; इनमें य और व अर्धस्वर, र लुंठित या प्रकंपित (जीभ के कंपन से) और ल पार्श्विक (हवा जीभ के दोनों ओर से) है। ऊष्म या संघर्षी व्यंजन चार हैं: श, ष, स, ह। हर वर्ग का पाँचवाँ वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) नासिक्य है। ड़ और ढ़ उत्क्षिप्त या द्विगुण व्यंजन हैं, जिनमें जीभ ऊपर उठकर झटके से गिरती है; ये शब्द के आरंभ में नहीं आते (सड़क, पेड़, पढ़ना), आरंभ में ड, ढ ही आते हैं (डाल, ढोल)। ङ और ञ से भी कोई शब्द आरंभ नहीं होता। अरबी-फ़ारसी और अंग्रेज़ी की क़, ख़, ग़, ज़, फ़ ध्वनियाँ दिखाने के लिए नुक्ता लगता है (क़लम, ख़बर, ग़रीब, ज़मीन, फ़ौज); केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अनुसार हिंदी में घुल-मिल गए शब्द बिना नुक्ते के भी लिखे जा सकते हैं (कलम, खबर, गरीब), पर जहाँ उच्चारण-भेद से अर्थ बदले वहाँ नुक्ता आवश्यक है: ज़रा (थोड़ा) और जरा (बुढ़ापा)।

प्राण और घोष के आधार पर

साँस की मात्रा के आधार पर अल्पप्राण व्यंजनों में कम साँस निकलती है: हर वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ वर्ण तथा य, र, ल, व। महाप्राण में अधिक साँस और ‘ह’ जैसी ध्वनि होती है: हर वर्ग का दूसरा और चौथा वर्ण, तथा ऊष्म श, ष, स, ह, जिन्हें अधिकतर पुस्तकें महाप्राण मानती हैं। स्वरतंत्रियों में कंपन के आधार पर अघोष में कंपन नहीं होता: हर वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण और श, ष, स। सघोष में कंपन होता है: हर वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण, य, र, ल, व, ह और सभी स्वर। एक वर्ग में चारों भेद देखिए: क अल्पप्राण अघोष, ख महाप्राण अघोष, ग अल्पप्राण सघोष, घ महाप्राण सघोष। ‘ह’ कंठ्य, सघोष और महाप्राण तीनों है।

उच्चारण स्थान

मुख का जो भाग किसी वर्ण को बोलने में काम आता है, वह उसका उच्चारण स्थान है। कंठ्य: अ, आ, क-वर्ग, ह, विसर्ग (संस्कृत सूत्र ‘अकुहविसर्जनीयानां कंठः’)। तालव्य: इ, ई, च-वर्ग, य, श। मूर्धन्य: ऋ, ट-वर्ग, र, ष। दंत्य: त-वर्ग, ल, स। ओष्ठ्य: उ, ऊ, प-वर्ग। नासिक्य: ङ, ञ, ण, न, म अपने वर्ग के स्थान के साथ नाक से भी बोले जाते हैं; अनुस्वार का स्थान भी नासिका है। दो स्थानों वाले वर्ण सबसे अधिक पूछे जाते हैं: ए, ऐ कंठ-तालव्य; ओ, औ कंठोष्ठ्य; व दंतोष्ठ्य (ऊपर के दाँत और निचला ओठ)। आधुनिक ध्वनि-विज्ञान र, ल, स, न को वर्त्स्य (मसूड़े से) मानता है, पर परीक्षा में पारंपरिक तालिका से ही उत्तर दिया जाता है।

अनुस्वार और अनुनासिक

अनुस्वार (ं) स्वर के बाद आने वाली नासिक्य व्यंजन ध्वनि है, जिसमें हवा केवल नाक से निकलती है और जो अगले वर्ग के पंचम वर्ण की तरह बोली जाती है: गंगा (गङ्गा), ठंडा (ठण्डा), संत (सन्त), संपादक (सम्पादक)। अनुनासिक (ँ) स्वर का गुण है, जिसमें हवा मुख और नाक दोनों से निकलती है: चाँद, आँख, हँसना, माँ। भ्रम से अर्थ बदलता है: हंस (पक्षी) और हँस (हँसना), अंगना (स्त्री) और अँगना (आँगन)। शिरोरेखा के ऊपर मात्रा हो तो चंद्रबिंदु की जगह बिंदु लगता है, पर उच्चारण अनुनासिक रहता है: नहीं, मैं, में, गोंद। मानक वर्तनी में पंचम वर्ण अपने वर्ग के वर्ण से पहले अनुस्वार बनता है (पंकज, कंठ, अंत), पर द्वित्व में या दूसरे वर्ग के वर्ण के साथ नहीं: सम्मान, उन्नति, जन्म, वाङ्मय, चिन्मय। य, र, ल, व, श, स, ह से पहले अनुस्वार ही लगता है: संयम, संरक्षण, संवाद, संसार, संहार। अं और अः न स्वर हैं न व्यंजन, इसलिए अयोगवाह कहलाते हैं। विसर्ग (ः) ‘ह’ जैसी ध्वनि है और तत्सम शब्दों में आता है: अतः, प्रातः, पुनः।

संयुक्त व्यंजन और द्वित्व

स्वर-रहित व्यंजन हलंत (्) से दिखाया जाता है: क्, जगत्। दो भिन्न व्यंजनों के बीच स्वर न हो तो संयुक्त व्यंजन बनता है: प्यार, स्वर, विद्या। वर्णमाला के चार संयुक्त व्यंजन हैं: क्ष (क् + ष), त्र (त् + र), ज्ञ (ज् + ञ), श्र (श् + र); ज्ञ बोला ‘ग्य’ जैसा जाता है, पर उसमें ज और ञ हैं। एक ही व्यंजन दो बार आए तो द्वित्व: पक्का, बिल्ली, कुत्ता। महाप्राण का द्वित्व नहीं होता, उससे पहले उसी वर्ग का अल्पप्राण आता है: मक्खन, पत्थर, अच्छा, बुड्ढा। स्वर-रहित र् अगले व्यंजन के ऊपर रेफ बनता है: कर्म, पूर्व, निर्णय, आशीर्वाद; इसलिए ‘आर्शीवाद’ अशुद्ध है। व्यंजन के बाद आया र नीचे पदेन बनता है: प्रकार, क्रम, ग्राम; ट, ड के साथ ट्र, ड्र (ट्रक, राष्ट्र)। र के साथ उ, ऊ के रूप भी अलग हैं: रु (गुरु, रुपया), रू (रूप)।

परीक्षा के जाल

ऋ स्वर है, व्यंजन नहीं। अं, अः अयोगवाह हैं। व दंतोष्ठ्य है, ओष्ठ्य नहीं; ए, ऐ कंठ-तालव्य और ओ, औ कंठोष्ठ्य हैं। श, ष, स अघोष हैं, पर ह सघोष है। अनुस्वार व्यंजन है और अनुनासिक स्वर का गुण, इसलिए ‘हंस’ और ‘हँस’ अलग शब्द हैं।

मुख्य तथ्य

  • हिंदी के 11 स्वर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ; ह्रस्व चार (अ, इ, उ, ऋ), दीर्घ सात, प्लुत का उदाहरण ओ३म्।
  • 33 मूल व्यंजन: 25 स्पर्श (क से म), 4 अंतःस्थ (य, र, ल, व), 4 ऊष्म (श, ष, स, ह); उत्क्षिप्त ड़, ढ़; संयुक्त क्ष, त्र, ज्ञ, श्र।
  • उच्चारण स्थान: कंठ्य (अ, आ, क-वर्ग, ह, विसर्ग); तालव्य (इ, ई, च-वर्ग, य, श); मूर्धन्य (ऋ, ट-वर्ग, र, ष); दंत्य (त-वर्ग, ल, स); ओष्ठ्य (उ, ऊ, प-वर्ग)।
  • दो स्थानों वाले वर्ण: ए, ऐ कंठ-तालव्य; ओ, औ कंठोष्ठ्य; व दंतोष्ठ्य; ङ, ञ, ण, न, म नासिक्य।
  • अल्पप्राण: वर्ग का पहला, तीसरा, पाँचवाँ वर्ण और य, र, ल, व; महाप्राण: वर्ग का दूसरा, चौथा वर्ण और श, ष, स, ह।
  • अघोष: वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण और श, ष, स; सघोष: वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण, य, र, ल, व, ह और सभी स्वर।
  • अनुस्वार बनाम अनुनासिक: हंस (पक्षी) और हँस (हँसना); अंगना (स्त्री) और अँगना (आँगन); मैं, नहीं, में में बिंदु है पर उच्चारण अनुनासिक।
  • पंचम वर्ण का नियम: गङ्गा = गंगा, सन्त = संत, सम्पादक = संपादक; पर सम्मान, उन्नति, जन्म, वाङ्मय, चिन्मय में अनुस्वार नहीं लगता।
  • रेफ और द्वित्व: आशीर्वाद शुद्ध (आर्शीवाद अशुद्ध); महाप्राण के द्वित्व में पहले अल्पप्राण आता है: मक्खन, पत्थर, अच्छा, बुड्ढा।

एक नज़र में दोहराव

वर्ण सबसे छोटी ध्वनि; 11 स्वर और 33 मूल व्यंजन (44), अयोगवाह अं-अः, उत्क्षिप्त ड़-ढ़, संयुक्त क्ष-त्र-ज्ञ-श्र (कुल गिनती 44/46/48/52, पुस्तक अनुसार); ह्रस्व अ, इ, उ, ऋ; ए-ऐ कंठ-तालव्य, ओ-औ कंठोष्ठ्य, व दंतोष्ठ्य; महाप्राण वर्ग के 2, 4 वर्ण और श, ष, स, ह; अघोष वर्ग के 1, 2 वर्ण और श, ष, स; अनुस्वार व्यंजन, अनुनासिक स्वर-गुण (हंस-हँस); ड़, ढ़, ङ, ञ से शब्द आरंभ नहीं होता।

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