41 में से पाठ 2 · हिंदी व्याकरण
शब्द-भेद: तत्सम-तद्भव, देशज-विदेशज, रूढ़-यौगिक-योगरूढ़ और विकारी-अविकारी
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शब्द और उसके वर्गीकरण
एक या अधिक वर्णों का स्वतंत्र और सार्थक समूह शब्द कहलाता है; ‘कमल’ शब्द है, पर ‘लमक’ नहीं, क्योंकि उसका कोई अर्थ नहीं। वाक्य में प्रयुक्त होकर विभक्ति या प्रत्यय से जुड़ा शब्द ‘पद’ कहलाता है। शब्दों को चार आधारों पर बाँटा जाता है: उत्पत्ति या स्रोत के आधार पर (तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज), रचना या बनावट के आधार पर (रूढ़, यौगिक, योगरूढ़), प्रयोग या रूपांतर के आधार पर (विकारी, अविकारी) और अर्थ के आधार पर (एकार्थी, अनेकार्थी, पर्यायवाची, विलोम)। परीक्षा में पहले तीन आधार सबसे अधिक पूछे जाते हैं।
तत्सम और तद्भव
तत्सम (तत् + सम, अर्थात् उसके समान) वे शब्द हैं जो संस्कृत से बिना बदले हिंदी में आए हैं: अग्नि, सूर्य, क्षेत्र, दुग्ध, हस्त, कर्म, ग्राम। तद्भव (तत् + भव, अर्थात् उससे उत्पन्न) वे शब्द हैं जो संस्कृत से पालि, प्राकृत और अपभ्रंश से होते हुए बदले रूप में आए: आग, सूरज, खेत, दूध, हाथ, काम, गाँव। कुछ पुस्तकें बीच की अवस्था को अर्धतत्सम कहती हैं, जैसे अग्नि से अगिन और फिर आग। तत्सम पहचानने के संकेत: ऋ, ष, क्ष, ज्ञ, श्र और संयुक्ताक्षर प्रायः तत्सम में मिलते हैं, और तद्भव में ये सरल हो जाते हैं। व से ब (वन से बन), य से ज (यमुना से जमुना, यश से जस), क्ष से ख या छ (क्षेत्र से खेत, अक्षि से आँख), श से स (शिक्षा से सीख) बनते हैं; संयुक्त व्यंजन टूटकर पहला स्वर दीर्घ हो जाता है (हस्त से हाथ, कर्म से काम, सप्त से सात)।
भरोसेमंद तत्सम-तद्भव जोड़े
घृत-घी, दधि-दही, उष्ट्र-ऊँट, गृह-घर, भ्रातृ-भाई, ओष्ठ-होंठ, काष्ठ-काठ, शय्या-सेज, आश्चर्य-अचरज, कोकिल-कोयल, पक्षी-पंछी, वधू-बहू, शृगाल-सियार, धैर्य-धीरज, मक्षिका-मक्खी, ज्येष्ठ-जेठ, भिक्षा-भीख, हरिद्रा-हल्दी, श्वश्रू-सास, श्वसुर-ससुर, चतुर्थ-चौथा, षष्ठ-छठा, दीपावली-दीवाली, मयूर-मोर, अंधकार-अँधेरा। जाल यह है कि जोड़े उलटे दिए जाते हैं और पूछा जाता है ‘तत्सम कौन-सा है’; ऊपर के हर जोड़े में पहला शब्द तत्सम है। जल, फल, वन, कमल, पवन जैसे शब्द तत्सम ही हैं, भले ही वे सरल लगें।
देशज, विदेशज और संकर
देशज वे शब्द हैं जो लोक-व्यवहार में अपने-आप बने और जिनका स्रोत संस्कृत या किसी विदेशी भाषा में नहीं मिलता: लोटा, पगड़ी, खिड़की, जूता, डिबिया, तेंदुआ, झाड़ू; किसी विशेष शब्द को देशज मानने पर पुस्तकों में कुछ मतभेद भी मिलता है। विदेशज वे शब्द हैं जो दूसरी भाषाओं से आए। अरबी से: अदालत, किताब, कानून, कलम, तारीख, मुकदमा। फ़ारसी से: आराम, दरवाज़ा, गुलाब, चश्मा, ज़मीन। तुर्की से: तोप, चाकू, कैंची, बेगम, बहादुर, उर्दू। पुर्तगाली से: अलमारी, बाल्टी, चाबी, तौलिया, अनानास, पादरी, गिरजा। कुछ शब्दों के स्रोत पर पुस्तकें एकमत नहीं हैं: ‘लाश’ को कई परीक्षा-पुस्तकें तुर्की बताती हैं, पर शब्दकोश इसे फ़ारसी मानते हैं, और ‘गोभी’ को कुछ पुस्तकें पुर्तगाली बताती हैं, जबकि इसका स्रोत अनिश्चित है। अंग्रेज़ी से: स्कूल, डॉक्टर, टिकट, रेल, बटन, स्टेशन। फ़्रांसीसी से कारतूस और कूपन, चीनी से चाय और लीची, जापानी से रिक्शा। दो भिन्न स्रोतों के शब्दों से बने शब्द संकर कहलाते हैं: रेलगाड़ी (अंग्रेज़ी + हिंदी), टिकटघर, बेढंगा (फ़ारसी ‘बे’ + हिंदी ‘ढंग’)।
रचना के आधार पर
रूढ़ शब्द वे हैं जिनके खंड करने पर खंडों का कोई अर्थ नहीं निकलता और जो परंपरा से एक अर्थ में चलते हैं: घर, पेड़, जल, दिन, पानी, घोड़ा। ‘घर’ को घ + र में तोड़ें तो कोई अर्थ नहीं बचता। यौगिक शब्द दो या अधिक सार्थक खंडों से बनते हैं और उनका अर्थ उन्हीं खंडों के जोड़ से निकलता है: विद्यालय (विद्या + आलय), पाठशाला, पुस्तकालय, घुड़सवार, सुपुत्र, दूधवाला, प्रतिदिन। योगरूढ़ शब्द यौगिक की तरह सार्थक खंडों से बनते हैं, पर किसी एक विशेष अर्थ के लिए रूढ़ हो जाते हैं: पंकज (पंक में जन्मा) केवल कमल के लिए आता है, कीचड़ में जन्मे मेंढक या कीड़े के लिए नहीं। ऐसे ही जलज, नीलकंठ (शिव), लंबोदर (गणेश), दशानन (रावण), गिरिधर (कृष्ण), चक्रपाणि (विष्णु), वीणापाणि (सरस्वती), चारपाई। ध्यान दें कि बहुव्रीहि समास के अधिकतर उदाहरण योगरूढ़ शब्द होते हैं।
प्रयोग के आधार पर विकारी
जिन शब्दों का रूप लिंग, वचन, कारक या काल के कारण बदलता है, वे विकारी हैं। ये चार हैं: संज्ञा (लड़का, लड़के, लड़कों), सर्वनाम (मैं, मुझे, मेरा), विशेषण (अच्छा, अच्छी, अच्छे) और क्रिया (पढ़ता, पढ़ी, पढ़ेंगे)। ध्यान दें कि हर विशेषण नहीं बदलता; आकारांत विशेषण बदलते हैं (काला घोड़ा, काली घोड़ी), पर सुंदर, लाल, ईमानदार जैसे विशेषण नहीं बदलते, फिर भी वे विकारी वर्ग में गिने जाते हैं, क्योंकि यह वर्ग पूरे शब्द-भेद का है।
प्रयोग के आधार पर अविकारी
जिन शब्दों का रूप कभी नहीं बदलता, वे अविकारी या अव्यय हैं: ‘लड़का धीरे चलता है’, ‘लड़कियाँ धीरे चलती हैं’ में ‘धीरे’ वैसा ही रहता है। अव्यय के भेद हैं: क्रियाविशेषण (आज, यहाँ, धीरे), संबंधबोधक (के पास, के बिना, की ओर), समुच्चयबोधक (और, परंतु, क्योंकि, कि), विस्मयादिबोधक (अरे!, वाह!, हाय!) और निपात (ही, भी, तो, तक, मात्र)। एक ही शब्द प्रयोग के अनुसार अलग भेद का हो सकता है: ‘पास आओ’ में ‘पास’ क्रियाविशेषण है, पर ‘घर के पास’ में संबंधबोधक; ‘तेज़ घोड़ा’ में ‘तेज़’ विशेषण है, पर ‘घोड़ा तेज़ दौड़ता है’ में क्रियाविशेषण। इसलिए शब्द-भेद का उत्तर वाक्य में उसका काम देखकर दीजिए।
परीक्षा के जाल
(1) तत्सम-तद्भव जोड़े में संस्कृत रूप ही तत्सम है; ‘आग’, ‘हाथ’, ‘खेत’ तद्भव हैं। (2) ‘पंकज’, ‘जलज’, ‘नीलकंठ’ योगरूढ़ हैं, यौगिक नहीं; ‘विद्यालय’, ‘पाठशाला’ यौगिक हैं। (3) ‘अलमारी’, ‘चाबी’, ‘बाल्टी’ पुर्तगाली और ‘तोप’, ‘चाकू’, ‘कैंची’ तुर्की हैं, अंग्रेज़ी नहीं। (4) अविकारी शब्द कभी रूप नहीं बदलते; ‘धीरे’, ‘और’, ‘के पास’ इसी वर्ग में हैं। (5) शब्द-भेद वाक्य में प्रयोग से तय होता है, अकेले शब्द से नहीं।
मुख्य तथ्य
- उत्पत्ति के आधार पर चार भेद: तत्सम (अग्नि), तद्भव (आग), देशज (लोटा, पगड़ी), विदेशज (किताब, स्कूल); दो स्रोतों से बने शब्द संकर (रेलगाड़ी)।
- तत्सम-तद्भव: घृत-घी, दधि-दही, उष्ट्र-ऊँट, गृह-घर, भ्रातृ-भाई, शृगाल-सियार, श्वश्रू-सास, हरिद्रा-हल्दी, मयूर-मोर।
- तद्भव बनने के संकेत: व से ब (वन-बन), य से ज (यमुना-जमुना), क्ष से ख (क्षेत्र-खेत), श से स (शिक्षा-सीख), संयुक्ताक्षर सरल (हस्त-हाथ)।
- विदेशज: अरबी (अदालत, कानून, कलम), फ़ारसी (आराम, दरवाज़ा, चश्मा), तुर्की (तोप, चाकू, कैंची), पुर्तगाली (अलमारी, बाल्टी, चाबी, तौलिया)।
- रूढ़: घर, पेड़, जल; यौगिक: विद्यालय, पाठशाला, पुस्तकालय; योगरूढ़: पंकज (कमल), जलज, दशानन (रावण), लंबोदर (गणेश)।
- विकारी चार: संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया; अविकारी (अव्यय): क्रियाविशेषण, संबंधबोधक, समुच्चयबोधक, विस्मयादिबोधक, निपात।
- प्रयोग से भेद बदलता है: ‘पास आओ’ (क्रियाविशेषण), ‘घर के पास’ (संबंधबोधक); ‘तेज़ घोड़ा’ (विशेषण), ‘तेज़ दौड़ता है’ (क्रियाविशेषण)।
- योगरूढ़ की पहचान: खंड सार्थक हों पर अर्थ एक विशेष वस्तु या व्यक्ति तक सीमित हो; पंकज कीचड़ में जन्मे हर जीव के लिए नहीं, केवल कमल के लिए।
एक नज़र में दोहराव
उत्पत्ति से: तत्सम (संस्कृत ज्यों का त्यों: अग्नि, क्षेत्र), तद्भव (बदला रूप: आग, खेत), देशज (लोटा, पगड़ी, खिड़की), विदेशज (अरबी कलम, फ़ारसी चश्मा, तुर्की तोप, पुर्तगाली अलमारी, अंग्रेज़ी स्टेशन), संकर (रेलगाड़ी); रचना से: रूढ़ (घर), यौगिक (विद्यालय), योगरूढ़ (पंकज, दशानन); प्रयोग से: विकारी (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया), अविकारी (अव्यय); भेद वाक्य में प्रयोग से तय होता है।