41 में से पाठ 26 · वाक्य शुद्धि और वर्तनी
वर्तनी की अशुद्धियाँ (1): मात्रा, अनुस्वार-अनुनासिक और मानक वर्तनी के नियम
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
वर्तनी और परीक्षा का प्रश्न
वर्तनी किसी शब्द को लिखने का मानक रूप है, यानी उसमें कौन-से वर्ण, कौन-सी मात्राएँ और कौन-से चिह्न किस क्रम में आएँगे। देवनागरी लगभग उच्चारण के अनुसार लिखी जाती है, इसलिए भूलें वहीं होती हैं जहाँ बोलचाल में दो ध्वनियों का अंतर मिट गया है, जैसे छोटी-बड़ी मात्रा या बिंदु-चंद्रबिंदु, या जहाँ तत्सम शब्द संस्कृत के नियम साथ लाते हैं। परीक्षा में प्रायः चार विकल्पों में से शुद्ध वर्तनी चुननी होती है, और विकल्प केवल एक-दो मात्राओं में भिन्न होते हैं, जैसे ‘परीक्षा, परिक्षा, परीक्सा, परिकषा’। ऐसे प्रश्न में केवल वही अक्षर देखिए जो विकल्पों में बदल रहा है, और उसी पर नियम लगाइए। मानक वर्तनी का आधार भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय के नियम हैं।
इ और ई की मात्रा
संस्कृत से आई इकारांत स्त्रीलिंग संज्ञाओं में छोटी इ रहती है: शक्ति, बुद्धि, रात्रि, विधि, कीर्ति, संस्कृति, संपत्ति, हानि, तिथि, और ‘अंजलि’ से बने श्रद्धांजलि, पुष्पांजलि; इसलिए ‘शक्ती’, ‘रात्री’, ‘श्रद्धांजली’ अशुद्ध हैं। बड़ी ई को प्रायः छोटी लिख दिया जाता है: परीक्षा, प्रतीक्षा, निरीक्षण, दीक्षा, आजीविका, ईर्ष्या; और ‘प्रदर्शनी’ शुद्ध है, ‘प्रदर्शिनी’ अशुद्ध। विसर्ग संधि में ‘निः’ के बाद र आए तो विसर्ग (र्) लुप्त होकर इ दीर्घ हो जाती है: निः + रोग = नीरोग, निः + रस = नीरस; इसलिए ‘निरोग’ और ‘निरस’ अशुद्ध माने जाते हैं। ‘ईय’ प्रत्यय में बड़ी ई (भारतीय, राष्ट्रीय, स्थानीय) और ‘इक’ में छोटी इ (दैनिक, मासिक) आती है। रूप बदलने पर ई छोटी हो जाती है: नदी से नदियाँ, स्त्री से स्त्रियाँ, स्थायी से स्थायित्व, उत्तरदायी से उत्तरदायित्व; संस्कृत के ‘इन्’ अंत वाले शब्दों के समास में भी: मंत्री से मंत्रिमंडल, स्वामी से स्वामिभक्त, प्राणी से प्राणिमात्र। ‘मंत्रीमंडल’ लिखना आम है, पर व्याकरण की पुस्तकें ‘मंत्रिमंडल’ को शुद्ध मानती हैं।
उ और ऊ की मात्रा
तत्सम उकारांत शब्दों में प्रायः छोटा उ होता है: वायु, आयु, ऋतु, वस्तु, धातु, हेतु, सेतु, जंतु, साधु, शत्रु, पशु, शिशु, प्रभु, मधु, बंधु, गुरु। तद्भव और देशज शब्दों के अंत में प्रायः बड़ा ऊ आता है: आलू, भालू, आँसू, डाकू, झाड़ू, लड्डू, उल्लू, बहू। ‘वधू’ और ‘भू’ तत्सम होकर भी बड़े ऊ वाले हैं; यह अपवाद याद रखिए। बहुवचन बनाते समय ऊ छोटा हो जाता है: डाकू से डाकुओं, आलू से आलुओं, बहू से बहुएँ, वधू से वधुएँ। शब्द के बीच के कठिन शब्द हैं: अनुकूल, प्रतिकूल, भूगोल, मूल्य, सूर्य, शून्य, पूर्ण, पूर्व, दूषित, अनुसूची, नूपुर, मुहूर्त (मुहुर्त नहीं), धूम्रपान (धुम्रपान नहीं)। र के साथ ‘रु’ और ‘रू’ का भ्रम सबसे अधिक होता है। रुपया, रुचि, गुरु, तरुण, करुणा, पुरुष और अरुण में छोटा उ है; रूप, रूस, रूठना, शुरू और रूढ़ि में बड़ा ऊ। इसलिए ‘रूपया’ और ‘पुरूष’ अशुद्ध हैं।
ए-ऐ और ओ-औ
इन जोड़ियों में मात्रा बदलते ही अर्थ बदल जाता है: ‘और’ (तथा) और ‘ओर’ (दिशा), ‘बैर’ (शत्रुता) और ‘बेर’ (फल), ‘मैल’ (गंदगी) और ‘मेल’ (मिलाप), ‘सौ’ (संख्या) और ‘सो’ (सोना क्रिया)। इसलिए ‘मेरी और देखो’ अशुद्ध है और ‘मेरी ओर देखो’ शुद्ध; ‘दोनों भाइयों में बेर हो गया’ के स्थान पर ‘बैर हो गया’ शुद्ध है। इस भाग का सबसे काम का नियम ‘इक’ प्रत्यय का है: ‘इक’ लगने पर प्रायः शब्द के पहले स्वर की वृद्धि होती है; अ का आ बनता है, इ, ई और ए का ऐ बनता है, तथा उ, ऊ और ओ का औ बनता है। इसलिए समाज से सामाजिक, सप्ताह से साप्ताहिक, वर्ष से वार्षिक, धर्म से धार्मिक, अर्थ से आर्थिक, व्यवहार से व्यावहारिक, प्रमाण से प्रामाणिक; नीति से नैतिक, इतिहास से ऐतिहासिक, विज्ञान से वैज्ञानिक, वेद से वैदिक, सेना से सैनिक; भूगोल से भौगोलिक, उद्योग से औद्योगिक, पुराण से पौराणिक, लोक से लौकिक, भूत से भौतिक। ‘परलोक’ से ‘पारलौकिक’ बनता है, जिसमें दोनों खंडों के स्वर बढ़ते हैं; यह विशेष स्थिति है, सामान्यतः केवल पहला स्वर बढ़ता है (सर्वजन से सार्वजनिक)। श्रमिक, धनिक और क्रमिक जैसे कुछ शब्दों में वृद्धि होती ही नहीं। ‘समाजिक’, ‘नेतिक’, ‘भोगोलिक’ जैसे विकल्प इसी नियम से पकड़े जाते हैं।
अनुस्वार और अनुनासिक
अनुस्वार (ं) में ध्वनि नाक से निकलती है और यह अगले व्यंजन से जुड़े नासिक्य की तरह बोला जाता है: संसार, गंगा, हंस, अंक। अनुनासिक (ँ, चंद्रबिंदु) में स्वर ही नाक और मुँह दोनों से बोला जाता है: हँसना, आँख, चाँद, माँ, गाँव, पाँच, दाँत। यह अंतर अर्थ भी बदलता है: ‘हंस’ (पक्षी) और ‘हँस’ (हँसना से), ‘अंगना’ (स्त्री) और ‘अँगना’ (आँगन)। निदेशालय के अनुसार जहाँ ध्वनि अनुनासिक है, वहाँ चंद्रबिंदु लगाना आवश्यक है; जब शिरोरेखा के ऊपर कोई मात्रा हो (ि, ी, े, ै, ो, ौ), तब चंद्रबिंदु के स्थान पर केवल बिंदु लगता है, यद्यपि उच्चारण अनुनासिक ही रहता है: मैं, में, नहीं, हैं, क्यों, कहीं, गोंद। स्त्रीलिंग बहुवचन क्रिया के अंतिम ई पर बिंदु लगता है (‘लड़कियाँ गईं’, ‘उसने पुस्तकें पढ़ीं’), पर विशेषण पर नहीं (‘अच्छी लड़कियाँ’)। पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) के बाद उसी वर्ग का वर्ण आए तो निदेशालय अनुस्वार लिखने को कहता है: गंगा, चंचल, ठंडा, संध्या, संपादक, हिंदी। पर यदि पंचमाक्षर के बाद किसी दूसरे वर्ग का वर्ण या य, व जैसा वर्ण आए, या वही पंचमाक्षर दोबारा आए, तो पूरा वर्ण लिखा जाता है: अन्य, कन्या, पुण्य, वाङ्मय, उन्मुख, चिन्मय, अन्न, सम्मान, सम्मेलन। ‘सम्’ उपसर्ग वाले संयम, संवाद, संसार, संहार में अनुस्वार ही रहता है, क्योंकि संस्कृत में भी वहाँ अनुस्वार है।
निदेशालय के अन्य मानक नियम
क्रिया और विशेषण के रूपों में स्वरात्मक रूप लिखे जाते हैं: गए, गई, नई, किए, लिए, दीजिए, चाहिए; ‘गये’, ‘नयी’, ‘किये’, ‘चाहिये’ अमानक हैं। पर जहाँ य मूल शब्द का अंग है, वहाँ य बना रहता है: स्थायी, दायित्व, अव्ययीभाव। परसर्ग संज्ञा से अलग लिखे जाते हैं (राम ने, बच्चों के लिए) और सर्वनाम से मिलाकर (उसने, मुझको, आपसे); सर्वनाम के साथ दो परसर्ग हों तो पहला मिलाकर और दूसरा अलग (उसके लिए, इसमें से), और बीच में ‘ही’ या ‘तक’ आए तो सब अलग (आप ही के लिए)। पूर्वकालिक ‘कर’ क्रिया से मिलाकर लिखा जाता है (खाकर, पढ़कर), जबकि संयुक्त क्रिया के अंग अलग रहते हैं (पढ़ा करता है, जा सकता है)। तत्सम शब्दों में विसर्ग बना रहता है (अतः, प्रायः, पुनः, दुःख), पर तद्भव प्रयोग में छूट सकता है (‘दुख-सुख’)। जहाँ नुक़्ता से अर्थ बदलता है, वहाँ उसे लगाना चाहिए: ‘राज’ (शासन) और ‘राज़’ (रहस्य)।
परीक्षा के जाल
पहला जाल तत्सम स्त्रीलिंग शब्दों पर बड़ी ई लगाना (श्रद्धांजली, रात्री) और ‘परीक्षा’, ‘प्रदर्शनी’ की बड़ी ई को छोटा करना है। दूसरा, ‘रु’ और ‘रू’ की अदला-बदली (रूपया, पुरूष, मुहुर्त)। तीसरा, ‘इक’ प्रत्यय में पहले स्वर की वृद्धि भूलना (समाजिक, व्यवहारिक, एतिहासिक)। चौथा, समास और बहुवचन में ई का छोटा होना न जानना (मंत्रीमंडल, नदीयाँ)। पाँचवाँ, ‘और-ओर’ तथा ‘हंस-हँस’ को एक मान लेना। ध्यान रहे कि पुराने पंचमाक्षर रूप (हिन्दी, सम्पादक) और बिना चंद्रबिंदु के छपाई रूप (आंख, चांद) प्रचलित हैं; ‘अशुद्ध’ वर्तनी पूछी जाए तो पहले देखिए कि कोई दूसरा विकल्प स्पष्ट रूप से अशुद्ध तो नहीं, और ‘मानक’ वर्तनी पूछी जाए तो निदेशालय वाला रूप चुनिए।
मुख्य तथ्य
- इ/ई (तत्सम स्त्रीलिंग): शक्ति, बुद्धि, रात्रि, विधि, कीर्ति, तिथि, श्रद्धांजलि शुद्ध; शक्ती, रात्री, विधी, श्रद्धांजली अशुद्ध।
- बड़ी ई: परीक्षा, प्रतीक्षा, निरीक्षण, आजीविका, ईर्ष्या, प्रदर्शनी शुद्ध; परिक्षा, प्रतिक्षा, निरिक्षण, आजिविका, इर्ष्या, प्रदर्शिनी अशुद्ध।
- निः + र: नीरोग, नीरस, नीरव शुद्ध (विसर्ग का लोप, इ दीर्घ); निरोग, निरस अशुद्ध।
- ई और ऊ का छोटा होना: नदी-नदियाँ, स्त्री-स्त्रियाँ, स्थायी-स्थायित्व, मंत्री-मंत्रिमंडल, प्राणी-प्राणिमात्र; डाकू-डाकुओं, बहू-बहुएँ।
- उ/ऊ: वायु, आयु, ऋतु, वस्तु, गुरु, रुपया, पुरुष में छोटा उ; आलू, डाकू, वधू, शुरू, रूप, मुहूर्त, धूम्रपान में बड़ा ऊ।
- ‘इक’ से वृद्धि: समाज-सामाजिक, वर्ष-वार्षिक, व्यवहार-व्यावहारिक, प्रमाण-प्रामाणिक, नीति-नैतिक, इतिहास-ऐतिहासिक, भूगोल-भौगोलिक, उद्योग-औद्योगिक, परलोक-पारलौकिक; पर श्रमिक, धनिक, क्रमिक में वृद्धि नहीं।
- अर्थ-भेद: और (तथा) / ओर (दिशा), बैर (शत्रुता) / बेर (फल), मैल (गंदगी) / मेल (मिलाप), हंस (पक्षी) / हँस (हँसना), अंगना (स्त्री) / अँगना (आँगन)।
- चंद्रबिंदु और बिंदु: आँख, चाँद, पाँच, गाँव में चंद्रबिंदु; ऊपर मात्रा होने पर केवल बिंदु: मैं, में, नहीं, हैं, क्यों; ‘लड़कियाँ गईं’ पर ‘अच्छी लड़कियाँ’।
- पंचमाक्षर: गंगा, चंचल, ठंडा, संध्या, हिंदी, संपादक में अनुस्वार; अन्य, कन्या, वाङ्मय, उन्मुख, अन्न, सम्मान, सम्मेलन में पूरा पंचमाक्षर।
- निदेशालय के रूप: गए, गई, नई, किए, लिए, चाहिए (गये, नयी, किये नहीं); राम ने पर उसने; उसके लिए; पढ़कर; जा सकता है; अतः, प्रायः, दुःख।
एक नज़र में दोहराव
तत्सम इकारांत स्त्रीलिंग में छोटी इ (शक्ति, रात्रि, श्रद्धांजलि); परीक्षा, प्रतीक्षा, प्रदर्शनी में ई; निः + र से नीरोग, नीरस; बहुवचन-समास में ई-ऊ छोटी (नदियाँ, मंत्रिमंडल, डाकुओं); तत्सम उकारांत में उ (वायु, गुरु), तद्भव में ऊ (आलू), अपवाद वधू; रुपया, पुरुष पर रूप, शुरू, मुहूर्त; ‘इक’ से वृद्धि (सामाजिक, व्यावहारिक, नैतिक, भौगोलिक, पारलौकिक); और/ओर, बैर/बेर, हंस/हँस; ऊपर मात्रा पर बिंदु (मैं, नहीं); सवर्गी पंचमाक्षर का अनुस्वार (गंगा, हिंदी) पर अन्य, सम्मान; गए, नई, किए, चाहिए।