41 में से पाठ 25 · अपठित गद्यांश
काव्यांश और तथ्यात्मक गद्यांश: भाव, अलंकार, शब्दार्थ, समय-प्रबंधन और आम गलतियाँ
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
काव्यांश के प्रश्न कैसे आते हैं
कुछ परीक्षाओं में गद्यांश की जगह कविता की चार-छह पंक्तियाँ, अर्थात् काव्यांश या पद्यांश, दी जाती हैं। उन पर प्रायः कविता का भाव, उचित शीर्षक, कठिन शब्दों के अर्थ, किसी पंक्ति का अलंकार और कभी-कभी रस या भाषा पूछे जाते हैं। कविता में बात सीधे नहीं कही जाती, इसलिए पहले उसे अपने शब्दों में गद्य की तरह बोलकर देखिए: किसका वर्णन है, कौन-सा समय या ऋतु है, और कवि का मन प्रसन्न है, दुखी है या जोश से भरा है। भाषा पहचानने का सरल संकेत क्रिया के रूप हैं: ‘था’, ‘गया’, ‘हुआ’ जैसे रूपों वाली कविता खड़ी बोली में है, जबकि ‘भयो’, ‘गयो’ जैसे ओकारांत रूप प्रायः ब्रजभाषा के संकेत हैं; राजस्थानी में भी ऐसे रूप मिलते हैं, इसलिए यह संकेत है, अंतिम प्रमाण नहीं।
अलंकार पहचानने की कुंजी
हर प्रमुख अलंकार का एक पहचान-चिह्न है। अनुप्रास में एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति होती है। यमक में एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है और हर बार अर्थ अलग होता है, जैसे ‘काली घटा का घमंड घटा’ में पहला ‘घटा’ बादल है और दूसरा ‘कम हुआ’। श्लेष में शब्द एक ही बार आता है पर एक साथ एक से अधिक अर्थ देता है। उपमा में समानता बताई जाती है और ‘सा’, ‘सी’, ‘से’, ‘सम’, ‘समान’, ‘जैसा’ जैसे वाचक शब्द दिखते हैं; इसके चार अंग हैं: उपमेय, उपमान, वाचक शब्द और साधारण धर्म, जैसे ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ में मुख, चंद्रमा, ‘समान’ और ‘सुंदर’। रूपक में वाचक शब्द नहीं होता और उपमेय तथा उपमान को एक ही मान लिया जाता है (चरण-कमल, मुख-चंद्र); समास-विग्रह में ‘चरणकमल’ को ‘कमल के समान चरण’ (कर्मधारय) लिखा जाता है, पर अलंकार की दृष्टि से इसमें वाचक शब्द नहीं और उपमेय-उपमान का अभेद है, इसलिए यह रूपक है। उत्प्रेक्षा में संभावना या कल्पना होती है और ‘मानो’, ‘मनु’, ‘जनु’, ‘जानो’ इसके संकेत हैं। मानवीकरण में प्रकृति या निर्जीव वस्तु को मनुष्य की तरह काम करते दिखाया जाता है; यह पाश्चात्य काव्यशास्त्र से आया अलंकार है, इसलिए संस्कृत की पुरानी सूचियों में नहीं मिलता, पर आज की परीक्षाओं में पूछा जाता है।
हल किया हुआ उदाहरण, काव्यांश
यह स्वरचित काव्यांश पढ़िए: ‘भोर हुई, नभ में लाली छाई, / चिड़ियाँ चहकीं, चली पुरवाई। / खेतों में सरसों मुसकाई, / सोने-सी पीली धरती लहराई।’ प्रश्न 1, मुख्य भाव: प्रातःकाल में गाँव के खेतों की प्राकृतिक सुंदरता; ‘भोर’ और ‘लाली’ समय बताते हैं और ‘चहकीं’, ‘मुसकाई’ से कवि का स्वर प्रसन्नता का है, इसलिए ‘किसान की निर्धनता’ या ‘वर्षा का कष्ट’ जैसे विकल्प गलत होंगे। प्रश्न 2, शब्दार्थ: ‘पुरवाई’ पूर्व दिशा से चलने वाली हवा है; ‘नभ’ आकाश है, जिसके पर्यायवाची गगन, व्योम और अंबर हैं। प्रश्न 3, ‘खेतों में सरसों मुसकाई’ में मानवीकरण, क्योंकि मुसकाना मनुष्य का काम है और यहाँ फूली सरसों को दिया गया है। प्रश्न 4, ‘सोने-सी पीली धरती लहराई’ में उपमा: उपमेय धरती, उपमान सोना, वाचक शब्द ‘सी’ और साधारण धर्म ‘पीली’। प्रश्न 5, ‘चिड़ियाँ चहकीं, चली’ में ‘च’ की आवृत्ति से अनुप्रास। एक काव्यांश में कई अलंकार हो सकते हैं, इसलिए उत्तर प्रश्न में दी गई पंक्ति पर ही दीजिए।
तथ्यात्मक और विवरणात्मक गद्यांश
समाचार, रिपोर्ट या किसी वस्तु, संस्था या प्रक्रिया का विवरण देने वाले गद्यांश में भाव कम और तथ्य अधिक होते हैं: तिथियाँ, संख्याएँ, नाम, क्रम और कारण। इन पर प्रायः ‘कब’, ‘कितने’, ‘किसने’, ‘किस क्रम में’ और ‘किसका उल्लेख नहीं है’ पूछा जाता है। विधि खोजकर पढ़ने की है: प्रश्न से मुख्य शब्द या संख्या लीजिए, गद्यांश में वही पंक्ति ढूँढ़िए और उत्तर उसी से मिलाइए। उत्तर गद्यांश के अनुसार दिया जाता है, अपनी जानकारी के अनुसार नहीं। ‘उल्लेख नहीं है’ वाले प्रश्न में हर विकल्प को गद्यांश में खोजिए; जो न मिले, वही उत्तर है।
हल किया हुआ उदाहरण, तथ्यात्मक गद्यांश
‘भारत में डाक को सही स्थान तक जल्दी पहुँचाने के लिए 15 अगस्त 1972 को पिन कोड प्रणाली शुरू की गई। पिन का पूरा रूप पोस्टल इंडेक्स नंबर है। यह छह अंकों की संख्या होती है। इसका पहला अंक क्षेत्र बताता है, दूसरा उप-क्षेत्र, और पहले तीन अंक मिलकर छँटाई ज़िले की पहचान कराते हैं। अंतिम तीन अंक उस डाकघर को बताते हैं जहाँ डाक पहुँचनी है।’ प्रश्न 1, प्रणाली कब शुरू हुई? उत्तर: 15 अगस्त 1972। प्रश्न 2, पिन कोड में कितने अंक होते हैं? उत्तर: छह। प्रश्न 3, छँटाई ज़िले की पहचान कैसे होती है? उत्तर: पहले तीन अंकों से; ‘केवल तीसरा अंक’ वाला विकल्प जाल है, क्योंकि गद्यांश ‘पहले तीन अंक मिलकर’ कहता है। प्रश्न 4, किसका उल्लेख नहीं है? (क) पिन का पूरा रूप (ख) पहले अंक का काम (ग) प्रणाली बनाने वाले व्यक्ति का नाम (घ) अंतिम तीन अंकों का काम; उत्तर (ग)। प्रश्न 5, उचित शीर्षक: ‘पिन कोड प्रणाली’; ‘भारतीय डाक का इतिहास’ बहुत व्यापक है।
समय-प्रबंधन
गद्यांश वाले प्रश्न सबसे अधिक समय लेते हैं, इसलिए उनका क्रम पहले से तय रखिए। प्रायः लाभ इसमें है कि पहले व्याकरण और शब्द-भंडार के छोटे प्रश्न हल हों, फिर गद्यांश, ताकि समय कम पड़ने पर आसान अंक न छूटें। एक गद्यांश पर क्रम यह रहे: प्रश्नों पर एक दृष्टि, फिर एक बार पूरा पाठ, फिर उत्तर; दूसरी बार पूरा गद्यांश नहीं, केवल चिह्नित पंक्ति पढ़िए। जिन परीक्षाओं में नकारात्मक अंकन है, वहाँ दो विकल्पों में उलझन हो तो पंक्ति से एक बार और मिलाइए; फिर भी निर्णय न हो तो उस परीक्षा के अंकन-नियम को ध्यान में रखकर ही प्रश्न करने या छोड़ने का निर्णय कीजिए। अभ्यास के समय घड़ी लगाकर गद्यांश हल कीजिए, ताकि परीक्षा भवन में गति अपने-आप बने।
आम गलतियाँ
पहली, प्रश्न के ‘नहीं’, ‘असत्य’, ‘के अतिरिक्त’ को अनदेखा करना। दूसरी, गद्यांश का कोई शब्द विकल्प में देखकर उसे चुन लेना, जबकि विकल्प का अर्थ गद्यांश के विपरीत हो। तीसरी, अपनी जानकारी या राय को उत्तर बना देना। चौथी, काव्यांश में पूरी कविता का अलंकार बताना, जबकि प्रश्न एक पंक्ति का है। पाँचवीं, उपमा और रूपक में भ्रम: ‘सा’, ‘समान’ जैसा वाचक शब्द हो तो उपमा; न हो और दोनों को एक मान लिया गया हो तो रूपक। छठी, यमक और श्लेष में भ्रम: शब्द एक से अधिक बार आए और हर बार अर्थ बदले तो यमक, एक ही बार आकर एक से अधिक अर्थ दे तो श्लेष। सातवीं, तथ्यात्मक गद्यांश में ‘लगभग’, ‘से अधिक’, ‘केवल’ जैसे शब्द छोड़कर संख्या मिलाना। इन सबका एक ही उपाय है: हर उत्तर को उस पंक्ति से मिलाइए जिससे वह निकला है।
मुख्य तथ्य
- काव्यांश पर प्रायः भाव, शीर्षक, कठिन शब्दों के अर्थ, किसी पंक्ति का अलंकार और कभी-कभी रस या भाषा पूछे जाते हैं; पहले उसे गद्य की तरह अपने शब्दों में समझें।
- अनुप्रास: वर्ण की आवृत्ति (चिड़ियाँ चहकीं, चली); यमक: शब्द एक से अधिक बार, हर बार अर्थ अलग (काली घटा का घमंड घटा); श्लेष: शब्द एक बार, अर्थ एक से अधिक।
- उपमा के चार अंग: उपमेय, उपमान, वाचक शब्द (सा, सी, सम, समान, जैसा), साधारण धर्म; ‘सोने-सी पीली धरती’ में धरती, सोना, सी, पीली।
- रूपक: वाचक शब्द नहीं, उपमेय और उपमान एक मान लिए जाते हैं (चरण-कमल, मुख-चंद्र); उत्प्रेक्षा: संभावना, संकेत मानो, मनु, जनु, जानो।
- मानवीकरण: प्रकृति या निर्जीव वस्तु को मनुष्य की तरह काम करते दिखाना (खेतों में सरसों मुसकाई); यह पाश्चात्य काव्यशास्त्र से आया अलंकार है।
- शब्दार्थ: पुरवाई = पूर्व दिशा से चलने वाली हवा; नभ = आकाश (गगन, व्योम, अंबर); भोर = प्रातःकाल।
- तथ्यात्मक गद्यांश: प्रश्न से मुख्य शब्द या संख्या लें, वही पंक्ति खोजें; उत्तर गद्यांश के अनुसार दें, अपनी जानकारी से नहीं।
- पिन कोड: 15 अगस्त 1972 से, छह अंक; पहला अंक क्षेत्र, दूसरा उप-क्षेत्र, पहले तीन मिलकर छँटाई ज़िला, अंतिम तीन डाकघर।
- समय: पहले व्याकरण के छोटे प्रश्न, फिर गद्यांश; दूसरी बार पूरा गद्यांश नहीं, केवल चिह्नित पंक्ति पढ़ें; नकारात्मक अंकन हो तो अंधा अनुमान नहीं।
- आम भूलें: ‘नहीं’ वाला प्रश्न सीधा पढ़ना, पूरी कविता का अलंकार बताना, उपमा-रूपक और यमक-श्लेष में भ्रम, ‘लगभग’ या ‘केवल’ छोड़कर संख्या मिलाना।
एक नज़र में दोहराव
काव्यांश: पहले गद्य की तरह अर्थ समझें, फिर भाव, शीर्षक, शब्दार्थ, अलंकार; अनुप्रास वर्ण-आवृत्ति, यमक में एक शब्द बार-बार भिन्न अर्थ में, श्लेष में एक बार अनेक अर्थ, उपमा में वाचक शब्द (सा, सी, समान), रूपक में अभेद, उत्प्रेक्षा में मानो-जनु, मानवीकरण में प्रकृति मनुष्य जैसी; तथ्यात्मक गद्यांश में मुख्य शब्द से पंक्ति खोजें, उत्तर गद्यांश के अनुसार; पहले छोटे प्रश्न, फिर गद्यांश; ‘नहीं’, ‘केवल’, ‘लगभग’ पर ध्यान।