41 में से पाठ 35 · पर्यायवाची और विलोम शब्द
विलोम शब्द (1): विलोम बनाने के तरीके और प्रमुख युग्म
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
विलोम शब्द और उनकी शर्तें
जो शब्द किसी शब्द का उलटा अर्थ दे, उसे विलोम या विपरीतार्थक शब्द कहते हैं, जैसे सत्य-असत्य, उदय-अस्त। सही विलोम की तीन शर्तें हैं। पहली, शब्द-भेद वही हो: संज्ञा का विलोम संज्ञा और विशेषण का विशेषण (उन्नति-अवनति, उन्नत-अवनत)। दूसरी, स्रोत वही हो: तत्सम का विलोम तत्सम और उर्दू का उर्दू (सम्मान-अपमान, पर इज्जत-बेइज्जती)। तीसरी, अर्थ उसी प्रसंग में उलटा हो: ‘हलका बोझ’ का उलटा ‘भारी’ है, पर ‘हलका रंग’ का उलटा ‘गहरा’। विलोम बनाने के चार मुख्य ढंग हैं: शब्द से पहले उपसर्ग जोड़ना (ज्ञान-अज्ञान), एक उपसर्ग को दूसरे से बदलना (सुगम-दुर्गम), समास के एक पद या प्रत्यय को बदलना (कृतज्ञ-कृतघ्न, अग्रज-अनुज), और बिलकुल अलग शब्द रखना (दिन-रात)। नर-नारी जैसे लिंग-युग्म कई परीक्षा-पुस्तकों की विलोम-सूचियों में मिलते हैं, पर कुछ व्याकरण इन्हें विलोम नहीं, लिंग-परिवर्तन मानते हैं; प्रश्न में ऐसा जोड़ा आए तो बाकी विकल्प देखकर निर्णय कीजिए। ध्यान रहे कि ‘राजा’ का विलोम सूचियों में प्रायः ‘रंक’ दिया जाता है, ‘रानी’ नहीं।
‘अ’ और ‘अन्’ जोड़कर
संस्कृत का निषेधवाचक उपसर्ग व्यंजन से शुरू होने वाले शब्द से पहले ‘अ’ और स्वर से शुरू होने वाले शब्द से पहले ‘अन्’ बनता है। ‘अ’ वाले विलोम: ज्ञान-अज्ञान, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, शुभ-अशुभ, पूर्ण-अपूर्ण, स्थिर-अस्थिर, संभव-असंभव, साधारण-असाधारण, योग्य-अयोग्य, पवित्र-अपवित्र, मूर्त-अमूर्त, लौकिक-अलौकिक, ज्ञात-अज्ञात, हिंसा-अहिंसा, चल-अचल, मर्त्य-अमर्त्य। ‘अन्’ वाले विलोम: आदर-अनादर, उचित-अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक, उपस्थित-अनुपस्थित, अर्थ-अनर्थ, उदार-अनुदार, आसक्त-अनासक्त, इच्छा-अनिच्छा, एक-अनेक, आस्था-अनास्था, उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण, उपयुक्त-अनुपयुक्त, अधिकार-अनधिकार, आचार-अनाचार, इष्ट-अनिष्ट। दो बारीकियाँ याद रखिए। ‘नश्वर-अनश्वर’ में ‘अन्’ नहीं, ‘अ’ लगा है (अ + नश्वर), क्योंकि नश्वर व्यंजन से शुरू होता है। और हिंदी के तद्भव शब्दों में ‘अन’ व्यंजन से पहले भी आता है: अनपढ़, अनजान, अनमोल, अनगिनत; स्वर वाला नियम केवल तत्सम शब्दों पर लागू होता है। कहीं-कहीं ‘न’ भी निषेध देता है: आस्तिक-नास्तिक।
‘निर्’ और ‘दुर्’ से
‘स’ (सहित) से शुरू होने वाले बहुत-से शब्दों का विलोम ‘निर्’ (रहित) से बनता है, और संधि के कारण ‘निर्’ कहीं ‘निस्’, ‘निष्’, ‘निः’ या ‘नी’ हो जाता है: सजीव-निर्जीव, सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, साक्षर-निरक्षर, सार्थक-निरर्थक, सदोष-निर्दोष, सबल-निर्बल, सापेक्ष-निरपेक्ष, सापराध-निरपराध, सक्रिय-निष्क्रिय, सकाम-निष्काम, सशस्त्र-निःशस्त्र, सरस-नीरस। बिना ‘स’ वाले शब्दों के विलोम भी ‘निर्’ से बनते हैं: आशा-निराशा, आमिष-निरामिष, आश्रित-निराश्रित, और धनी-निर्धन (निर् + धन)। ‘सु’ (अच्छा, सरल) का उलटा ‘दुर्’ (बुरा, कठिन) है, जो संधि से ‘दुस्’, ‘दुष्’ या ‘दुः’ भी बनता है: सुगम-दुर्गम, सुलभ-दुर्लभ, सुबोध-दुर्बोध, सुगंध-दुर्गंध, सुदिन-दुर्दिन, सुकर-दुष्कर, सुकर्म-दुष्कर्म, सुपरिणाम-दुष्परिणाम, सुचरित्र-दुश्चरित्र, सौभाग्य-दुर्भाग्य; ‘सत्’ (संधि में सद् या सज्) वाले शब्दों का विलोम भी ‘दुर्’ से बनता है: सद्भावना-दुर्भावना, सज्जन-दुर्जन, सदाचार-दुराचार। ‘सु’ का दूसरा जोड़ा ‘कु’ है: सुपुत्र-कुपुत्र, सुमति-कुमति, सुपथ-कुपथ, सुरूप-कुरूप, सुपात्र-कुपात्र, सुसंगति-कुसंगति; और ‘विख्यात’ या ‘प्रख्यात’ का विलोम ‘कुख्यात’ है।
‘वि’ और दूसरे उपसर्ग-युग्म
‘वि’ कई शब्दों में उलटा या अलगाव का अर्थ देता है: स्मरण-विस्मरण, पक्ष-विपक्ष, सम-विषम, देश-विदेश, सजातीय-विजातीय, सम्मुख-विमुख, संयोग-वियोग, अनुराग-विराग, आसक्ति-विरक्ति, आकर्षण-विकर्षण, क्रय-विक्रय। पर ‘वि’ हमेशा उलटा नहीं करता: विज्ञान, विख्यात, विशुद्ध और विनम्र में वह विशेषता का भाव देता है। दूसरे प्रमुख उपसर्ग-युग्म ये हैं। स्व और पर: स्वतंत्र-परतंत्र, स्वाधीन-पराधीन, स्वदेश-परदेश, स्वार्थ-परमार्थ। अनु और प्रति: अनुकूल-प्रतिकूल, अनुलोम-प्रतिलोम (कुछ सूचियों में अनुलोम-विलोम भी)। उत् और अव, अप या नि: उन्नति-अवनति, उन्नत-अवनत, उत्कर्ष-अपकर्ष, उत्कृष्ट-निकृष्ट। आ और निर्: आयात-निर्यात। आ और प्र: आदान-प्रदान। आ और अव: आरोह-अवरोह, आज्ञा-अवज्ञा। मूल शब्द में ‘अप’ या ‘अव’ जोड़कर भी विलोम बनते हैं: मान-अपमान, यश-अपयश, कीर्ति-अपकीर्ति, शकुन-अपशकुन, गुण-अवगुण; और उपसर्ग बदलकर उपकार-अपकार।
प्रत्यय या समास का एक पद बदलकर
कई विलोम पूरे शब्द को नहीं, उसके एक हिस्से को बदलकर बनते हैं। कृतज्ञ (किए उपकार को मानने वाला) का विलोम कृतघ्न (किए उपकार को भुला देने वाला) है। ऐसे ही: अग्रज-अनुज, पूर्वज-वंशज, पूर्वार्ध-उत्तरार्ध, पूर्ववर्ती-परवर्ती, पूर्वाह्न-अपराह्न, अधिकतम-न्यूनतम, अल्पज्ञ-बहुज्ञ या सर्वज्ञ, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, दीर्घायु-अल्पायु, मितव्ययी-अपव्ययी, उत्तरायण-दक्षिणायन, अंतर्मुखी-बहिर्मुखी, अंतरंग-बहिरंग, आशावादी-निराशावादी, देशभक्त-देशद्रोही, सकारात्मक-नकारात्मक। इन्हें हल करने की कुंजी यह है कि साझा हिस्सा वैसा ही रहता है और केवल बदलने वाला हिस्सा उलटता है: ‘पूर्व’ का उलटा ‘उत्तर’, ‘पर’ या ‘अपर’, ‘अल्प’ का ‘बहु’, ‘अंतर्’ का ‘बहिर्’, ‘अधिक’ का ‘न्यून’।
बिलकुल अलग शब्द वाले विलोम
बहुत-से विलोम किसी उपसर्ग के नियम से नहीं बनते, इन्हें जोड़े के रूप में ही याद करना पड़ता है। सबसे अधिक पूछे जाने वाले ऐसे युग्म हैं: आदि-अंत, आय-व्यय, आकाश-पाताल, अमृत-विष, उदय-अस्त, उत्थान-पतन, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम, कोमल-कठोर, गुरु-लघु, जड़-चेतन, जीवन-मरण, दिन-रात, दाता-याचक, धूप-छाँव, निंदा-स्तुति, पाप-पुण्य, प्रश्न-उत्तर, प्रकाश-अंधकार, मित्र-शत्रु, मौखिक-लिखित, विधि-निषेध, शीत-उष्ण, सुख-दुःख, स्वर्ग-नरक, हर्ष-विषाद, सृष्टि-प्रलय, स्थूल-सूक्ष्म, सामान्य-विशेष, ठोस-तरल, मूक-वाचाल, कृपण-उदार, नकद-उधार, खरा-खोटा। इन्हें याद करते समय अर्थ भी साथ रखिए: ‘गुरु’ यहाँ भारी या बड़ा है और ‘लघु’ हलका या छोटा; ‘विधि’ करने योग्य काम का विधान है और ‘निषेध’ मनाही; ‘दाता’ देने वाला है और ‘याचक’ माँगने वाला।
उर्दू-फारसी शब्दों के विलोम
उर्दू शब्दों के विलोम प्रायः ना, बे, गैर या बद जोड़कर बनते हैं, और विलोम भी उर्दू का ही होना चाहिए: पसंद-नापसंद, लायक-नालायक, खुश-नाखुश, ईमानदार-बेईमान, इज्जत-बेइज्जती, कसूरवार-बेकसूर, हाजिर-गैरहाजिर, कानूनी-गैरकानूनी, नेकी-बदी, खुशनसीब-बदनसीब। कुछ उर्दू विलोम अलग शब्द से बनते हैं: आबाद-बरबाद, आजाद-गुलाम, अमीर-गरीब, फायदा-नुकसान, इकरार-इनकार, हलाल-हराम। ‘उपस्थित’ का विलोम ‘अनुपस्थित’ लिखिए और ‘हाजिर’ का ‘गैरहाजिर’; ‘उपस्थित-गैरहाजिर’ जैसा मिश्रण विलोम का अच्छा उदाहरण नहीं माना जाता।
मुख्य तथ्य
- अ (व्यंजन से पहले): ज्ञान-अज्ञान, धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, शुभ-अशुभ, संभव-असंभव, लौकिक-अलौकिक, हिंसा-अहिंसा, मर्त्य-अमर्त्य।
- अन् (स्वर से पहले): आदर-अनादर, उचित-अनुचित, आवश्यक-अनावश्यक, उपस्थित-अनुपस्थित, अर्थ-अनर्थ, इच्छा-अनिच्छा, एक-अनेक, उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण, अधिकार-अनधिकार।
- बारीकी: नश्वर-अनश्वर में ‘अ’ लगा है (अ + नश्वर); अनपढ़, अनजान, अनमोल जैसे तद्भव शब्दों में ‘अन’ व्यंजन से पहले भी आता है।
- स और निर्: सजीव-निर्जीव, सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, साक्षर-निरक्षर, सार्थक-निरर्थक, सक्रिय-निष्क्रिय, सकाम-निष्काम, सरस-नीरस, सापराध-निरपराध।
- सु (या सत्) और दुर्: सुगम-दुर्गम, सुलभ-दुर्लभ, सुबोध-दुर्बोध, सुकर-दुष्कर, सुचरित्र-दुश्चरित्र, सज्जन-दुर्जन, सदाचार-दुराचार, सौभाग्य-दुर्भाग्य; सु और कु: सुपुत्र-कुपुत्र, सुमति-कुमति, सुरूप-कुरूप।
- उपसर्ग-युग्म: स्वतंत्र-परतंत्र, स्वाधीन-पराधीन, अनुकूल-प्रतिकूल, संयोग-वियोग, अनुराग-विराग, उन्नति-अवनति, उत्कर्ष-अपकर्ष, आयात-निर्यात, आदान-प्रदान, आरोह-अवरोह, आज्ञा-अवज्ञा।
- अप या अव जोड़कर: मान-अपमान, यश-अपयश, कीर्ति-अपकीर्ति, शकुन-अपशकुन, गुण-अवगुण; उपसर्ग बदलकर उपकार-अपकार।
- पद बदलकर: कृतज्ञ-कृतघ्न, अग्रज-अनुज, पूर्वज-वंशज, पूर्वार्ध-उत्तरार्ध, पूर्वाह्न-अपराह्न, अधिकतम-न्यूनतम, अल्पज्ञ-सर्वज्ञ, दीर्घायु-अल्पायु, मितव्ययी-अपव्ययी, अंतर्मुखी-बहिर्मुखी।
- अलग शब्द: आदि-अंत, आय-व्यय, उदय-अस्त, उत्थान-पतन, कोमल-कठोर, गुरु-लघु, जड़-चेतन, दाता-याचक, निंदा-स्तुति, मौखिक-लिखित, शीत-उष्ण, स्थूल-सूक्ष्म, मूक-वाचाल।
- उर्दू के विलोम उर्दू में: पसंद-नापसंद, ईमानदार-बेईमान, हाजिर-गैरहाजिर, कानूनी-गैरकानूनी, खुशनसीब-बदनसीब, आबाद-बरबाद, इकरार-इनकार।
एक नज़र में दोहराव
विलोम का शब्द-भेद, स्रोत और प्रसंग वही हो; तत्सम में व्यंजन से पहले अ (ज्ञान-अज्ञान), स्वर से पहले अन् (आदर-अनादर), पर नश्वर-अनश्वर में अ; स और निर् (सजीव-निर्जीव, सरस-नीरस), सु और दुर् या कु (सुगम-दुर्गम, सुपुत्र-कुपुत्र), स्व-पर, अनु-प्रति, सम्-वि, उत्-अव या अप, आ-निर् (आयात-निर्यात), आ-प्र (आदान-प्रदान); मान-अपमान, गुण-अवगुण; पद बदलकर कृतज्ञ-कृतघ्न, अग्रज-अनुज; वि हमेशा उलटा नहीं (विज्ञान, विख्यात); उर्दू में ना, बे, गैर, बद।