8 में से पाठ 8 · विज्ञान और उसका शिक्षणशास्त्र (पेपर II)
विज्ञान में मूल्यांकन, पाठ्य सामग्री और उपचारात्मक शिक्षण
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विज्ञान में CCE
RTE अधिनियम 2009 की धारा 29(2)(ज) बच्चे के ज्ञान की समझ और उसे लागू करने की क्षमता के व्यापक और सतत मूल्यांकन की अपेक्षा करती है। सतत का अर्थ है कि आकलन पूरे वर्ष शिक्षण के अंग के रूप में चलता है: रचनात्मक आकलन अधिगम के लिए आकलन है, जो सीखने के दौरान प्रतिपुष्टि देता है, और योगात्मक आकलन सत्र के अंत में अधिगम का आकलन है; अधिगम के रूप में आकलन का अर्थ है कि बच्चे स्व-आकलन और सहपाठी आकलन द्वारा अपने सीखने की निगरानी स्वयं करते हैं। व्यापक का अर्थ है कि यह शैक्षिक और सह-शैक्षिक दोनों क्षेत्रों को समेटता है: ज्ञान, प्रक्रिया कौशल, अभिवृत्तियाँ, मूल्य और प्रायोगिक कार्य। NEP 2020 नियमित, रचनात्मक और दक्षता-आधारित आकलन चाहती है, जो रटने के बजाय उच्चतर क्रम के कौशलों को परखे।
आकलन के उपकरण
कागज़-कलम परीक्षाएँ विज्ञान अधिगम के केवल एक भाग को पकड़ पाती हैं। शिक्षक मौखिक प्रश्न, गतिविधियों के दौरान अवलोकन, उपाख्यानात्मक अभिलेख (महत्वपूर्ण घटनाओं पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ), जाँच सूचियाँ (सूचीबद्ध व्यवहारों के लिए हाँ या नहीं), निर्धारण मापनियाँ (किसी गुण की मात्रा), रूब्रिक (स्तरों सहित मानदंड, पहले से साझा किए गए), पोर्टफ़ोलियो (समय के साथ प्रगति दिखाने वाला संकलित कार्य), संकल्पना मानचित्र और एक से अधिक स्वीकार्य उत्तर वाले मुक्त-उत्तरीय प्रश्नों का भी उपयोग करते हैं। प्रतिपुष्टि केवल अंक न होकर वर्णनात्मक होनी चाहिए, जो बच्चे को बताए कि क्या अच्छा हुआ और कैसे सुधार करें।
तीनों क्षेत्रों का आकलन
संज्ञानात्मक क्षेत्र की ब्लूम की वर्गिकी (1956) को 2001 में एंडरसन और क्रैथवोल ने स्मरण, बोध, अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्यांकन और सृजन के रूप में संशोधित किया। क्रैथवोल का भावात्मक क्षेत्र ग्रहण करने और अनुक्रिया करने से मूल्य निर्धारण, संगठन और चारित्रीकरण तक जाता है, और आर.एच. डेव के मनोगत्यात्मक स्तर अनुकरण (इमिटेशन), हस्तकौशल (मैनिपुलेशन), परिशुद्धता (प्रिसिज़न), समन्वय (आर्टिकुलेशन) और स्वाभाविकीकरण (नेचुरलाइज़ेशन) हैं। प्रक्रिया कौशलों का आकलन प्रदर्शन द्वारा होता है: चरों के नियंत्रण को परखने के लिए एक व्यवस्था दिखाकर पूछें कि कौन-सा कारक समान रखना होगा; अभिलेखन परखने के लिए बच्चों से पाठ्यांक तालिका में भरवाएँ। 'पता लगाने का तरीका बनाओ कि गेंद कठोर फ़र्श पर अधिक ऊँची उछलती है या नरम फ़र्श पर' जैसा कार्य अन्वेषण की योजना बनाने का आकलन करता है, जो सृजन स्तर का कौशल है।
प्रायोगिक कार्य
प्रायोगिक कार्य का आकलन योजना बनाने, उपकरणों को सही और सुरक्षित ढंग से संभालने, ईमानदारी से प्रेक्षण और अभिलेखन करने, परिणामों की व्याख्या करने और उन्हें संप्रेषित करने के आधार पर होता है, जिसके लिए प्रदर्शन का अवलोकन, प्रयोगशाला अभिलेख और छोटे मौखिक प्रश्न प्रयुक्त होते हैं। सुरक्षा भी इसका अंग है: रसायनों को कभी न चखें, सीधे सूँघने के बजाय वाष्प को हाथ से हल्के से नाक की ओर लाएँ, गर्म परखनली का मुँह लोगों से दूर रखें और अम्ल को धीरे-धीरे जल में मिलाएँ। जहाँ प्रयोगशालाएँ नहीं हैं, वहाँ किट और कामचलाऊ उपकरण हर बच्चे को सामग्री संभालने का अवसर देते हैं, और समूह में भूमिकाएँ बदलते रहने से ऐसा नहीं होता कि कुछ बच्चे, प्रायः लड़के, प्रयोग करें और बाकी केवल देखते रहें।
पाठ्य सामग्री और सहायक सामग्री
NCF 2005 पाठ्यपुस्तक को अनेक संसाधनों में से एक मानती है, संपूर्ण पाठ्यचर्या नहीं; शिक्षक स्थानीय पर्यावरण, समुदाय और बच्चों के अपने अनुभवों का भी उपयोग करता है। NCF 2005 पर आधारित NCERT की उच्च प्राथमिक विज्ञान पुस्तकें गतिविधियों के इर्द-गिर्द बनी हैं, जिनमें पहेली और बूझो नामक पात्र बच्चों के प्रश्न उठाते हैं; अच्छी विज्ञान पाठ्यपुस्तक सटीक, आयु के अनुरूप, गतिविधि-आधारित, जेंडर-संवेदी, पर्यावरण से जुड़ी और सरल भाषा में लिखी होती है। एडगर डेल का अनुभव शंकु (1946) प्रत्यक्ष, उद्देश्यपूर्ण अनुभव को आधार पर और शाब्दिक प्रतीकों को शिखर पर रखता है: अनुभव जितना मूर्त होगा, अधिगम उतना ही स्थायी होगा।
भ्रांत धारणाएँ
बच्चे दैनिक अनुभव और भाषा से बनी अपनी धारणाएँ लेकर आते हैं, जिन्हें वैकल्पिक अवधारणाएँ या भ्रांत धारणाएँ कहते हैं: पौधे अपना भोजन मिट्टी से लेते हैं, भारी वस्तुएँ तेज़ी से गिरती हैं, चंद्रमा का अपना प्रकाश है, चंद्रमा की कलाएँ पृथ्वी की छाया से बनती हैं (वह ग्रहण है), ऋतुएँ सूर्य से दूरी पर निर्भर हैं, चमगादड़ पक्षी है, मकड़ी कीट है, खुंभी (मशरूम) पौधा है, और ऊष्मा तथा ताप एक ही हैं। ऐसी धारणाएँ टिकाऊ होती हैं और केवल बता देने से दूर नहीं होतीं। रचनावादी क्रम यह है: नैदानिक प्रश्न या संकल्पना कार्टून से धारणा को सामने लाना, ऐसी गतिविधि से संज्ञानात्मक द्वंद्व उत्पन्न करना जिसका परिणाम उस धारणा के विपरीत हो, चर्चा द्वारा बच्चों को धारणा का पुनर्गठन करने में मदद करना, और उसे नई स्थितियों में लागू करना। पोस्नर और उनके सहयोगियों (1982) के अनुसार संकल्पनात्मक परिवर्तन के लिए पुरानी धारणा से असंतोष और ऐसी नई धारणा चाहिए जो बोधगम्य, विश्वसनीय और फलदायी हो।
निदान और उपचारात्मक शिक्षण
नैदानिक परीक्षण त्रुटियों के पीछे की विशिष्ट कठिनाई का पता लगाता है, जैसे यह कि परिपथ के प्रश्नों में असफल बच्चा यह नहीं जानता कि परिपथ बंद होना चाहिए, या चालकों और विद्युतरोधियों में भ्रमित है; इसका उद्देश्य ग्रेड देना नहीं है। इसके बाद उपचारात्मक शिक्षण होता है, पहली विधि से भिन्न विधि से: मूर्त सामग्री, छोटे समूह, सहपाठी शिक्षण, अधिक उदाहरण और व्यक्तिगत ध्यान, और फिर पुनः परीक्षण। त्रुटियाँ बच्चों की सोच की खिड़कियाँ हैं, दंड के अवसर नहीं। तेज़ी से सीखने वालों को उन्हीं अभ्यासों की अधिकता के बजाय परियोजनाओं और चुनौतीपूर्ण समस्याओं जैसी संवर्धन (समृद्धि) गतिविधियाँ चाहिए।
विज्ञान शिक्षण की समस्याएँ
आम समस्याएँ हैं परीक्षा-केंद्रित रटंत, प्रयोगशालाओं और उपकरणों की कमी, बड़ी कक्षाएँ, बोझिल पाठ्यक्रम, ऐसी भाषा में विज्ञान पढ़ाना जो बच्चा घर पर नहीं बोलता, गतिविधि-आधारित विधियों में अप्रशिक्षित शिक्षक, विज्ञान कौन कर सकता है इस बारे में जेंडर रूढ़िबद्धताएँ, और दैनिक जीवन से कटा विज्ञान। समाधान NCF 2005 और NEP 2020 के अनुरूप हैं: पाठ्यपुस्तक की भाषा के साथ घर की भाषा का उपयोग (NEP 2020 चाहती है कि जहाँ तक संभव हो, कम से कम कक्षा 5 तक, और अधिमानतः कक्षा 8 तथा उसके आगे तक, शिक्षा का माध्यम घर की भाषा, मातृभाषा या स्थानीय भाषा हो), उपकरणों का कामचलाऊ निर्माण, समुदाय और पर्यावरण का संसाधन के रूप में उपयोग, समूह कार्य की योजना, और स्मरण के बजाय समझ का आकलन।
मुख्य तथ्य
- RTE अधिनियम 2009, धारा 29(2)(ज): बच्चे के ज्ञान की समझ और उसे लागू करने की क्षमता का व्यापक और सतत मूल्यांकन।
- रचनात्मक = अधिगम के लिए आकलन (शिक्षण के दौरान); योगात्मक = अधिगम का आकलन (सत्र के अंत में); अधिगम के रूप में आकलन = स्व और सहपाठी निगरानी।
- उपकरण: उपाख्यानात्मक अभिलेख (महत्वपूर्ण घटनाएँ), जाँच सूची (हाँ या नहीं), निर्धारण मापनी (गुण की मात्रा), रूब्रिक (मानदंड और स्तर), पोर्टफ़ोलियो (समय के साथ प्रगति)।
- संशोधित ब्लूम (2001, एंडरसन और क्रैथवोल): स्मरण, बोध, अनुप्रयोग, विश्लेषण, मूल्यांकन, सृजन; भावात्मक क्षेत्र: ग्रहण करने से चारित्रीकरण तक; मनोगत्यात्मक (डेव): अनुकरण से स्वाभाविकीकरण तक।
- प्रयोगशाला सुरक्षा: रसायन कभी न चखें; वाष्प को हाथ से हल्के से नाक की ओर लाएँ; परखनली का मुँह लोगों से दूर रखें; अम्ल को जल में धीरे-धीरे मिलाएँ; रेत, पानी और प्राथमिक उपचार तैयार रखें।
- एडगर डेल का अनुभव शंकु (1946): आधार पर प्रत्यक्ष, उद्देश्यपूर्ण अनुभव, शिखर पर शाब्दिक प्रतीक।
- NCF 2005: पाठ्यपुस्तक एक संसाधन है, एकमात्र नहीं; NCF 2005 पर आधारित NCERT की विज्ञान पुस्तकों में पहेली और बूझो बच्चों के प्रश्न उठाते हैं।
- भ्रांत धारणा सुधारने का क्रम: सामने लाना, संज्ञानात्मक द्वंद्व उत्पन्न करना, पुनर्गठन, अनुप्रयोग; पोस्नर और सहयोगी (1982): असंतोष, बोधगम्य, विश्वसनीय, फलदायी।
- नैदानिक परीक्षण विशिष्ट कठिनाई खोजता है; उपचारात्मक शिक्षण भिन्न विधि से पुनः पढ़ाता है; तेज़ी से सीखने वालों को उसी अभ्यास की अधिकता नहीं, संवर्धन गतिविधियाँ मिलती हैं।
- NEP 2020: जहाँ तक संभव हो, कम से कम कक्षा 5 तक, अधिमानतः कक्षा 8 और उसके आगे तक, शिक्षा का माध्यम घर की भाषा, मातृभाषा या स्थानीय भाषा।
एक नज़र में दोहराव
CCE = RTE अधिनियम 2009, धारा 29(2)(ज); रचनात्मक आकलन अधिगम के लिए, योगात्मक अधिगम का; उपाख्यानात्मक अभिलेख, जाँच सूची, निर्धारण मापनी, रूब्रिक, पोर्टफ़ोलियो; संशोधित ब्लूम 2001; भावात्मक - क्रैथवोल; मनोगत्यात्मक - डेव; प्रक्रिया कौशलों का आकलन प्रदर्शन से; पाठ्यपुस्तक एक संसाधन; डेल का शंकु मूर्त से अमूर्त; भ्रांत धारणाओं के लिए बताना नहीं, संज्ञानात्मक द्वंद्व; पहले नैदानिक परीक्षण फिर उपचारात्मक शिक्षण; तेज़ सीखने वालों के लिए संवर्धन; घर की भाषा विज्ञान सीखने में सहायक।