41 में से पाठ 12 · हिंदी व्याकरण

अलंकार, रस और छंद: अनुप्रास से अतिशयोक्ति, नौ रस और दोहा-चौपाई-सोरठा की मात्राएँ

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अलंकार और उसके भेद

अलंकार का अर्थ है आभूषण; जैसे आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं। अलंकार के दो मुख्य भेद हैं। शब्दालंकार में चमत्कार किसी विशेष शब्द पर टिका होता है; उस शब्द की जगह उसका पर्यायवाची रख दें तो चमत्कार समाप्त हो जाता है। अर्थालंकार में चमत्कार अर्थ में होता है, इसलिए पर्यायवाची रखने पर भी बना रहता है।

शब्दालंकार

अनुप्रास में एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति होती है: ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में’ (मैथिलीशरण गुप्त, ‘पंचवटी’) में ‘च’ की, और ‘तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए’ (भारतेंदु) में ‘त’ की आवृत्ति है; इसके उपभेद छेकानुप्रास, वृत्यनुप्रास, लाटानुप्रास, अंत्यानुप्रास और श्रुत्यनुप्रास हैं। यमक में एक ही शब्द एक से अधिक बार आता है और हर बार उसका अर्थ अलग होता है: ‘कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय’ (बिहारी) में पहला कनक सोना और दूसरा धतूरा है (सोने में धतूरे से सौ गुनी मादकता है); ‘काली घटा का घमंड घटा’ में पहला घटा बादल और दूसरा ‘कम हुआ’। श्लेष में शब्द एक ही बार आता है, पर उसके कई अर्थ निकलते हैं: ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥’ (रहीम) में अंतिम ‘पानी’ के तीन अर्थ हैं: मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए प्रतिष्ठा और चून (आटे) के लिए जल। याद रखिए: यमक में शब्द दोहराया जाता है, श्लेष में नहीं।

उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा

उपमा में दो वस्तुओं की समानता बताई जाती है, और इसके चार अंग हैं: उपमेय (जिसकी तुलना हो), उपमान (जिससे तुलना हो), साधारण धर्म (समान गुण) और वाचक शब्द (सा, सी, से, सम, समान, सरिस, जैसा, ज्यों)। ‘पीपर पात सरिस मनु डोला’ (तुलसी) में मनु (मन) उपमेय, पीपर पात उपमान, डोला साधारण धर्म और सरिस वाचक है; कोई अंग न हो तो लुप्तोपमा: ‘कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा’ में साधारण धर्म (कठोरता) लुप्त है। रूपक में उपमेय और उपमान को एक ही मान लिया जाता है, वाचक शब्द नहीं होता: ‘चरन-कमल बंदौं हरि राई’ (सूरदास), ‘मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं’ (सूरदास), ‘पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो’ (मीराबाई)। उत्प्रेक्षा में उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है; वाचक शब्द हैं मनु, मनहु, मनौ, मानो, जनु, जनहु, जानो: ‘सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम, सलौनैं गात। मनौ नीलमनि-सैल पर आतपु परयौ प्रभात॥’ (बिहारी), जिसमें पीला वस्त्र ओढ़े साँवले कृष्ण में प्रभात की धूप पड़े नीलमणि पर्वत की संभावना की गई है। अंतर: उपमा में समानता, रूपक में अभेद और उत्प्रेक्षा में संभावना।

अतिशयोक्ति और अन्य अर्थालंकार

अतिशयोक्ति में किसी बात को लोक-सीमा से बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाता है: ‘हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥’। विभावना में कारण के बिना कार्य होने का वर्णन होता है: ‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना’ (तुलसी)। संदेह में उपमेय और उपमान में अनिश्चय बना रहता है: ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है’। भ्रांतिमान में भ्रम से एक वस्तु को दूसरी समझ लिया जाता है; मानवीकरण में प्रकृति या निर्जीव वस्तुओं पर मानवीय भावों का आरोप होता है; अन्योक्ति में किसी और के बहाने किसी और की बात कही जाती है।

रस और उसके अंग

काव्य पढ़ने, सुनने या नाटक देखने से जो आनंद मिलता है, वह रस है; आचार्य विश्वनाथ ने रस को काव्य की आत्मा कहा। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का रस-सूत्र है: ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’, अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस बनता है। रस के चार अंग हैं। स्थायी भाव मन में स्थायी रूप से रहने वाले भाव हैं। विभाव भाव जगाने वाले कारण हैं: आलंबन विभाव वह व्यक्ति या वस्तु जिसके कारण भाव जागे (जिसके मन में भाव जागे वह आश्रय, जिसके प्रति जागे वह विषय), और उद्दीपन विभाव भाव को और भड़काने वाली परिस्थिति (चाँदनी, एकांत, शत्रु की ललकार)। अनुभाव आश्रय की वे चेष्टाएँ हैं जिनसे भाव प्रकट होता है: आँसू, रोमांच, कंपन। संचारी या व्यभिचारी भाव थोड़ी देर के लिए आने-जाने वाले भाव हैं, जिनकी संख्या 33 मानी जाती है: शंका, चिंता, हर्ष, ग्लानि, स्मृति, गर्व, आलस्य आदि।

रस और स्थायी भाव

शृंगार का स्थायी भाव रति है (रसराज; संयोग और वियोग या विप्रलंभ दो भेद), हास्य का हास, करुण का शोक, रौद्र का क्रोध, वीर का उत्साह, भयानक का भय, वीभत्स का जुगुप्सा (घृणा), अद्भुत का विस्मय (आश्चर्य) और शांत का निर्वेद (शम)। भरतमुनि ने नाटक के लिए आठ रस माने थे; शांत रस बाद के आचार्यों ने जोड़ा, जिससे नौ रस हुए। बाद में वात्सल्य (स्थायी भाव वात्सल्य या वत्सलता) और भक्ति (स्थायी भाव भगवद्विषयक रति) जोड़कर ग्यारह रस भी गिने जाते हैं। उदाहरण: ‘मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो’ (सूरदास) में वात्सल्य, और ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ (सुभद्राकुमारी चौहान) में वीर रस है। जाल: वियोग शृंगार में मिलने की आशा रहती है, करुण में प्रिय सदा के लिए खो जाता है; वीर का स्थायी भाव उत्साह है, क्रोध नहीं।

छंद और मात्रा-गणना

वर्ण, मात्रा, यति (विराम), गति (प्रवाह) और तुक के नियमों में बँधी रचना छंद कहलाती है; छंद की हर पंक्ति के भाग चरण या पाद कहलाते हैं। मात्रा गिनने के नियम: ह्रस्व स्वर और उनसे बने वर्ण लघु (।, 1 मात्रा) हैं, चंद्रबिंदु वाला ह्रस्व भी लघु रहता है (हँसी में हँ); दीर्घ स्वर, अनुस्वार या विसर्ग वाले वर्ण और संयुक्ताक्षर से ठीक पहले का ह्रस्व वर्ण गुरु (ऽ, 2 मात्रा) हैं (सत्य में स गुरु); हलंत वर्ण की मात्रा नहीं गिनी जाती। वर्णिक छंदों में आठ गण होते हैं, जिन्हें ‘यमाताराजभानसलगा’ सूत्र से याद किया जाता है: यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।), सगण (।।ऽ)। छंद के मुख्य भेद हैं: मात्रिक (दोहा, सोरठा, चौपाई, रोला, हरिगीतिका), वर्णिक (सवैया, कवित्त या घनाक्षरी) और मुक्त छंद। चरणों के आधार पर चौपाई सम, दोहा और सोरठा अर्धसम, और कुंडलिया तथा छप्पय विषम छंद हैं।

दोहा, सोरठा और चौपाई

दोहा अर्धसम मात्रिक छंद है; इसके विषम (पहले, तीसरे) चरणों में 13 और सम (दूसरे, चौथे) चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं, कुल 48; सम चरणों के अंत में गुरु-लघु और तुक होती है: ‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥’ (कबीर); पहले चरण में बड़ा (3), हुआ (3), तो (2), क्या (2), हुआ (3) मिलकर 13 मात्राएँ हैं। सोरठा दोहे का उलटा है: विषम चरणों में 11 और सम चरणों में 13 मात्राएँ, और तुक विषम चरणों में: ‘जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन’ (तुलसी)। चौपाई सम मात्रिक छंद है, जिसके चारों चरणों में 16-16 मात्राएँ होती हैं और चरण के अंत में जगण या तगण नहीं आता: ‘जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥’ (हनुमान चालीसा)। रामचरितमानस मुख्यतः चौपाई में है, बीच-बीच में दोहे और सोरठे हैं। अन्य: रोला 24 मात्राएँ (11-13 पर यति), कुंडलिया दोहा और रोला मिलाकर 6 चरण, हरिगीतिका 28 मात्राएँ (16-12 पर यति)।

मुख्य तथ्य

  • शब्दालंकार बनाम अर्थालंकार: पर्यायवाची रखने पर चमत्कार मिट जाए तो शब्दालंकार (अनुप्रास, यमक, श्लेष), बचा रहे तो अर्थालंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा)।
  • यमक: ‘कनक कनक ते सौ गुनी’ (सोना, धतूरा); श्लेष: ‘पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून’ (चमक, प्रतिष्ठा, जल); यमक में शब्द दोहराया जाता है।
  • उपमा के चार अंग: ‘पीपर पात सरिस मनु डोला’ में मनु (मन) उपमेय, पीपर पात उपमान, डोला साधारण धर्म, सरिस वाचक शब्द।
  • रूपक: ‘चरन-कमल बंदौं हरि राई’, ‘पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो’; उत्प्रेक्षा के वाचक: मनु, मनहु, मनौ, मानो, जनु, जानो।
  • अतिशयोक्ति: ‘हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥’; विभावना: ‘बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना’।
  • रस के अंग: स्थायी भाव, विभाव (आलंबन, उद्दीपन), अनुभाव, संचारी भाव (33); रस-सूत्र भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का।
  • स्थायी भाव: शृंगार-रति, हास्य-हास, करुण-शोक, रौद्र-क्रोध, वीर-उत्साह, भयानक-भय, वीभत्स-जुगुप्सा, अद्भुत-विस्मय, शांत-निर्वेद; वात्सल्य और भक्ति मिलाकर ग्यारह।
  • दोहा: 13-11, कुल 48 मात्राएँ, सम चरणों के अंत में गुरु-लघु; सोरठा: 11-13 (दोहे का उलटा); चौपाई: हर चरण में 16 मात्राएँ।
  • मात्रा: लघु (।) = 1, गुरु (ऽ) = 2; संयुक्ताक्षर से पहले का ह्रस्व गुरु (सत्य), चंद्रबिंदु वाला ह्रस्व लघु (हँसी); गण-सूत्र: यमाताराजभानसलगा।

एक नज़र में दोहराव

शब्दालंकार (अनुप्रास: वर्ण-आवृत्ति; यमक: शब्द दोहराया, अर्थ अलग; श्लेष: शब्द एक, अर्थ अनेक) और अर्थालंकार (उपमा: सा, सम, सरिस; रूपक: अभेद; उत्प्रेक्षा: मनु, मानो, जनु; अतिशयोक्ति; विभावना); रस के अंग: स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव, 33 संचारी; नौ रस, भरत के आठ, वात्सल्य-भक्ति मिलाकर ग्यारह; वीर-उत्साह, करुण-शोक, शांत-निर्वेद; दोहा 13-11, सोरठा 11-13, चौपाई 16 प्रति चरण; यमाताराजभानसलगा।

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