41 में से पाठ 11 · हिंदी व्याकरण

वाक्य-विचार और विराम-चिह्न: वाक्य के अंग, भेद, रूपांतरण और चिह्नों का प्रयोग

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वाक्य और उसके आवश्यक तत्त्व

सार्थक शब्दों का व्यवस्थित समूह, जो पूरा अर्थ प्रकट करे, वाक्य कहलाता है। वाक्य बनने के लिए छह गुण आवश्यक माने जाते हैं। सार्थकता: हर शब्द का अर्थ हो। योग्यता: शब्दों में अर्थ की संगति हो; ‘वह पानी खाता है’ में योग्यता नहीं, ‘वह पानी पीता है’ में है। आकांक्षा: वाक्य सुनकर कुछ और जानने की इच्छा न रहे; अकेला ‘राम पुस्तक’ अधूरा है। आसत्ति या निकटता: वाक्य के शब्द बीच में लंबे अंतराल के बिना कहे जाएँ। पदक्रम: शब्द व्याकरण के क्रम में हों; हिंदी का सामान्य क्रम कर्ता, कर्म, क्रिया है: ‘राम ने रावण को मारा’। अन्वय: लिंग, वचन, पुरुष, कारक और काल का मेल; ‘लड़कियाँ खेल रहा है’ में अन्वय नहीं। हिंदी में विशेषण विशेष्य से पहले और क्रियाविशेषण प्रायः क्रिया से पहले आता है।

वाक्य के अंग

हर वाक्य के दो अंग होते हैं। उद्देश्य वह है जिसके बारे में कुछ कहा जाए, और विधेय वह जो उद्देश्य के बारे में कहा जाए। ‘मेहनती किसान खेत में हल चला रहा है’ में ‘मेहनती किसान’ उद्देश्य है, जिसमें कर्ता ‘किसान’ और उसका विस्तार ‘मेहनती’ है; ‘खेत में हल चला रहा है’ विधेय है, जिसमें क्रिया ‘चला रहा है’, कर्म ‘हल’ और क्रिया का विस्तार ‘खेत में’ है। आज्ञा वाले वाक्यों में उद्देश्य प्रायः छिपा रहता है: ‘पानी लाओ’ में उद्देश्य ‘तुम’ है।

रचना के आधार पर भेद

सरल या साधारण वाक्य में एक उद्देश्य और एक विधेय, अर्थात् एक ही मुख्य समापिका क्रिया होती है: ‘राधा गीत गाती है’, ‘वर्षा होने पर किसान प्रसन्न हुए’। संयुक्त वाक्य में दो या अधिक स्वतंत्र (प्रधान) उपवाक्य समानाधिकरण समुच्चयबोधकों से जुड़े होते हैं: और, एवं, तथा, पर, परंतु, किंतु, लेकिन, या, अथवा, इसलिए, अतः: ‘राम आया और श्याम चला गया’, ‘वह गरीब है, परंतु ईमानदार है’, ‘वह बीमार था, इसलिए नहीं आया’। मिश्र वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य और एक या अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं, जो व्यधिकरण समुच्चयबोधकों (कि, क्योंकि, यदि-तो, ताकि, यद्यपि-तथापि) या संबंधवाचक शब्दों (जो, जिसे, जब-तब, जहाँ-वहाँ) से जुड़ते हैं: ‘मैं जानता हूँ कि वह ईमानदार है’। ध्यान दें: ‘इसलिए’ से जुड़ा वाक्य संयुक्त है, पर ‘क्योंकि’ से जुड़ा मिश्र।

आश्रित उपवाक्य के तीन भेद

संज्ञा उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की क्रिया के कर्ता या कर्म का काम करता है और प्रायः ‘कि’ से आरंभ होता है: ‘उसने कहा कि मैं कल आऊँगा’। विशेषण उपवाक्य प्रधान उपवाक्य की किसी संज्ञा की विशेषता बताता है और जो, जिसे, जिसका, जिसने से आरंभ होता है: ‘वह लड़का, जो कल आया था, मेरा भाई है’। क्रियाविशेषण उपवाक्य प्रधान क्रिया का समय, स्थान, कारण, शर्त या रीति बताता है और जब, जहाँ, क्योंकि, यदि, ताकि, यद्यपि, ज्यों-ही से आरंभ होता है: ‘जब वर्षा हुई, तब मोर नाचने लगे’, ‘यदि तुम परिश्रम करोगे तो सफल होगे’।

अर्थ के आधार पर आठ भेद

विधानवाचक, जिसमें किसी बात का होना बताया जाए (‘सूर्य पूर्व में उगता है’); निषेधवाचक (‘मैं आज बाज़ार नहीं जाऊँगा’); प्रश्नवाचक (‘क्या तुमने भोजन किया?’); आज्ञावाचक, जिसमें आज्ञा, अनुरोध या उपदेश हो (‘तुम घर जाओ’, ‘कृपया बैठिए’); इच्छावाचक, जिसमें इच्छा, आशीर्वाद या शुभकामना हो (‘ईश्वर तुम्हें लंबी आयु दे’, ‘आपकी यात्रा सफल हो’); संदेहवाचक (‘शायद आज वर्षा हो’, ‘वह पहुँच गया होगा’); संकेतवाचक या शर्तवाचक, जिसमें एक काम दूसरे पर निर्भर हो (‘यदि तुम परिश्रम करते तो सफल हो जाते’); और विस्मयादिवाचक (‘वाह! कितना सुंदर दृश्य है!’)।

वाक्य रूपांतरण

अर्थ बदले बिना वाक्य की रचना बदलना वाक्य रूपांतरण है। सरल से मिश्र: ‘वह अस्वस्थ होने के कारण नहीं आया’ से ‘वह नहीं आया, क्योंकि वह अस्वस्थ था’; ‘परिश्रमी व्यक्ति सफल होता है’ से ‘जो व्यक्ति परिश्रम करता है, वह सफल होता है’। सरल से संयुक्त: ‘वह खाना खाकर सो गया’ से ‘उसने खाना खाया और वह सो गया’। संयुक्त से सरल: ‘सूरज निकला और अँधेरा दूर हो गया’ से ‘सूरज निकलने पर अँधेरा दूर हो गया’। मिश्र से सरल: ‘जब वह स्टेशन पहुँचा, तब गाड़ी जा चुकी थी’ से ‘उसके स्टेशन पहुँचने से पहले गाड़ी जा चुकी थी’। अर्थ के आधार पर भी रूपांतरण होता है: विधान से निषेध (‘वह ईमानदार है’ से ‘वह बेईमान नहीं है’) और विधान से प्रश्न (‘सब तुम्हारा आदर करते हैं’ से ‘कौन तुम्हारा आदर नहीं करता?’)।

विराम-चिह्नों का प्रयोग

लिखते समय रुकने और भाव स्पष्ट करने के लिए विराम-चिह्न लगाए जाते हैं। पूर्ण विराम (।) विधान, निषेध और आज्ञा वाले वाक्य के अंत में; कविता में छंद या पद की समाप्ति पर दोहरा दंड (॥)। अल्प विराम (,) शब्दों की सूची में (‘राम, श्याम, मोहन और सोहन आए’; ‘और’ से पहले नहीं), ‘हाँ’ और ‘नहीं’ के बाद (‘हाँ, मैं आऊँगा’), संबोधन के बाद (‘राम, यहाँ आओ’) और उद्धरण से पहले। अल्प विराम की जगह बदलने से अर्थ उलट जाता है: ‘रोको, मत जाने दो’ और ‘रोको मत, जाने दो’। अर्धविराम (;) लंबे वाक्य के ऐसे उपवाक्यों के बीच, जहाँ अल्प विराम से अधिक ठहराव चाहिए। प्रश्नवाचक चिह्न (?) सीधे प्रश्न के अंत में; अप्रत्यक्ष प्रश्न में नहीं: ‘उसने पूछा कि तुम कहाँ जा रहे हो।’ विस्मयादिबोधक चिह्न (!) हर्ष, शोक, घृणा, आश्चर्य और संबोधन के बाद: ‘अरे! तुम आ गए’।

अन्य विराम-चिह्न

योजक चिह्न (-) द्वंद्व समास (माता-पिता), पुनरुक्त शब्दों (धीरे-धीरे) और ‘सा, सी, से’ वाली तुलना (चाँद-सा मुखड़ा) में लगता है। निर्देशक चिह्न (—) किसी कथन या संवाद से पहले और व्याख्या के लिए आता है: ‘अध्यापक — तुमने गृहकार्य किया?’। उद्धरण चिह्न दो प्रकार के हैं: दोहरा (“ ”) किसी के कहे वाक्य को ज्यों का त्यों लिखने में, और इकहरा (‘ ’) किसी शब्द, पुस्तक या उपनाम पर बल देने में: ‘रामचरितमानस’, ‘निराला’। कोष्ठक ( ) अर्थ स्पष्ट करने और नाटक के निर्देशों में: ‘धनंजय (अर्जुन) ने लक्ष्य भेदा’। लाघव चिह्न (॰) संक्षिप्त रूप में: डॉ॰, पं॰, ई॰पू॰। हंसपद या त्रुटिपूरक चिह्न (^) छूटा हुआ शब्द ऊपर लिखने के लिए लगाया जाता है।

मुख्य तथ्य

  • वाक्य के छह आवश्यक तत्त्व: सार्थकता, योग्यता, आकांक्षा, आसत्ति (निकटता), पदक्रम और अन्वय; ‘वह पानी खाता है’ में योग्यता नहीं।
  • उद्देश्य-विधेय: ‘मेहनती किसान खेत में हल चला रहा है’ में ‘मेहनती किसान’ उद्देश्य, ‘खेत में हल चला रहा है’ विधेय।
  • रचना से तीन भेद: सरल (‘राधा गीत गाती है’), संयुक्त (‘राम आया और श्याम चला गया’), मिश्र (‘मैं जानता हूँ कि वह ईमानदार है’)।
  • संयुक्त के योजक: और, तथा, परंतु, किंतु, या, अथवा, इसलिए, अतः; मिश्र के योजक: कि, जो, क्योंकि, यदि-तो, जब-तब, यद्यपि-तथापि।
  • आश्रित उपवाक्य: संज्ञा (‘कि’ से), विशेषण (‘जो, जिसे’ से), क्रियाविशेषण (‘जब, जहाँ, क्योंकि, यदि’ से)।
  • अर्थ से आठ भेद: विधान, निषेध, प्रश्न, आज्ञा, इच्छा (‘ईश्वर तुम्हें लंबी आयु दे’), संदेह (‘शायद वर्षा हो’), संकेत (‘यदि... तो...’), विस्मय (‘वाह!’)।
  • रूपांतरण: ‘परिश्रमी व्यक्ति सफल होता है’ (सरल) से ‘जो व्यक्ति परिश्रम करता है, वह सफल होता है’ (मिश्र)।
  • अल्प विराम से अर्थ बदलता है: ‘रोको, मत जाने दो’ (रोक लो) और ‘रोको मत, जाने दो’ (जाने दो)।
  • अप्रत्यक्ष प्रश्न में प्रश्नवाचक चिह्न नहीं: ‘उसने पूछा कि तुम कहाँ जा रहे हो।’; योजक चिह्न: माता-पिता, धीरे-धीरे, चाँद-सा।

एक नज़र में दोहराव

वाक्य के तत्त्व: सार्थकता, योग्यता, आकांक्षा, आसत्ति, पदक्रम, अन्वय; अंग: उद्देश्य और विधेय; रचना से: सरल (एक समापिका क्रिया), संयुक्त (स्वतंत्र उपवाक्य; और, परंतु, इसलिए), मिश्र (प्रधान + आश्रित; कि, जो, क्योंकि, यदि); आश्रित उपवाक्य: संज्ञा, विशेषण, क्रियाविशेषण; अर्थ से आठ भेद; रूपांतरण में अर्थ न बदले; विराम: । , ; ? ! - — “ ” ( ) ॰; ‘रोको, मत जाने दो’ बनाम ‘रोको मत, जाने दो’।

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