41 में से पाठ 24 · अपठित गद्यांश

क्लोज़ टेस्ट (रिक्त स्थान वाला गद्यांश): संदर्भ, लिंग-वचन-कारक और संयोजक शब्द

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

क्लोज़ टेस्ट क्या है

इसमें एक छोटे गद्यांश के बीच-बीच से शब्द हटाकर रिक्त स्थान बना दिए जाते हैं और हर रिक्त स्थान के लिए चार विकल्प दिए जाते हैं। ‘क्लोज़’ शब्द अंग्रेज़ी ‘क्लोज़र’ (पूर्णता) से लिया गया है: मन अधूरी रचना को अर्थ के सहारे पूरा कर लेता है, और यही क्षमता यह प्रश्न परखता है। विधि दो चरणों की है। पहले चरण में पूरा गद्यांश पढ़िए और हर रिक्त स्थान पर विकल्प देखे बिना अपना शब्द सोचिए, जैसे ‘यहाँ कोई अच्छा गुण आएगा’ या ‘यहाँ विरोध का शब्द आएगा’। दूसरे चरण में वह विकल्प चुनिए जो आपके सोचे भाव के सबसे निकट हो। गलत विकल्प प्रायः ऐसे बनाए जाते हैं जो अकेले पढ़ने पर ठीक लगें पर पूरे गद्यांश में न बैठें। परखने का क्रम यह रखिए: पहले व्याकरण से असंभव विकल्प हटाइए, फिर अर्थ और स्वर से, और अंत में शब्द-संगति से।

संदर्भ के संकेत तीन स्तरों पर

संकेत उसी वाक्य में, पड़ोसी वाक्य में या पूरे गद्यांश के विषय में मिलता है। वाक्य के भीतर ‘के कारण’, ‘के बावजूद’, ‘के समान’ बताते हैं कि परिणाम, विरोध या समानता चाहिए। पड़ोसी वाक्यों में तुलना का ढाँचा दिखता है: ‘पहले लोग पैदल या बैलगाड़ी से यात्रा करते थे, इसलिए यात्रा बहुत ...... होती थी। आज रेल और वायुयान ने उसे ...... बना दिया है।’ ‘पहले’ और ‘आज’ का विरोध बताता है कि पहले रिक्त स्थान में ‘कठिन’ और दूसरे में ‘सरल’ या ‘सुगम’ आएगा। पूरे गद्यांश का संकेत पर्यायवाची शृंखला से मिलता है: स्वच्छता पर लिखा लेखक ‘स्वच्छ’, ‘निर्मल’, ‘शुद्ध’ जैसे शब्द दोहराता है, इसलिए रिक्त स्थान में प्रायः उसी भाव-क्षेत्र का शब्द बैठता है। गद्यांश के स्वर के विपरीत शब्द, चाहे व्याकरण में ठीक हो, प्रायः गलत होता है।

लिंग से परखना

जब विकल्पों में एक ही शब्द के रूप हों (देता, देती, देते), तो निर्णय कर्ता या कर्म के लिंग से होता है, इसलिए संज्ञा का लिंग पक्का होना चाहिए। भूल वाले शब्द याद रखिए: दही, पानी, घी, मोती, हाथी, समाज और महत्त्व पुल्लिंग हैं; आत्मा, पुस्तक, चाय, सरकार, जनता, प्रजा और सभा स्त्रीलिंग। प्रत्यय भी संकेत देते हैं: ‘-ता’ वाली भाववाचक संज्ञाएँ (मित्रता, सुंदरता) और ‘-आई’, ‘-आवट’, ‘-आहट’ वाली (पढ़ाई, लिखावट, घबराहट) स्त्रीलिंग होती हैं, जबकि ‘-त्व’, ‘-पन’, ‘-आव’ वाली (व्यक्तित्व, बचपन, बहाव) पुल्लिंग; पर ‘देवता’ और ‘पिता’ पुल्लिंग हैं, क्योंकि ये भाववाचक संज्ञाएँ नहीं, पुरुष का बोध कराने वाली संज्ञाएँ हैं; ‘पिता’ तो संस्कृत ‘पितृ’ से बना है, उसमें ‘-ता’ प्रत्यय है ही नहीं। इसलिए ‘सरकार ने नई योजना शुरू की’, ‘दही खट्टा है’, ‘देश की जनता जागरूक हो रही है’ सही हैं। ‘जनता’ समूहवाचक होकर भी एकवचन है, जबकि ‘लोग’ सदा बहुवचन: ‘लोग जागरूक हो रहे हैं’। आदर के लिए एक व्यक्ति के साथ भी बहुवचन क्रिया आती है: ‘प्रधानाचार्य जी आ रहे हैं’।

वचन और कारक से परखना

परसर्ग (ने, को, से, में, पर, का, के, की) लगने पर कई संज्ञाओं का रूप बदल जाता है। बहुवचन संज्ञा के बाद परसर्ग हो तो ‘-ओं’ वाला रूप आता है: ‘इन पौधों को समय पर पानी दो’, ‘बच्चों के लिए’; और आकारांत पुल्लिंग एकवचन ‘-ए’ बन जाता है: ‘लड़के ने’, ‘कमरे में’; पर राजा, पिता, देवता, चाचा जैसे शब्द नहीं बदलते: ‘राजा ने’, ‘पिता को’। रिक्त स्थान स्वयं परसर्ग हो तो अर्थ से कारक पहचानिए: ‘वह बस ...... विद्यालय जाता है’ में साधन है, इसलिए ‘से’ (करण); ‘पेड़ ...... पत्ते गिरते हैं’ में अलग होना है, इसलिए ‘से’ (अपादान); ‘माँ ने बच्चे ...... दूध दिया’ में ‘को’ (संप्रदान); ‘छत ...... बंदर बैठा है’ में ‘पर’ (अधिकरण)। ‘ने’ सकर्मक क्रिया के भूतकालिक कृदंत वाले रूपों (खाया, खाया है, खाया था) के साथ आता है, अपूर्ण भूत (खा रहा था) के साथ नहीं; ‘वह आया’ सही है, ‘उसने आया’ नहीं। संयुक्त क्रिया में निर्णय अंतिम क्रिया से होता है: ‘उसने खाना खा लिया’, पर ‘वह खाना खा चुका’। अपवाद: ‘लाना’ सकर्मक होकर भी ‘ने’ नहीं लेता (‘वह पुस्तक लाया’), और ‘नहाना’, ‘छींकना’, ‘खाँसना’, ‘थूकना’ अकर्मक होकर भी ‘ने’ लेते हैं (‘उसने छींका’)। ‘ने’ वाले वाक्य में कर्म के साथ भी ‘को’ हो तो क्रिया पुल्लिंग एकवचन रहती है: ‘लड़की ने बिल्ली को देखा’।

संयोजक शब्दों के वर्ग

पहले दोनों वाक्यों का संबंध पहचानिए। जोड़ने वाले: और, तथा, एवं; विकल्प वाले: या, अथवा, अन्यथा, नहीं तो; विरोध वाले: परंतु, किंतु, लेकिन, बल्कि; परिणाम वाले: इसलिए, अतः, अतएव; कारण वाले: क्योंकि, चूँकि; उद्देश्य वाले: ताकि, जिससे कि; शर्त वाले: यदि...तो; स्वरूप बताने वाले: कि, अर्थात्, यानी। तीन भूलें बार-बार होती हैं। पहली दिशा की: ‘क्योंकि’ के बाद कारण आता है और ‘इसलिए’ के बाद परिणाम: ‘वह विद्यालय नहीं आया, क्योंकि बीमार था’, पर ‘वह बीमार था, इसलिए विद्यालय नहीं आया’। दूसरी दोहराव की: ‘क्योंकि’ और ‘इसलिए’ एक वाक्य में साथ नहीं आते; जोड़ी चाहिए तो ‘चूँकि...इसलिए’। तीसरी ‘बल्कि’ की: यह निषेध के बाद आता है, जैसे ‘वह केवल गायक नहीं, बल्कि अच्छा कवि भी है’। जोड़ी का दूसरा भाग कभी अगले रिक्त स्थान में होता है, इसलिए ‘यद्यपि’ दिखे तो आगे ‘तथापि’ या ‘फिर भी’ खोजिए। मानक व्याकरण ‘यद्यपि’ के साथ ‘तथापि’ (या ‘फिर भी’) की जोड़ी मानता है; बोलचाल और कुछ लेखन में ‘यद्यपि...परंतु’ भी मिलता है, पर वाक्य-शुद्धि के प्रश्नों में इसे प्रायः अशुद्ध माना जाता है, इसलिए विकल्प में ‘तथापि’ हो तो वही चुनिए।

हल किया हुआ उदाहरण

‘पुस्तकें मनुष्य की सबसे अच्छी (1)...... होती हैं। वे बिना कुछ माँगे हमें ज्ञान (2)...... हैं। (3)...... आज मोबाइल फ़ोन के कारण पढ़ने की आदत घटती जा रही है, (4)...... अच्छी पुस्तकों का महत्त्व कम नहीं हुआ है। जो बालक बचपन से ही (5)...... रूप से पढ़ने लगते हैं, उनकी भाषा समृद्ध होती है और सोचने की (6)...... बढ़ती है।’ विकल्प: (1) शत्रु, मित्र, मित्रता, मित्रवत्; (2) लेती, देती, देते, करती; (3) यद्यपि, क्योंकि, इसलिए, जब; (4) तथापि, अतः, और, अथवा; (5) नियम, नियमों, नियमित, नियमितता; (6) शक्ति, शक्तियाँ, शक्तिशाली, बल।

उदाहरण का हल

(1) ‘मित्र’; गद्यांश पुस्तकों की प्रशंसा कर रहा है, इसलिए ‘शत्रु’ स्वर के विपरीत है, ‘पुस्तकें मित्रता होती हैं’ अर्थहीन है और ‘मित्रवत्’ (मित्र के समान) अव्यय है, संज्ञा नहीं। (2) ‘देती’; कर्ता ‘वे’ यहाँ पुस्तकों (स्त्रीलिंग बहुवचन) के लिए आया है, इसलिए ‘देते’ नहीं; ‘लेती’ अर्थ के विपरीत है और संगत जोड़ा ‘ज्ञान देना’ है, ‘ज्ञान करना’ नहीं। (3) और (4) साथ हल होते हैं: एक ओर आदत घटने की बात है, दूसरी ओर महत्त्व न घटने की, अर्थात् विरोध; इसलिए ‘यद्यपि...तथापि’; ‘क्योंकि’ या ‘इसलिए’ कारण-परिणाम बताते, विरोध नहीं। (5) ‘नियमित’, क्योंकि ‘रूप’ संज्ञा से पहले विशेषण चाहिए; बाकी तीनों संज्ञाएँ हैं। (6) ‘शक्ति’, क्योंकि ‘की’ और ‘बढ़ती है’ स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा माँगते हैं; ‘शक्तियाँ’ के साथ ‘बढ़ती हैं’ होता, ‘बल’ पुल्लिंग है (‘सोचने का बल बढ़ता है’) और ‘शक्तिशाली’ विशेषण। अंत में चुने हुए शब्दों के साथ पूरा गद्यांश एक बार पढ़िए; हर वाक्य स्वाभाविक लगे, तभी उत्तर पक्के मानिए।

मुख्य तथ्य

  • विधि: पूरा गद्यांश पढ़कर हर रिक्त स्थान पर विकल्प देखे बिना अपना शब्द सोचें; फिर व्याकरण, अर्थ-स्वर और शब्द-संगति के क्रम में विकल्प हटाएँ।
  • तुलना का संकेत: ‘पहले यात्रा बहुत ...... होती थी, आज रेल ने उसे ...... बना दिया है’ में कठिन और सरल; ‘पहले’ और ‘आज’ विरोध बताते हैं।
  • पुल्लिंग: दही, पानी, घी, मोती, हाथी, समाज, महत्त्व; स्त्रीलिंग: आत्मा, पुस्तक, चाय, सरकार, जनता, प्रजा, सभा।
  • ‘-ता’, ‘-आई’, ‘-आवट’, ‘-आहट’ वाली भाववाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग; ‘-त्व’, ‘-पन’, ‘-आव’ वाली पुल्लिंग; पर देवता और पिता पुल्लिंग हैं।
  • ‘जनता जागरूक हो रही है’ (एकवचन स्त्रीलिंग), ‘लोग जागरूक हो रहे हैं’ (बहुवचन); आदर में ‘प्रधानाचार्य जी आ रहे हैं’।
  • परसर्ग से पहले बहुवचन में ‘-ओं’: इन पौधों को, बच्चों के लिए; आकारांत पुल्लिंग एकवचन में ‘-ए’: लड़के ने, कमरे में; पर राजा ने, पिता को (ये नहीं बदलते)।
  • ‘ने’ के अपवाद: लाना सकर्मक होकर भी ‘ने’ नहीं लेता (वह पुस्तक लाया); नहाना, छींकना, खाँसना, थूकना अकर्मक होकर भी ‘ने’ लेते हैं (उसने छींका)।
  • संयोजक की दिशा: ‘क्योंकि’ के बाद कारण, ‘इसलिए’ के बाद परिणाम; दोनों एक वाक्य में साथ नहीं, जोड़ी ‘चूँकि...इसलिए’; ‘बल्कि’ निषेध के बाद।
  • पुस्तक वाला उदाहरण: मित्र, देती, यद्यपि, तथापि, नियमित, शक्ति; ‘सोचने की ...... बढ़ती है’ में स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा चाहिए।

एक नज़र में दोहराव

क्लोज़ टेस्ट: पूरा गद्यांश पढ़कर पहले अपना शब्द सोचें; व्याकरण, फिर अर्थ-स्वर, फिर संगति से विकल्प हटाएँ; संकेत उसी वाक्य, पड़ोसी वाक्य और पूरे विषय में; लिंग पक्का करें (दही पुल्लिंग, सरकार और जनता स्त्रीलिंग); परसर्ग से पहले ‘-ओं’ और ‘-ए’ रूप; ‘ने’ सकर्मक क्रिया के भूतकालिक कृदंत रूपों (खाया, खाया था) में, अपूर्ण भूत में नहीं, अपवाद लाना और छींकना; ‘ने’ और ‘को’ दोनों हों तो क्रिया पुल्लिंग एकवचन; क्योंकि के बाद कारण, इसलिए के बाद परिणाम; चूँकि...इसलिए, यद्यपि...तथापि; बल्कि निषेध के बाद।

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