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गद्यांश पर आधारित शब्दार्थ और व्याकरण के प्रश्न: पर्यायवाची, विलोम, संधि, समास, उपसर्ग-प्रत्यय
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गद्यांश में व्याकरण क्यों पूछा जाता है
अनेक परीक्षाओं में गद्यांश के नीचे बोध के साथ उसी में आए किसी शब्द का पर्यायवाची, विलोम, संधि-विच्छेद, समास-विग्रह, उपसर्ग या प्रत्यय भी पूछा जाता है। ऐसे प्रश्न दो बातें एक साथ परखते हैं: व्याकरण का ज्ञान और यह समझ कि शब्द इस गद्यांश में किस अर्थ और किस रूप में आया है। इसलिए उत्तर से पहले उस शब्द वाली पूरी पंक्ति पढ़िए, उसका शब्द-भेद (संज्ञा, विशेषण, क्रिया या अव्यय) पहचानिए, फिर विकल्प परखिए। जो उत्तर किसी शब्द-सूची में ठीक हो, वह भी गलत हो सकता है यदि गद्यांश वाले अर्थ से मेल न खाए।
प्रसंग के अनुसार पर्यायवाची
हिंदी के कई शब्द अनेकार्थी हैं और परीक्षक उनका दूसरा अर्थ विकल्प में रखकर जाल बनाता है। ‘कर’ के अर्थ हाथ, किरण, टैक्स और सूँड हैं: ‘सूर्य के कर धरती को गरम करते हैं’ में कर = किरण, ‘सरकार ने नया कर लगाया’ में कर = टैक्स, और दोनों में ‘हस्त’ वाला विकल्प गलत होगा। ‘पत्र’ चिट्ठी भी है और पत्ता भी: ‘पेड़ के पत्र झड़ गए’ में ‘पर्ण’ ठीक है। ‘हार’ पराजय भी है और माला भी; ‘अर्थ’ मतलब भी है और धन भी। दूसरा जाल मिलते-जुलते शब्दों का है: अनिल वायु है पर अनल आग; सविता सूर्य है पर सरिता नदी; नीरज कमल है पर नीरद बादल। ‘कौन-सा पर्यायवाची नहीं है’ वाले प्रश्न में हर विकल्प को उसी एक अर्थ से मिलाइए: ‘जल’ के लिए नीर, वारि, अंबु, तोय सही हैं, पर ‘नीरद’ नहीं।
विलोम में शब्द-भेद और मानक रूप
विलोम उसी शब्द-भेद का होना चाहिए जिसका मूल शब्द है। ‘उन्नति’ संज्ञा है, उसका विलोम ‘अवनति’; ‘उन्नत’ विशेषण है, उसका विलोम ‘अवनत’। ‘ज्ञान’ का विलोम ‘अज्ञान’ है, ‘अज्ञानी’ नहीं, क्योंकि ‘अज्ञानी’ तो ‘ज्ञानी’ का विलोम है। तत्सम शब्द का विलोम प्रायः तत्सम ही होता है और बहुत-से विलोम उपसर्ग बदलकर बनते हैं: आयात-निर्यात, अनुकूल-प्रतिकूल, उत्कर्ष-अपकर्ष, आदान-प्रदान। हर शब्द के आगे ‘अ’ लगा देने से मानक विलोम नहीं बनता: आस्तिक का नास्तिक, साकार का निराकार, सजीव का निर्जीव, सुगम का दुर्गम और कृतज्ञ का कृतघ्न होता है (कृतज्ञ-कृतघ्न में उपसर्ग नहीं, दूसरा खंड बदलता है)। गद्यांश के शब्द का विलोम पूछे जाने पर भी प्रसंग देखिए: पराजय वाले अर्थ में ‘हार’ का विलोम ‘जीत’ है, पर माला वाले अर्थ में उसका कोई विलोम नहीं बनता।
संधि-विच्छेद की पहचान
संधि में पास-पास की दो ध्वनियाँ मिलकर बदलती हैं, इसलिए विच्छेद में ‘+’ लगता है और दोनों खंड अपने मूल रूप में लौटते हैं। स्वर संधि के पाँच भेद सबसे अधिक पूछे जाते हैं: दीर्घ (विद्यालय = विद्या + आलय, परीक्षा = परि + ईक्षा), गुण (सूर्योदय = सूर्य + उदय, महेश = महा + ईश), वृद्धि (सदैव = सदा + एव, महौषधि = महा + औषधि), यण् (इत्यादि = इति + आदि, स्वागत = सु + आगत) और अयादि (नयन = ने + अन, पवन = पो + अन)। व्यंजन संधि में जगदीश = जगत् + ईश, सज्जन = सत् + जन, उज्ज्वल = उत् + ज्वल; विसर्ग संधि में मनोबल = मनः + बल, निराशा = निः + आशा, दुर्जन = दुः + जन। विकल्पों में ‘विद्य + आलय’ या ‘विद्या + लय’ जैसे खंड जाल होते हैं; सही विच्छेद वही है जिसके दोनों खंड इस शब्द के अर्थ में सार्थक हों (विद्या का आलय) और संधि-नियम से जोड़ने पर वही शब्द बने।
समास-विग्रह और प्रसंग
समास में बीच के कारक-चिह्न या योजक शब्द लुप्त होते हैं और विग्रह में लौट आते हैं, इसलिए विग्रह में ‘+’ नहीं, ‘का’, ‘के लिए’, ‘से’, ‘और’ जैसे शब्द लिखे जाते हैं। अव्ययीभाव में पहला पद अव्यय और प्रधान होता है (प्रतिदिन, यथाशक्ति, आजीवन); तत्पुरुष में दूसरा पद प्रधान (राजपुत्र = राजा का पुत्र, हस्तलिखित = हस्त से लिखित, देवालय = देव का आलय, जिसे कुछ पुस्तकें ‘देव के लिए आलय’ लिखती हैं; दोनों विग्रहों में तत्पुरुष); कर्मधारय में विशेषण-विशेष्य या उपमेय-उपमान (नीलकमल = नीला है जो कमल, चरणकमल = कमल के समान चरण); द्विगु में पहला पद संख्यावाचक और पूरा पद समूह का बोधक (चौराहा = चार राहों का समूह, त्रिलोक, सप्ताह); द्वंद्व में दोनों पद प्रधान (माता-पिता, सुख-दुःख); और बहुव्रीहि में कोई तीसरा अर्थ प्रधान (दशानन = दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण)। गद्यांश में सबसे बड़ा जाल यह है कि एक ही शब्द प्रसंग के अनुसार दो अलग समासों का हो सकता है: ‘पीतांबर’ पीले वस्त्र के अर्थ में कर्मधारय है, पर ‘पीतांबर ने बाँसुरी बजाई’ में अर्थ कृष्ण है, इसलिए बहुव्रीहि; ‘त्रिलोचन’ शिव के अर्थ में बहुव्रीहि है। पुस्तकों में एक मतभेद भी है: संस्कृत व्याकरण कर्मधारय और द्विगु को तत्पुरुष के उपभेद मानता है, जबकि हिंदी की अधिकतर पुस्तकें इन्हें अलग गिनकर समास के छह भेद बताती हैं।
उपसर्ग और प्रत्यय
उपसर्ग शब्द के आगे जुड़कर अर्थ बदलता है (प्र + गति = प्रगति, अनु + शासन = अनुशासन, परि + श्रम = परिश्रम) और प्रत्यय पीछे जुड़ता है। कृत् प्रत्यय क्रिया के मूल रूप या धातु के बाद लगते हैं (लिख + आवट = लिखावट, पढ़ + आई = पढ़ाई, लूट + एरा = लुटेरा, बिक + आऊ = बिकाऊ), और तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के बाद (मानव + ता = मानवता, बूढ़ा + आपा = बुढ़ापा, गुण + वान = गुणवान)। ‘इक’ प्रत्यय में सबसे अधिक भूल होती है, क्योंकि इसके लगने पर प्रायः पहले स्वर की वृद्धि हो जाती है: समाज से सामाजिक, इतिहास से ऐतिहासिक, दिन से दैनिक, नीति से नैतिक, भूगोल से भौगोलिक; इसलिए ‘सामाजिक’ का मूल शब्द ‘समाज’ है। उपसर्ग के साथ संधि भी देखिए: ‘अत्यधिक’ में उपसर्ग ‘अति’ है, ‘अभ्यास’ में ‘अभि’, ‘स्वागत’ में ‘सु’। ‘अनुपस्थित’ में ‘अन्’ और ‘उप’ दो उपसर्ग हैं; कुछ पुस्तकें ‘अ’ और ‘अन्’ को उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होने वाला निषेधवाचक अव्यय मानती हैं, पर प्रश्नों में इन्हें प्रायः उपसर्ग ही कहा जाता है।
हल किया हुआ उदाहरण
गद्यांश पढ़िए: ‘विद्यालय केवल पढ़ाई का स्थान नहीं, जीवन की पाठशाला भी है। यहाँ बालक अनुशासन सीखता है, मित्रता निभाना सीखता है और हार-जीत को समान भाव से स्वीकार करना सीखता है। जो छात्र प्रतिदिन पुस्तकालय जाता है, उसका ज्ञान पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहता। सच्ची शिक्षा वही है जो मनुष्य को विनम्र बनाए और सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग करे।’ प्रश्न 1, ‘विद्यालय’ का संधि-विच्छेद: (क) विद्य + आलय (ख) विद्या + लय (ग) विद्या + आलय (घ) विद + यालय; उत्तर (ग), आ + आ = आ, दीर्घ संधि। प्रश्न 2, ‘प्रतिदिन’ में समास: अव्ययीभाव, क्योंकि पहला पद ‘प्रति’ अव्यय है और विग्रह ‘प्रत्येक दिन’ (हर दिन) है। प्रश्न 3, ‘हार-जीत’ में समास: द्वंद्व (हार और जीत); यहाँ ‘हार’ का अर्थ पराजय है, माला नहीं। प्रश्न 4, ‘अनुशासन’ में उपसर्ग: ‘अनु’। प्रश्न 5, ‘सामाजिक’ में मूल शब्द और प्रत्यय: समाज + इक। प्रश्न 6, ‘ज्ञान’ का विलोम: (क) अज्ञानी (ख) अज्ञान (ग) ज्ञानी (घ) विज्ञान; उत्तर (ख), क्योंकि संज्ञा का विलोम संज्ञा होगा। प्रश्न 7, ‘मनुष्य’ का पर्यायवाची: (क) मानवता (ख) मानव (ग) मनोज (घ) मनन; उत्तर (ख); ‘मानवता’ भाववाचक संज्ञा है और ‘मनोज’ कामदेव का नाम।
मुख्य तथ्य
- अनेकार्थी शब्द: ‘सूर्य के कर’ में कर = किरण; ‘सरकार ने नया कर लगाया’ में कर = टैक्स; पर्यायवाची गद्यांश वाले अर्थ का ही चुनें।
- मिलते-जुलते शब्दों का जाल: अनिल = वायु, अनल = आग; सविता = सूर्य, सरिता = नदी; नीरज = कमल, नीरद = बादल।
- विलोम उसी शब्द-भेद का: उन्नति-अवनति (संज्ञा), उन्नत-अवनत (विशेषण); ज्ञान का विलोम अज्ञान, अज्ञानी नहीं।
- मानक विलोम: आस्तिक-नास्तिक, साकार-निराकार, सजीव-निर्जीव, सुगम-दुर्गम, कृतज्ञ-कृतघ्न, आयात-निर्यात, अनुकूल-प्रतिकूल।
- संधि-विच्छेद: विद्यालय = विद्या + आलय (दीर्घ), सूर्योदय = सूर्य + उदय (गुण), सदैव = सदा + एव (वृद्धि), इत्यादि = इति + आदि (यण्), पवन = पो + अन (अयादि)।
- एक शब्द, दो समास: पीतांबर = पीला है जो अंबर (कर्मधारय), पर कृष्ण के अर्थ में पीला है अंबर जिसका (बहुव्रीहि); त्रिलोचन शिव के अर्थ में बहुव्रीहि।
- ‘इक’ प्रत्यय से प्रायः पहले स्वर की वृद्धि: समाज-सामाजिक, इतिहास-ऐतिहासिक, दिन-दैनिक, नीति-नैतिक, भूगोल-भौगोलिक।
- उपसर्ग के साथ संधि: अत्यधिक = अति + अधिक, अभ्यास = अभि + आस, स्वागत = सु + आगत; अनुपस्थित में अन् और उप दो उपसर्ग।
- संधि-विच्छेद में ‘+’ (विद्यालय = विद्या + आलय), समास-विग्रह में कारक-चिह्न (राजपुत्र = राजा का पुत्र, हस्तलिखित = हस्त से लिखित)।
एक नज़र में दोहराव
गद्यांश के शब्द का उत्तर उसके प्रसंग और शब्द-भेद से दें; अनेकार्थी (कर, पत्र, हार, अर्थ) का प्रसंग वाला अर्थ लें; अनिल-अनल, सविता-सरिता, नीरज-नीरद का जाल; विलोम उसी शब्द-भेद का (उन्नति-अवनति, ज्ञान-अज्ञान), मानक रूप (आस्तिक-नास्तिक, सुगम-दुर्गम); संधि-विच्छेद के दोनों खंड सार्थक; पीतांबर, त्रिलोचन में समास प्रसंग से तय; ‘इक’ से स्वर-वृद्धि (समाज-सामाजिक); उपसर्ग के साथ संधि (अति + अधिक)।