41 में से पाठ 8 · हिंदी व्याकरण

कारक: आठ कारक, विभक्तियाँ, ‘ने’ का प्रयोग और ‘को’ तथा ‘से’ का भेद

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

कारक और विभक्ति

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उसका संबंध वाक्य की क्रिया या दूसरे शब्दों से जाना जाए, उसे कारक कहते हैं, और यह संबंध बताने वाले चिह्न विभक्ति या परसर्ग कहलाते हैं। हिंदी में आठ कारक हैं: कर्ता (ने), कर्म (को), करण (से, के द्वारा), संप्रदान (को, के लिए), अपादान (से, अलग होने के अर्थ में), संबंध (का, की, के; रा, री, रे; ना, नी, ने), अधिकरण (में, पर) और संबोधन (हे, अरे, ऐ, ओ)। संस्कृत परंपरा में कारक वही है जिसका सीधा संबंध क्रिया से हो, इसलिए कुछ वैयाकरण संबंध और संबोधन को कारक नहीं मानते; पर हिंदी की परीक्षाओं में आठ कारक ही पढ़े जाते हैं। ‘मोहन ने बाग में पेड़ से आम तोड़कर अपने मित्र के लिए टोकरी में रखे’ जैसे एक ही वाक्य में कई कारक पहचाने जा सकते हैं।

कर्ता कारक और ‘ने’ का प्रयोग

क्रिया को करने वाला कर्ता है। ‘ने’ मुख्यतः सकर्मक क्रिया के भूतकाल के कुछ रूपों में लगता है: सामान्य भूत (‘राम ने पुस्तक पढ़ी’), आसन्न भूत (‘राम ने पुस्तक पढ़ी है’), पूर्ण भूत (‘राम ने पुस्तक पढ़ी थी’), संदिग्ध भूत (‘राम ने पुस्तक पढ़ी होगी’) और हेतुहेतुमद् भूत (‘यदि उसने परिश्रम किया होता तो सफल होता’)। अपूर्ण भूत, वर्तमान और भविष्य में ‘ने’ नहीं लगता: ‘राम पुस्तक पढ़ रहा था’, ‘राम पुस्तक पढ़ेगा’। अकर्मक क्रिया के साथ भी ‘ने’ नहीं लगता: ‘वह आया’, ‘सीता हँसी’; पर छींकना, खाँसना, थूकना जैसी कुछ अकर्मक क्रियाओं के साथ लगता है (‘उसने छींका’), और ‘नहाना’ के साथ दोनों रूप मिलते हैं (गुरु ‘हमने नहाया है’ लिखते हैं, बोलचाल में ‘वह नहाया’ भी चलता है)। कुछ सकर्मक क्रियाएँ ‘ने’ नहीं लेतीं: लाना, भूलना, बकना (‘वह पुस्तक लाया’, ‘मैं भूल गया’); गुरु इसी सूची में बोलना, समझना और जानना को भी रखते हैं (‘वह कुछ नहीं बोला’), पर आज की मानक हिंदी में कर्म के साथ ‘बोलना’ प्रायः ‘ने’ लेता है (‘उसने झूठ बोला’)। संयुक्त क्रिया में अंतिम क्रिया अकर्मक हो तो ‘ने’ नहीं लगता (‘वह खाना खा गया’), सकर्मक हो तो लगता है (‘उसने खाना खा लिया’)। कर्ता बिना चिह्न के भी आता है (‘राम पढ़ता है’), और कर्मवाच्य-भाववाच्य में ‘से’ या ‘के द्वारा’ के साथ (‘मुझसे चला नहीं जाता’)।

‘ने’ के साथ क्रिया का मेल

‘ने’ लगने पर क्रिया कर्ता के अनुसार नहीं बदलती। कर्म बिना ‘को’ के हो तो क्रिया कर्म के लिंग-वचन के अनुसार होती है: ‘राम ने रोटी खाई’, ‘सीता ने आम खाया’, ‘लड़कों ने पुस्तकें पढ़ीं’। कर्म के साथ ‘को’ लगा हो तो क्रिया सदा पुल्लिंग, एकवचन, अन्य पुरुष में रहती है: ‘राम ने सीता को देखा’, ‘लड़कियों ने पुस्तकों को पढ़ा’। इसी कारण ‘सीता ने गाना गाई’ अशुद्ध और ‘सीता ने गाना गाया’ शुद्ध है।

कर्म और संप्रदान

जिस पर क्रिया का फल पड़े, वह कर्म है; इसका चिह्न ‘को’ है, जो प्रायः सजीव कर्म के साथ आता है और निर्जीव कर्म के साथ प्रायः लुप्त रहता है: ‘माँ बच्चे को सुला रही है’, ‘वह पुस्तक पढ़ता है’। दो कर्म वाली क्रिया में निर्जीव मुख्य कर्म बिना चिह्न के और सजीव गौण कर्म ‘को’ के साथ आता है: ‘अध्यापक ने छात्रों को गणित पढ़ाया’। जिसके लिए कुछ किया जाए या जिसे कुछ दिया जाए, वह संप्रदान है; चिह्न ‘को’ और ‘के लिए’: ‘गरीबों को कपड़े दो’, ‘बच्चों के लिए खिलौने लाओ’, ‘गुरु को नमस्कार’। पहचान: ‘को’ के साथ देने, भेजने या किसी के हित का भाव हो तो संप्रदान, वरना कर्म: ‘मोहन ने सोहन को पीटा’ (कर्म), ‘राजा ने ब्राह्मण को गाय दी’ (संप्रदान)। ‘के लिए’ सदा संप्रदान है। समय बताने वाला ‘को’ अधिकरण होता है: ‘वह रात को आया’, ‘रविवार को छुट्टी है’।

करण और अपादान

दोनों का चिह्न ‘से’ है, इसलिए यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला अंतर है। करण वह साधन या कारण है जिसके द्वारा क्रिया होती है: ‘वह कलम से लिखता है’, ‘पुलिस ने चोर को डंडे से मारा’, ‘हम आँखों से देखते हैं’, ‘पत्र डाक के द्वारा भेजा गया’, ‘वह भूख से व्याकुल है’। अपादान में किसी वस्तु के अलग होने का भाव होता है: ‘पेड़ से पत्ते गिरते हैं’, ‘गंगा हिमालय से निकलती है’, ‘वह घर से चला गया’। अलगाव के अलावा तुलना (‘राम श्याम से लंबा है’), डर (‘बच्चा कुत्ते से डरता है’), सीखना (‘शिष्य गुरु से विद्या सीखता है’), लज्जा, दूरी (‘गाँव शहर से दूर है’), उत्पत्ति (‘दूध से दही बनता है’), बचाव (‘बुराई से बचो’) और समय का आरंभ (‘वह कल से बीमार है’) भी अपादान में आते हैं। पहचान: ‘से’ को ‘के द्वारा’ या ‘की सहायता से’ से बदल सकें तो करण, ‘से अलग होकर’ का भाव हो तो अपादान।

संबंध, अधिकरण और संबोधन

संबंध कारक एक संज्ञा का दूसरी संज्ञा से संबंध बताता है, और इसका चिह्न आगे वाली संज्ञा (संबंधी) के लिंग-वचन के अनुसार बदलता है: ‘राम का घर’, ‘राम की पुस्तक’, ‘राम के बेटे’; सर्वनाम के साथ रा, री, रे (मेरा, तेरा, हमारी) और ना, नी, ने (अपना, अपनी) होते हैं। अधिकरण क्रिया का आधार (स्थान, समय) बताता है; चिह्न ‘में’ और ‘पर’: ‘मछली जल में रहती है’, ‘पुस्तक मेज़ पर है’, ‘परीक्षा मार्च में होगी’। संबोधन कारक में किसी को पुकारा जाता है; चिह्न हे, अरे, ऐ, ओ और संज्ञा के बाद विस्मयादिबोधक चिह्न (!) लगता है: ‘हे भगवान!’, ‘अरे भाई! इधर आओ’। संबोधन बहुवचन में अनुस्वार नहीं लगता: ‘बच्चो! शांत रहो’, ‘भाइयो और बहनो!’।

विभक्ति लिखने का नियम

केंद्रीय हिंदी निदेशालय के मानक के अनुसार संज्ञा के साथ विभक्ति अलग लिखी जाती है (राम ने, घर में, पेड़ से), पर सर्वनाम के साथ मिलाकर (उसने, मुझको, उसका, तुमसे, आपके)। सर्वनाम के साथ दो विभक्तियाँ हों तो पहली मिलाकर और दूसरी अलग लिखी जाती है: उसके लिए, आपके द्वारा, इसमें से। सर्वनाम और विभक्ति के बीच ‘ही’ या ‘तक’ आए तो विभक्ति अलग लिखी जाती है: आप ही के लिए।

परीक्षा के जाल

(1) ‘को’ कर्म, संप्रदान या अधिकरण (समय) हो सकता है; वाक्य का भाव देखिए। (2) ‘से’ करण भी हो सकता है और अपादान भी; साधन या कारण हो तो करण, अलगाव, तुलना, डर, सीखना हो तो अपादान। (3) ‘वह आया’ में ‘ने’ नहीं, क्योंकि ‘आना’ अकर्मक है; ‘मैंने जाना है’ अशुद्ध, ‘मुझे जाना है’ शुद्ध। (4) ‘राम ने सीता को देखा’ में क्रिया पुल्लिंग, क्योंकि कर्म के साथ ‘को’ है। (5) संबोधन बहुवचन में ‘बहनों’ नहीं, ‘बहनो’ लिखा जाता है।

मुख्य तथ्य

  • आठ कारक और चिह्न: कर्ता (ने), कर्म (को), करण (से, के द्वारा), संप्रदान (को, के लिए), अपादान (से), संबंध (का, की, के), अधिकरण (में, पर), संबोधन (हे, अरे)।
  • ‘ने’ सकर्मक क्रिया के भूतकाल में: ‘राम ने पुस्तक पढ़ी/पढ़ी है/पढ़ी थी/पढ़ी होगी’; अपूर्ण भूत में नहीं: ‘राम पुस्तक पढ़ रहा था’।
  • ‘ने’ के अपवाद: लाना, भूलना, बकना सकर्मक होकर भी बिना ‘ने’ (‘वह पुस्तक लाया’), पर ‘उसने झूठ बोला’ आज मानक है; छींकना, खाँसना, थूकना अकर्मक होकर भी ‘ने’ के साथ (‘उसने छींका’)।
  • क्रिया का मेल: ‘राम ने रोटी खाई’ (कर्म के अनुसार); ‘राम ने सीता को देखा’ (‘को’ होने पर पुल्लिंग एकवचन)।
  • कर्म बनाम संप्रदान: ‘मोहन ने सोहन को पीटा’ (कर्म); ‘राजा ने ब्राह्मण को गाय दी’, ‘बच्चों के लिए खिलौने’ (संप्रदान)।
  • करण बनाम अपादान: ‘कलम से लिखता है’, ‘भूख से व्याकुल’ (करण); ‘पेड़ से पत्ते गिरते हैं’, ‘राम श्याम से लंबा है’, ‘कुत्ते से डरता है’ (अपादान)।
  • समय वाला ‘को’ अधिकरण: ‘वह रात को आया’, ‘रविवार को छुट्टी है’; स्थान: ‘मछली जल में’, ‘पुस्तक मेज़ पर’।
  • द्विकर्मक: ‘अध्यापक ने छात्रों को गणित पढ़ाया’ में गणित मुख्य कर्म, छात्रों को गौण कर्म।
  • विभक्ति लेखन: संज्ञा से अलग (राम ने), सर्वनाम से मिलाकर (उसने, मुझको); दो विभक्ति हों तो उसके लिए, आपके द्वारा।

एक नज़र में दोहराव

आठ कारक: कर्ता ने, कर्म को, करण से/के द्वारा, संप्रदान को/के लिए, अपादान से (अलगाव), संबंध का-की-के, अधिकरण में-पर, संबोधन हे-अरे; ‘ने’ सकर्मक के सामान्य, आसन्न, पूर्ण, संदिग्ध, हेतुहेतुमद् भूत में, अपूर्ण भूत में नहीं; लाना, भूलना, बकना बिना ‘ने’; कर्म पर ‘को’ हो तो क्रिया पुल्लिंग एकवचन; करण साधन-कारण, अपादान अलगाव-तुलना-डर-सीखना; समय का ‘को’ अधिकरण; संबोधन बहुवचन में अनुस्वार नहीं।

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