41 में से पाठ 7 · हिंदी व्याकरण

लिंग और वचन: लिंग निर्धारण, स्त्रीलिंग प्रत्यय, बहुवचन के नियम और अपवाद

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

लिंग और उसकी पहचान

संज्ञा के जिस रूप से उसके पुरुष या स्त्री जाति का होने का बोध हो, उसे लिंग कहते हैं। संस्कृत में तीन लिंग हैं, पर हिंदी में दो: पुल्लिंग और स्त्रीलिंग; नपुंसक लिंग नहीं है, इसलिए निर्जीव वस्तुएँ भी इन्हीं दो में से किसी एक में आती हैं। प्राणियों का लिंग उनके नर या मादा होने से तय होता है, पर निर्जीव वस्तुओं का लिंग परंपरा और शब्द के अंत से। वाक्य में लिंग की पहचान क्रिया और विशेषण से होती है: ‘दही खट्टा है’, ‘चाय ठंडी है’।

पुल्लिंग के नियम

‘-पन’, ‘-पा’, ‘-त्व’, ‘-आव’, ‘-आवा’ वाली भाववाचक संज्ञाएँ पुल्लिंग होती हैं: बचपन, बुढ़ापा, महत्त्व, बंधुत्व, बहाव, चढ़ाव, बुलावा, पहनावा। संस्कृत ‘-य’ वाले भाववाचक भी पुल्लिंग हैं: माधुर्य, सौंदर्य, धैर्य, शौर्य। ‘-खाना’ और ‘-दान’ वाले शब्द पुल्लिंग हैं: दवाखाना, डाकखाना, फूलदान, कलमदान। ‘-ना’ से बनी क्रियार्थक संज्ञा पुल्लिंग होती है: ‘उसका रोना अच्छा नहीं लगता’। पर्वत (हिमालय, विंध्याचल), समुद्र (हिंद महासागर), देश (भारत, जापान), दिन (सोमवार), हिंदी महीने (चैत्र, सावन), ग्रह (सूर्य, चंद्रमा, मंगल; पर पृथ्वी स्त्रीलिंग), धातुएँ (सोना, ताँबा, लोहा, पीतल; पर चाँदी स्त्रीलिंग), रत्न (हीरा, पन्ना, मोती; पर मणि स्त्रीलिंग), द्रव (पानी, दूध, तेल, घी, दही; पर चाय, लस्सी स्त्रीलिंग), अनाज (गेहूँ, चावल, चना, जौ; पर ज्वार, अरहर, मूँग स्त्रीलिंग) और अधिकतर पेड़ (पीपल, नीम, आम, बरगद; पर इमली स्त्रीलिंग) पुल्लिंग हैं।

स्त्रीलिंग के नियम

‘-ता’, ‘-आई’, ‘-आवट’, ‘-आहट’, ‘-इमा’, ‘-ति’ वाली भाववाचक संज्ञाएँ स्त्रीलिंग होती हैं: सुंदरता, मित्रता, भलाई, पढ़ाई, थकावट, बनावट, घबराहट, लालिमा, महिमा, रीति, शक्ति, उन्नति। संस्कृत के आकारांत शब्द प्रायः स्त्रीलिंग हैं: दया, कृपा, लता, शिक्षा, विद्या, माया। नदियाँ (गंगा, यमुना, कावेरी), भाषाएँ और बोलियाँ (हिंदी, अंग्रेज़ी, अवधी, भोजपुरी), लिपियाँ (देवनागरी, रोमन), तिथियाँ (प्रतिपदा, एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा) और नक्षत्र (अश्विनी, भरणी, रोहिणी) स्त्रीलिंग हैं। अपवाद: ब्रह्मपुत्र और सोन को नद मानकर पुल्लिंग माना जाता है। ‘-ई’ अंत से स्त्रीलिंग मान लेना सबसे बड़ा जाल है: पानी, घी, दही, मोती, हाथी, पक्षी, प्राणी, स्वामी, योगी, साथी पुल्लिंग हैं। शरीर के अंगों में सिर, हाथ, पैर, कान, दाँत, होंठ, बाल, गला, पेट पुल्लिंग; और आँख, नाक, जीभ, गर्दन, उँगली, कमर, पीठ, छाती स्त्रीलिंग हैं।

नित्य लिंग और मतभेद वाले शब्द

कुछ प्राणिवाचक शब्द सदा एक ही लिंग में आते हैं। नित्य पुल्लिंग: कौआ, खटमल, भेड़िया, उल्लू, चीता, मच्छर। नित्य स्त्रीलिंग: कोयल, मैना, चील, मछली, गिलहरी, मक्खी, तितली। इनका दूसरा लिंग बताना हो तो ‘नर’ या ‘मादा’ जोड़ते हैं: नर कोयल, मादा भेड़िया। मंत्री, डॉक्टर, वकील, प्रधानमंत्री जैसे पद-नाम दोनों के लिए आते हैं; लिंग क्रिया से पता चलता है: ‘डॉक्टर आ गई हैं’। कुछ शब्दों पर पुस्तकें और प्रदेश एकमत नहीं हैं: ‘आत्मा’ संस्कृत में पुल्लिंग है, पर हिंदी में स्त्रीलिंग (‘उसकी आत्मा’) चलता है; ‘दही’ मानक हिंदी में पुल्लिंग है, पर बोलचाल में कई जगह स्त्रीलिंग बोला जाता है। ऐसे प्रश्नों में मानक हिंदी का प्रयोग ही चुनिए।

स्त्रीलिंग बनाने के प्रत्यय

‘-ई’: लड़का-लड़की, घोड़ा-घोड़ी, देव-देवी, पुत्र-पुत्री, दास-दासी। ‘-इया’: बूढ़ा-बुढ़िया, चूहा-चुहिया, बेटा-बिटिया, डिब्बा-डिबिया, लोटा-लुटिया। ‘-इन’: धोबी-धोबिन, माली-मालिन, बाघ-बाघिन, सुनार-सुनारिन, ग्वाला-ग्वालिन। ‘-नी’: शेर-शेरनी, मोर-मोरनी, ऊँट-ऊँटनी, हाथी-हथिनी। ‘-आनी’: सेठ-सेठानी, देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी, नौकर-नौकरानी, इंद्र-इंद्राणी, भव-भवानी। ‘-आइन’: पंडित-पंडिताइन, ठाकुर-ठकुराइन। संस्कृत ‘-अक’ से ‘-इका’: लेखक-लेखिका, गायक-गायिका, अध्यापक-अध्यापिका, बालक-बालिका, नायक-नायिका। संस्कृत ‘-आ’: छात्र-छात्रा, सुत-सुता, प्रिय-प्रिया, शिष्य-शिष्या, अनुज-अनुजा। ‘-वान/-मान’ से ‘-वती/-मती’: भगवान-भगवती, श्रीमान-श्रीमती, बुद्धिमान-बुद्धिमती, गुणवान-गुणवती, आयुष्मान-आयुष्मती। ‘-ई’ अंत वाले संस्कृत शब्दों से ‘-इनी’: तपस्वी-तपस्विनी, यशस्वी-यशस्विनी, स्वामी-स्वामिनी। ‘-ता’ से ‘-त्री’: नेता-नेत्री, अभिनेता-अभिनेत्री, दाता-दात्री।

विशेष स्त्रीलिंग रूप

कुछ जोड़े किसी नियम से नहीं बनते और सबसे अधिक पूछे जाते हैं: पिता-माता, भाई-बहन, राजा-रानी, बैल-गाय, पुरुष-स्त्री, वर-वधू, ससुर-सास, सम्राट-सम्राज्ञी, विद्वान-विदुषी, साधु-साध्वी, कवि-कवयित्री, युवक-युवती, दूल्हा-दुल्हन, नर-मादा। वर्तनी का ध्यान रखिए: कवयित्री (कवियत्री नहीं), विदुषी, सम्राज्ञी, साध्वी, अभिनेत्री।

वचन बदलने के नियम

हिंदी में दो वचन हैं, एकवचन और बहुवचन (संस्कृत में द्विवचन भी है)। विभक्ति-रहित बहुवचन इस तरह बनता है: आकारांत पुल्लिंग में ‘-आ’ का ‘-ए’ (लड़का-लड़के, कपड़ा-कपड़े); अकारांत स्त्रीलिंग में ‘-एँ’ (बात-बातें, पुस्तक-पुस्तकें, बहन-बहनें); आकारांत स्त्रीलिंग में ‘-एँ’ (माता-माताएँ, कथा-कथाएँ, कविता-कविताएँ); इकारांत-ईकारांत स्त्रीलिंग में ‘-इयाँ’ (नदी-नदियाँ, तिथि-तिथियाँ, शक्ति-शक्तियाँ); ‘-इया’ अंत वाले में ‘-इयाँ’ (चिड़िया-चिड़ियाँ, गुड़िया-गुड़ियाँ); उकारांत-ऊकारांत स्त्रीलिंग में ‘-एँ’ और ऊ ह्रस्व (वस्तु-वस्तुएँ, बहू-बहुएँ, वधू-वधुएँ)। विभक्ति लगने पर बहुवचन में ‘-ओं’ आता है: लड़कों ने, घरों में, नदियों का, साधुओं को। आकारांत के अलावा पुल्लिंग शब्द विभक्ति-रहित बहुवचन में नहीं बदलते: बालक, घर, फल, हाथी (‘बालक आए’)। समूह बताने के लिए गण, जन, वर्ग, वृंद, लोग जोड़े जाते हैं: छात्रगण, गुरुजन, पाठकवृंद, अध्यापकवर्ग।

वचन के अपवाद

संबंध और आदर वाले आकारांत पुल्लिंग शब्द बहुवचन में नहीं बदलते: पिता, चाचा, दादा, मामा, राजा, देवता, योद्धा, नेता (‘राजा आए’, ‘मेरे चाचा आए हैं’)। कुछ शब्द सदा बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं: प्राण, दर्शन, हस्ताक्षर, होश, लोग, आँसू, दाम (‘आपके दर्शन हुए’, ‘उसके होश उड़ गए’, ‘मेरे प्राण सूख गए’)। कुछ सदा एकवचन में: जनता, पानी, दूध, घी, सोना, आकाश, प्रेम, क्रोध, सामान (‘जनता आ रही है’)। आदर के लिए एक व्यक्ति के साथ भी बहुवचन क्रिया लगती है: ‘पिताजी आ रहे हैं’। ‘अनेक’ स्वयं बहुवचन है, इसलिए ‘अनेकों’ अशुद्ध है; और ‘प्रत्येक’ के साथ एकवचन आता है: ‘प्रत्येक छात्र आया’। संबोधन बहुवचन में अनुस्वार नहीं लगता: ‘भाइयो और बहनो!’।

मुख्य तथ्य

  • ‘-ई’ अंत के पुल्लिंग शब्द: पानी, घी, दही, मोती, हाथी, पक्षी, प्राणी, स्वामी, योगी; ‘-आ’ अंत के स्त्रीलिंग: दया, कृपा, लता, विद्या।
  • पुल्लिंग वर्ग और अपवाद: धातुएँ (चाँदी स्त्रीलिंग), ग्रह (पृथ्वी स्त्रीलिंग), द्रव (चाय, लस्सी स्त्रीलिंग), पेड़ (इमली स्त्रीलिंग), रत्न (मणि स्त्रीलिंग)।
  • स्त्रीलिंग वर्ग: नदियाँ, भाषाएँ, बोलियाँ, लिपियाँ, तिथियाँ; अपवाद ब्रह्मपुत्र और सोन (नद होने से पुल्लिंग)।
  • नित्य पुल्लिंग: कौआ, खटमल, भेड़िया, उल्लू, चीता; नित्य स्त्रीलिंग: कोयल, मैना, चील, मछली, गिलहरी, तितली; दूसरा लिंग ‘नर/मादा’ जोड़कर।
  • स्त्रीलिंग प्रत्यय: लेखक-लेखिका, छात्र-छात्रा, सेठ-सेठानी, धोबी-धोबिन, शेर-शेरनी, बूढ़ा-बुढ़िया, तपस्वी-तपस्विनी, नेता-नेत्री, श्रीमान-श्रीमती।
  • विशेष जोड़े: कवि-कवयित्री, विद्वान-विदुषी, साधु-साध्वी, सम्राट-सम्राज्ञी, वर-वधू, ससुर-सास, बैल-गाय, युवक-युवती।
  • बहुवचन: लड़का-लड़के, बात-बातें, माता-माताएँ, नदी-नदियाँ, चिड़िया-चिड़ियाँ, बहू-बहुएँ; विभक्ति के साथ लड़कों, नदियों, साधुओं।
  • न बदलने वाले आकारांत: पिता, चाचा, दादा, मामा, राजा, देवता, योद्धा, नेता; सदा बहुवचन: प्राण, दर्शन, हस्ताक्षर, होश, लोग।
  • शुद्ध प्रयोग: ‘अनेकों’ अशुद्ध, ‘अनेक’ शुद्ध; ‘प्रत्येक छात्र आया’; ‘जनता आ रही है’; संबोधन में ‘भाइयो और बहनो!’ (अनुस्वार नहीं)।

एक नज़र में दोहराव

हिंदी में दो लिंग, दो वचन; -पन, -पा, -त्व, -आव पुल्लिंग; -ता, -आई, -आवट, -आहट, -इमा, -ति स्त्रीलिंग; पानी, घी, दही, मोती, हाथी पुल्लिंग; चाँदी, पृथ्वी, चाय, इमली, मणि अपवाद में स्त्रीलिंग; ब्रह्मपुत्र, सोन पुल्लिंग; नित्य लिंग: कौआ, कोयल; कवयित्री, विदुषी, सम्राज्ञी; बहुवचन -ए, -एँ, -इयाँ, विभक्ति के साथ -ओं; पिता, राजा, चाचा नहीं बदलते; प्राण, दर्शन, हस्ताक्षर सदा बहुवचन; जनता एकवचन; अनेकों अशुद्ध; भाइयो-बहनो।

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