41 में से पाठ 9 · हिंदी व्याकरण

क्रिया, काल और वाच्य: सकर्मक-अकर्मक, प्रेरणार्थक, काल के भेद और वाच्य परिवर्तन

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

क्रिया और धातु

जिस शब्द से किसी काम के करने या होने का बोध हो, वह क्रिया है: पढ़ना, खेलना, होना। क्रिया का मूल रूप धातु कहलाता है (पढ़, लिख, खा, जा), और धातु में ‘-ना’ जोड़ने से उसका सामान्य रूप बनता है (पढ़ना)। जो धातुएँ किसी दूसरे शब्द से नहीं बनीं, वे मूल धातु हैं; प्रेरणार्थक, नामधातु और संयुक्त धातु यौगिक धातुएँ हैं। ‘-ना’ वाला रूप वाक्य में संज्ञा की तरह भी आता है, जिसे क्रियार्थक संज्ञा कहते हैं: ‘टहलना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है’।

सकर्मक और अकर्मक

जिस क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़े, वह सकर्मक है; पहचान के लिए क्रिया से ‘क्या’ या ‘किसे/किसको’ पूछिए: ‘राम पत्र लिखता है’ (क्या लिखता है? पत्र)। कर्म न लिखा हो तब भी क्रिया सकर्मक रहती है: ‘राम पढ़ता है’। जिसका फल कर्ता पर ही पड़े, वह अकर्मक है: आना, जाना, सोना, हँसना, रोना, उठना, बैठना, दौड़ना, डरना, चमकना। सकर्मक के दो भेद हैं: एककर्मक (‘वह फल खाता है’) और द्विकर्मक, जिसमें देना, पढ़ाना, सिखाना, पूछना, बताना जैसी क्रियाओं के दो कर्म होते हैं (‘माँ ने बच्चे को कहानी सुनाई’)। कुछ क्रियाएँ प्रयोग से दोनों होती हैं: ‘बाल्टी भर गई’ (अकर्मक), ‘उसने बाल्टी भरी’ (सकर्मक); ‘मेरा सिर खुजलाता है’, ‘वह सिर खुजलाता है’। अकर्मक क्रिया अपनी ही धातु से बना कर्म (सजातीय कर्म) लेकर सकर्मक बन जाती है: ‘सिपाही ने बड़ी लड़ाई लड़ी’, ‘पक्षी अनोखी बोली बोलते हैं’।

प्रेरणार्थक, नामधातु और संयुक्त क्रिया

प्रेरणार्थक क्रिया में कर्ता स्वयं काम न करके किसी दूसरे को करने की प्रेरणा देता है। धातु में ‘-आ’ जोड़ने से प्रथम और ‘-वा’ जोड़ने से द्वितीय प्रेरणार्थक बनता है: पढ़ना-पढ़ाना-पढ़वाना, लिखना-लिखाना-लिखवाना, सोना-सुलाना-सुलवाना, पीना-पिलाना-पिलवाना, खाना-खिलाना-खिलवाना, देखना-दिखाना-दिखवाना, धोना-धुलाना-धुलवाना। आना, जाना, सकना, होना, रुचना, पाना जैसी क्रियाओं के प्रेरणार्थक रूप नहीं बनते (गुरु)। प्रथम प्रेरणार्थक में कर्ता प्रायः स्वयं भी काम में सम्मिलित रहता है (‘माँ बच्चे को खाना खिलाती है’), जबकि द्वितीय प्रेरणार्थक में काम किसी दूसरे के द्वारा कराया जाता है (‘माँ नौकरानी से बच्चे को खाना खिलवाती है’)। संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण से बनी क्रिया नामधातु है: हाथ-हथियाना, बात-बतियाना, लाज-लजाना, फ़िल्म-फ़िल्माना, अपना-अपनाना, चिकना-चिकनाना, साठ-सठियाना। संयुक्त क्रिया मुख्य क्रिया और रंजक या सहायक क्रिया के मेल से बनती है: खा चुका, पढ़ने लगा, रो पड़ा, लिख दिया, जा सकता है, गाता रहता है। ‘वह खाकर सो गया’ में ‘खाकर’ पूर्वकालिक क्रिया है, जो दूसरी क्रिया से पहले पूरे हुए काम को बताती है।

काल और उसके भेद

क्रिया के जिस रूप से उसके होने का समय पता चले, वह काल है; तीन काल हैं: वर्तमान, भूत और भविष्य। वर्तमान काल के मुख्य भेद: सामान्य वर्तमान (‘वह पढ़ता है’), अपूर्ण या तात्कालिक वर्तमान (‘वह पढ़ रहा है’), संदिग्ध वर्तमान (‘वह पढ़ता होगा’) और संभाव्य वर्तमान (‘शायद वह पढ़ता हो’); कुछ पुस्तकें पूर्ण वर्तमान (‘वह पढ़ चुका है’) और आज्ञार्थ वर्तमान भी जोड़ती हैं। भूतकाल के छह भेद सबसे अधिक पढ़ाए जाते हैं: सामान्य भूत (‘वह आया’), आसन्न भूत, जिसमें काम अभी-अभी पूरा हुआ हो (‘वह आया है’), पूर्ण भूत (‘वह आया था’), अपूर्ण भूत (‘वह आ रहा था’), संदिग्ध भूत (‘वह आया होगा’) और हेतुहेतुमद् भूत, जिसमें एक काम दूसरे पर निर्भर था पर हुआ नहीं (‘यदि वर्षा होती तो फसल अच्छी होती’); कुछ पुस्तकें संभाव्य भूत (‘शायद वह आया हो’) भी गिनती हैं। भविष्य काल के भेद: सामान्य भविष्य (‘वह पढ़ेगा’), संभाव्य भविष्य (‘संभव है वह कल आए’) और हेतुहेतुमद् भविष्य (‘वह परिश्रम करेगा तो सफल होगा’)। उपभेदों की संख्या पुस्तकों में अलग-अलग है, इसलिए उदाहरण के वाक्य को ही आधार बनाइए।

काल पहचानने के संकेत

‘ता है/ती है/ते हैं’ सामान्य वर्तमान; ‘रहा है’ अपूर्ण वर्तमान; ‘ता होगा’ संदिग्ध वर्तमान; ‘या/ई/ए’ सामान्य भूत; ‘या है’ आसन्न भूत; ‘या था’ पूर्ण भूत; ‘रहा था’ अपूर्ण भूत; ‘या होगा’ संदिग्ध भूत; ‘ता तो ... ता’ हेतुहेतुमद् भूत; ‘एगा/एगी/एँगे’ सामान्य भविष्य। ‘वह रोज़ पढ़ता था’ जैसे अभ्यास बताने वाले रूप को कुछ पुस्तकें अपूर्ण भूत और कुछ नित्य भूत कहती हैं। आसन्न भूत (‘गया है’) और पूर्ण भूत (‘गया था’) का अंतर निकटता का है: पहला अभी पूरा हुआ, दूसरा बहुत पहले।

वाच्य और उसके भेद

क्रिया के जिस रूप से पता चले कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव में से किसकी प्रधानता है, वह वाच्य है। कर्तृवाच्य में कर्ता प्रधान होता है और क्रिया कर्ता के अनुसार चलती है: ‘राम पत्र लिखता है’, ‘सीता गीत गाती है’। कर्मवाच्य में कर्म प्रधान होता है, कर्ता के साथ ‘से’ या ‘के द्वारा/द्वारा’ लगता है और क्रिया कर्म के अनुसार चलती है: ‘राम द्वारा पत्र लिखा जाता है’, ‘सीता द्वारा गीत गाया गया’; यह केवल सकर्मक क्रिया से बनता है और सरकारी सूचनाओं (‘चोर पकड़ा गया’) तथा असमर्थता (‘मुझसे यह बोझ नहीं उठाया जाता’) में प्रयुक्त होता है। भाववाच्य में क्रिया का भाव प्रधान होता है; यह केवल अकर्मक क्रिया से बनता है, कर्ता के साथ ‘से’ लगता है और क्रिया सदा अन्य पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन में रहती है; प्रायः असमर्थता बताता है: ‘मुझसे चला नहीं जाता’, ‘बच्चों से रात भर सोया नहीं गया’, और प्रस्ताव में बिना निषेध के भी आता है: ‘चलो, अब सोया जाए’।

वाच्य परिवर्तन

कर्तृवाच्य से कर्मवाच्य बनाने के लिए (1) कर्ता के साथ ‘से’ या ‘द्वारा’ लगाइए, (2) मुख्य क्रिया को सामान्य भूत के रूप में रखकर उसके साथ ‘जाना’ का उसी काल का रूप जोड़िए, (3) क्रिया का लिंग-वचन कर्म के अनुसार कीजिए: ‘मैं पुस्तक पढ़ूँगा’ से ‘मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाएगी’; ‘पुलिस ने चोरों को पकड़ा’ से ‘पुलिस द्वारा चोरों को पकड़ा गया’ या ‘पुलिस द्वारा चोर पकड़े गए’। भाववाच्य बनाने के लिए अकर्मक क्रिया के कर्ता के साथ ‘से’ लगाकर क्रिया को पुल्लिंग एकवचन में ‘जाना’ के साथ रखिए: ‘मैं नहीं हँस सकता’ से ‘मुझसे हँसा नहीं जाता’। जाल: ‘मुझसे पत्र नहीं लिखा जाता’ कर्मवाच्य है, क्योंकि ‘लिखना’ सकर्मक है और ‘पत्र’ कर्म है; ‘मुझसे हँसा नहीं जाता’ भाववाच्य है, क्योंकि ‘हँसना’ अकर्मक है। गुरु के व्याकरण में वाच्य से अलग ‘प्रयोग’ भी बताया गया है: क्रिया कर्ता के अनुसार हो तो कर्तरि, कर्म के अनुसार हो तो कर्मणि और किसी के अनुसार न हो तो भावे प्रयोग; इसलिए ‘राम ने रोटी खाई’ कर्तृवाच्य होते हुए भी कर्मणि प्रयोग है।

मुख्य तथ्य

  • सकर्मक की पहचान ‘क्या/किसे’ से: ‘राम पत्र लिखता है’; अकर्मक: आना, जाना, सोना, हँसना, दौड़ना, डरना; द्विकर्मक: ‘माँ ने बच्चे को कहानी सुनाई’।
  • प्रेरणार्थक: पढ़ना-पढ़ाना-पढ़वाना, सोना-सुलाना-सुलवाना, पीना-पिलाना-पिलवाना, धोना-धुलाना-धुलवाना; आना, जाना, सकना, होना के प्रेरणार्थक नहीं।
  • नामधातु: हाथ से हथियाना, बात से बतियाना, लाज से लजाना, अपना से अपनाना, साठ से सठियाना।
  • संयुक्त क्रिया: खा चुका, पढ़ने लगा, रो पड़ा, लिख दिया; पूर्वकालिक क्रिया: ‘वह खाकर सो गया’ में खाकर।
  • भूतकाल के छह भेद: वह आया (सामान्य), आया है (आसन्न), आया था (पूर्ण), आ रहा था (अपूर्ण), आया होगा (संदिग्ध), यदि वर्षा होती तो फसल अच्छी होती (हेतुहेतुमद्)।
  • वर्तमान: पढ़ता है (सामान्य), पढ़ रहा है (अपूर्ण), पढ़ता होगा (संदिग्ध), शायद पढ़ता हो (संभाव्य); भविष्य: पढ़ेगा (सामान्य), संभव है आए (संभाव्य)।
  • वाच्य: ‘राम पत्र लिखता है’ (कर्तृ), ‘राम द्वारा पत्र लिखा जाता है’ (कर्म), ‘मुझसे चला नहीं जाता’ (भाव, अकर्मक, पुल्लिंग एकवचन)।
  • कर्मवाच्य बनाम भाववाच्य: ‘मुझसे पत्र नहीं लिखा जाता’ (सकर्मक, कर्मवाच्य); ‘मुझसे हँसा नहीं जाता’ (अकर्मक, भाववाच्य)।
  • प्रयोग (गुरु): ‘राम ने रोटी खाई’ कर्तृवाच्य है, पर क्रिया कर्म के अनुसार होने से कर्मणि प्रयोग।

एक नज़र में दोहराव

धातु + ना = सामान्य रूप; सकर्मक की पहचान ‘क्या/किसे’; द्विकर्मक देना, पढ़ाना, पूछना; प्रेरणार्थक -आ (प्रथम), -वा (द्वितीय), आना-जाना-सकना-होना के नहीं; नामधातु हथियाना, बतियाना; संयुक्त क्रिया खा चुका; भूत के छह भेद: सामान्य, आसन्न, पूर्ण, अपूर्ण, संदिग्ध, हेतुहेतुमद्; वाच्य तीन: कर्तृ, कर्म (सकर्मक, ‘द्वारा’), भाव (अकर्मक, ‘से’, पुल्लिंग एकवचन, असमर्थता); उपभेदों की गिनती पुस्तकों में अलग।

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