41 में से पाठ 10 · हिंदी व्याकरण

उपसर्ग और प्रत्यय: संस्कृत, हिंदी, उर्दू उपसर्ग तथा कृत् और तद्धित प्रत्यय

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उपसर्ग क्या है

उपसर्ग वे शब्दांश हैं जो स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त नहीं होते, पर किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ को बदल देते हैं या उसमें विशेषता ला देते हैं। एक ही ‘हार’ शब्द से प्रहार (चोट), आहार (भोजन), विहार (घूमना), संहार (विनाश), उपहार (भेंट) और परिहार (त्याग) बनते हैं। उपसर्ग से कहीं अर्थ बदलता है (हार से प्रहार), कहीं उलट जाता है (मान से अपमान, जय से पराजय) और कहीं केवल विशेषता आती है (बल से प्रबल, कोप से प्रकोप)। उपसर्ग जुड़ते समय संधि के नियम लगते हैं, इसलिए ‘उत् + नति = उन्नति’ और ‘सु + आगत = स्वागत’ जैसे रूप बनते हैं। हिंदी में उपसर्ग तीन स्रोतों से आते हैं: संस्कृत, हिंदी और अरबी-फ़ारसी (उर्दू)।

संस्कृत के 22 उपसर्ग

संस्कृत के उपसर्ग 22 माने जाते हैं, जब दुर्-दुस् और निर्-निस् को अलग-अलग गिना जाए। अति (अधिक): अत्यंत, अतिरिक्त, अत्याचार। अधि (ऊपर, श्रेष्ठ): अधिकार, अधिपति, अध्यक्ष। अनु (पीछे, समान): अनुज, अनुकरण, अनुवाद। अप (बुरा, विपरीत): अपमान, अपयश, अपव्यय। अपि (भी): अपिधान। अभि (सामने, ओर): अभिमुख, अभियान, अभ्यास। अव (नीचे, बुरा): अवगुण, अवनति, अवतार। आ (तक, ओर): आजीवन, आगमन, आक्रमण। उत्/उद् (ऊपर, श्रेष्ठ): उत्थान, उत्कर्ष, उद्घाटन, उन्नति। उप (निकट, सहायक): उपवन, उपमंत्री, उपकार। दुर्/दुस् (कठिन, बुरा): दुर्जन, दुर्गम, दुष्कर्म, दुस्साहस। नि (नीचे, भीतर): निबंध, निवास, निपुण। निर्/निस् (बिना, बाहर): निर्धन, निर्भय, निष्फल, निस्संदेह। परा (उलटा, पीछे): पराजय, पराक्रम, परामर्श। परि (चारों ओर, पूर्ण): परिक्रमा, परिपूर्ण, पर्यावरण। प्र (आगे, अधिक): प्रगति, प्रबल, प्रख्यात। प्रति (हर एक, विपरीत): प्रतिदिन, प्रतिकूल, प्रत्येक। वि (विशेष, अभाव): विज्ञान, वियोग, व्यर्थ। सम् (अच्छी तरह, साथ): संयोग, संगम, सम्मान। सु (अच्छा, सरल): सुगम, सुपुत्र, स्वागत।

उपसर्ग की तरह प्रयुक्त संस्कृत शब्दांश

अ, अन, स, सह, अधः, अंतर्, पुनर्, प्रादुर्, बहिर्, चिर, सत्, स्व जैसे शब्दांश 22 उपसर्गों में नहीं गिने जाते, पर उपसर्ग की तरह जुड़ते हैं: अज्ञान, अनादि, सपरिवार, सहयोग, अधोगति, अंतर्गत, पुनर्जन्म, प्रादुर्भाव, बहिष्कार, चिरकाल, सज्जन, स्वदेश। एक शब्द में दो या तीन उपसर्ग भी हो सकते हैं: निरभिमान (निर् + अभि + मान), सुसंस्कृत (सु + सम् + कृत), प्रत्युपकार (प्रति + उप + कार), अव्यवस्था (अ + वि + अव + स्था)।

हिंदी और उर्दू के उपसर्ग

हिंदी (तद्भव) उपसर्ग: अ (अछूता, अजान), अन (अनपढ़, अनबन, अनमोल, अनजान), अध (अधमरा, अधपका, अधखिला), उन (उन्नीस, उनतीस; एक कम), नि (निडर, निकम्मा, निहत्था), भर (भरपेट, भरपूर, भरसक), बिन (बिनब्याहा, बिनमाँगा), कु (कुपुत्र, कुचाल, कुढंग), स/सु (सपूत, सजग, सुडौल), चौ (चौराहा, चौमासा), ति (तिराहा, तिमाही)। अरबी-फ़ारसी (उर्दू) उपसर्ग: कम (कमज़ोर, कमउम्र), खुश (खुशबू, खुशहाल), ग़ैर (ग़ैरहाज़िर, ग़ैरज़रूरी), दर (दरअसल, दरकिनार), ना (नापसंद, नालायक, नासमझ), ब (बखूबी, बदौलत), बद (बदनाम, बदबू, बदतमीज़), बा (बाकायदा, बाइज़्ज़त), बिला (बिलावजह, बिलाशक), बे (बेईमान, बेघर, बेकार), ला (लापरवाह, लाजवाब, लाइलाज), सर (सरताज, सरपंच), हम (हमउम्र, हमदर्द, हमसफ़र), हर (हरदिन, हरएक)। अंग्रेज़ी से सब (सब-इंस्पेक्टर), हेड (हेडमास्टर) और वाइस (वाइस-चांसलर) भी आते हैं।

प्रत्यय और कृत् प्रत्यय

प्रत्यय वे शब्दांश हैं जो शब्द के अंत में जुड़कर नया शब्द बनाते हैं। धातु (क्रिया के मूल रूप) में जुड़ने वाले प्रत्यय कृत् कहलाते हैं और उनसे बने शब्द कृदंत। कर्तृवाचक कृत्: -अक (लेखक, पाठक, गायक), -ता (दाता, वक्ता, श्रोता, नेता), -वाला (पढ़नेवाला), -हार (होनहार, पालनहार), -आकू (लड़ाकू, पढ़ाकू), -आक (तैराक), -एरा (लुटेरा), -अक्कड़ (भुलक्कड़, घुमक्कड़)। कर्मवाचक: -औना (खिलौना, बिछौना)। करणवाचक: -न (बेलन, ढक्कन), -नी (कतरनी, लेखनी)। भाववाचक: -आई (लड़ाई, पढ़ाई, सिलाई), -आवट (लिखावट, सजावट, थकावट), -आहट (घबराहट, चिल्लाहट), -आव (बहाव, बचाव), -आन (उड़ान, थकान)। क्रियाद्योतक: -ता (बहता पानी, चलती गाड़ी), -आ (पका आम, लिखा पत्र), -कर (पढ़कर), -ते ही (आते ही)। संस्कृत -अनीय और -तव्य से: पठनीय, दर्शनीय, पूजनीय, कर्तव्य, गंतव्य।

तद्धित प्रत्यय

संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण में जुड़ने वाले प्रत्यय तद्धित हैं। कर्तृवाचक: -कार (चित्रकार, कलाकार), -आर (सुनार, लुहार), -गर (जादूगर, कारीगर), -ची (तोपची, खज़ानची), -दार (दुकानदार, ज़मींदार), -वाला (दूधवाला)। भाववाचक: -ता (मित्रता, सुंदरता), -त्व (मनुष्यत्व, बंधुत्व), -पन (बचपन, लड़कपन), -आई (भलाई, बुराई), -आस (मिठास, खटास), -इमा (लालिमा, महिमा)। गुणवाचक या संबंधवाचक: -इक (धार्मिक, सामाजिक, मासिक), -ईय (भारतीय, राष्ट्रीय), -ईला (रंगीला, ज़हरीला), -वान/-मान (धनवान, बुद्धिमान), -आलु/-लु (दयालु, कृपालु, ईर्ष्यालु), -मय (आनंदमय, जलमय), -ईन (कुलीन, ग्रामीण)। ऊनवाचक (छोटापन): -इया (खटिया, डिबिया, लुटिया), -ई (टोकरी), -री (कोठरी)। अपत्यवाचक (संतान बताने वाले), जिनमें पहले स्वर की वृद्धि होती है: वसुदेव-वासुदेव, दशरथ-दाशरथि, पृथा-पार्थ, कुंती-कौंतेय, रघु-राघव, मनु-मानव, कुरु-कौरव, पांडु-पांडव, जनक-जानकी, गंगा-गांगेय।

कृत् और तद्धित की पहचान

मूल शब्द क्रिया की धातु हो तो कृत्, संज्ञा या विशेषण हो तो तद्धित। ‘पढ़ाई’ में पढ़ (धातु) + आई, इसलिए कृत्; ‘भलाई’ में भला (विशेषण) + आई, इसलिए तद्धित। इसी तरह लिखावट, घबराहट, उड़ान कृदंत हैं, जबकि मिठास, सुंदरता, बचपन तद्धितांत। ‘-इक’ प्रत्यय से पहले स्वर की वृद्धि का नियम वर्तनी के प्रश्नों में भी आता है: इतिहास-ऐतिहासिक, नीति-नैतिक, उद्योग-औद्योगिक, भूगोल-भौगोलिक, सप्ताह-साप्ताहिक; इसलिए ‘इतिहासिक’ और ‘सप्ताहिक’ अशुद्ध हैं। उर्दू प्रत्यय भी याद रखिए: -बाज़ (धोखेबाज़), -खाना (दवाखाना), -आना (सालाना, रोज़ाना), -गार (मददगार)।

परीक्षा के जाल

(1) ‘अत्यधिक’ में उपसर्ग अति है, ‘अध्ययन’ में अधि, ‘व्यर्थ’ में वि और ‘पर्यावरण’ में परि; संधि के कारण उपसर्ग छिप जाता है। (2) ‘अ’ और ‘अन’ 22 संस्कृत उपसर्गों में नहीं गिने जाते। (3) ‘उन्नीस’ का ‘उन’ हिंदी उपसर्ग है, जबकि ‘उन्नति’ में संस्कृत ‘उत्’। (4) ‘बे’, ‘ना’, ‘ग़ैर’, ‘ला’ उर्दू के निषेधवाचक उपसर्ग हैं। (5) एक शब्द में उपसर्ग और प्रत्यय दोनों हो सकते हैं: अपमानित (अप + मान + इत), प्रत्यक्षता, बेईमानी (बे + ईमान + ई)।

मुख्य तथ्य

  • ‘हार’ से उपसर्ग द्वारा: प्रहार, आहार, विहार, संहार, उपहार, परिहार; मान से अपमान, जय से पराजय (अर्थ उलटा)।
  • संस्कृत के 22 उपसर्ग: अति, अधि, अनु, अप, अपि, अभि, अव, आ, उत्, उप, दुर्, दुस्, नि, निर्, निस्, परा, परि, प्र, प्रति, वि, सम्, सु।
  • संधि में छिपे उपसर्ग: अत्यंत (अति), अध्यक्ष (अधि), अभ्यास (अभि), व्यर्थ (वि), पर्यावरण (परि), स्वागत (सु), उन्नति (उत्)।
  • एक शब्द में कई उपसर्ग: निरभिमान (निर् + अभि), सुसंस्कृत (सु + सम्), प्रत्युपकार (प्रति + उप), अव्यवस्था (अ + वि + अव)।
  • हिंदी उपसर्ग: अन (अनपढ़), अध (अधमरा), उन (उन्नीस), भर (भरपेट), नि (निडर), कु (कुचाल), चौ (चौराहा)।
  • उर्दू उपसर्ग: बे (बेईमान), ना (नापसंद), ग़ैर (ग़ैरहाज़िर), ला (लापरवाह), बद (बदनाम), हम (हमदर्द), सर (सरपंच), बिला (बिलावजह)।
  • कृत् प्रत्यय (धातु से): लेखक, लुटेरा, भुलक्कड़, खिलौना, बेलन, पढ़ाई, लिखावट, उड़ान, पठनीय, कर्तव्य।
  • तद्धित प्रत्यय (संज्ञा/विशेषण से): चित्रकार, जादूगर, मिठास, बचपन, लालिमा, सामाजिक, भारतीय, दयालु, डिबिया।
  • अपत्यवाचक तद्धित (वृद्धि के साथ): दशरथ-दाशरथि, पृथा-पार्थ, कुंती-कौंतेय, रघु-राघव, पांडु-पांडव, जनक-जानकी।

एक नज़र में दोहराव

उपसर्ग आरंभ में, प्रत्यय अंत में; संस्कृत के 22 उपसर्ग (दुर्-दुस्, निर्-निस् अलग गिनकर); अ, अन, स, सह, पुनर् उपसर्गवत् शब्दांश; हिंदी: अन, अध, उन, भर, नि, कु; उर्दू: बे, ना, ग़ैर, ला, बद, हम; कृत् धातु से (पढ़ाई, लिखावट, लुटेरा, पठनीय), तद्धित संज्ञा-विशेषण से (भलाई, मिठास, सामाजिक, दयालु); -इक से वृद्धि (ऐतिहासिक, साप्ताहिक); अपत्यवाचक: दाशरथि, पार्थ, कौंतेय, राघव।

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