41 में से पाठ 4 · हिंदी व्याकरण
समास: छह भेद, समास-विग्रह और कर्मधारय-बहुव्रीहि का अंतर
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समास और विग्रह
दो या अधिक शब्दों के बीच की विभक्ति या संबंध बताने वाले शब्द हटाकर बनाया गया नया छोटा शब्द समस्त पद या सामासिक पद कहलाता है, और यह प्रक्रिया समास। समस्त पद के पहले खंड को पूर्वपद और दूसरे को उत्तरपद कहते हैं। समस्त पद को फिर से खोलकर लिखना समास-विग्रह है: ‘राजपुत्र’ का विग्रह ‘राजा का पुत्र’। समास का भेद इस बात से तय होता है कि कौन-सा पद प्रधान है: अव्ययीभाव में पूर्वपद, तत्पुरुष, कर्मधारय और द्विगु में उत्तरपद, द्वंद्व में दोनों पद और बहुव्रीहि में कोई अन्य (तीसरा) पद। हिंदी की अधिकतर पुस्तकें छह भेद पढ़ाती हैं; संस्कृत परंपरा और कामताप्रसाद गुरु जैसे वैयाकरण कर्मधारय और द्विगु को तत्पुरुष के ही उपभेद मानकर चार मुख्य भेद (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वंद्व, बहुव्रीहि) गिनाते हैं; गुरु कर्मधारय को ‘समानाधिकरण तत्पुरुष’ और द्विगु को ‘संख्यापूर्व कर्मधारय’ कहते हैं।
अव्ययीभाव समास
जिसमें पहला पद अव्यय और प्रधान हो, और पूरा समस्त पद अव्यय की तरह (प्रायः क्रियाविशेषण बनकर) प्रयुक्त हो। उदाहरण: यथाशक्ति (शक्ति के अनुसार), यथासंभव (जितना संभव हो), प्रतिदिन (हर दिन), प्रत्येक (हर एक), आजीवन (जीवन भर), आजन्म (जन्म से लेकर), भरपेट (पेट भरकर), निडर (बिना डर के), बेखटके (बिना खटके के), अनुरूप (रूप के योग्य)। संज्ञा की पुनरुक्ति से बने क्रियाविशेषण भी अव्ययीभाव माने जाते हैं: घर-घर, हाथोंहाथ, दिनोंदिन, रातोंरात, बीचोंबीच। पहचान: यथा, प्रति, आ, भर, नि, बे जैसे अव्यय पहले हों और शब्द ‘कैसे, कब, कितना’ का उत्तर दे।
तत्पुरुष समास
जिसमें उत्तरपद प्रधान हो और बीच का कारक-चिह्न लुप्त हो। कर्ता और संबोधन को छोड़कर छह कारकों के आधार पर इसके छह भेद हैं। कर्म तत्पुरुष (को): स्वर्गप्राप्त (स्वर्ग को प्राप्त), गगनचुंबी (गगन को चूमने वाला), यशप्राप्त। करण तत्पुरुष (से, के द्वारा): हस्तलिखित (हाथ से लिखा), तुलसीकृत (तुलसी द्वारा रचित), रेखांकित, शोकाकुल, रोगग्रस्त। संप्रदान तत्पुरुष (के लिए): रसोईघर (रसोई के लिए घर), गौशाला, विद्यालय, देवालय, हथकड़ी। अपादान तत्पुरुष (से, अलग होने में): देशनिकाला (देश से निकाला), धनहीन, पथभ्रष्ट, ऋणमुक्त, जन्मांध (जन्म से अंधा)। संबंध तत्पुरुष (का, की, के): राजपुत्र, गंगाजल, राष्ट्रपति, सेनापति, देशभक्ति। अधिकरण तत्पुरुष (में, पर): आपबीती (आप पर बीती), घुड़सवार (घोड़े पर सवार), शरणागत (शरण में आया), कलानिपुण, पुरुषोत्तम (पुरुषों में उत्तम)। ‘विद्यालय’ और ‘देवालय’ को कुछ पुस्तकें संबंध तत्पुरुष (विद्या का आलय) मानती हैं; विकल्पों में जो विग्रह दिया हो, उसी से भेद तय कीजिए।
तत्पुरुष के अन्य भेद
नञ् तत्पुरुष में पहला पद निषेध (अ, अन, न, ना) बताता है: असभ्य (न सभ्य), अधर्म, अज्ञान, अनादर, असंभव, अनपढ़, नापसंद। उपपद तत्पुरुष में उत्तरपद ऐसा कृदंत होता है जो अकेले प्रयुक्त नहीं होता: जलचर (जल में चरने वाला), नभचर, कुंभकार (कुंभ बनाने वाला), स्वर्णकार, चर्मकार, सर्वज्ञ (सब जानने वाला), जलद (जल देने वाला)। मध्यमपदलोपी (लुप्तपद) समास में बीच का पूरा पद लुप्त होता है: दहीबड़ा (दही में डूबा बड़ा), पनचक्की (पानी से चलने वाली चक्की), बैलगाड़ी (बैलों से खींची जाने वाली गाड़ी); कुछ पुस्तकें इसे तत्पुरुष में और कुछ कर्मधारय में रखती हैं। अलुक् तत्पुरुष में विभक्ति लुप्त नहीं होती: युधिष्ठिर (युद्ध में स्थिर), मनसिज, खेचर।
कर्मधारय और द्विगु
कर्मधारय में उत्तरपद प्रधान होता है और दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध होता है। विशेषण-विशेष्य: नीलकमल (नीला है जो कमल), महात्मा (महान है जो आत्मा), सद्गुण, नवयुवक, परमात्मा, पीतांबर (पीला है जो अंबर)। उपमान-उपमेय: चंद्रमुख (चंद्र के समान मुख), घनश्याम (घन के समान श्याम), कमलनयन (कमल के समान नयन)। रूपक वाला कर्मधारय: विद्याधन (विद्या रूपी धन), चरणकमल (कमल रूपी चरण), क्रोधाग्नि (क्रोध रूपी अग्नि), भवसागर (भव रूपी सागर)। द्विगु में पूर्वपद संख्यावाचक होता है और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराता है: त्रिभुवन (तीन भुवनों का समाहार), चौराहा (चार राहों का समाहार), नवरत्न, सप्तर्षि, पंचवटी, सप्ताह (सात दिनों का समूह), शताब्दी, त्रिफला, चौमासा, दोपहर, सतसई (सात सौ दोहों का समाहार)। संख्यावाचक विशेषण होने के कारण कुछ पुस्तकें द्विगु को कर्मधारय का उपभेद भी मानती हैं।
द्वंद्व और बहुव्रीहि
द्वंद्व में दोनों पद प्रधान होते हैं और विग्रह में ‘और’, ‘या’ अथवा ‘आदि’ लगता है; समस्त पद में प्रायः योजक चिह्न लगता है। इतरेतर द्वंद्व (और): माता-पिता, भाई-बहन, राधा-कृष्ण, सीता-राम, अन्न-जल। वैकल्पिक द्वंद्व (या): भला-बुरा, ठंडा-गरम, थोड़ा-बहुत, लाभ-हानि। समाहार द्वंद्व (आदि, पूरे समूह का बोध): दाल-रोटी (दाल, रोटी आदि, अर्थात् भोजन), हाथ-पाँव, नहाया-धोया। बहुव्रीहि में कोई भी पद प्रधान नहीं होता; दोनों मिलकर किसी तीसरे का बोध कराते हैं, और विग्रह में ‘जिसका, जिसकी, जिसके, जो’ आता है: दशानन (दस हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण), लंबोदर (गणेश), चक्रपाणि (चक्र है पाणि में जिसके, अर्थात् विष्णु), पीतांबर (पीले हैं वस्त्र जिसके, अर्थात् कृष्ण), गजानन, चंद्रशेखर (शिव), गिरिधर, वीणापाणि (सरस्वती), चतुर्भुज (विष्णु), त्रिनेत्र (शिव), दिगंबर।
कर्मधारय और बहुव्रीहि का अंतर
कर्मधारय में दोनों पदों का संबंध आपस में ही रहता है, अर्थात् पहला पद दूसरे की विशेषता बताता है और अर्थ उन्हीं दो पदों तक सीमित रहता है; बहुव्रीहि में यही दोनों पद मिलकर किसी तीसरे व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं। इसलिए एक ही शब्द दोनों हो सकता है: नीलकंठ (नीला कंठ: कर्मधारय; नीला है कंठ जिसका, अर्थात् शिव: बहुव्रीहि), पीतांबर (पीला वस्त्र: कर्मधारय; श्रीकृष्ण: बहुव्रीहि), लंबोदर (लंबा उदर: कर्मधारय; गणेश: बहुव्रीहि), कमलनयन (कमल के समान नयन: कर्मधारय; विष्णु या राम: बहुव्रीहि)। यही बात द्विगु और बहुव्रीहि में है: त्रिलोचन, चतुर्भुज, पंचानन, चतुर्मुख; संख्या के समूह का अर्थ हो तो द्विगु, देवता का अर्थ हो तो बहुव्रीहि। गुरु का उदाहरण है: ‘त्रिनेत्र’ ‘तीन नेत्रों’ के अर्थ में द्विगु है, पर ‘महादेव’ के अर्थ में बहुव्रीहि; इसी तरह ‘चतुर्भुज’ ‘चार भुजाओं का समाहार’ के विग्रह से द्विगु और ‘चार हैं भुजाएँ जिसकी, अर्थात् विष्णु’ के विग्रह से बहुव्रीहि है।
परीक्षा के जाल
(1) प्रश्न में दिया गया विग्रह ही भेद तय करता है; विग्रह न हो तो शब्द का प्रचलित अर्थ देखिए। (2) संधि और समास एक साथ हो सकते हैं: ‘हिमालय’ में दीर्घ संधि भी है और ‘हिम का आलय’ के रूप में तत्पुरुष समास भी। (3) ‘प्रत्येक’, ‘यथाशक्ति’, ‘आजीवन’ अव्ययीभाव हैं, तत्पुरुष नहीं। (4) ‘दाल-रोटी’ समाहार द्वंद्व है, क्योंकि उसका अर्थ केवल दाल और रोटी नहीं, पूरा भोजन है। (5) ‘देशनिकाला’ और ‘पथभ्रष्ट’ अपादान, जबकि ‘हस्तलिखित’ और ‘तुलसीकृत’ करण तत्पुरुष हैं। (6) ‘महात्मा’ को ‘महान है आत्मा जिसकी’ के रूप में बहुव्रीहि भी लिखा जाता है; विकल्प का विग्रह देखिए।
मुख्य तथ्य
- प्रधान पद: अव्ययीभाव में पूर्वपद; तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु में उत्तरपद; द्वंद्व में दोनों; बहुव्रीहि में कोई तीसरा (अन्य) पद।
- अव्ययीभाव: यथाशक्ति (शक्ति के अनुसार), प्रतिदिन, प्रत्येक, आजीवन, भरपेट, निडर; पुनरुक्ति वाले भी: घर-घर, हाथोंहाथ, रातोंरात।
- तत्पुरुष: स्वर्गप्राप्त (कर्म), हस्तलिखित (करण), रसोईघर (संप्रदान), देशनिकाला (अपादान), राजपुत्र (संबंध), घुड़सवार (अधिकरण)।
- नञ् तत्पुरुष: असभ्य, अधर्म, अनपढ़, नापसंद; उपपद: जलचर, कुंभकार, सर्वज्ञ, जलद; मध्यमपदलोपी: दहीबड़ा, पनचक्की, बैलगाड़ी।
- कर्मधारय: नीलकमल (नीला है जो कमल), चंद्रमुख (चंद्र के समान मुख), चरणकमल (कमल रूपी चरण), भवसागर (भव रूपी सागर)।
- द्विगु: त्रिभुवन (तीन भुवनों का समाहार), चौराहा, नवरत्न, सप्ताह, शताब्दी, पंचवटी, त्रिफला, सतसई।
- द्वंद्व: माता-पिता (इतरेतर, ‘और’), भला-बुरा (वैकल्पिक, ‘या’), दाल-रोटी (समाहार, ‘आदि’)।
- बहुव्रीहि: दशानन (रावण), लंबोदर, गजानन (गणेश), चक्रपाणि (विष्णु), चंद्रशेखर, त्रिनेत्र (शिव), वीणापाणि (सरस्वती)।
- एक शब्द, दो समास: नीलकंठ = नीला कंठ (कर्मधारय) या नीला है कंठ जिसका, शिव (बहुव्रीहि); चतुर्भुज = चार भुजाओं का समाहार (द्विगु) या विष्णु (बहुव्रीहि)।
एक नज़र में दोहराव
समास में विभक्ति लुप्त, विग्रह में लौटती है; छह भेद (कुछ पुस्तकें कर्मधारय और द्विगु को तत्पुरुष में रखकर चार गिनती हैं); अव्ययीभाव: पहला पद अव्यय (यथाशक्ति, प्रतिदिन); तत्पुरुष: कारक-चिह्न लुप्त (हस्तलिखित, देशनिकाला, राजपुत्र); कर्मधारय: विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय (नीलकमल, चंद्रमुख); द्विगु: संख्या + समूह (त्रिभुवन, चौराहा); द्वंद्व: दोनों प्रधान (माता-पिता); बहुव्रीहि: तीसरे का बोध (दशानन, लंबोदर); नीलकंठ, पीतांबर विग्रह से कर्मधारय या बहुव्रीहि।