41 में से पाठ 3 · हिंदी व्याकरण
संधि: स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि के नियम, अपवाद और संधि-विच्छेद
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संधि क्या है
दो वर्णों (ध्वनियों) के पास-पास आने से जो परिवर्तन होता है, उसे संधि कहते हैं, और संधि से बने शब्द को फिर से उसके मूल खंडों में तोड़ना संधि-विच्छेद कहलाता है। संधि वर्णों का मेल है, जबकि समास शब्दों का; ‘विद्यालय’ का संधि-विच्छेद ‘विद्या + आलय’ है और समास-विग्रह ‘विद्या के लिए आलय’। संधि के तीन भेद हैं: स्वर संधि (स्वर + स्वर), व्यंजन संधि (व्यंजन के साथ स्वर या व्यंजन) और विसर्ग संधि (विसर्ग के साथ स्वर या व्यंजन)। स्वर संधि के पाँच भेद हैं: दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण और अयादि।
दीर्घ और गुण संधि
दीर्घ संधि में दो सवर्ण (एक जैसे) स्वर मिलकर दीर्घ बनते हैं। अ/आ + अ/आ = आ: धर्मार्थ (धर्म + अर्थ), हिमालय (हिम + आलय)। इ/ई + इ/ई = ई: गिरीश (गिरि + ईश), मुनींद्र (मुनि + इंद्र)। उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ: भानूदय (भानु + उदय), सूक्ति (सु + उक्ति)। गुण संधि में अ/आ के बाद इ/ई आए तो ए, उ/ऊ आए तो ओ, और ऋ आए तो अर् बनता है: नरेंद्र (नर + इंद्र), रमेश (रमा + ईश), उपेक्षा (उप + ईक्षा); सूर्योदय (सूर्य + उदय), महोत्सव (महा + उत्सव); देवर्षि (देव + ऋषि), महर्षि (महा + ऋषि)।
वृद्धि, यण और अयादि
वृद्धि संधि में अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो ऐ, और ओ/औ आए तो औ बनता है: सदैव (सदा + एव), मतैक्य (मत + ऐक्य); वनौषधि (वन + औषधि)। यण संधि में इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो वे क्रमशः य्, व्, र् बन जाते हैं: इत्यादि (इति + आदि), यद्यपि (यदि + अपि), प्रत्येक (प्रति + एक), व्यर्थ (वि + अर्थ); स्वागत (सु + आगत), अन्वय (अनु + अय), अन्वेषण (अनु + एषण); पित्राज्ञा (पितृ + आज्ञा)। अयादि संधि में ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई स्वर आए तो वे क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् बनते हैं: नयन (ने + अन); नायक (नै + अक), गायक (गै + अक); पवन (पो + अन), पवित्र (पो + इत्र); पावक (पौ + अक), भावुक (भौ + उक)।
स्वर संधि पहचानने की युक्ति
जोड़ पर दीर्घ स्वर दिखे (आ, ई, ऊ) तो दीर्घ; ए, ओ या अर् दिखे तो गुण; ऐ या औ दिखे तो वृद्धि। जोड़ पर आधा य्, व् या र् किसी व्यंजन के साथ दिखे (त्य, द्य, स्व, न्व, त्र) तो यण; और य, व पूरे वर्ण के रूप में अ/आ के बाद दिखें (नयन, नायक, पवन, पावक) तो अयादि। संस्कृत से आए कुछ अपवाद याद रखिए, जहाँ गुण की जगह वृद्धि होती है: अक्षौहिणी (अक्ष + ऊहिनी), प्रौढ़ (प्र + ऊढ़), स्वैर (स्व + ईर)।
व्यंजन संधि के नियम
(1) वर्ग का पहला वर्ण किसी स्वर या वर्ग के तीसरे-चौथे वर्ण, य, र, ल, व से पहले आए तो उसी वर्ग का तीसरा वर्ण बन जाता है: दिगंबर (दिक् + अंबर), वागीश (वाक् + ईश), सदाचार (सत् + आचार), जगदीश (जगत् + ईश), उद्घाटन (उत् + घाटन)। (2) पहला वर्ण न या म से पहले आए तो पाँचवाँ बनता है: वाङ्मय (वाक् + मय), जगन्नाथ (जगत् + नाथ), उन्नति (उत् + नति), चिन्मय (चित् + मय)। (3) त्/द् के बाद च, ज, ट, ड, ल आएँ तो त् भी वही बन जाता है: उच्चारण (उत् + चारण), सज्जन (सत् + जन), उज्ज्वल (उत् + ज्वल), उल्लास (उत् + लास), तल्लीन (तत् + लीन)। त् + श = च्छ: उच्छ्वास (उत् + श्वास); त् + ह = द्ध: उद्धार (उत् + हार), तद्धित (तत् + हित)। (4) म् के बाद स्पर्श व्यंजन आए तो अनुस्वार या उसी वर्ग का पंचम वर्ण: संकल्प (सम् + कल्प), संतोष (सम् + तोष), संपूर्ण (सम् + पूर्ण); म् + म = म्म: सम्मान; य, र, ल, व, श, स, ह से पहले अनुस्वार: संयम, संसार, संहार, संवाद; अपवाद: सम्राट (सम् + राट)। (5) स्वर के बाद छ आए तो च्छ: विच्छेद (वि + छेद), अनुच्छेद, स्वच्छंद, आच्छादन। (6) ऋ, र, ष के बाद न हो तो ण बनता है: परिणाम (परि + नाम), प्रमाण (प्र + मान), रामायण (राम + अयन); बीच में च-वर्ग, ट-वर्ग, त-वर्ग या श, स आ जाएँ तो नहीं: अर्जुन, दर्शन, रचना। (7) अ, आ के अलावा किसी स्वर के बाद स प्रायः ष बनता है: अभिषेक (अभि + सेक), विषम (वि + सम), निषिद्ध (नि + सिद्ध); अनुसरण, विसर्ग जैसे अपवाद भी हैं।
विसर्ग संधि के नियम
(1) विसर्ग के बाद च/छ हो तो श्, ट/ठ हो तो ष्, त/थ हो तो स्: निश्चय (निः + चय), निश्छल (निः + छल), धनुष्टंकार (धनुः + टंकार), नमस्ते (नमः + ते)। (2) अ + विसर्ग के बाद अ या कोई सघोष व्यंजन हो तो ओ: मनोयोग (मनः + योग), यशोदा (यशः + दा), मनोबल (मनः + बल), तपोभूमि (तपः + भूमि), मनोनुकूल (मनः + अनुकूल; यहाँ बाद वाला अ लुप्त हो जाता है)। (3) अ, आ के अलावा किसी स्वर + विसर्ग के बाद स्वर या सघोष व्यंजन हो तो र्: निराशा (निः + आशा), निर्धन (निः + धन), दुर्गुण (दुः + गुण), आशीर्वाद (आशीः + वाद), दुरुपयोग (दुः + उपयोग)। (4) इ/उ + विसर्ग के बाद र हो तो विसर्ग लुप्त और पहला स्वर दीर्घ: नीरस (निः + रस), नीरोग (निः + रोग)। (5) इ/उ + विसर्ग के बाद क, प, फ हो तो ष्: निष्कपट (निः + कपट), दुष्कर्म (दुः + कर्म), निष्फल (निः + फल)। (6) अ + विसर्ग के बाद क, प हो तो प्रायः विसर्ग बना रहता है: प्रातःकाल, अंतःकरण; अपवाद, जिनमें विसर्ग स् बनता है: नमस्कार (नमः + कार), पुरस्कार (पुरः + कार), तिरस्कार (तिरः + कार), और आ + विसर्ग वाला भास्कर (भाः + कर)। (7) अ + विसर्ग के बाद अ के अलावा कोई स्वर हो तो विसर्ग लुप्त होता है और आगे संधि नहीं होती: अतएव (अतः + एव)। (8) श, स से पहले विसर्ग बना भी रह सकता है: दुःशासन/दुश्शासन, निःसंदेह/निस्संदेह, दोनों रूप मान्य हैं।
विसर्ग के विशेष अपवाद
पुनः और अंतः का विसर्ग मूल रूप से र् से बना है, इसलिए ये अ + विसर्ग होते हुए भी र् बनाते हैं: पुनर्जन्म (पुनः + जन्म), पुनरपि (पुनः + अपि), अंतरात्मा (अंतः + आत्मा)। इसी तरह ‘उदाहरण’ का विच्छेद उत् + हरण नहीं, उत् + आहरण है (कुछ पुस्तकें उद् + आहरण लिखती हैं); उत् + हरण से ‘उद्धरण’ बनता है। ‘उपेक्षा’ गुण संधि है, यण नहीं; ‘स्वागत’ यण है, गुण नहीं; ‘सदैव’ वृद्धि है, दीर्घ नहीं।
अभ्यास के लिए संधि-विच्छेद
परमेश्वर (परम + ईश्वर, गुण), अत्यधिक (अति + अधिक, यण), पावन (पौ + अन, अयादि), उल्लेख (उत् + लेख, व्यंजन), सन्मार्ग (सत् + मार्ग, व्यंजन), दुर्दशा (दुः + दशा, विसर्ग), निश्चल (निः + चल, विसर्ग), मनोरथ (मनः + रथ, विसर्ग), नीरोग (निः + रोग, विसर्ग)। संधि का भेद पूछा जाए तो पहले देखिए कि जोड़ पर दोनों ओर क्या है: दो स्वर हों तो स्वर संधि, कहीं व्यंजन हो तो व्यंजन संधि, और पहले खंड के अंत में विसर्ग हो तो विसर्ग संधि।
मुख्य तथ्य
- दीर्घ: हिमालय (हिम + आलय), गिरीश (गिरि + ईश), भानूदय (भानु + उदय); गुण: नरेंद्र (नर + इंद्र), सूर्योदय (सूर्य + उदय), महर्षि (महा + ऋषि)।
- वृद्धि: सदैव (सदा + एव), मतैक्य (मत + ऐक्य), वनौषधि (वन + औषधि); अपवाद में वृद्धि: अक्षौहिणी, प्रौढ़, स्वैर।
- यण: इत्यादि (इति + आदि), यद्यपि (यदि + अपि), स्वागत (सु + आगत), अन्वेषण (अनु + एषण), पित्राज्ञा (पितृ + आज्ञा)।
- अयादि: नयन (ने + अन), नायक (नै + अक), पवन (पो + अन), पवित्र (पो + इत्र), पावक (पौ + अक), भावुक (भौ + उक)।
- व्यंजन संधि: दिगंबर (दिक् + अंबर), जगन्नाथ (जगत् + नाथ), सज्जन (सत् + जन), उद्धार (उत् + हार), विच्छेद (वि + छेद); अपवाद सम्राट (सम् + राट)।
- विसर्ग से ओ: मनोयोग, यशोदा, तपोभूमि; विसर्ग से र्: निराशा, दुर्गुण, आशीर्वाद; दीर्घ होकर लोप: नीरस, नीरोग, नीरव।
- विसर्ग से स् अपवाद: नमस्कार (नमः + कार), पुरस्कार (पुरः + कार), भास्कर (भाः + कर); अतएव (अतः + एव) में आगे संधि नहीं।
- पुनः, अंतः का विसर्ग र् बनता है: पुनर्जन्म, पुनरपि, अंतरात्मा; उदाहरण = उत् + आहरण, पर उद्धरण = उत् + हरण।
- पहचान: जोड़ पर ए/ओ/अर् = गुण; ऐ/औ = वृद्धि; आधा य्/व्/र् = यण; पूरा य/व (नयन, पवन) = अयादि।
एक नज़र में दोहराव
संधि वर्णों का मेल, समास शब्दों का; स्वर संधि पाँच: दीर्घ (आ, ई, ऊ), गुण (ए, ओ, अर्: नरेंद्र, महर्षि), वृद्धि (ऐ, औ: सदैव, वनौषधि), यण (य्, व्, र्: इत्यादि, स्वागत), अयादि (अय्, आय्, अव्, आव्: नयन, नायक, पवन, पावक); व्यंजन: वाक् + ईश = वागीश, जगत् + नाथ = जगन्नाथ, सम् + राट = सम्राट; विसर्ग: मनोयोग, निराशा, निश्चय, नीरस, नमस्कार, अतएव; पुनः-अंतः में र्।