41 में से पाठ 5 · हिंदी व्याकरण
संज्ञा और सर्वनाम: भेद, भाववाचक संज्ञा की रचना और सर्वनाम के छह भेद
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संज्ञा और उसके भेद
किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, प्राणी, गुण या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं। कामताप्रसाद गुरु जैसे पारंपरिक वैयाकरण संज्ञा के तीन भेद मानते हैं: व्यक्तिवाचक, जातिवाचक और भाववाचक; गुरु द्रव्यवाचक को जातिवाचक में और समुदायवाचक को व्यक्तिवाचक तथा जातिवाचक में ही समाहित मानते हैं। अंग्रेज़ी व्याकरण के प्रभाव से कई पुस्तकें जातिवाचक के भीतर के दो प्रकारों, समूहवाचक और द्रव्यवाचक, को अलग गिनकर पाँच भेद बताती हैं। परीक्षा में विकल्प देखकर तय कीजिए कि प्रश्न तीन भेदों वाला है या पाँच वाला; ‘सेना’ का उत्तर पाँच भेदों में समूहवाचक और तीन भेदों में जातिवाचक होगा।
व्यक्तिवाचक और जातिवाचक
व्यक्तिवाचक संज्ञा किसी एक विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु का बोध कराती है: महात्मा गांधी, सीता (व्यक्ति); भारत, आगरा, गंगा, हिमालय (स्थान, नदी, पर्वत); रामचरितमानस (पुस्तक); सोमवार, जनवरी (दिन, महीने); दीवाली (त्योहार)। जातिवाचक संज्ञा पूरी जाति या वर्ग का बोध कराती है: लड़का, नदी, पहाड़, शहर, गाय, पुस्तक; पद और व्यवसाय (डॉक्टर, अध्यापक, सिपाही) तथा संबंध (भाई, माँ) भी जातिवाचक हैं। समूहवाचक संज्ञा किसी समूह का बोध कराती है: सेना, सभा, कक्षा, भीड़, झुंड, दल, परिवार, गुच्छा। द्रव्यवाचक संज्ञा ऐसे पदार्थ का बोध कराती है जिसे गिना नहीं, नापा-तौला जाता है: सोना, चाँदी, दूध, पानी, तेल, घी, गेहूँ।
भाववाचक संज्ञा और उसकी रचना
जिस संज्ञा से गुण, दोष, दशा, भाव या क्रिया के व्यापार का बोध हो, वह भाववाचक है: मिठास, बुढ़ापा, क्रोध, प्रेम, सच्चाई, थकान। ये पाँच प्रकार के शब्दों से बनती हैं। जातिवाचक संज्ञा से: बच्चा-बचपन, मित्र-मित्रता, मनुष्य-मनुष्यता, पशु-पशुता, दास-दासता, शिशु-शैशव, पंडित-पांडित्य। सर्वनाम से: अपना-अपनापन (अपनत्व), मम-ममता (ममत्व), निज-निजत्व, सर्व-सर्वस्व, अहं-अहंकार। विशेषण से: मीठा-मिठास, सुंदर-सुंदरता (सौंदर्य), चतुर-चतुराई (चातुर्य), लाल-लालिमा, मधुर-माधुर्य, वीर-वीरता, ऊँचा-ऊँचाई, बुरा-बुराई। क्रिया से: पढ़ना-पढ़ाई, हँसना-हँसी, चलना-चाल, लिखना-लिखावट, थकना-थकावट, घबराना-घबराहट, उड़ना-उड़ान, बहना-बहाव, गिरना-गिरावट। अव्यय से: दूर-दूरी, निकट-निकटता, शीघ्र-शीघ्रता, धिक्-धिक्कार। ध्यान दें कि ‘सौंदर्य’, ‘माधुर्य’, ‘चातुर्य’ में पहले स्वर की वृद्धि होती है।
संज्ञा के भेदों का एक-दूसरे में प्रयोग
वाक्य में प्रयोग से संज्ञा का भेद बदल जाता है। व्यक्तिवाचक का जातिवाचक में प्रयोग तब होता है जब किसी विशेष व्यक्ति के नाम से उसका गुण बताया जाए: ‘कलियुग में भी हरिश्चंद्रों की कमी नहीं है’ (सत्यवादी लोग), ‘देश को जयचंदों से बचाना है’ (देशद्रोही), ‘हर घर में कोई न कोई विभीषण होता है’ (घर का भेदी), ‘वह तो कुंभकर्ण है’ (बहुत सोने वाला)। जातिवाचक का व्यक्तिवाचक में प्रयोग तब होता है जब कोई सामान्य शब्द किसी एक व्यक्ति के लिए रूढ़ हो जाए: गोस्वामी जी (तुलसीदास), बापू या महात्मा (गांधी जी), नेताजी (सुभाषचंद्र बोस), पंडित जी (नेहरू जी), पुरी (जगन्नाथ पुरी)। भाववाचक का जातिवाचक में प्रयोग तब होता है जब वह बहुवचन में या ठोस अर्थ में आए: ‘पहाड़ों पर कठिन चढ़ाइयाँ हैं’, ‘आजकल पहनावे बदल गए हैं’, ‘बुराइयों से बचो’।
सर्वनाम और उसके छह भेद
संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द सर्वनाम हैं, जो संज्ञा की बार-बार पुनरावृत्ति रोकते हैं। गुरु के अनुसार हिंदी में 11 मूल सर्वनाम हैं: मैं, तू, आप, यह, वह, सो, जो, कोई, कुछ, कौन, क्या। इनके छह भेद हैं। पुरुषवाचक: उत्तम पुरुष (मैं, हम), मध्यम पुरुष (तू, तुम, आप) और अन्य पुरुष (वह, वे, यह, ये)। निश्चयवाचक या संकेतवाचक, जो निकट या दूर की निश्चित वस्तु बताता है: ‘यह मेरी पुस्तक है’, ‘वह घर है’। अनिश्चयवाचक, जिसमें निश्चित बोध न हो; ‘कोई’ प्राणी के लिए और ‘कुछ’ वस्तु के लिए: ‘बाहर कोई खड़ा है’, ‘दूध में कुछ गिर गया’। संबंधवाचक, जो दो उपवाक्यों में संबंध जोड़ता है: ‘जो परिश्रम करेगा, वह सफल होगा’, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। प्रश्नवाचक: ‘कौन’ प्राणी के लिए, ‘क्या’ वस्तु या भाव के लिए: ‘कौन आया?’, ‘तुम क्या खा रहे हो?’। निजवाचक, जो कर्ता के अपने-आप होने का बोध कराता है: आप, स्वयं, खुद, अपने-आप: ‘मैं अपना काम आप करता हूँ’, ‘वह स्वयं आया’।
सर्वनाम के जाल
‘आप’ तीन रूपों में आता है: आदर के लिए मध्यम पुरुष (‘आप कब आए?’), अन्य पुरुष के आदर में (‘गांधी जी सत्य के पुजारी थे; आप अहिंसा में विश्वास रखते थे’) और निजवाचक (‘मैं आप चला जाऊँगा’, अर्थात् स्वयं)। ‘यह’, ‘वह’, ‘कोई’, ‘कौन’ जब संज्ञा से पहले आकर उसकी विशेषता बताएँ, तब सार्वनामिक विशेषण बन जाते हैं: ‘यह पुस्तक मेरी है’ में ‘यह’ विशेषण है, पर ‘यह मेरी पुस्तक है’ में सर्वनाम। ‘क्या तुम कल आओगे?’ में ‘क्या’ सर्वनाम नहीं, प्रश्न का सूचक अव्यय है, क्योंकि वह किसी संज्ञा के स्थान पर नहीं आया। ‘कुछ’ भी ‘कुछ लोग’, ‘कुछ दूध’ में विशेषण है।
सर्वनाम के रूप और शुद्ध प्रयोग
सर्वनाम का अपना लिंग नहीं होता; लिंग क्रिया से पता चलता है: ‘मैं जाता हूँ’, ‘मैं जाती हूँ’। सर्वनाम में संबोधन कारक नहीं होता। विभक्ति लगने पर रूप बदलते हैं: मैं-मुझे-मेरा-मुझसे-मैंने, तू-तुझे-तेरा, वह-उसे-उसका-उसने, यह-इसे-इसका, कौन-किसे-किसका, जो-जिसे-जिसका; बहुवचन में वे-उन्होंने, ये-इन्होंने। मानक प्रयोग ‘मुझे’ या ‘मुझको’ है, ‘मेरे को’ नहीं; ‘तुझे’ है, ‘तेरे को’ नहीं; और ‘वह ने’ नहीं, ‘उसने’। आदरसूचक ‘आप’ के साथ क्रिया सदा बहुवचन में आती है: ‘आप बैठिए’, ‘आप कहाँ जा रहे हैं?’।
मुख्य तथ्य
- संज्ञा के तीन भेद (गुरु): व्यक्तिवाचक (गंगा, आगरा), जातिवाचक (नदी, शहर), भाववाचक (मिठास, बचपन); पाँच भेद वाली पुस्तकें समूहवाचक (सेना) और द्रव्यवाचक (सोना) अलग गिनती हैं।
- भाववाचक संज्ञा पाँच स्रोतों से: जातिवाचक (मित्र-मित्रता), सर्वनाम (मम-ममता), विशेषण (मधुर-माधुर्य), क्रिया (उड़ना-उड़ान), अव्यय (दूर-दूरी)।
- व्यक्तिवाचक का जातिवाचक प्रयोग: ‘कलियुग में भी हरिश्चंद्रों की कमी नहीं’, ‘देश को जयचंदों से बचाओ’।
- जातिवाचक का व्यक्तिवाचक प्रयोग: गोस्वामी जी (तुलसीदास), बापू (गांधी जी), नेताजी (सुभाषचंद्र बोस)।
- भाववाचक का जातिवाचक प्रयोग: ‘पहाड़ों पर कठिन चढ़ाइयाँ हैं’, ‘आजकल पहनावे बदल गए हैं’।
- सर्वनाम के छह भेद: पुरुषवाचक (मैं, तुम, वह), निश्चयवाचक (यह, वह), अनिश्चयवाचक (कोई, कुछ), संबंधवाचक (जो-सो), प्रश्नवाचक (कौन, क्या), निजवाचक (आप, स्वयं, खुद)।
- हिंदी के 11 मूल सर्वनाम: मैं, तू, आप, यह, वह, सो, जो, कोई, कुछ, कौन, क्या।
- ‘यह मेरी पुस्तक है’ में ‘यह’ सर्वनाम; ‘यह पुस्तक मेरी है’ में ‘यह’ सार्वनामिक विशेषण; ‘क्या तुम आओगे?’ में ‘क्या’ सर्वनाम नहीं।
- शुद्ध रूप: मुझे/मुझको (मेरे को नहीं), तुझे (तेरे को नहीं), उसने (वह ने नहीं); सर्वनाम में संबोधन कारक नहीं होता।
एक नज़र में दोहराव
संज्ञा तीन (व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक) या पाँच (समूहवाचक, द्रव्यवाचक सहित); भाववाचक जातिवाचक, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय से (मित्रता, ममता, माधुर्य, उड़ान, दूरी); हरिश्चंद्रों (व्यक्ति से जाति), गोस्वामी जी (जाति से व्यक्ति), चढ़ाइयाँ (भाव से जाति); 11 मूल सर्वनाम; छह भेद: पुरुष, निश्चय, अनिश्चय (कोई प्राणी, कुछ वस्तु), संबंध (जो-सो), प्रश्न (कौन, क्या), निज (आप, स्वयं); संज्ञा से पहले सर्वनाम = सार्वनामिक विशेषण।