6 में से पाठ 1 · समावेशी शिक्षा और विशेष आवश्यकता वाले बच्चे
पृथक्करण, एकीकरण और समावेशन: दिव्यांगता के मॉडल और सलामांका वक्तव्य
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विद्यालय की चार प्रकार की प्रतिक्रिया
किसी दिव्यांग बच्चे या किसी अन्य भिन्नता वाले बच्चे के प्रति शिक्षा व्यवस्था चार प्रकार से प्रतिक्रिया कर सकती है। अपवर्जन (exclusion) में बच्चा विद्यालय से पूरी तरह बाहर रहता है। पृथक्करण (segregation) में बच्चे को अलग व्यवस्था में पढ़ाया जाता है, जैसे दृष्टिहीन या बधिर बच्चों का विशेष विद्यालय। एकीकरण (integration) में बच्चे को सामान्य विद्यालय में रखा जाता है, परंतु अपेक्षा की जाती है कि बच्चा स्वयं को ढाले: पाठ्यचर्या, समय-सारणी, शिक्षण और परीक्षाएँ जैसी हैं वैसी ही रहती हैं, और बच्चे को किसी संसाधन कक्ष या समय-समय पर आने वाले विशेष शिक्षक के माध्यम से सामंजस्य बिठाने में मदद दी जाती है। समावेशन (inclusion) इसके स्थान पर विद्यालय को बदलता है: शिक्षक आरंभ से ही पाठ, सामग्री, बैठने की व्यवस्था, समूह-कार्य और आकलन की योजना इस प्रकार बनाता है कि हर बच्चा, दिव्यांगता के साथ या उसके बिना, एक ही कक्षा में सीखे। एकीकरण में बच्चे को व्यवस्था में रखा जाता है; समावेशन में व्यवस्था को बच्चे के लिए नए सिरे से गढ़ा जाता है। समावेशन हर बच्चे की उपस्थिति, सहभागिता और उपलब्धि की बाधाओं को हटाने की एक सतत प्रक्रिया है।
एकीकरण से समावेशन तक
पृथक्करण से दूर जाने की प्रवृत्ति सामान्यीकरण सिद्धांत (normalisation principle) पर आधारित थी, जिसे स्वीडन के बेंग्ट निर्जे (Bengt Nirje) ने 1969 में प्रस्तुत किया: दिव्यांगजन को दैनिक जीवन का ऐसा ढर्रा जीने का अवसर मिलना चाहिए जो दूसरों के जीवन के यथासंभव समान हो। भारत में 1974 की दिव्यांग बच्चों के लिए एकीकृत शिक्षा (IEDC) योजना ने इसी विचार का अनुसरण किया। यह प्रगति थी, परंतु बहुत से बच्चे 'कक्षा में तो थे, पर कक्षा के नहीं थे': उपस्थित थे, पर भाग नहीं ले पा रहे थे, क्योंकि शिक्षण नहीं बदला था। समावेशन इसी अनुभव से निकला, और भारतीय नीति IEDC से सर्व शिक्षा अभियान के शून्य अस्वीकृति (zero rejection) दृष्टिकोण की ओर और फिर RPwD अधिनियम 2016 के समावेशी शिक्षा संबंधी दायित्वों की ओर बढ़ी।
दिव्यांगता के मॉडल
शिक्षक दिव्यांगता के बारे में कैसा सोचता है, इसी से तय होता है कि वह क्या करेगा। चिकित्सीय मॉडल (medical model) दिव्यांगता को व्यक्ति के भीतर की कमी मानता है, जिसका निदान और उपचार विशेषज्ञ करेंगे; कक्षा में इसका परिणाम यह होता है कि ध्यान इस पर रहता है कि बच्चा क्या नहीं कर सकता। दया मॉडल (charity model) दिव्यांगजन को दया का पात्र मानता है, जिन्हें अधिकार नहीं बल्कि करुणा चाहिए। सामाजिक मॉडल (social model), जिसे 1970 के दशक में ब्रिटेन के दिव्यांगजन संगठनों ने विकसित किया और विद्वान माइकल ओलिवर ने यह नाम दिया, क्षति (impairment: शरीर के किसी कार्य की हानि, जैसे अल्प दृष्टि) को दिव्यांगता (disability: वह बहिष्कार जो तब होता है जब समाज बाधाएँ खड़ी करता है, जैसे केवल मुद्रित पाठ्यपुस्तकें या केवल सीढ़ियों से पहुँची जा सकने वाली कक्षा) से अलग करता है; इन अभिवृत्तिगत, भौतिक, संप्रेषण-संबंधी और संस्थागत बाधाओं को हटाना समाज का दायित्व है। अधिकार-आधारित मॉडल, जो दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCRPD, 2006) में दिखता है, दिव्यांगजन को अधिकारों का धारक मानता है; इसका अनुच्छेद 24 सभी स्तरों पर समावेशी शिक्षा व्यवस्था की माँग करता है। WHO का कार्यात्मकता, दिव्यांगता और स्वास्थ्य का अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (ICF, 2001) चिकित्सीय और सामाजिक दृष्टियों को जैव-मनो-सामाजिक मॉडल में जोड़ता है: दिव्यांगता स्वास्थ्य-स्थिति और परिवेश की अंतःक्रिया से उत्पन्न होती है।
सलामांका वक्तव्य
'विशेष आवश्यकता शिक्षा पर विश्व सम्मेलन - पहुँच और गुणवत्ता' 7 से 10 जून 1994 को स्पेन के सलामांका नगर में हुआ, जिसे स्पेन ने UNESCO के साथ मिलकर आयोजित किया। 92 सरकारों और 25 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने विशेष आवश्यकता शिक्षा पर सलामांका वक्तव्य और कार्य-ढाँचा (Framework for Action) अपनाया। इसने पुष्टि की कि हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार है और हर बच्चे की अधिगम आवश्यकताएँ अनूठी हैं, तथा विशेष शैक्षिक आवश्यकता वाले बच्चों की पहुँच सामान्य विद्यालयों तक होनी चाहिए, जो उन्हें बाल-केंद्रित शिक्षाशास्त्र के भीतर समायोजित करें। इसका सबसे प्रसिद्ध निष्कर्ष है कि समावेशी अभिविन्यास वाले सामान्य विद्यालय भेदभावपूर्ण अभिवृत्तियों का मुकाबला करने, समावेशी समाज बनाने और सबके लिए शिक्षा प्राप्त करने के सबसे प्रभावी साधन हैं। सलामांका, जोमटियन (थाईलैंड) में हुए सबके लिए शिक्षा विश्व सम्मेलन (1990) और दिव्यांगजनों के लिए अवसरों की समानता पर संयुक्त राष्ट्र के मानक नियमों (1993) पर आधारित था, और इसे व्यापक रूप से समावेशी शिक्षा आंदोलन का आरंभ-बिंदु माना जाता है।
कक्षा में समावेशन का महत्व
समावेशन सबके अधिगम को बेहतर बनाता है। दिव्यांग बच्चों को भाषा और सामाजिक व्यवहार के लिए साथियों के आदर्श, ऊँची अपेक्षाएँ और अपने ही समुदाय में जीवन की तैयारी मिलती है। सहपाठी समानुभूति, सहयोग और भिन्नता के प्रति सम्मान सीखते हैं, और एक बच्चे के लिए अपनाई गई रणनीतियाँ, जैसे दृश्य सामग्री, स्पष्ट निर्देश और समूह-कार्य, हर शिक्षार्थी की सहायता करती हैं। समावेशन संविधान से भी निकलता है: विधि के समक्ष समता (अनुच्छेद 14), धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध (अनुच्छेद 15), 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21क) और निःशक्तता की दशा में लोक सहायता का निदेश (अनुच्छेद 41)। NCF 2005 विद्यालयों से विविधता को समस्या नहीं बल्कि संसाधन मानने को कहता है, और सतत विकास लक्ष्य 4 (2015) देशों को सबके लिए समावेशी और समतापूर्ण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध करता है।
CTET इसे कैसे परखता है
प्रश्न एक स्थिति बताकर शिक्षक की सर्वोत्तम प्रतिक्रिया पूछते हैं। यदि अल्प दृष्टि वाला बच्चा आपकी कक्षा में आता है, तो समावेशन का अर्थ है बैठने की व्यवस्था, छपाई का आकार और श्यामपट्ट के उपयोग का तरीका बदलना, न कि अभिभावकों से बच्चे को विशेष विद्यालय में भेजने को कहना। जो विकल्प कहें कि बच्चे को अलग पढ़ाया जाए, उसे कक्षा के अनुसार ढलना होगा या वह दया का पात्र है, या कि दिव्यांगता बच्चे की अपनी समस्या है, वे पृथक्करण, एकीकरण, दया मॉडल या चिकित्सीय मॉडल को दर्शाते हैं। वह विकल्प चुनें जो बाधा हटाए, बच्चे को पूरी तरह शामिल करे और अपेक्षाएँ ऊँची रखे।
मुख्य तथ्य
- अपवर्जन = विद्यालय नहीं; पृथक्करण = अलग विशेष विद्यालय; एकीकरण = सामान्य विद्यालय, बच्चा स्वयं को ढाले; समावेशन = सामान्य कक्षा, विद्यालय हर बच्चे के अनुसार ढले।
- 'कक्षा में, पर कक्षा का नहीं' वास्तविक सहभागिता के बिना एकीकरण को बताता है - यही अंतर समावेशन ने पाटना चाहा।
- चिकित्सीय मॉडल: दिव्यांगता व्यक्ति की कमी है जिसका उपचार होना है; सामाजिक मॉडल: दिव्यांगता समाज और विद्यालय की बाधाओं से बनती है।
- दया मॉडल दिव्यांगजन को दया का पात्र मानता है; अधिकार-आधारित मॉडल (UNCRPD 2006) उन्हें अधिकारों का धारक मानता है।
- सामाजिक मॉडल: क्षति (impairment) शरीर के कार्य की हानि है (अल्प दृष्टि); दिव्यांगता बाधाओं से होने वाला बहिष्कार है (केवल मुद्रित पुस्तकें, सीढ़ियाँ)।
- सलामांका वक्तव्य: विशेष आवश्यकता शिक्षा पर विश्व सम्मेलन, सलामांका, स्पेन, 7-10 जून 1994; स्पेन और UNESCO; 92 सरकारें और 25 अंतरराष्ट्रीय संगठन।
- सलामांका: समावेशी अभिविन्यास वाले सामान्य विद्यालय भेदभावपूर्ण अभिवृत्तियों का मुकाबला करने के सबसे प्रभावी साधन हैं।
- UNCRPD का अनुच्छेद 24 समावेशी शिक्षा से संबंधित है; WHO का ICF (2001) दिव्यांगता का जैव-मनो-सामाजिक मॉडल है।
- सामान्यीकरण सिद्धांत: बेंग्ट निर्जे, स्वीडन, 1969 - एकीकरण की जड़; IEDC (1974) भारत की एकीकरण योजना थी।
- CTET परिदृश्य में सही विकल्प बाधा हटाता है और बच्चे को ऊँची अपेक्षाओं के साथ सामान्य कक्षा में रखता है।
एक नज़र में दोहराव
अपवर्जन; पृथक्करण = विशेष विद्यालय; एकीकरण = बच्चा विद्यालय के अनुसार ढले; समावेशन = विद्यालय बच्चे के अनुसार ढले; चिकित्सीय मॉडल = व्यक्ति में कमी; दया मॉडल = करुणा; सामाजिक मॉडल = समाज की बाधाएँ (माइकल ओलिवर); अधिकार मॉडल = UNCRPD 2006, अनुच्छेद 24; ICF 2001 जैव-मनो-सामाजिक; सामान्यीकरण, निर्जे 1969; IEDC 1974; सलामांका 7-10 जून 1994, स्पेन + UNESCO, 92 सरकारें; जोमटियन 1990; अनुच्छेद 14, 15, 21क, 41; NCF 2005: विविधता एक संसाधन है।