10 में से पाठ 8 · भारतीय राजव्यवस्था और संविधान
न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, अधीनस्थ न्यायालय और अधिकरण
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एकीकृत न्यायपालिका
भारत में एकल एकीकृत न्याय व्यवस्था है, जिसमें शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय, उसके नीचे उच्च न्यायालय और जिलों में अधीनस्थ न्यायालय हैं; यह व्यवस्था भारत शासन अधिनियम 1935 से ली गई। अनुच्छेद 124 से 147 में वर्णित सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को हुआ और इसने 1937 के संघीय न्यायालय का स्थान लिया। आरंभ में इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और 7 अन्य न्यायाधीश थे, और संसद कानून द्वारा यह संख्या बढ़ा सकती है। इसका स्थान दिल्ली है (अनुच्छेद 130)।
न्यायाधीशों की नियुक्ति
राष्ट्रपति अनुच्छेद 124(2) के तहत सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के आवश्यक समझे गए न्यायाधीशों से परामर्श के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं, और मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर हर नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श अनिवार्य है। द्वितीय न्यायाधीश मामले (1993) ने मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों का कॉलेजियम बनाया, और तृतीय न्यायाधीश मामले (1998), जो एक राष्ट्रपति संदर्भ था, ने इसे मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों तक बढ़ाया। 99वें संशोधन (2014) ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाया, जिसे न्यायालय ने 2015 में चतुर्थ न्यायाधीश मामले में रद्द कर दिया। न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति का भारत का नागरिक होना और 5 वर्ष तक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा होना, या राष्ट्रपति की राय में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होना आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।
पद से हटाना और स्वतंत्रता
किसी न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश से हटाया जा सकता है, जब प्रत्येक सदन एक ही सत्र में अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर समावेदन पारित करे (अनुच्छेद 124(4))। न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम 1968 के तहत प्रस्ताव पर लोक सभा के 100 या राज्य सभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं, और स्वीकार होने पर यह तीन सदस्यीय जाँच समिति को जाता है। ऐसा पहला प्रस्ताव, न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध, 1993 में लोक सभा में गिर गया। न्यायाधीशों के वेतन भारत की संचित निधि पर भारित हैं, हटाने की कार्यवाही के अलावा संसद में उनके आचरण पर चर्चा नहीं हो सकती (अनुच्छेद 121), और अभिलेख न्यायालय के रूप में न्यायालय अपनी अवमानना के लिए दंड दे सकता है (अनुच्छेद 129)।
सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
मूल क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 131) अनन्य है और केंद्र तथा राज्यों के बीच या राज्यों के आपसी विधिक विवादों पर लागू होता है, पर संविधान-पूर्व संधियों से जुड़े विवादों पर नहीं। अनुच्छेद 32 के तहत रिट क्षेत्राधिकार उच्च न्यायालयों के साथ साझा है। अपीलीय क्षेत्राधिकार में उच्च न्यायालय के प्रमाणपत्र पर संवैधानिक मामले (अनुच्छेद 132), सिविल मामले (अनुच्छेद 133) और आपराधिक मामले (अनुच्छेद 134) आते हैं। अनुच्छेद 136 के तहत न्यायालय सैन्य अधिकरणों को छोड़कर किसी भी न्यायालय या अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध अपील की विशेष अनुमति दे सकता है; यह इसकी सबसे व्यापक विवेकाधीन शक्ति है। अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व के किसी विधि या तथ्य के प्रश्न पर इसकी राय माँग सकते हैं; यह राय बाध्यकारी नहीं है और न्यायालय राय देने से मना भी कर सकता है, पर संविधान-पूर्व संधियों से उत्पन्न विवादों पर राय देना अनिवार्य है।
न्यायिक पुनर्विलोकन और जनहित याचिका
संविधान का उल्लंघन करने वाले कानूनों और कार्यकारी कार्यों को रद्द करने की शक्ति, अर्थात् न्यायिक पुनर्विलोकन, अनुच्छेद 13, 32 और 226 सहित कई उपबंधों से निकलती है और मूल ढाँचे का भाग है (मिनर्वा मिल्स 1980; उच्च न्यायालयों की रिट शक्ति के लिए एल. चंद्र कुमार 1997)। न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा आगे बढ़ाई गई जनहित याचिका ने इस नियम को शिथिल किया कि केवल प्रभावित व्यक्ति ही न्यायालय जा सकता है। विचाराधीन कैदियों से जुड़ा हुसैनारा खातून (1979) मामला पहली प्रकाशित जनहित याचिका माना जाता है। प्रमुख जनहित याचिकाओं में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित विशाखा (1997) मामला शामिल है।
उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय का उपबंध करता है, और अनुच्छेद 231 दो या अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की अनुमति देता है। 1862 में स्थापित कलकत्ता, बंबई और मद्रास उच्च न्यायालय सबसे पुराने हैं। राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और (अन्य न्यायाधीशों के लिए) उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं (अनुच्छेद 217)। न्यायाधीश के लिए 10 वर्ष तक न्यायिक पद या 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में अनुभव आवश्यक है; यहाँ प्रतिष्ठित विधिवेत्ता की श्रेणी नहीं है। शपथ राज्यपाल के समक्ष ली जाती है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों और 'किसी अन्य प्रयोजन' के लिए रिट जारी करने की शक्ति देता है, और अनुच्छेद 227 उन्हें अपने क्षेत्र के सैन्य न्यायालयों को छोड़कर सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति देता है।
अधीनस्थ न्यायालय, अधिकरण और लोक अदालतें
अनुच्छेद 233 से 237 के तहत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल उच्च न्यायालय के परामर्श से करते हैं, और अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय का होता है। जिला न्यायाधीश जिले का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी है; आपराधिक मामलों की सुनवाई करते समय वह सत्र न्यायाधीश होता है, जिसके दिए मृत्युदंड की पुष्टि उच्च न्यायालय करता है। 42वें संशोधन (1976) ने भाग XIVA जोड़ा: अनुच्छेद 323A संसद को लोक सेवा के मामलों के लिए प्रशासनिक अधिकरण बनाने की शक्ति देता है (प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम 1985), और अनुच्छेद 323B संसद और राज्य विधानमंडलों को कराधान, औद्योगिक विवाद, भूमि सुधार और अन्य विषयों के लिए अधिकरण बनाने देता है। लोक अदालतों को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के तहत सांविधिक दर्जा मिला; पहली लोक अदालत 1982 में गुजरात के जूनागढ़ में लगी। लोक अदालत का निर्णय सिविल न्यायालय की डिक्री माना जाता है, अंतिम होता है, इसके विरुद्ध अपील नहीं होती और कोई न्यायालय शुल्क नहीं लगता।
मुख्य तथ्य
- सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950, संघीय न्यायालय (1937) के स्थान पर; मूल संख्या मुख्य न्यायाधीश + 7 न्यायाधीश; संसद कानून से संख्या बढ़ा सकती है।
- न्यायाधीश मामले: प्रथम (एस.पी. गुप्ता 1981, परामर्श का अर्थ सहमति नहीं), द्वितीय (1993, मुख्य न्यायाधीश + 2 का कॉलेजियम), तृतीय (1998, मुख्य न्यायाधीश + 4), चतुर्थ (2015, NJAC रद्द)।
- सेवानिवृत्ति आयु: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65; उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 (15वें संशोधन, 1963 द्वारा 60 से बढ़ाई गई)।
- हटाने का प्रस्ताव: लोक सभा के 100 या राज्य सभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर; एक ही सत्र में दोनों सदनों में विशेष बहुमत; आधार सिद्ध कदाचार या असमर्थता।
- अनुच्छेद 131 मूल (केंद्र-राज्य और अंतर-राज्य विवाद), अनुच्छेद 136 विशेष अनुमति, अनुच्छेद 143 सलाहकारी (राय बाध्यकारी नहीं), अनुच्छेद 141 इसका निर्णीत कानून सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी, अनुच्छेद 142 पूर्ण न्याय।
- शपथ: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश राष्ट्रपति के समक्ष; उच्च न्यायालय के न्यायाधीश राज्यपाल के समक्ष; सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश भारत के किसी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते।
- सबसे पुराने उच्च न्यायालय: कलकत्ता, बंबई और मद्रास, 1862; अनुच्छेद 222: राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण करते हैं।
- जनहित याचिका के प्रणेता: न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और वी.आर. कृष्ण अय्यर; हुसैनारा खातून (1979) पहली प्रकाशित जनहित याचिका; विशाखा (1997) कार्यस्थल उत्पीड़न दिशानिर्देश।
- अधिकरण: 42वें संशोधन से भाग XIVA; अनुच्छेद 323A प्रशासनिक अधिकरण (केवल संसद), अनुच्छेद 323B अन्य अधिकरण (संसद और राज्य विधानमंडल); एल. चंद्र कुमार (1997) ने इन पर उच्च न्यायालय की समीक्षा बनाए रखी।
- लोक अदालत: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के तहत सांविधिक; पहली बार 1982 में जूनागढ़, गुजरात में; निर्णय अंतिम, अपील नहीं, न्यायालय शुल्क नहीं।
एक नज़र में दोहराव
एकीकृत न्यायपालिका भारत शासन अधिनियम 1935 से; सर्वोच्च न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950; अनु. 124-147; कॉलेजियम द्वितीय न्यायाधीश मामले 1993 से; NJAC 2015 में रद्द; सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65, उच्च न्यायालय के 62 वर्ष पर सेवानिवृत्त; हटाना अनु. 124(4) और न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम 1968; क्षेत्राधिकार: मूल 131, रिट 32, अपीलीय 132-134 और 136, सलाहकारी 143; उच्च न्यायालय अनु. 214-231, रिट अनु. 226; जिला न्यायाधीश अनु. 233; अधिकरण 323A, 323B; लोक अदालतें 1987 अधिनियम के तहत।