10 में से पाठ 6 · भारतीय राजव्यवस्था और संविधान

प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और भारत के महान्यायवादी

AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार

वास्तविक कार्यपालिका

भारत की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति नाममात्र के प्रमुख हैं और प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका है। अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का उपबंध करता है, और कोई न्यायालय यह जाँच नहीं कर सकता कि क्या सलाह दी गई। अनुच्छेद 75 के तहत राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को और प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों को नियुक्त करते हैं; मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं; मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है; और जो मंत्री लगातार 6 महीने तक किसी भी सदन का सदस्य न रहे, वह मंत्री नहीं रहता। अनुच्छेद 77 के अनुसार सभी कार्यकारी कार्य राष्ट्रपति के नाम से होते हैं। अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य बताता है कि वह मंत्रिपरिषद के निर्णय राष्ट्रपति को बताए और राष्ट्रपति द्वारा माँगी गई जानकारी दे।

प्रधानमंत्री की नियुक्ति

परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति लोक सभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को नियुक्त करते हैं। किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर राष्ट्रपति अपने विवेक का प्रयोग करते हैं और नियुक्त व्यक्ति से निश्चित समय में बहुमत सिद्ध करने को कह सकते हैं; ऐसा पहली बार 1979 में हुआ, जब चरण सिंह नियुक्त किए गए। संसद का सदस्य न होने वाला व्यक्ति भी 6 महीने के लिए नियुक्त हो सकता है, और प्रधानमंत्री किसी भी सदन का हो सकता है; इंदिरा गांधी (1966), आई.के. गुजराल (1997) और मनमोहन सिंह (2004) पद ग्रहण करते समय राज्य सभा के सदस्य थे। जवाहरलाल नेहरू पहले प्रधानमंत्री थे और 1947 से 1964 में अपनी मृत्यु तक पद पर रहे, गुलज़ारीलाल नंदा दो बार (1964 और 1966) अंतरिम प्रधानमंत्री रहे, और मोरारजी देसाई ने पहली गैर-कांग्रेसी सरकार (1977) का नेतृत्व किया। प्रधानमंत्री की मृत्यु या त्यागपत्र से मंत्रिपरिषद भंग हो जाती है। उप-प्रधानमंत्री का पद संविधान में नहीं है; वल्लभभाई पटेल इस पद पर रहने वाले पहले व्यक्ति थे।

सामूहिक और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

सामूहिक उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75(3)) का अर्थ है कि मंत्रिपरिषद एक साथ टिकती या गिरती है: यदि लोक सभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे, तो राज्य सभा से आए मंत्रियों सहित सभी मंत्रियों को त्यागपत्र देना होता है। मंत्रिमंडल के निर्णय हर मंत्री पर बाध्यकारी हैं, और जो मंत्री किसी निर्णय को स्वीकार न कर सके, उसे त्यागपत्र देना चाहिए। व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75(2)) राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत सिद्धांत से आता है: राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर किसी मंत्री को बर्खास्त कर सकते हैं। ब्रिटेन के विपरीत भारत में मंत्रियों का विधिक उत्तरदायित्व नहीं है, क्योंकि राष्ट्रपति के आदेशों पर किसी मंत्री के प्रतिहस्ताक्षर आवश्यक नहीं हैं। मंत्री तीसरी अनुसूची में दिए प्रारूप में राष्ट्रपति के समक्ष पद और गोपनीयता की शपथ लेते हैं।

आकार की सीमा और श्रेणियाँ

91वें संशोधन (2003) ने अनुच्छेद 75(1A) जोड़ा: प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। अनुच्छेद 164(1A) यही सीमा राज्यों पर लागू करता है, साथ में न्यूनतम 12 मंत्री। इस संशोधन ने दल-बदल के कारण अयोग्य हुए सांसद या विधायक के मंत्री बनने पर रोक लगाई और दसवीं अनुसूची में किसी विधायक दल के एक-तिहाई सदस्यों द्वारा 'विभाजन' की छूट समाप्त कर दी। मंत्रिपरिषद में तीन श्रेणियाँ हैं: कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार वाले या कैबिनेट मंत्रियों से संबद्ध) और उप मंत्री। मंत्रिमंडल (कैबिनेट) मंत्रिपरिषद का छोटा केंद्रीय समूह है; 'मंत्रिमंडल' शब्द संविधान में केवल अनुच्छेद 352 में आता है, जहाँ इसे 44वें संशोधन (1978) ने रखा।

मंत्रिमंडल समितियाँ

मंत्रिमंडल समितियाँ संविधानेतर निकाय हैं, जो भारत सरकार (कार्य संचालन) नियम 1961 के तहत बनती हैं; इनकी संख्या और सदस्य प्रधानमंत्री तय करते हैं। ये स्थायी या तदर्थ हो सकती हैं और मंत्रिमंडल का कार्यभार घटाती हैं। प्रमुख उदाहरण हैं: राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति, जिसे प्रायः 'सुपर कैबिनेट' कहा जाता है, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति, मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति और सुरक्षा संबंधी मंत्रिमंडल समिति। प्रधानमंत्री के आसपास विश्वस्त सलाहकारों के अनौपचारिक समूह को 'किचन कैबिनेट' कहा जाता है।

भारत का महान्यायवादी

अनुच्छेद 76 महान्यायवादी (Attorney General) का पद बनाता है, जो देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करते हैं जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य हो। संविधान न कार्यकाल तय करता है, न हटाने की प्रक्रिया; महान्यायवादी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित पारिश्रमिक पाता है। इसका कर्तव्य भारत सरकार को विधिक विषयों पर सलाह देना और राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए विधिक कार्य करना है। महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है और अनुच्छेद 88 के तहत वह दोनों सदनों, उनकी संयुक्त बैठक और किसी भी समिति की कार्यवाही में बोल सकता है और भाग ले सकता है, पर मत नहीं दे सकता; अनुच्छेद 105 उसे संसद सदस्य के विशेषाधिकार देता है। महान्यायवादी मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं होता और निजी वकालत कर सकता है, पर भारत सरकार के विरुद्ध नहीं। एम.सी. सीतलवाड प्रथम महान्यायवादी थे।

सॉलिसिटर जनरल और महाधिवक्ता

सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल महान्यायवादी की सहायता करते हैं, पर इन पदों का संविधान में उल्लेख नहीं है; इनकी सेवा शर्तें विधि अधिकारी (सेवा शर्तें) नियम 1987 से तय होती हैं। राज्य में महान्यायवादी के समकक्ष महाधिवक्ता (Advocate General, अनुच्छेद 165) है, जिसे राज्यपाल उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने योग्य व्यक्तियों में से नियुक्त करते हैं और जो राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है; अनुच्छेद 177 के तहत महाधिवक्ता राज्य विधानमंडल में बोल सकता है, पर मत नहीं दे सकता।

मुख्य तथ्य

  • अनुच्छेद 74: राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद; अनुच्छेद 75(3): लोक सभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व।
  • 91वाँ संशोधन (2003): प्रधानमंत्री सहित मंत्री अधिकतम लोक सभा सदस्य संख्या का 15 प्रतिशत; राज्य में अधिकतम विधान सभा का 15 प्रतिशत, न्यूनतम 12।
  • जो व्यक्ति सांसद नहीं है, वह भी 6 महीने के लिए मंत्री या प्रधानमंत्री बन सकता है; इस अवधि में उसे किसी सदन का सदस्य बनना होगा।
  • प्रधानमंत्री चुनने में राष्ट्रपति के विवेक का पहला प्रयोग: चरण सिंह, 1979; पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री: मोरारजी देसाई, 1977।
  • नियुक्ति के समय राज्य सभा सदस्य रहे प्रधानमंत्री: इंदिरा गांधी (1966), आई.के. गुजराल (1997), मनमोहन सिंह (2004)।
  • 'मंत्रिमंडल' शब्द संविधान में केवल एक बार आता है, अनुच्छेद 352 में, जहाँ इसे 44वें संशोधन (1978) ने जोड़ा।
  • मंत्रिमंडल समितियाँ संविधानेतर हैं और कार्य संचालन नियम 1961 के तहत बनती हैं; राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति को 'सुपर कैबिनेट' कहा जाता है।
  • महान्यायवादी (अनुच्छेद 76): सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी योग्यता, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद, संसद में बोल सकता है पर मत नहीं दे सकता (अनुच्छेद 88); प्रथम महान्यायवादी एम.सी. सीतलवाड।
  • सॉलिसिटर जनरल: संवैधानिक पद नहीं; राज्य का महाधिवक्ता: अनुच्छेद 165, राज्यपाल द्वारा नियुक्त, राज्य विधानमंडल में बोल सकता है (अनुच्छेद 177)।

एक नज़र में दोहराव

अनु. 74-78: प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद के प्रमुख, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त; लोक सभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व (75(3)); गैर-सदस्य 6 महीने तक; 91वाँ संशोधन 2003: 15% सीमा, राज्यों में न्यूनतम 12; कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री, उप मंत्री; 'मंत्रिमंडल' शब्द केवल अनु. 352 में; मंत्रिमंडल समितियाँ 1961 के नियमों के तहत; महान्यायवादी अनु. 76, सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार, संसद में बिना मत के बोल सकता है (अनु. 88); महाधिवक्ता अनु. 165।

इस विषय का अभ्यास करें

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के सभी 10 पाठ