10 में से पाठ 5 · बाल विकास और शिक्षाशास्त्र
नैतिक और व्यक्तित्व विकास: कोहलबर्ग, गिलिगन और एरिक्सन
AI की सहायता से तैयार किया गया और 28 अक्टूबर 2026 को तथ्यों की जाँच की गई; किसी मानव संपादक ने इसे अभी पंक्ति-दर-पंक्ति नहीं पढ़ा है। कोई गलती दिखे तो हमें बताइए। संपादकीय मानक और सुधार
नैतिक विकास पर पियाजे की शुरुआत
नैतिक विकास बच्चे की सही-गलत की समझ और उसके अनुसार आचरण करने की क्षमता का विकास है। पियाजे ने द मॉरल जजमेंट ऑफ द चाइल्ड (1932) में बच्चों को कंचे खेलते देखा और उनसे छोटी-छोटी कहानियों के बारे में प्रश्न पूछे। छोटे बच्चे, जो परतंत्र नैतिकता या नैतिक यथार्थवाद (heteronomous morality) की अवस्था (मोटे तौर पर 5 से 10 वर्ष) में होते हैं, नियमों को अटल और अधिकारियों द्वारा बनाए गए मानते हैं, और किसी कार्य को उसके परिणामों से आँकते हैं: अनजाने में पंद्रह कप तोड़ने वाला बच्चा उन्हें उस बच्चे से अधिक शरारती लगता है जिसने चोरी से जैम निकालते हुए एक ही कप तोड़ा। बड़े बच्चे, स्वायत्त नैतिकता (autonomous morality) में (लगभग 10 वर्ष से), नियमों को ऐसे समझौते मानते हैं जिन्हें बदला जा सकता है और कार्यों को इरादों से आँकते हैं। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लॉरेंस कोहलबर्ग (1927-1987) ने इस कार्य को एक अधिक पूर्ण अवस्था सिद्धांत में विकसित किया।
कोहलबर्ग की विधि और हाइन्ज़ दुविधा
कोहलबर्ग ने 10 से 16 वर्ष के लड़कों के सामने नैतिक दुविधाएँ रखीं। सबसे प्रसिद्ध दुविधा में हाइन्ज़ की पत्नी एक विशेष प्रकार के कैंसर से मर रही है; नगर के एक दवा-विक्रेता ने एक दवा खोजी है जो उसे बचा सकती है, पर वह उसकी लागत का दस गुना दाम माँगता है; हाइन्ज़ केवल लगभग आधी रकम जुटा पाता है, दवा-विक्रेता उसे सस्ते में बेचने या बाद में पैसे लेने से मना कर देता है, और हाइन्ज़ दुकान में घुसकर दवा चुरा लेता है। क्या उसे ऐसा करना चाहिए था, और क्यों? कोहलबर्ग की रुचि इसमें नहीं थी कि उत्तर हाँ है या नहीं, बल्कि उसके पीछे के तर्क में थी, क्योंकि एक ही 'हाँ' दोष के भय से भी आ सकती है और मानव जीवन के मूल्य में विश्वास से भी। ऐसे तर्कों के आधार पर उन्होंने तीन स्तर बताए, जिनमें से प्रत्येक में दो अवस्थाएँ हैं।
तीन स्तर और छह अवस्थाएँ
पूर्व-पारंपरिक स्तर पर, जो लगभग 9 वर्ष से कम आयु के अधिकांश बच्चों में मिलता है, नैतिकता बाहरी होती है। अवस्था 1, आज्ञापालन और दंड अभिविन्यास: जिस कार्य पर दंड मिले वह गलत है। अवस्था 2, व्यक्तिवाद और विनिमय: सही वह है जो अपने हित में हो, और न्याय एक सौदा है - 'तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा'। पारंपरिक स्तर पर, जो बड़े बच्चों, किशोरों और अधिकांश वयस्कों में मिलता है, व्यक्ति दूसरों और समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप चलता है। अवस्था 3, अच्छे पारस्परिक संबंध, 'अच्छा लड़का - अच्छी लड़की' अभिविन्यास: स्वीकृति पाने के लिए अच्छा बनो। अवस्था 4, सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना, कानून और व्यवस्था अभिविन्यास: कानूनों का पालन करो और कर्तव्य निभाओ क्योंकि समाज को व्यवस्था चाहिए। उत्तर-पारंपरिक स्तर पर, जहाँ वयस्कों का केवल एक छोटा भाग पहुँचता है, नैतिकता स्व-चयनित सिद्धांतों पर टिकी होती है। अवस्था 5, सामाजिक अनुबंध और व्यक्तिगत अधिकार: कानून सर्वहित के लिए किए गए समझौते हैं और लोकतांत्रिक ढंग से बदले जा सकते हैं। अवस्था 6, सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत: न्याय, समानता और मानवीय गरिमा जैसे सिद्धांतों के अनुसार आचरण करो, चाहे वह कानून के विरुद्ध ही क्यों न हो। अवस्थाएँ एक अपरिवर्तनीय क्रम में आती हैं, कोई अवस्था छोड़ी नहीं जाती, और नैतिक तर्क संज्ञानात्मक विकास पर निर्भर करता है, यद्यपि तर्क से हमेशा आचरण का पूर्वानुमान नहीं होता।
गिलिगन की आलोचना और कक्षा
कोहलबर्ग की सहयोगी कैरल गिलिगन ने इन अ डिफरेंट वॉयस (1982) में तर्क दिया कि उनका सिद्धांत पक्षपाती था, क्योंकि वह केवल पुरुषों के प्रतिदर्श पर बना था और न्याय तथा अधिकारों की नैतिकता को सर्वोच्च मानता था। उनके अनुसार स्त्रियाँ प्रायः देखभाल की नैतिकता (ethic of care) से - दायित्व, संबंधों और हानि से बचने के आधार पर - तर्क करती हैं, और इसलिए उन्हें गलत ढंग से निचले स्तर पर, प्रायः अवस्था 3 पर, आँका गया। कक्षा में नैतिकता केवल भाषण देकर बच्चों में नहीं डाली जा सकती। शिक्षक कहानियों और विद्यालय-जीवन की वास्तविक दुविधाओं पर चर्चा कर सकते हैं, तैयार उत्तर स्वीकार करने के बजाय 'क्यों' पूछ सकते हैं, बच्चों को मिलकर कक्षा के नियम बनाने दे सकते हैं और स्वयं निष्पक्षता का आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं; कोहलबर्ग ने लोकतांत्रिक चर्चा से चलने वाले 'न्यायपूर्ण समुदाय' (just community) विद्यालय स्थापित किए।
एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत
जर्मनी में जन्मे अमेरिकी मनोविश्लेषक एरिक एरिक्सन (1902-1994) ने फ्रायड की मनोलैंगिक अवस्थाओं को पुनर्गठित करके आठ मनोसामाजिक अवस्थाओं का जीवनपर्यंत सिद्धांत बनाया, जो चाइल्डहुड एंड सोसाइटी (1950) में प्रस्तुत है। हर अवस्था में व्यक्ति एक संकट, अर्थात दो परिणामों के बीच एक मोड़, का सामना करता है, और उसका सकारात्मक समाधान एक मूल शक्ति या गुण देता है। अवस्थाएँ हैं: विश्वास बनाम अविश्वास (शैशव, आशा), स्वायत्तता बनाम लज्जा और संदेह (लगभग 1 से 3 वर्ष, इच्छाशक्ति), पहल बनाम अपराधबोध (लगभग 3 से 6, उद्देश्य), परिश्रम बनाम हीनता (लगभग 6 से 12, सक्षमता), पहचान बनाम भूमिका भ्रांति (किशोरावस्था, निष्ठा), आत्मीयता बनाम अलगाव (युवा वयस्कता, प्रेम), उत्पादकता बनाम ठहराव (मध्य वयस्कता, देखभाल) और सत्यनिष्ठा बनाम निराशा (वृद्धावस्था, प्रज्ञा)। फ्रायड के विपरीत, एरिक्सन ने यौन प्रवृत्तियों के बजाय सामाजिक संबंधों और संस्कृति पर बल दिया, और विकास को जीवनभर चलने वाला माना।
विद्यालयी वर्षों में एरिक्सन
शिक्षकों के लिए तीन अवस्थाएँ सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। पहल बनाम अपराधबोध में विद्यालय-पूर्व बच्चे योजना बनाना, चीज़ें बनाना और आज़माना चाहते हैं; प्रश्नों और खेल का स्वागत करने वाले वयस्क उनमें उद्देश्य-भाव जगाते हैं, जबकि लगातार डाँट उन्हें कोशिश करने पर ही अपराधबोध से भर देती है। परिश्रम बनाम हीनता प्राथमिक वर्षों की अवस्था है, जब बच्चे सक्षम और उत्पादक बनना चाहते हैं और पूरे किए गए काम के लिए पहचान चाहते हैं। जो शिक्षक प्राप्य कार्य देता है, प्रयास और प्रगति की प्रशंसा करता है और सार्वजनिक तुलना से बचता है, वह परिश्रम का भाव बनाता है, जबकि बार-बार की असफलता और उपहास हीनता का भाव पैदा करते हैं। पहचान बनाम भूमिका भ्रांति किशोरावस्था की अवस्था है: कक्षा VI से VIII के विद्यार्थी 'मैं कौन हूँ?' पूछने लगते हैं और भूमिकाएँ, मित्रताएँ और मूल्य आज़माते हैं, इसलिए उन्हें ठप्पों के बजाय क्लब, ज़िम्मेदारियाँ, करियर-जागरूकता और सम्मानजनक मार्गदर्शन चाहिए। 'पहचान संकट' (identity crisis) शब्द एरिक्सन ने ही गढ़ा।
मुख्य तथ्य
- पियाजे की नैतिक अवस्थाएँ: परतंत्र (नैतिक यथार्थवाद - नियम अटल, परिणामों से निर्णय) फिर स्वायत्त (नियम सहमति से बदले जा सकते हैं, इरादों से निर्णय)।
- हाइन्ज़ दुविधा: हाइन्ज़ अपनी मरती हुई पत्नी को बचाने के लिए अत्यधिक महँगी दवा चुराता है; कोहलबर्ग ने हाँ या नहीं वाले उत्तर को नहीं, दिए गए तर्क को आँका।
- पूर्व-पारंपरिक स्तर: अवस्था 1 आज्ञापालन और दंड; अवस्था 2 व्यक्तिवाद और विनिमय ('तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी')।
- पारंपरिक स्तर: अवस्था 3 अच्छा लड़का - अच्छी लड़की (स्वीकृति); अवस्था 4 कानून और व्यवस्था (कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था)। अधिकांश किशोर और वयस्क इसी स्तर पर तर्क करते हैं।
- उत्तर-पारंपरिक स्तर: अवस्था 5 सामाजिक अनुबंध और व्यक्तिगत अधिकार; अवस्था 6 सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत। वयस्कों का केवल एक छोटा भाग यहाँ पहुँचता है।
- गिलिगन, इन अ डिफरेंट वॉयस (1982): कोहलबर्ग के केवल-पुरुष प्रतिदर्श और न्याय पर केंद्रित दृष्टि ने देखभाल की नैतिकता की उपेक्षा की।
- एरिक्सन की आठ अवस्थाएँ (चाइल्डहुड एंड सोसाइटी, 1950): विश्वास, स्वायत्तता, पहल, परिश्रम, पहचान, आत्मीयता, उत्पादकता, सत्यनिष्ठा - प्रत्येक अपने विपरीत के सामने।
- प्राथमिक विद्यालय के वर्ष (लगभग 6-12): परिश्रम बनाम हीनता - प्राप्य कार्य दें, प्रयास की प्रशंसा करें, सार्वजनिक तुलना से बचें।
- किशोरावस्था: पहचान बनाम भूमिका भ्रांति ('पहचान संकट' शब्द एरिक्सन का); मार्सिया की पहचान स्थितियाँ: विसरण, पूर्वबंधन, स्थगन, उपलब्धि।
एक नज़र में दोहराव
पियाजे: परतंत्र (परिणाम) से स्वायत्त (इरादे) नैतिकता; कोहलबर्ग (हाइन्ज़ दुविधा, उत्तर नहीं तर्क): पूर्व-पारंपरिक (1 दंड, 2 विनिमय), पारंपरिक (3 अच्छा लड़का-अच्छी लड़की, 4 कानून और व्यवस्था), उत्तर-पारंपरिक (5 सामाजिक अनुबंध, 6 सार्वभौमिक सिद्धांत); अपरिवर्तनीय क्रम; गिलिगन 1982 देखभाल की नैतिकता; एरिक्सन की 8 मनोसामाजिक अवस्थाएँ: पहल बनाम अपराधबोध 3-6, परिश्रम बनाम हीनता 6-12, किशोरावस्था में पहचान बनाम भूमिका भ्रांति।