8 में से पाठ 7 · भाषा शिक्षणशास्त्र (भाषा I और भाषा II)

विधियाँ और सामग्री: व्याकरण-अनुवाद से कार्य-आधारित शिक्षण तक, पाठ्यपुस्तकें और भाषा खेल

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उपागम, विधि और तकनीक

एडवर्ड एंथनी (1963) ने तीन स्तरों में अंतर किया। उपागम (approach) भाषा की प्रकृति और उसके सीखे जाने के ढंग के बारे में मान्यताओं का समूह है; विधि (method) किसी उपागम पर आधारित, भाषा प्रस्तुत करने की समग्र योजना है; तकनीक (technique) कक्षा की कोई विशेष गतिविधि है, जैसे ड्रिल या भूमिका निर्वाह। भाषा और अधिगम के बारे में दृष्टिकोण बदलने के साथ विधियाँ भी बदलीं: भाषा को सीखे जाने वाले नियम मानने से, बनाई जाने वाली आदतें मानने तक, और फिर अभ्यास किए जाने वाले संप्रेषण तक।

व्याकरण-अनुवाद और प्रत्यक्ष विधि

व्याकरण-अनुवाद विधि, जिसे शास्त्रीय विधि (classical method) भी कहते हैं क्योंकि इससे लैटिन और यूनानी पढ़ाई जाती थी, व्याकरण के नियम निगमन से पढ़ाती है, द्विभाषी शब्द-सूचियों का प्रयोग करती है, और शिक्षार्थियों से मातृभाषा और लक्ष्य भाषा के बीच वाक्यों और अनुच्छेदों का अनुवाद कराती है। मातृभाषा माध्यम होती है, पढ़ने और लिखने पर बल होता है और शुद्धता सबसे महत्त्वपूर्ण होती है। बड़ी कक्षाओं में इसे अपनाना आसान है, पर शिक्षार्थी शायद ही बोलना सीख पाते हैं। प्रत्यक्ष विधि 19वीं शताब्दी के अंत में इसकी प्रतिक्रिया में आई; मैक्सिमिलियन बर्लिट्ज़ ने अपना पहला विद्यालय 1878 में खोला। यह केवल लक्ष्य भाषा का प्रयोग करती है, वस्तुओं, चित्रों और प्रदर्शन से अर्थ स्पष्ट करती है, व्याकरण आगमन से पढ़ाती है, और बोलने तथा दैनिक शब्दावली को प्राथमिकता देती है। इसके लिए धाराप्रवाह शिक्षक चाहिए और अमूर्त शब्दों में इसे कठिनाई होती है।

श्रव्य-भाषिक और संरचनात्मक विधियाँ

श्रव्य-भाषिक विधि (audio-lingual method) द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिकी सेना के भाषा कार्यक्रम से विकसित हुई और संरचनात्मक भाषाविज्ञान तथा स्किनर के व्यवहारवाद पर आधारित थी। यह भाषा को आदत मानती है: शिक्षार्थी संवाद याद करते हैं और पैटर्न ड्रिल (दोहराव, प्रतिस्थापन, रूपांतरण, शृंखला ड्रिल) का अभ्यास करते हैं, न्यूनतम युग्मों से उच्चारण का अभ्यास होता है, और त्रुटियों को रोका जाता है क्योंकि माना जाता है कि वे गलत आदतें बनाती हैं। संरचनात्मक उपागम, जो भारतीय विद्यालयों में अंग्रेज़ी के लिए लंबे समय तक प्रयुक्त रहा, वाक्य-संरचनाओं और शब्दावली का चयन और क्रमबद्धीकरण करता है और उन्हें परिस्थितियों में प्रस्तुत करता है। ये विधियाँ शुद्धता और उच्चारण तो बनाती हैं, पर ऐसे यांत्रिक शिक्षार्थी तैयार करने की प्रवृत्ति रखती हैं जो भाषा का सृजनात्मक प्रयोग नहीं कर पाते।

संप्रेषणात्मक और कार्य-आधारित शिक्षण

संप्रेषणात्मक भाषा शिक्षण (CLT), जो 1970 के दशक में ब्रिटेन और यूरोप में विकसित हुआ, संप्रेषणात्मक क्षमता को लक्ष्य बनाता है। डी.ए. विल्किन्स की पुस्तक Notional Syllabuses (1976) ने शिक्षण को संरचनाओं के बजाय धारणाओं (notions, जैसे समय और मात्रा) और प्रकार्यों (functions, जैसे अनुरोध करना, क्षमा माँगना, आमंत्रित करना) के आधार पर संगठित किया। CLT प्रामाणिक सामग्री, जोड़ी और समूह कार्य, सूचना-अंतराल, भूमिका निर्वाह और समस्या-समाधान का प्रयोग करता है; शिक्षक सुगमकर्ता (facilitator) होता है, शुद्धता के साथ प्रवाह को भी महत्त्व दिया जाता है, और त्रुटियों को सीखने का हिस्सा मानकर सहन किया जाता है। कार्य-आधारित भाषा शिक्षण (TBLT) पाठों को स्पष्ट परिणाम वाले कार्यों के इर्द-गिर्द संगठित करता है, जैसे कक्षा-भ्रमण की योजना बनाना या दो चित्रों में अंतर खोजना, जिनमें अर्थ प्रधान होता है। भारत में एन.एस. प्रभु की बैंगलोर परियोजना (Bangalore Project, 1979-84) ने व्याकरण पाठ्यक्रम के बिना, समस्या-समाधान कार्यों के माध्यम से अंग्रेज़ी पढ़ाई। जेन विलिस (1996) ने कार्य-चक्र दिया: पूर्व-कार्य, कार्य, योजना, प्रस्तुति (report), फिर भाषा पर ध्यान (language focus)।

अन्य विधियाँ संक्षेप में

संपूर्ण शारीरिक प्रतिक्रिया (TPR, जेम्स एशर) आदेशों को क्रियाओं से जोड़ती है और छोटे आरंभिक शिक्षार्थियों के लिए उपयुक्त है; मौन विधि (Silent Way, कालेब गैटेग्नो) में शिक्षक अधिकांशतः चुप रहता है और रंगीन छड़ों का प्रयोग करता है; सजेस्टोपीडिया (जॉर्जी लोज़ानोव) चिंता कम करने के लिए विश्राम और संगीत का प्रयोग करता है; सामुदायिक भाषा अधिगम (Community Language Learning, चार्ल्स करन) शिक्षक को परामर्शदाता मानता है; प्राकृतिक उपागम (क्रैशन और टेरेल) बोधगम्य इनपुट पर बल देता है; और द्विभाषी विधि (सी.जे. डॉडसन) अर्थ स्पष्ट करने के लिए मातृभाषा का प्रयोग करती है। कोई एक विधि हर कक्षा के लिए उपयुक्त नहीं; शिक्षक विधियों को मिलाकर अपनाते हैं, और NCF 2005 का रचनावादी दृष्टिकोण शिक्षार्थी-केंद्रित, अर्थ-केंद्रित और बच्चों की भाषाओं का उपयोग करने वाले शिक्षण को प्राथमिकता देता है।

पाठ्यपुस्तकें और बहुमाध्यम

पाठ्यपुस्तक उपयोगी संसाधन है पर पूरी पाठ्यचर्या नहीं; NCF 2005 शिक्षकों से उससे आगे जाने, पाठों को बच्चों के जीवन से जोड़ने और अन्य सामग्री के प्रयोग की अपेक्षा करती है। पूरक पठन-पुस्तकें, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, पोस्टर, विज्ञापन, मेन्यू और समय-सारणियाँ कक्षा में प्रामाणिक भाषा लाती हैं। वास्तविक वस्तुएँ, फ़्लैश कार्ड, चित्र-कार्ड, चार्ट और कठपुतलियाँ छोटे शिक्षार्थियों की सहायता करती हैं। ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग, रेडियो, फ़िल्में और डिजिटल संसाधन विविध आवाज़ों और उच्चारणों से परिचय कराते हैं, और बच्चों की अपनी बोली को रिकॉर्ड करने से वे स्वयं को सुन पाते हैं। सामग्री शिक्षार्थियों की आयु, रुचियों, भाषायी पृष्ठभूमि और संस्कृति के अनुकूल होनी चाहिए, और जेंडर, क्षेत्र तथा दिव्यांगता के चित्रण में समावेशी होनी चाहिए।

बाल साहित्य और भाषा खेल

कहानियाँ, कविताएँ, लोककथाएँ, चित्र-पुस्तकें और बड़ी किताबें यादगार संदर्भों में समृद्ध भाषा देती हैं, कल्पना और समानुभूति विकसित करती हैं, और विस्तृत पठन का आधार हैं; कक्षा पुस्तकालय विद्यालय के सबसे अच्छे निवेशों में से एक है। कविताएँ आनंद, लय और बिंब के लिए पढ़ाई जाती हैं। शब्द-शृंखला, अंत्याक्षरी, बिंगो, साइमन कहता है, मूक अभिनय (dumb charades), बीस प्रश्न, वर्ग पहेली और कानाफूसी जैसे भाषा खेल सहज वातावरण में अर्थपूर्ण अभ्यास देते हैं, जिससे भावात्मक फ़िल्टर नीचा होता है। खेल का स्पष्ट भाषायी उद्देश्य होना चाहिए और उसमें हर बच्चे की भागीदारी हो, केवल सबसे तेज़ बच्चों की नहीं।

मुख्य तथ्य

  • एडवर्ड एंथनी (1963): उपागम (भाषा और अधिगम के बारे में मान्यताएँ), विधि (समग्र योजना), तकनीक (कक्षा की गतिविधि)।
  • व्याकरण-अनुवाद विधि (शास्त्रीय विधि): निगमन से नियम, अनुवाद, द्विभाषी शब्द-सूचियाँ, पढ़ना और लिखना, शुद्धता; बोलने की उपेक्षा।
  • प्रत्यक्ष विधि: केवल लक्ष्य भाषा, वस्तुओं और चित्रों से अर्थ, आगमन से व्याकरण, बोलना पहले; बर्लिट्ज़ का पहला विद्यालय 1878 में खुला।
  • श्रव्य-भाषिक विधि: द्वितीय विश्व युद्ध के अमेरिकी सेना कार्यक्रम से विकसित; संरचनात्मक भाषाविज्ञान और व्यवहारवाद; संवाद, पैटर्न ड्रिल, आदत-निर्माण, त्रुटियों की रोकथाम।
  • CLT: संप्रेषणात्मक क्षमता; धारणाएँ और प्रकार्य (विल्किन्स, Notional Syllabuses, 1976); प्रामाणिक सामग्री, सूचना-अंतराल, भूमिका निर्वाह; शिक्षक सुगमकर्ता।
  • कार्य-आधारित शिक्षण: परिणाम वाले अर्थ-केंद्रित कार्य; एन.एस. प्रभु की बैंगलोर परियोजना (1979-84); जेन विलिस का कार्य-चक्र (1996)।
  • विधि और नाम: मौन विधि - कालेब गैटेग्नो; सजेस्टोपीडिया - जॉर्जी लोज़ानोव; सामुदायिक भाषा अधिगम - चार्ल्स करन; TPR - जेम्स एशर; द्विभाषी विधि - सी.जे. डॉडसन।
  • पाठ्यपुस्तक एक संसाधन है, पाठ्यचर्या नहीं: प्रामाणिक सामग्री, वास्तविक वस्तुएँ, फ़्लैश कार्ड, ऑडियो-वीडियो और बाल साहित्य जोड़ें।
  • भाषा खेल कम चिंता वाले वातावरण में उद्देश्यपूर्ण अभ्यास देते हैं और उनमें हर बच्चे की भागीदारी होनी चाहिए।

एक नज़र में दोहराव

एंथनी 1963: उपागम, विधि, तकनीक; व्याकरण-अनुवाद: शास्त्रीय, निगमन, अनुवाद, बोलने की उपेक्षा; प्रत्यक्ष विधि: केवल लक्ष्य भाषा, आगमन, बर्लिट्ज़ 1878; श्रव्य-भाषिक: सेना विधि, व्यवहारवाद, पैटर्न ड्रिल; संरचनात्मक उपागम; CLT: 1970 का दशक, विल्किन्स 1976, सूचना-अंतराल, सुगमकर्ता; TBLT: प्रभु की बैंगलोर परियोजना 1979-84, विलिस 1996; मौन विधि (गैटेग्नो), सजेस्टोपीडिया (लोज़ानोव), CLL (करन); पाठ्यपुस्तक एक संसाधन; बाल साहित्य; भाषा खेल।

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