8 में से पाठ 6 · भाषा शिक्षणशास्त्र (भाषा I और भाषा II)

व्याकरण और शब्द-भंडार का शिक्षण: आगमन और निगमन विधि, संदर्भ में व्याकरण

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व्याकरण किसलिए

जो भी बच्चा कोई भाषा बोलता है, वह उसका व्याकरण अंतर्निहित रूप से जानता है: हिंदी बोलने वाली पाँच वर्ष की बच्ची मैं जाती हूँ कहती है, कभी मैं जाती हैं नहीं, यद्यपि वह नियम नहीं बता सकती। विद्यालय का व्याकरण इस ज्ञान को स्पष्ट और परिष्कृत करता है, विशेषकर लिखित और औपचारिक भाषा के लिए। आदेशात्मक व्याकरण (prescriptive grammar) शुद्ध प्रयोग के नियम निर्धारित करता है; वर्णनात्मक व्याकरण (descriptive grammar) बताता है कि लोग वास्तव में भाषा का प्रयोग कैसे करते हैं। NCF 2005 आरंभिक वर्षों में व्याकरण को रटने योग्य परिभाषाओं और नियमों के रूप में पढ़ाने के विरुद्ध चेतावनी देती है; व्याकरण बच्चों को भाषा बेहतर समझने और प्रयोग करने में मदद करे, और यह अर्थपूर्ण पाठों और प्रयोग से उभरने पर सबसे अच्छा सीखा जाता है।

निगमन विधि

निगमन विधि (deductive method) में शिक्षक पहले नियम बताता है, फिर उदाहरण देता है, और फिर शिक्षार्थी अभ्यास करते हैं, यानी नियम से उदाहरण की ओर। यह तेज़ और व्यवस्थित है, अमूर्त नियम समझ सकने वाले बड़े शिक्षार्थियों के लिए उपयुक्त है, और व्याकरण-अनुवाद विधि का यही तरीका है। पर यह शिक्षक-केंद्रित है, शिक्षार्थियों को निष्क्रिय रखती है, और शिक्षार्थी नियम प्रायः भूल जाते हैं क्योंकि उन्होंने उसे स्वयं कभी खोजा नहीं था। उदाहरण: शिक्षक लिखता है कि संज्ञा किसी व्यक्ति, स्थान या वस्तु का नाम है, पाँच उदाहरण देता है और बच्चों से वाक्यों में संज्ञाओं को रेखांकित करने को कहता है।

आगमन विधि

आगमन विधि (inductive method) में शिक्षार्थी पहले संदर्भ में अनेक उदाहरणों से मिलते हैं, पैटर्न पहचानते हैं, शिक्षक के मार्गदर्शन में स्वयं नियम बनाते हैं और फिर उसे लागू करते हैं, यानी उदाहरण से नियम की ओर। यह शिक्षार्थी-केंद्रित है, गहरी समझ और लंबे समय तक धारण देती है और बच्चों के लिए उपयुक्त है, यद्यपि इसमें अधिक समय लगता है। उदाहरण: बच्चे भूतकाल में लिखी एक छोटी अंग्रेज़ी कहानी पढ़ते हैं, पात्रों ने जो किया उसकी सूची बनाते हैं, देखते हैं कि अधिकांश क्रियाओं में -ed लगता है जबकि कुछ का रूप बदल जाता है (went, saw), और नियम बनाते हैं; हिंदी में वे लड़का खेलता है और लड़की खेलती है जैसे वाक्य इकट्ठे करके खोजते हैं कि लिंग के साथ क्रिया कैसे बदलती है। प्रत्यक्ष विधि और संप्रेषणात्मक उपागम आगमन का प्रयोग करते हैं, और CTET विद्यालयी शिक्षार्थियों के लिए आगमनात्मक, संदर्भ-आधारित उपागम को बेहतर मानता है।

संदर्भ में व्याकरण और संप्रेषणात्मक उपागम

संदर्भ में व्याकरण का अर्थ है किसी संरचना को ऐसे पाठ या स्थिति के माध्यम से पढ़ाना जिसमें वह स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त होती है: दिनचर्या के वर्णन से सामान्य वर्तमान काल, दो जानवरों की तुलना से तुलनात्मक रूप, और किसी व्यंजन की विधि से आज्ञार्थक वाक्य। डेल हाइम्स ने तर्क दिया कि भाषा जानने का अर्थ केवल उसका व्याकरण जानना नहीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों में उसका उचित प्रयोग जानना भी है, जिसे उन्होंने संप्रेषणात्मक क्षमता (communicative competence) कहा। माइकल कैनेल और मेरिल स्वेन (1980) ने इसे व्याकरणिक, समाजभाषिक और रणनीतिक क्षमता में बाँटा, और कैनेल (1983) ने इसमें प्रोक्ति (discourse) क्षमता जोड़ी। संप्रेषणात्मक उपागम में व्याकरण अर्थ की सेवा करता है: शिक्षार्थी वास्तविक कार्यों के लिए भाषा का प्रयोग करते हैं, और शिक्षक पहले से अलग-थलग नियम पढ़ाने के बजाय आवश्यकता पड़ने पर किसी रूप की ओर संक्षेप में ध्यान दिलाता है।

किसी शब्द को जानने का अर्थ

किसी शब्द को जानने का अर्थ है उसकी ध्वनि और वर्तनी, उसके अर्थ, वाक्य में उसका प्रयोग, उसके साथ आने वाले शब्द (सहप्रयोग या collocation, जैसे अंग्रेज़ी में heavy rain, न कि strong rain), उसका शब्द-परिवार, और यह जानना कि उसका प्रयोग कब उचित है। ग्रहणात्मक शब्द-भंडार, यानी सुनने और पढ़ने में समझे जाने वाले शब्द, हमेशा अभिव्यक्तात्मक शब्द-भंडार, यानी बोलने और लिखने में प्रयुक्त शब्दों, से बड़ा होता है। शब्द भिन्न-भिन्न संदर्भों में बार-बार मिलने से धीरे-धीरे सीखे जाते हैं, इसीलिए व्यापक पठन नए शब्दों का सबसे बड़ा स्रोत है। अर्थ सहित शब्दों की सूचियाँ रटवाने से बहुत कम प्रयोग योग्य ज्ञान मिलता है।

शब्द-भंडार का निर्माण

छोटे बच्चे नए शब्द वास्तविक वस्तुओं (realia), चित्रों, क्रियाओं, मूक अभिनय और संपूर्ण शारीरिक प्रतिक्रिया (TPR) से सीखते हैं। बच्चों को शब्दकोश देखने से पहले संदर्भ से अर्थ का अनुमान लगाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। उपयोगी गतिविधियों में शब्द-जाल या अर्थ-मानचित्र (बारिश से जुड़े सभी शब्द), शब्द-दीवार, व्यक्तिगत शब्द-पुस्तिका, शब्द-परिवार और उपसर्ग-प्रत्यय से शब्द-निर्माण (happy, unhappy, happiness; सफल, असफल, सफलता), संदर्भ में पर्यायवाची और विलोम, मिलान और छँटाई के खेल, वर्ग पहेली, और अंत्याक्षरी जैसे भाषा खेल शामिल हैं। नए शब्दों का बोलने और लिखने में फिर से प्रयोग होना चाहिए ताकि वे अभिव्यक्तात्मक शब्द-भंडार का हिस्सा बनें।

CTET क्या पूछता है

आगमन विधि उदाहरण से नियम की ओर चलती है और बच्चों के लिए बेहतर है; व्याकरण संदर्भ में और प्रयोग के माध्यम से पढ़ाया जाए; संप्रेषणात्मक क्षमता हाइम्स का शब्द है; शब्द-भंडार पठन, संदर्भ और बार-बार प्रयोग से बढ़ता है, रटी हुई सूचियों से नहीं; और शब्दकोश से पहले संदर्भ से अर्थ का अनुमान आता है।

मुख्य तथ्य

  • निगमन विधि: पहले नियम, फिर उदाहरण, फिर अभ्यास; शिक्षक-केंद्रित और तेज़; व्याकरण-अनुवाद विधि में प्रयुक्त।
  • आगमन विधि: संदर्भ में उदाहरण, शिक्षार्थी नियम खोजते हैं, फिर अभ्यास; शिक्षार्थी-केंद्रित, गहरा धारण; बच्चों के लिए बेहतर।
  • आदेशात्मक व्याकरण बताता है कि कैसे बोलना या लिखना चाहिए; वर्णनात्मक व्याकरण बताता है कि लोग वास्तव में भाषा का प्रयोग कैसे करते हैं।
  • संदर्भ में व्याकरण: दिनचर्या से सामान्य वर्तमान काल, जानवरों की तुलना से तुलनात्मक रूप, व्यंजन-विधि से आज्ञार्थक वाक्य।
  • संप्रेषणात्मक क्षमता: डेल हाइम्स; घटक (कैनेल और स्वेन, 1980): व्याकरणिक, समाजभाषिक, रणनीतिक; प्रोक्ति क्षमता कैनेल (1983) ने जोड़ी।
  • ग्रहणात्मक शब्द-भंडार (समझे गए शब्द) अभिव्यक्तात्मक शब्द-भंडार (प्रयुक्त शब्द) से बड़ा होता है; किसी शब्द से विविध संदर्भों में अनेक बार मिलना ज़रूरी है।
  • शब्द-भंडार गतिविधियाँ: वास्तविक वस्तुएँ, चित्र, मूक अभिनय, TPR, शब्द-जाल, शब्द-दीवार, शब्द-परिवार, उपसर्ग-प्रत्यय, संदर्भ से अनुमान, शब्द-खेल।
  • शब्द-निर्माण: happy, unhappy, happiness; हिंदी में सफल, असफल, सफलता (उपसर्ग अ-, प्रत्यय -ता)।
  • बच्चे अपनी घर की भाषा का व्याकरण अंतर्निहित रूप से पहले से जानते हैं; विद्यालय का व्याकरण उसे शून्य से नहीं सिखाता, बल्कि स्पष्ट करता है।

एक नज़र में दोहराव

विद्यालय से पहले अंतर्निहित व्याकरण का ज्ञान; आदेशात्मक बनाम वर्णनात्मक व्याकरण; निगमन: नियम से उदाहरण, शिक्षक-केंद्रित, व्याकरण-अनुवाद; आगमन: उदाहरण से नियम, शिक्षार्थी-केंद्रित, बेहतर; संदर्भ में व्याकरण; हाइम्स: संप्रेषणात्मक क्षमता; कैनेल और स्वेन 1980: व्याकरणिक, समाजभाषिक, रणनीतिक; कैनेल 1983: प्रोक्ति; ग्रहणात्मक बनाम अभिव्यक्तात्मक शब्द-भंडार; सहप्रयोग; वास्तविक वस्तुएँ, शब्द-जाल, शब्द-दीवार, उपसर्ग-प्रत्यय, संदर्भ से अनुमान।

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